संपत्ति के संकेंद्रण और धर्म की राजनीति के बीच है सीधा रिश्ता

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राज्य, सत्ता और धर्म

एक पुस्तक है जिसका नाम है प्रोविंसलाइजिंग यूरोप जिसके लेखक दीपेश चक्रवर्ती हैं। इस पुस्तक का एक तर्क है कि अगर आपको यूरोप का विरोध करना है तो भी आपको उनकी भाषा, उनकी तर्क पद्धति, उनकी ज्ञानमीमांसा में ही विरोध करना पड़ेगा। आप अपनी भाषा (भारतीय), तर्क पद्धति, ज्ञानमीमांसा, ज्ञान परंपरा और आदर्श के आधार पर यूरोप का विरोध नहीं कर सकते। अंग्रेजों ने जब भारतीयों को गुलाम बनाया तो केवल राजनीतिक या आर्थिक तौर पर ही गुलाम नहीं बनाया बल्कि सांस्कृतिक तौर पर भी गुलाम बनाया। यहां तक कि आपकी पूरी ज्ञान परंपरा को भी उन्होंने नष्ट कर दिया। उन्होंने जो इतिहास दृष्टि दी, उसी इतिहास दृष्टि से आज हम भी इतिहास को देखते हैं जैसे हिंदू काल फिर मुस्लिम काल और आधुनिक काल (ईसाई काल नहीं, है ना मजेदार बात)। अंग्रेजों ने जो शिक्षा पद्धति लागू की वह आज भी जस की तस हमारे देश में लागू है। हमारा सोचने का तरीका वही है जो इस शिक्षा पद्धति से निर्मित होता है। अंग्रेज जब भारत आए तो साथ में ही ईसाई मिशनरी भी उनके साथ थी। जिसकी प्रेरणा से विवेकानंद ने भी हिंदू धर्म को एक मिशन के ढर्रे पर रामकृष्ण मिशन के जरिए आगे बढ़ाने की बात सोची। अट्ठारह सौ सत्तावन के प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष को शिकस्त देने के बाद अंग्रेजों ने एक नीति बनाई: बांटो और राज करो। हालांकि इस नीति ने कितना प्रभाव भारतीयों पर डाला कहना मुश्किल है लेकिन 1930 के दशक के आसपास जब संख्या बल (बहुसंख्या) की प्रतियोगिता के आधार पर संसदीय चुनाव की शुरुआत हुई तब से जाति और धर्म ने राजनीतिक रंग लेना ठीक से शुरू किया। हालांकि हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग की अवसरवाद की पराकाष्ठा देखिए कि सांप्रदायिक राजनीति के आधार पर चुनाव लड़ने के बाद भी दोनों ने मिलकर कई प्रांतों में सरकार बनाई। 9/11 की घटना के बाद आतंकवाद मुस्लिम आतंकवाद हो गया। जिस ओसामा बिन लादेन को अमेरिका ने प्रशिक्षित किया था और रुस के खिलाफ चेचन्या में तमाम हथियारों के साथ तैनात किया था, तेल के व्यापार में हिस्सेदारी को लेकर जो फसाद शुरू हुआ उसकी अंतिम परिणति उसे दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी होने का तमगा उसी अमेरिकी सरकार ने दिया जिसने उसे प्रशिक्षित किया था। मध्य एशिया में खास तौर पर तेल उत्पादक देशों में विकसित यूरोपीय देशों एवं अमेरिका की आर्थिक नीतियों ने इस आतंकवाद को पैदा किया जो धार्मिक रूप लिए हुए हैं हालांकि यह आर्थिक और राजनीतिक ज्यादा है। तेल के व्यापार पर पश्चिम यूरोप के देशों एवं अमेरिका के वर्चस्व को गलत तरीके से दी गई यह चुनौती है। इसका धर्म से कोई लेना देना नहीं है जितना कि अर्थ की राजनीति से लेना देना। 9/11 की घटना के बाद से दुनिया के अलग-अलग देशों ने इस आतंकवाद का फायदा अपनी राजनीति चमकाने में किया। 90 के दशक में ही एक तरफ जहां भारत की अर्थव्यवस्था का दरवाजा खोला गया (बाद में जिसे मनमोहन सिंह और नरसिंह राव ने औपचारिक रूप से अंजाम दिया था ) दूसरी तरफ राजीव गांधी ने राम जन्मभूमि का भी ताला खोला। दोनों एक दूसरे से जुड़ी हुई घटनाएं हैं। हालांकि कांग्रेस इसका फायदा नहीं उठा पाई। इसकी अगली कड़ी में भारतीय जनता पार्टी ने एक तरफ जोरदार तरीके से नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को लागू किया तथा दूसरी तरफ हिंदुत्व की राजनीति का भी इस्तेमाल किया।

अब मैं हिंदुत्व की राजनीति पर बात करना चाहता हूं। मेरा कहना है की इस्लामी आतंकवाद जिसे कहते हैं उसे इस्लाम धर्म पर आधारित माना जाता है। इस्लाम एकेश्वरवाद, एक पैगंबर और एक किताब कुरान पर आधारित धर्म है। आतंकवाद के आर्थिक, राजनीतिक स्वरूप को छोड़कर केवल उसे धर्म और धार्मिक स्वरूप में खोजा जाने लगता है। और इस तरह इस्लाम को ही आतंकवाद का पर्याय घोषित किया जाने लगता है। हालांकि हर धर्म में दो तरह की धाराएं होती हैं: एक उदार और दूसरी रूढ़ीवादी। एक तरफ इस्लाम में सूफी धारा है तो दूसरी तरफ वहाबी धारा है। नवीं और दसवीं शताब्दी में इस्लाम की रूढ़िवादी धारा प्रभावी होती जाती है और एक तरह से मद्धेशिया में इस्लाम का विकास रुक जाता है। जिस इस्लामी देशों ने ग्रीक ज्ञान-विज्ञान को संजोकर रखा, जिस ज्ञान को लेकर यूरोप में एलाइनमेंट होता है और ज्ञान-विज्ञान में वह दुनिया के अन्य देशों से आगे निकल जाता है उसी ज्ञान को सदियों संजोकर रखने वाला इस्लामी देश रूढ़ हो जाता है जैसे लगता है वह ज्ञान विज्ञान के खिलाफ है। किसी भी धर्म का विकास तभी होता है जब उसमें आत्मालोचना की परम्परा हमेशा मौजूद हो ताकि समय-समय पर उसमें बदलाव होते रहें और उसे पुनर्परिभाषित और पुनर्व्याख्यायित किया जाता रहे। भारत में खास तौर पर हिंदू धर्म में यह आत्म-आलोचना की प्रक्रिया लगातार जारी रही और इसमें कई तरह के पंथ पैदा हुए। और यह किसी न किसी रूप में आधुनिक काल तक विवेकानंद, अरविंद, टैगोर और गांधी तक जारी रहा और आज भी जारी है ।

जब पश्चिम यूरोपीय देशों तथा अमेरिका के अर्थ की राजनीति के विरोध ने इस्लाम का धर्म-रूप ग्रहण किया। एक तरफ जहां पश्चिम यूरोपीय देश तथा अमेरिका अपनी अर्थ की राजनीति को मध्य एशिया के तेल उत्पादक देशों पर लागू करते हैं वहीं दूसरी तरफ वे आतंकवादी संगठनों को भी पैसा देते हैं और उसे पालते पोसते हैं ताकि इनकी राजनीति और नीतियों का विरोध करने वाली वास्तविक जन आधारित राजनीतिक धारा ना पैदा हो जाए। भारत और पाकिस्तान भी विकसित देशों के अर्थ के राजनीति के शिकार हैं और अपनी जनता को बेवकूफ बनाने के लिए एक दूसरे का विरोध करते रहते हैं। हिंदुत्व की राजनीति के समर्थकों की समस्या यह है कि उन्हें यह लगता है कि वह इस्लाम और इस्लामी आतंकवाद का विरोध कर रहे हैं लेकिन वास्तव में वे चाहते हैं कि हिंदू धर्म जो कि एक उदारवादी धर्म है और बहुदेववाद पर आधारित है उसे इस्लाम की तरह एक किताब, एक ईश्वर पर आधारित किया जाए और उसे मिलिटेंट बनाया जाए। दरअसल वह हिंदू धर्म को वहाबी इस्लाम के मिलिटेंट या आतंकवादी स्वरूप में ढालना चाहते हैं। यही इनकी समस्या है। भारतीय इतिहास में राज्य या राजनीति धर्म से ऊपर नहीं मानी जाती थी। जब किसी राजा का राज्याभिषेक होता था तो सांकेतिक रूप से (धर्म) दंड से राजा के सिर पर प्रहार किया जाता था उसका मतलब होता था कि राजा के ऊपर धर्म दंड है यानी धर्म राजनीति से ऊपर है। आज धर्म का दर्जा गिरा दिया गया है। धर्म को अब राजनीति की गुलामी में जोत दिया गया है और कहा जा रहा है कि यही भारत का असली इतिहास एवं संस्कृति है।

हिंदू धर्म की दो तरह की व्याख्याएं मौजूद है। एक उसे कट्टरपंथ की ओर ले जाती है तो दूसरा उसे मुक्तिकामी बनाती हैं,इसे लिब्रेशन थियोलॉजी के नाम से भी जाना जाता है।अनंतानंद रामबचन ने कई किताब लिखी है लेकिन उसमें एक महत्वपूर्ण किताब है हिंदू थियोलॉजी ऑफ लिबरेशन। लिबरेशन थियोलॉजी का यह मानना है की मानव के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आत्मीय मुक्ति धर्म का काम है। “लिबरेशन थियोलॉजी का मुख्य तर्क है कि सभी धर्म मूलतः समाज में व्याप्त बुराइयों को समाप्त करने के लिए लोकप्रिय हुए हैं। कालांतर में धर्म कदाचित अपने उद्देश्यों से भटक गए। आज के समय में व्याप्त बुराई की जड़ पूंजीवाद है इसलिए इसके विरुद्ध नए धर्म युद्ध की आवश्यकता है। निकारागुआ जैसे कई देशों में इस प्रकार के धार्मिक आंदोलनों में साम्यवादी क्रांति के प्रति न केवल सहिष्णुता रही है बल्कि उसमें खुल कर हिस्सा लिया है। इस प्रकार के आंदोलन ने समाज के दबे कुचले वर्गों को एकजुट किया है।“(ज्ञान की राजनीति: समाज अध्ययन और भारतीय चिंतन- मणींद्र नाथ ठाकुर, सेतु प्रकाशन 2022, पृष्ठ संख्या-213)

लैटिन अमेरिकी देशों में भी लिबरेशन थियोलॉजी के आधार पर कई संघर्ष हुए हैं। लिबरेशन थियोलॉजी अकर्मण्यता को नहीं बल्कि इंगेजमेंट की मांग करता है। लेकिन वह मानव के एक हिस्से को दूसरे से नहीं लड़ाता।

लिबरेशन थियोलॉजी की बात करते हुए मुझे आंबेडकर याद आते हैं।धर्म के लोकहितवादी स्वरूप के बारे में आंबेडकर मानते थे कि “धर्म के वस्तुतः मौलिक सिद्धांतों के आधार पर कुछ नियमों का विकास कर लिया जाता है और फिर सिद्धांतों को भूलकर नियमों को ही धर्म का मूल मान लिया जाता है। इन नियमों के विकास में समाज के शक्ति संतुलन का भी काफी हाथ रहता है। प्राकृतिक संपदा पर अधिकार और सामाजिक संबंधों के निर्माण के बीच भी एक रिश्ता होता है। धर्म का स्वरूप इन सब से प्रभावित होता है। हिंदू धर्म में जाति प्रथा के द्वारा समाज के असमान संबंधों को स्थाई रूप प्रदान कर दिया है। आंबेडकर के अनुसार इन नियमों को हटाकर पुनः सिद्धांतों के धर्म की स्थापना की आवश्यकता है। आंबेडकर धर्म को खारिज नहीं करते थे बल्कि उसमें भारी सुधार की आवश्यकता महसूस करते थे ताकि उसका मुक्तिकामी स्वरूप निखर सके।“ (ज्ञान की राजनीति: समाज अध्ययन और भारतीय चिंतन- मणींद्र नाथ ठाकुर, सेतु प्रकाशन 2022, पृष्ठ संख्या-287)

समस्या यह है कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्था और राजनीति जो कहीं पर कल्याणकारी राज्य के रूप में तो कहीं पर तानाशाही के रूप में मौजूद है। उसकी आलोचना कैसे की जाए और उसको खत्म करने का क्या प्रोग्राम हो सकता है।

आज पूरी दुनिया में नव उदारवाद की आर्थिक नीतियां और राजनीति का वर्चस्व है जिसने पूरी दुनिया के लोगों का जीना हराम कर रखा है। जो विकसित देश इन नीतियों का फायदा उठाते हैं या कोई देश जिसका शासक वर्ग इन नीतियों का फायदा उठाता है वह इसके खिलाफ कोई प्रोग्राम नहीं लेता बल्कि लोगों को यह बताता है कि कैसे एक खास धर्म, जाति, नस्ल… के लोग समस्या है ना कि नव उदारवादी आर्थिक और राजनीतिक नीति। अगर आतंकवाद का विरोध करना है या उसे खत्म करना है तो इन नव उदारवादी आर्थिक नीतियों और राजनीति का विरोध करना होगा उसे खत्म करना होगा। ऐसा नहीं होगा कि आप नव उदारवादी नीतियों और राजनीति का खात्मा ना करें और आतंकवाद खत्म हो जाए।

विकसित यूरोपीय देश और अमेरिकी हित को साधने वाली नव उदारवादी आर्थिक नीति और राजनीति ने दुनिया के हर हिस्से को आपस में लड़ा रखा है तथा इनका समर्थन करने वाले देश भी अपने देश में जनता के एक हिस्से को दूसरे से लड़ाते रहते हैं। किसी भी राजनीतिक आंदोलन के लिए यह सबसे आसान रास्ता होता है कि उसे धार्मिक आवरण प्रदान किया जाए ताकि लोगों के दिलों में जो धर्म के प्रति प्रेम और वैधता है उसे हासिल किया जा सके। एक धर्म का कट्टरपंथ दूसरे धर्म के कट्टरपंथ के लिए खाद-पानी का काम करता है। और दूसरे धर्म का कट्टरपंथ पलट कर पहले धर्म के कट्टरपंथ को और मजबूत करता है।दोनों एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक होते हैं।

हिंदुत्व की राजनीति करने वाले लोगों के पास क्या नव उदारवादी आर्थिक नीतियों की कोई आलोचना मौजूद है? या इसे खत्म करने का कोई प्रोग्राम है? उत्तर है नहीं, क्योंकि वे तो इसके कट्टर समर्थक है। दुनिया में और भारत में संपत्ति का संकेंद्रण जितना व्यापक रूप लेता जा रहा है उतना ही धर्म की राजनीति चमकती जा रही है। भारत के मुश्किल से 1% लोगों के पास भारत की आय का 74% से भी ज्यादा का हिस्सा है, भारत में अरबपतियों-करोड़पतिओं की संख्या बढ़ती जा रही है, लोगों की गरीबी दिनों-दिन बढ़ती जा रही है लेकिन हिंदुओं के लिए समस्या तो केवल इस्लाम ही है। उसी तरह तथाकथित इस्लामिक देशों के शासक वर्गों की समस्या भी मोहम्मद साहब के खिलाफ की गई बातें हैं ना कि खुद सारी संपत्ति पर कब्जा करके उनका बैठना क्यों ना हो आखिर वह भी तो नव उदारवादी आर्थिक नीतियों एवं राजनीति के समर्थक और संरक्षक हैं।

  – नरेश कुमार

(लखनऊ में भौतिक-शास्त्र का अध्यापन करते हैं एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं। संपर्क:+91-9450011433)

 

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