प्रेम का संवेग न रोके रुकता है न जोड़े जुड़ता है

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*यथार्थ और अभिनय*
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प्रेम के दो रूप है
एक यथार्थ
दूसरा अभिनय
यथार्थ का कोई प्लाट नहीं
अनुभूतियों का प्लाट होता है
रोना भी यथार्थ है
हँसना भी यथार्थ है
जो होगा
वह सचमुच होगा
उसकी कोई कल्पना नहीं है
उसकी कोई अनुभूति नहीं है
बुरा होगा तो होगा
अच्छा होगा तो होगा
उसकी मीमांसा
उसकी घटनाओं का मूल रूप है
उसका मंचन
उसकी अनुभूतियों का अभिनय है
प्रेम में करार नहीं होता
प्रेम में तकरार जरूर होता है
प्रेम में अभिनय प्रेम नहीं है
प्रेम में अभिनय धोखा है
प्रेम विनिमय नहीं है
प्रेम नियम है
प्रेम अनुभूतियों से नहीं होता
प्रेम से अनुभूतियाँ होती हैं
विक्षिप्त में प्रेम नहीं होता
प्रेम में विक्षिप्त होता है
प्रेम करके प्रेम रुकता नहीं
रोके रुक जाए वह प्रेम नहीं
दिल में प्रेम जन्म लेता है
प्रेम में दिल जन्म नहीं लेता है
परिणय में प्रेम हो न हो
प्रेम पवित्र परिणय है
प्रेम की योजनाएँ प्रेम नहीं होतीं
प्रेम की चाह भी प्रेम नहीं है
प्रेम की महत्त्वाकांक्षा भी प्रेम नहीं है
प्रेम प्रवृत्तियों का स्वाभाविक मिलन है
प्रवृत्तियाँ मन की जैविकीय संरचना है
प्रेम का संवेग न रोके रुकता है
न जोड़े जुड़ता है
प्रेम उस अदृश्य उत्पत्ति की तरह है
जो चाहकर उत्पन्न नहीं हो सकता है
प्रेम एक केमिकल लोचा है
जिसकी गतिशीलता समाप्त नहीं होती
चाहो तो प्रयोग करके देख लें
मैं यहाँ रुकने की कोशिश करता हूँ
तुम वहाँ रुकने की कोशिश करो।
R.D Anand

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