प्रेम को ज़िंदा रखने की ज़िद भी करती है स्त्री

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स्त्री जब प्रेम करती है तो
पृथ्वी अपनी धुरी पर थोड़ा तेज़ घूमने लगती है
स्त्री जब प्रेम करती है तो
यह ब्रह्मांड थोड़ा फैल जाता है
स्त्री जब प्रेम करती है तो
चीटियाँ अपने से दस गुनी बड़ी शक्कर की डली ठेलकर
बिल तक ले जाने में कामयाब हो जाती है
लेकिन जल्द ही ब्रह्मांड फिर सिकुड़ने लगता है
पृथ्वी अपनी धुरी पर सुस्त होने लगती है
चीटियों का कोई जोर अब डली पर नहीं लगता
स्त्री का प्रेम
संबंधों के अंधेरे कुएं में छूट गयी बाल्टी सा डूबने लगता है
स्त्री के हाथ से फिसलने लगता है
उसका इतिहास और उसका भविष्य
यह प्रक्रिया दोहराई जाती है
अनगिनत बार…
फिर भी स्त्री प्रेम करना नहीं छोड़ती
उसका प्रेम दफ़्न होता जाता है
अंधेरे कुएं में
प्रेम के ऊपर प्रेम की परत दर परत इकट्ठा होने लगती है
जैसे इकट्ठा होती है पेड़ से गिरी पत्तियां एक के ऊपर एक सदियों तक…
और बन जाती है ईंधन एक लंबे समय बाद..
ठीक उसी तरह परत दर परत इकट्ठा स्त्री का प्रेम
एक लंबे अंधेरे समय बाद
बन जाता है बगावत
इसलिए, स्त्री अब महज प्रेम ही नहीं करती
प्रेम को ज़िंदा रखने की ज़िद भी करती है,
इसलिए, स्त्री अब महज प्रेम ही नहीं करती
प्रेम के लिए
दुनिया को सुन्दर बनाने की जद्दोजहद भी करती है….
मनीष आज़ाद

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