नरेंद्र कुमार की कविताः धुंआ धुंआ आकाश

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धुंआ धुंआ आकाश!
जब समय का प्रहरी करेगा हिसाब
किसने कितना भोगा माल
और कितना तबाह किया पर्यावरण
तब हमारे बच्चे
हामिद की तरह सीना तान कर कहेंगे
हमारी साधनहीनता ही था
हमारा चिमटा
हमने धुंआ धुंआ नहीं किया था आकाश
हमने जब्बकर रखा था अपना
बाल मन
हामिद की तरह।

हमारी स्मृतियों में उभरते हैं
कारखाने की धमन भट्ठियों के पास से
लौट आए खांसते पिता
अंधेरी कोठरियों में बल्ब को घेरे
धुंए की लहराती परतें
और चूल्हे को फूंकते बेहाल हो गई
मां की आंखें
मेरे हिस्से में पहले से ही है
धुंए का साम्राज्य
धुंआ जो लगातार गहरा होता जा रहा है
और उसके बीच बल्ब की मद्धिम रोशनी
हम तक आने के लिए जूझ रही है

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