कविता का समकाल : बर्बर समय का सच

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अजित कुमार राय
आज की कथावाची कंप्यूटर कविता वैश्वीकरण के विरोध में नहीं है अपितु वैश्वीकरण की शिकार है। यही नहीं की पाश्चात्य कविताओं के बिम्बों को हिंदी में अनूदित करने का फैशन जोरों पर है बल्कि बिना अपनी भाषा में मान्यता प्राप्त किये हर कवि ग्लोबल हो जाने की लालसा से पीड़ित है। कई नए कवि अपनी कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद छपवाने मेज ज़्यादा दिलचस्पी लेते हैं। महेंद्र भटनागर का बहुत पहले एक संग्रह आया था – ‘राग-संवेदन’। उसमें पहले पेज पर अंग्रेजी अनुवाद और दूसरे पृष्ठ पर मूल हिंदी कविता छपी थी। अब शायद हिंदी को भी हमें अंग्रेजी माध्यम से समझना पड़ेगा। कविता की राह में विमर्शों के स्पीड ब्रेकर तो हैं ही, बौद्धिक व्यायाम बहुत अधिक है। आज विखंडनवादी बाजार बहुत गर्म है और कविता से काव्यात्मकता उसी प्रकार विदा ले चुकी है जिस प्रकार कहानी से कहानीपन गायब होता चला गया है।
हमारी निगाह जब मिठाई की दुकानों पर जाती है तो वहां उपयोगितावाद के साथ-साथ कलात्मक सौष्ठव का भी संश्लेष दृष्टिगोचर होता है। कविता आज सिर्फ कवियों से संवाद के लिए लिखी जा रही है क्योंकि पाठक तो इस काव्य-लोक से कबका निर्वासित हो चुका था। आलोचकों ने भी इन पर गंभीर विमर्श करना छोड़ दिया है। यहाँ आलोचना ने भी निष्पक्ष और ईमानदार विश्लेषण का अपना स्वधर्म छोड़ दिया है और कविता के वर्कशॉप से कारीगर अधिक पैदा हो रहे हैं, कलाकार कम। साथ ही एक नए पाखण्ड का भी उदय हुआ है। वातानुकूलित कक्षों में बैठकर मजदूर और किसानों के हाड़तोड़ श्रम पर कवितायेँ लिखी जा रही हैं जिसमें स्वानुभूति और तरल संवेदना सर्वथा अनुपस्थित है इसलिए कवितायेँ निष्प्राण प्रतीत होती हैं। इस यथार्थबोध की जड़ता को तोड़ते हुए रचनात्मक यथार्थ को कविता में विन्यस्त करना होगा।
समकालीन दिखने के लिए तात्कालिक मुद्दों , घटनाओं या सतही यथार्थ को विषय बनाने के बजाय उसमें कल्पनाशीलता के द्वारा आकस्मिक सृजनशीलता आविष्कृत करनी होगी। यद्यपि आज सूचना-क्रांतिऔर सोशल मीडिया के युग में इस कल्पनाशीलता का अभूतपूर्व विस्फोट दिखाई पड़ता है। जरूरत है धीरज और मननशीलता क साथ उसे गहरे सर्जनात्मक प्रारूप में विन्यस्त करने की। साथ ही अग्निवार्षि कवियों को भी अग्निदीक्षा लेनी होगी। देखा गया है कि अधिकांश कवि अपनी वर्गीय चेतना में अपने वर्ग समाज से ऊपर उठकर अपने को विशिष्ट वर्ग का नागरिक समझने लगते हैं। इस प्रवृत्ति से उबरना होगा। क्रान्ति चेतना भी आज कविता में आंदोलनात्मक न होकर विमर्शात्मक हो गयी है। बाजार के प्रलोभनों से आविष्ट रहते हुए हम बाजार को गाली देते रहेंगे तो अविश्वासनीय कविता की ही सृष्टि करेंगे।
आज आम आदमी को केंद्र में रखकर लिखी गई कविताओं को कोई आम जान नहीं पढता यह जनवादी कविता की एक सांस्कृतिक विडम्बना है। आज समाजशास्त्रीय संरचना के साथ-साथ कविता के अपने रूपगठन और आतंरिक विनियोजन पर भी विचार होना चाहिए। यह भी देखना होगा की विकासशील समाजों में पूँजी, उत्पादन और मानवीय अपेक्षाओं के बीच विपर्यय की ऐसी स्थितियां हैं। यह विपर्यय एक दूसरे स्तर पर भी देखा जा सकता है। पंकज चतुर्वेदी और अष्टभुजा शुक्ल जैसे लेखक भी हैं जो कि एक श्रेष्ठ आलोचक हैं किंतु औसत दर्जे के कवि हैं।
विपर्यय यह भी है कि श्रेष्ठ नावगीतकारों को अपदस्थ कर ढेर सारे घटिया कवियों ने उनके स्थनीयमान पर कब्जा कर लिया है और उनकी रफ रचनायें पत्र-पत्रिकाओं में कथित प्रगतिशीलता के नाम पर धड़ल्ले से छप रही है। बात के भीतर से बात निकालने में अक्षम आइडियावाद की मारी इन गद्यातप कविताओं को कौन समझाए कि हमारे इस दौर में कविता किसी नयी अवधारणा को बनाने का काम नही करती बल्कि वह यथार्थ और विचार के ठीक बीच बैठे हुए एक बेहद बुनियादी विरोधाभास को उठाती है।
विजय कुमार कहते हैं- ” मौजूदा समय में यह दुनिया जो कि अब पहले के समयों की तरह सरल रैखिक और ऐकान्तिक रूप से तर्कपूर्ण नहीं रही, जहाँ मनुष्य के किसी बड़े स्वप्न या आदर्श को लगातार झुठलाया जा रहा है और परस्पर विरोधी हित लड़ने के बजाय पिघलकर एक कोलाज तैयार कर दे रहे हैं। पूँजी का अबाधित प्रसार और टेक्नोलॉजी का विकास जिन शक्तियों के हाथों में हैं वे एक खास तरह का विश्वव्यापी विमर्श रच रही हैं। आज निर्धारित फ्रेम में चीज़ों के अर्थों को निपेक्ष, निर्बंध और समतल दिखाने की पुरजोर कोशिशें हैं।”
आज की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि हमें लगता है कि कोई और यातना सह रहा है और हम सुरक्षित हैं। हमे आमानवीयता की तफसीलें वो लोग देते हैं जो त्रासदियों के बाद बचे रह जाते हैं लेकिन उनसे हमारे संबंधों का फ्रेमवर्क कुछ बिचौलिया शक्तियां तय करती हैं।
ये शक्तियां हमारी प्रतिक्रियाओं तक को गढ़ती हैं। बाजार और टेक्नोलॉजी ने अज्ञात पर से पर्दा उठा दिया लेकिन साथ ही शीशे की दीवारें कड़ी कर दीं। आप देखते है पर मूव नहीं होते । यह एक भीतरी संघात है। देखने और महसूस करने के बीच की यह अलंघ्य दूरी धीरे-धीरे हमारे सिस्टम में चली आ रही है। संवेदनहीनता, पैसिविटी और विस्मृति की कुछ अजीबोगरीब बाधाएं पैदा हो रही हैं। हमारे समय में क्रूरताओं के ये नए आयाम हैं। दूसरे शब्दों में त्रासदियाँ भी अब प्रदर्शन की वस्तु बन गयी हैं। जो मनोरंजन के लिए निर्वियक्तिक ढंग से दर्शकों के सामने एक रोचक वृत्तान्त के रूप में प रोसकर उनसे वैधता हासिल कर लेना चाहती हैं।
सूचना, तथ्यों और बिम्बों के इस घटाटोप में हम अतीत नहीं , बल्कि वर्तमान के खँडहरों से अपनी कविता उठाते हैं और भावनाओं के प्राचीन भग्नावशेषों में एक संदेहवादी फैंसिंग उठाते हैं। वर्तमान के तदर्थवाद से ये कविताएं इस हद तक आत्मिक स्टार पर निपटती हैं की वह अपने सार तत्त्व में एक सार्वकालिक समय बन जाता है। केदारनाथ सिंह वचन के पीछे से झाँकती उनकी आभाओं को गिरफ्त में लेते हैं। वास्तव का रूप विवरणात्मकता, छूटे हुए अन्तरालों और तदार्थता क बिच से उठता है तथा यांत्रिक बने हुए संसार का पूरा परिदृश्य अचानक सजीव, सनसनीखेज और ताप से भरा हुआ लगने लगता है। इस कविता में वस्तुएं अपनी भावहीन पदार्थमयता से बहार निकलती हैं और एक आश्चर्यलोक का निर्माण करती हैं। केदारनाथ सिंह से प्रभावित होकर स्वप्निल श्रीवास्तव मौलिक सृजन के बजाय अनुसरण को काव्य मूल्य के रूप में आयत्त करते हुए बहुत सारी कवितायेँ लिखते हैं। कुमार अम्बुज ने एक सूक्ति गढ़ा था—
जिसके पास बंदूक है,
वही अमर है।
स्वप्निल श्रीवास्तव कहतेे हैं–
वे हमारे हाथों में
पिस्तौल थमाकर कहते हैं
उस आदमी को मार दो
अन्यथा तुम्हे मार दिया जायेगा।
इसके पीछे वे ताकतें हैं जो आदमी को इंसान की तरह जीने देना नहीं चाहती , भरसक उसे नफरत और दमन की अपनी व्यूह रचना के एक विवश सिपाही में बदल देना चाहती हैं किन्तु संसार बड़ा जटिल है । रघुवीर सहाय कहते हैं कि “जो व्यक्ति पीड़ित है वही इस व्यवस्था में किसी जगह पीड़क भी होगा। एक आसान करुणा इस सारे श्रृंखलाबद्ध पापाचार को खोल ही नहीं सकती।”
मुझे लगता है कि एक दलित के स्त्री-विमर्श और एक सामान्य स्त्री के दलित विमर्श को इसी अन्योन्याश्रित सम्बन्ध में देखा जाना चाहिए। इसीलिए कवि को लगता है कि मुझे अपना प्रेम प्रकट करने के लिए दूसरी पृथ्वी चाहिये क्योंकि यहाँखेल की पृष्ठभूमि में दूसरा खेल खेल रहे हैं राष्ट्राध्यक्ष, सटोरिये और दलाल। उनकी कविता में ठहरा हुआ समय तस्दीक करता है की घड़ी खराब है और घड़ी में रुक गया है वक्त। इस अमरुद के पेड़ उदास हैं क्योंकि उन्होंने नहीं देखे तोतों के झुण्ड, नहीं सुनी उनके गीत और बच्चों को भी नहीं मिला उनका अधखाया अमरुद —-
बताते हैं तोतों के पंख
राक्षस के कब्जे में हैं।
तोते नहीं आते तो पकते नहीं अमरुद।
लगता है इस कविता को आशुतोष दुबे ने पूरा किया है। वे भुवन का कुशक्षेम पूछते हैं—-
आसमान में काली बदली का झुकना था
की अनलिखे पेड़ की जड़ें पारदर्शी पृथ्वी के भीतर
भुवन के कुशलक्षेम का संवाद लेकर दौड़ने लगी
मैंने कलम जेब में रख ली जिसकी स्याही सूख गयी थी
और तभी टपका सुग्गे का अधखाया फल
इस तरह पूरा हुआ वह पेड़
जो लिखा नहीं जा सका।
इस प्रकार गहरे जीवनानुभवों हमेशा कविता से बाहर पड़ते हैं। अरुण कमल ने ‘ नए इलाके’ में एक ग्रामीण वनिता का शब्द-चित्र खींचा था जो ढिबरी या दीये की दीप्तिपाती लौ में दृष्टिगोचर होती है और उसका आनन् उद्भासित हो उठता है। रजेश जोशी ने अपनी एक प्रेम कविता में फोटोग्राफिक तकनीक का प्रयोग करते हुए प्रेयसी का छायातप चित्र खींचा था–
अचानक गुल होगयी बत्ती
घुप्प अँधेरा हो गया चारों तरफ
उसने टटोल कर ढूंढ़ी दियासलाई
और एक मोमबत्ती जलाई
आधे अँधेरे और आधे उजाले के बीच
उभरा उसका चेहरा
न जाने कितने दिनों बाद देखा मैंने
इस तरह उसका चेहरा
जैसे किसी और ग्रह से
देखा मैंने पृथ्वी को।
आज शायद कविता की यही केंद्रीय नियति भी बन गयी है। वह जागतिक यथार्थ को शायद किसी और ग्रह से देखती परखती है इसीलिए आज वह पाठकों के लिए किसी दुसरे ग्रहलोक को चीज़ बन गयी है।इसी भाव-साम्य की बहुत खूबसूरत और संवेद्य काव्यानुभूति अशोक बाजपेयी के यहाँ प्राप्त होती है—
अंतरिक्ष की किसी खिड़की से देखो
तो एक पतंग की तरह थरथराती हुई
नक्षत्रों के बियाबान में
एक हरी पत्ती की तरह कांपती हुई
शब्द की नोंक पर खतरनाक सी ठहरी हुई दुनिया।
आज कविता में भी फ़ास्ट फ़ूड और ड्राई फ़ूड कल्चर का प्रवेश हो चुका है। बोधिसत्व अपने अतीत को लाल भात के माध्यम से याद करते हैं—-
धीरे – धीरे उठान हुआ लाल भात का।
पहले थाली से फिर रसोई से,
फिर कोठिला से फिर खेत से
व्याहताओं, दूल्हनों के कोंछ से भी
देखा जाय तो लाल भात ही क्यों कृष्णा कपिला गायें, नन्दी और नान्दी भी अतीत की सन्दर्भ सूची में समा चुके हैं। कहीं कृषि संस्कृति भी संग्रहालय की वस्तु न बन जाए। समय के साथ बहुत कुछ पीछे छूटता चला गया, बहुत सारी चीज़ें खो गयीं
अन्तरों की भीड़ में
ध्रुव पंक्ति है खोयी कहीं पर।
मनोज कुमार झा भी गुमशुदे बच्चों या कवियों की फेहरिस्त में ही खुद को महसूस करते हैं—
तीस साल पहले माँ का हाथ छूट गया था गांव के मेले में
अभी तक जहाँ-तहाँ पुकारा जाता हूँ
गुम हुए बच्चों की फेहरिस्त में।
विजय बहादुर सिंह के संपादकत्व में पहले पहल वागर्थ में जब मनोज कुमार झा की कवितायेँ प्रकाशित हुई थी तो कथ्य और शिल्प दोनों ही स्तरों पर अपूर्व ताजगी का अनुभव हुआ था- मानो नारियल के भीतर उसका पानी बज रहा हो किन्तु बाद में उनकी बहुत सारी कविताएँ सरलीकरण का शिकार हुईं फिर भी उनकी कविताओं में कूट वक्रता सहज ही प्राप्त होती रहती है।
कुछ है इस साँझ की गंध में
जो देवताओं को सौंपे गए घी के दीयों से नहीं दब रही।
यह गन्ध गिद्धों के मरने की भी हो सकती है,
गौरैयों के गायब होने की भी हो सकती है
और इस समाज से किसानों के ऋण होने की भी हो सकती है। दरअसल उनकी कविता पोखर के पंक की तरह पाँवों को पकड़ लेती है जैसे बोधिसत्व को श्री राम सेंटर का पता पकड़ लेता है—-
हम किताबें खरीदने नहीं , उसे देखने जाते थे।
हम उससे कमीशन बढ़ाने और छूट देने का झगड़ा करते थे
वह कहती और छूट नहीं मिल सकती , मनाही है।
इस सन्दर्भ में मुझे वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा की प्रेम कविता याद आ रही है–
सब कुछ पार्थिव है यहाँ
लेकिन मुलाकातें नहीं हैं पार्थिव।
एक बार और मिलने के बाद भी
एक बार और मिलने की इच्छा पृथ्वी पर
कभी ख़त्म नहीं होगी।
दरअसल यह अपार्थिव प्रेम ही है जो हिंसा, जातिभेद, धर्मभेद आदि तमाम तरह के विभाजनों से युक्त इस समाज और धरती को जीने लायक बनाता है। मनोज कहते हैं —
मेरा जन्मस्थल धरती और मेरी माँ
के बीच का जल है आलोकमय,
अक्षांशों और देशान्तरों की रेखाओं को पोंछता।
प्रगतिशील कविता के अक्षांश और देशान्तर में प्रकृति और प्रेम काव्य निषिद्ध हो गया था किन्तु शरीर की अभियांत्रिकी को संबोधित रीतिकालीन परकीया प्रेम का स्त्री-विमर्श ने अद्यतन देहवादी संस्करण प्रस्तुत किया किन्तु इसका संकेद्रण कहानियों और उपन्यासों में ही अधिक हुआ, कविता का भी कुछ उससे मुक्त रही। रोमानी भावुकता को अतिक्रान्त कर नया कवि प्रेम को गले लगाता है पर एक बौद्धिक दूरी के साथ। रवींद्र स्वप्निल प्रजापति ने अपनी प्रेयसी से विश्लेष का गतिशील चित्र खींचा है–
तुमसे अलग होने का दर्द एक गतिशील दृश्य है।
तुमसे दूर होना
है यादों की ट्रेन का धीरे-धीरे जाना
पल-पल दूर होने और पल-पल बिखरना।
इस प्रेम को हरी झंडी दिखाते हुए कवि ने प्लेटफार्म पर सरकती ट्रेन पर सवार प्रेमिका को हाथ हिलाते देखते हुए अपनी ज़िन्दगी के प्लेटफार्म पर एक अपूरणीय खालीपन को महसूस किया जैसे किसी ने हवा को हवा से छीन लिया हो। यह बदला हुआ प्रेम है। कवि को लगता है–
कुछ समय बीत जाने के बाद
बदल देना चाहिए गाड़ियों के टायर
व्यवस्थाएं और कानूनों के अक्षर।
किन्तु यहाँ यह सवाल पूछा जा सकता है कि हम अपने माँ- बाप को कैसे बदल सकते हैं। अपनी मातृ-संस्कृति के साथ व्यभिचार मार्क्सवादी साहित्य से लेकर दलित-विमर्श और स्त्री-विमर्श करते आ रहे हैं किन्तु अब ‘स्त्रियाँ घर लौटती हैं ‘ किन्तु यह लौटना अब नए घर में होता है। प्रताड़ना, अन्याय और अत्याचार के प्रतीकार ,प्रतिरोध या प्रतिशोध करते-करते स्त्रियाँ दूर तक भटक गयी थीं। अब वह एक नए प्रेम की छाँव में विश्राम के लिए लौटती हैं।
स्त्रियाँ घर लौटती हैं
पश्चिम के आकाश में
आकुल वेग से उड़ती हुई
काली चिड़ियों की पाँत की तरह।
स्त्री एक साथ पूरे घर में लौटती है
स्त्री बच्चे की भूख में रोटी बनकर लौटती है।
वो आँगन की तुलसी और कनेर में लौट आती है
स्त्री है जो प्रायः स्त्री की तरह नहीं लौटती,
पत्नी, बहन, माँ या बेटी की तरह लौटती है
स्त्री चिड़िया सी लौटती है
और थोड़ी मिट्टी रोज़ पंजों में भर लाती है
और छोड़ देती है आँगन में
घर भी एक बच्चा है स्त्री के लिए
जो रोज़ थोड़ा और बड़ा होता है
लौटती ही स्त्री तो घास आँगन की
हो जाती है थोड़ी और हरी
दरअसल एक स्त्री का घर लौटना
धरती का अपनी धुरी पर लौटना है।
– विवेक चतुर्वेदी
बहुत पहले मैंने प्रोफ़ेसर विद्यानिवास मिश्र का एक इंटरव्यू लिया था। उस साक्षात्कार में स्त्री के मुद्दे पर सवाल पूछने पर उन्होंने कहा था कि जब तक घर में स्त्री माँ है, बहन है,दादी है, बुआ है, मौसी है, नानी है तब तक वह भोग्या कैसे हो सकती है? इतने सारे रिश्तों में उसकी सांस्कृतिक छवि उसके भोग्या होने का निषेध करती हैं पर यह रिश्ते आज पछुआ आंधी के दबाव में टूट रहे हैं किन्तु अब नए कवियों के काव्य संसार में स्त्री नए अवतार में प्रस्तुत हो रही है और उनकी कविता एक पूर्णता की ओर बढ़ रही है। प्रेम की काव्यानुभूति का यह नवाचार वरेण्य है।
कविता का समकाल : शहर में जंगल
‘ कविता के नए प्रतिमान’ शीर्षक आलोचना ग्रन्थ में नामवर सिंह कहते हैं – “कविता में बिम्ब वास्तविकता के साक्षात्कार का ही सूचक नहीं होता, प्रायः वह वास्तविकता से बचने का भी एक ढंग रहा है। अर्थात् कविता में बिम्ब रचना सदैव यथार्थ को मूर्त ही नहीं करती, कभी-कभी वह वास्तविकता का अमूर्त्तन भी करती है। बिम्बों के कारण कविता बोलचाल की भाषा से अक्सर दूर हटी है, बोलचाल की सहज लय खण्डित हुई है, वाक्य विन्यास की शक्ति को धक्का लगा है, भाषा के अंतर्गत क्रियाएं उपेक्षित हुई हैं, विशेषणों का अनावश्यक भार बढ़ा है और काव्य-कथ्य की ताकत कम हुई है। इन कमजोरियों को दूर करने के लिए ही कविता में तथाकथित ‘सपाटबयानी’ अपनाई जा रही है। ” जाहिर है कि कबीर के कठमुल्ले अनुयायियों की तरह ही प्रलेस और जलेस में दीक्षित कवियों ने नामवर जी के इस सपाटबयानी का सपाट अर्थ ही ग्रहण किया और फिर कविता का चेहरा ही सपाट हो गया ।”
राजेश जोशी भी कहते हैं कि हमारी आँख आज से पहले कभी इतनी रंग-बिरंगी और प्रतिक्षण बदलती इमेजेज़ से नहीं घिरी रही। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने चारों ओर बिम्बों का एक मेला सा रच दिया है। चलते फिरते बिंबों ने हमारे विचारों को बेदखल कर दिया है। बाजार और नयी प्रौद्योगिकी ने बिम्बों की एक प्रतिभाषा तैयार कर ली है इसलिए कविता में बिम्बों की जिस भाषा को सदियों में रचा था आज वह संकट में है।
अगर कविता की भाषा इस प्रतिभाषा के निकट जायेगी तो दोनों एक दूसरे को नष्ट कर देंगी। कविता जो की संभवतः मनुष्य की सबसे आदिम और सबसे आधुनिक सृजनात्मक गतिविधि है और मनुष्य के इंद्रिय बोध में हुए परिवर्तनों से वह सीधे जुड़ी है। चंचल पूंजी, ऐन्द्रजालिक तकनीकी और बाजार द्वारा रची गई बिम्बों की प्रतिभाषा या आभासी यथार्थ की प्रतिक्रिया में समकालीन कविता की बिंबों से बचाव की भाषा भी प्रश्नों के घेरे में है। राजेश जोशी का यह कथन कुछ-कुछ उस ऐतिहासिक सत्य जैसा है कि मध्यकाल में हिंदुओं ने मुग़लों द्वारा स्पर्शित अपनी कन्याओं को आसानी से छोड़ दिया अथवा पाकिस्तान के परमाणु बम बना लेने के बाद हम बम बनाना छोड़ दें। सच तो यह है कि हमें उससे शक्तिशाली बम बनाना होगा। सामाजिक हलचलों और युगीन परिवर्तनों के सापेक्ष कविता को मीडिया से तेज़ दौड़ना होगा। राष्ट्रकवि दिनकर कहते हैं–
सुनूँ क्या सिन्धु मैं गर्जन तुम्हारा
स्वयं युगधर्म की हुंकार हूँ मैं।
इसलिए कविता के भविष्य की नहीं, भविष्य की कविता की चिंता करनी चाहिए किन्तु इसके लिए मनुष्य के मनोजगत का अनुकूलन नहीं, उसके संवेदनात्मक विवेक को उद्बुद्ध करना चाहिए। सुभाष राय ने कोरोना काल के क्षिप्र परिवर्तनों और उसके सकारात्मक साइड इफ़ेक्ट को लक्ष्य करते हुए एक कालांकित कविता लिखी है। उनको लगता है कि नदी के बहने का अन्दाज़ कुछ बदला है , नदी अपने कपड़े कुछ बदल रही है। आसमान कुछ ज़्यादा नीला हो गया है, पहाड़ पर्वत बहुत दूर से दिखने लगे हैं, पक्षियों का कलरव कुछ तेज़ सुनाई पड़ने लगा है। किंतु सवाल यह है कि लाशों के पड़ोस में मनुष्य से बचता हुआ मनुष्य क्या मृत्यु से भी बच सकता है? क्या मृत्यु हवा में उड़कर आ सकती है? मृत्यु को चुनौती देते हुए डॉक्टर और पुलिसकर्मी जिनकी मुक्ति के लिए लड़ रहे हैं उन्ही के हाथों अपना हाथ कटवा रहे हैं। सुभाष राय की इस कविता की फलःश्रुति यह है कि हम मूल्य-विपर्यय के युग में जी यह हैं और सच पूछे तो सामाजिक दूरी के वायरस ने तो समाज को बहुत पहले ही आक्रान्त कर लिया था।
नव्यतम पीढ़ी सर्वाधिक संभावनाशील कवियों में से एक नीरज नीर की एक कविता है ‘शहर में साँप’ जिसमे एक साँप किसी तरह शहर में आ पहुंचा है। उसे देखकर लोग चिल्लाते हैं सांप सांप , अरे बाप रे बाप, यह तो जंगल छोड़कर शहर आ गया। तो सांप तनकर खड़ा हो जाता है और प्रतिवाद करता है
“आँखेँ मिलाकर बोला साँप :
मैं शहर में नहीं आया
जंगल मे आ गयें हैं आप ।
आप जहां खड़े हैं
वहाँ था
मोटा बरगद का पेड़ ।
उसके कोटर मे रहता था
मेरा बाप ।
आपका शहर जंगल को खा गया ।
आपको लगता है
साँप शहर में आ गया ।”
यह कविता मिथकीय सन्दर्भों में जहाँ शेषशायी विष्णु का बिम्ब उपस्थित करती है, वहीं अपने प्रतीकात्मक अर्थों में शहरी सभ्यता में उग रहे आरण्यकबोध या जंगलराज को भी सूचित करती है । मनुष्य और तक्षक की मित्रता सदियों पुरानी है, और स्वभाव की अदला-बदली भी । अज्ञेय जब लिखते हैं-
“साँप !
तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया,
फिर कहाँ से सीखा डँसना
इतना विष कहाँ से पाया ?”
निश्चय ही आज हमारा जीवनबोध विषाक्त होता जा रहा है । दुष्यंत कुमार ने कभी इसे बहुत तीव्रता से महसूस किया था-
“अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कँवल के फूल मुरझाने लगे हैं ।”
इस नैतिक पतन, चरित्रिक क्षरण और महानगरीय जीवनबोध के यथार्थ में अंतःसंचरित सत्य को प्रांजल राय ने शिद्दत से महसूस किया है और सर्वाधिक समर्थ अभिव्यक्ति दी है-
“हमारे समय की देह पर
सबसे गाढ़े अक्षरों में लिखा है- ‘पतन’,
जहाँ गिरना इतना सामान्य है
कि गिर जाना अख़बार के पिछले पाँव में लगी धूल से ज़्यादा कुछ भी नहीं,
और गिरने के उच्चारण से अधिक सामान्य है गिर जाना ।
यह वह समय है,
जहाँ नालियों की मरम्मत का श्रेय
शिलालेखों की देह को रंगीन कर देता है,
वहाँ पुल का गिरना इतना सामान्य है
कि उस गिरने के प्रति किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं होती ।”
निश्चय ही आज मनुष्य और मनुष्य के बीच, कवि और कवि के बीच तथा राजा और प्रजा के बीच संवाद का पुल ढह चुका है और कविता जनता से एक व्यापक संवाद ही है । इस संवाद-सेतु की रक्षा के लिए कवि बेचैन हो उठता है-
“संवादों के दौरान अक्सर अधूरे रह जाते हैं कुछ प्रश्न,
कि प्रश्नों का अधूरा रह जाना
कितना ज़रूरी है एक नया संवाद गढ़ने के लिए !
किन्तु देखो कि किस तरह प्रश्नों का प्रश्नवाचक मिटा दिया गया है चुपके से,
मानो प्रश्न नहीं, सविनय अनुरोध हों;
सोचता हूँ कि इतिहास के प्रश्नों के सामने
किस भूमिका में खड़े होंगे ये लोग,
जिनके मुंह से गायब है जीभ !
‘अ’-सहमतियों के उपसर्गों को
पन्नों से पोंछ देने को बेचैन है सत्ता,
कि सड़कों पर कुचली पड़ी है वह आवाज़
जिसकी लय भीड़ से मिल नहीं पायी ।
‘जय किसान’ बोलो कि राजधानियों में
लहू से सींच दी जाती है,
किसानों की देह की फसल ।
बोलो ‘जय जवान’
कि सीमा पर मरते सैनिकों की देह से गायब हैं चेहरे ।
पाँच सालों से सोई सत्ता की ममता अचानक
जागती है चुनावों के सिरहाने ,
आह कितना क्रूर स्वांग !
कि रोटी का प्रश्न धीरे-धीरे तब्दील होने लगता है
श्मशान की राख में ।
जाकर सत्ता की ‘स्वर्ण-लंका’ को सूचित कर दो
कि वे जो चिंगारियों की गंध में सोते हैं,
अँधेरा सोखती उनकी तीसरी आँख नींद से उठने को है ।”
दरअसल आज कविता में मानकीकरण और समरूपीकरण की समस्या को विजय कुमार से लेकर मंगलेश डबराल तक शिद्दत से महसूस करते आ रहे हैं । आज समरूप कविताओं की एक रूढ़ि सी बन गयी है । इस जड़ीभूत सौन्दर्याभिरुचि के तिलिस्म को तोड़ना है और कविता के प्रचलित तेवर के अस्वीकार से ही कविता का नया प्रारूप विन्यस्त होगा । परिपाटीग्रस्त अभिव्यक्ति और बाजारू लेखन दोनों के खतरों से बचते हुए, साथ ही कविता को अवांछित अमूर्तन से भरसक बचाते हुए प्रसन्न शिल्प में, किन्तु संरचनात्मक सघनता और शब्दों की मितव्ययिता के साथ बिम्बों की भाषा में शहर बनाम जंगल के बोध की चाक्षुष प्रतीति कराते हुए प्रांजल राय दिल्ली को एक रूपक की तरह उपस्थित करते हैं-
“देखो, धुंध की अभेद्य चादर में लिपटी हुई
ये दिल्ली है
भारतवर्ष की राजधानी,
राजपथ बनाम जनपथ के संघर्षो के इतिहास
जिसके चेहरे पर दर्ज हैं ।
शताब्दियों के खंडहर पर उगा नामचीन शहर,
खांडवप्रस्थ का बुढ़ापा
और इंद्रप्रस्थ की जवानी साधे,
स्वर्ण की नोंक पर टिका
सपनों की रंगीनियों में जीता है ।
छवियों को बनाता बिगड़ता है ये शहर
और छवियों के नीचे धँस जाता है सत्य ।
अनवरत दौड़ता भागता ये शहर
अपने पाँवों से बहते लहू से भी अनजान है,
जहाँ कार्बन और सल्फर ने गुप्त संधि की है
मौसम के ख़िलाफ़ ।”
इस गुप्त संधि की सबसे तल्ख़ अनुभूति आदिवासी चेतना की प्रवक्ता निर्मला पुतुल के यहाँ देखने को मिलती है । उन्हें लगता है कि शहर जंगल में आ गया है और झारखण्ड की आदिवासी संस्कृति संकटग्रस्त हो गयी है । कांक्रीट के पसरते जंगल में इसकी मौलिक आरण्यक पहचान खो गयी है । बड़े-बड़े पेड़ उखड़ गए हैं और लड़कियाँ गायब हो गयी हैं । वे माया को सम्बोधित करते हुए कहती हैं कि तुम कहाँ हो, सही सलामत हो या दिल्ली तुम्हें निगल गयी ? झारखण्ड की धरती, संथाल परगना की माटी, दुमका के पहाड़ और काठीकुंड के उजड़ते जंगल तुम्हें पुकार रहे हैं । बाजार ने आदिवासी महिलाओं को असुरक्षित कर दिया है । निर्मल पुतुल कहती हैं-
“मैंने देखा था चुड़का सोरेन !
बाजार ले जाकर बेंचते हुए तुम्हारी माँ को भी
हजार-हजार कामुक आँखों और सिपाहियों के पंजे झेलती चिलचिलाती धूप में ।
ईंट पाथते, पत्थर तोड़ते, मिट्टी काटते हुए भी
किसी बाज के चंगुल में चिड़ियों की तरह फड़फड़ाते हुए
एक बार देखा था उसे ।”
अपने अभिधात्मक तेवर में निर्मला पुतुल जिस कथ्य की ओर संकेत करती हैं, उसकी अंडरटोन बहुत व्यापक है । आज बाजार के आवर्त में मनुष्य की चेतना भी एक बिकाऊ माल में तब्दील हो गयी है । ज्ञान भी एक पण्य वस्तु में बदल गया है । फिर देह का सौदा तो सदियों से चलता चला आ रहा है, जिसके ख़िलाफ़ एक मुहिम छेड़ती हुई निर्मला पुतुल नारी अस्मिता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध दिखती हैं । वे पूछती हैं-
“किसके शिकार में रोज जाते हो जंगल, किसके ?
शाम घिरते ही अपनी बस्तियों में उतर आये
उन ख़तरनाक शहरी जानवरों को पहचानो चुड़का सोरेन, पहचानो
पाँव पसारे जो तुम्हारे ही घर में घुसकर बैठे हैं ।”
किन्तु उन्हें लगता है कि संथाल परगना अब नहीं रह गया है संथाल परगना । बहुत कम बचे रह गए हैं अपनी भाषा और वेशभूषा में यहाँ के लोग ।
“खो गयी है इसकी पहचान
कायापलट हो रही है इसकी
तीर, धनुष, मादल, नगाड़ा, बाँसुरी सब बटोर लिए जा रहे हैं लोक संग्रहालय
समय की मुर्दागाड़ी में लादकर, इसकी बेहतरी के लिए ।”
आदिवासी लड़कियों के मन में भी ऊँची सैंडिल और फेयर एंड लवली से निखरे चेहरे पाने के शहरी सपने हैं । सभ्यतागत विडम्बना यह है कि इन्हें पिछड़ा और गँवार समझने वाली नागर चेतना को इनका सब कुछ प्रिय है किन्तु उन्हें अपनाना और सभ्यता की मुख्य धारा में शामिल करना प्रिय नहीं है-
“उन्हें मेरा सब कुछ प्रिय है
मेरे पसीने से पुष्ट हुए अनाज के दाने, जंगल के फूल, फल और लकड़ियाँ,
खेतों में उगी सब्जियाँ, घर की मुर्गियाँ उन्हें प्रिय हैं,
मेरी गदराई देह, मेरा मांस प्रिय है उन्हें ।”
विकास के नाम पर विस्थापन को झेलना जैसे उनकी नियति बन गयी है । शहरी सभ्यता ने आदिवासियों को कदम-कदम पर छला है । उनकी खनिज संपदा और देह-खनिजता का लाभ तो हम लेना चाहते हैं, किन्तु उन्हें कोई लाभ देना नहीं चाहते । इस अन्तहीन शोषण और संत्रास के ख़िलाफ़ शंखनाद करते हुए वे कहती हैं-
“मैं चाहती हूँ
आँख रहते अंधे आदमी की आँख बनें मेरे शब्द
उनकी जुबान बने, जो जुबान रहते गूँगे बने देख रहे हैं तमाशा ।
चाहती हूँ मैं नगाड़े की तरह बजें मेरे शब्द
और निकल पड़ें लोग
अपने-अपने घरों से सड़क पर ।”
डा. विजेन्द्र सूर्य की ऋचाएँ गाते हुए भी धरती के गुरुत्वाकर्षण से बँधे रहते हैं । उनकी कविता में ठहरा हुआ समय समकालीन अवसाद को संपादित कर परावर्तित करता है । विचार सरणि की कोख से भाव अंकुरित होते हैं और कविता का प्रजनन होता है । एक खास तापमान पर कविता का रचाव आस्वाद्य तो है ही , उससे अधिक बेचैन करने वाला है । हमारा रचना – समय अपने समूचे संताप और संत्रास के साथ यहाँ उपस्थित है । गूलर का फल सरस और सुन्दर होता है । किन्तु उसमें भिनगे या कीड़े होते हैं । जीवन – सत्य को समग्रता में देखने – परखने की यह उद्यमिता प्याज के छिलके की तरह यथार्थ के पीछे का यथार्थ अनावृत करती है । काल के कराल जबड़ों को फैलाकर सदियों के अत्याचारों का साक्षात् करता है । और प्रतिरोध हीन मध्यवर्गीय मानसिकता के विरुद्ध सकर्मक ग्यान की तलाश करता है । कवि इस तमिस्रा के तिलिस्म से उद्धार के लिए सूर्य की अर्चना के लिए कुटज पुष्प कहाँ से लाए ? यहाँ तो भटकटैय्या के बैंजनी फूल हैं । गुड़हल के फूल की तरह आरक्त साँझ खिली तो है , परंतु हाथ रक्त से सने हैं , जो हत्याएँ दूसरों ने की हैं । इस प्रकार सामाजिक यथार्थ को आत्मगत करते हुए कवि उस समष्टि – पीड़ा को जीवन दर्शन में संघनित करता है ।इस अग्निगर्भा कविता में विविध वर्णी धरती पर नंगे तलवों चलने , महसूसने और उसकी आँच और गंध को सहेजने का उपक्रम संलक्ष्य है । ऋग्वेद में ईश्वर की पहली अनुभूति अग्नि के रूप में ही होती है —– ” अउम् अग्निमीले पुरोहितं ।यग्यस्य देवमृत्विजम् । होतारम् रत्नधातमम् । ” और उपनिषद् में भी ब्रह्म को अग्नि से ही उपमित किया गया है । ———- अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टा रूपं रूपं प्रति रूपं बभूव ,
एकस्तथा सर्व भूतान्तरात्मा , रूपं रूपं प्रति रूपं बहिश्च ।
जिस प्रकार एक ही अग्नि लकड़ी , कोयले , पुआल , गैस सिलिंडर , बिजली और अणु बम में अंतर्निहित है , किंतु उसकी महिमा का प्राकट्य उन – उन वस्तुओं की क्षमता के अनुरूप होता है , उसी प्रकार एक ही परम सत्ता विभिन्न पदार्थों और जीवों या मनुष्यों में प्रकट होता है । किंतु आज राम की कला का प्रकाश रावण के रूप में हो रहा है और दसों दिशाओं में दशानन की छवियाँ छा गयी हैं । आवारा पशु गलियारों में हँकड़ते – हुंकारते घूम रहे हैं और हमारे दुनियादार कान उस अट्टहास को सुन नहीं पाते । कोकिल कांतासम्मित मधुर वाणी में कूजन या अरण्य रोदन करती है । किंतु कालिदास ने भी पुंसकोकिल की काकली का ही उल्लेख किया है । कवि ऐक्टिविस्ट की भूमिका तलाशता है । गोस्वामी तुलसी दास भी कहते हैं ——–
निशि गृह मध्य दीप की बातन्ह , तम निवृत्ति नहिं होई ।
रात में दीपक के गुणों की चर्चा से अँधेरा दूर नहीं होगा । इस आख्यान मूलकता से ऊपर उठकर क्रांति द्रष्टा को क्रान्तिकारी बनना होगा । परंतु वस्तुस्थिति यह है कि ———
प्रश्नों में गुजर गई एक और शाम ।
सूरज के घोड़ो के पाँवों में कील गड़ी ,
चीखती दरारों पर थम गयी लगाम ।
—– रामचंद्र सरोज
पृथ्वी की रगों में बहना , क्या कहना ! फूल – पत्V मौसम का अहसास कोई मौसम विज्ञानी नहीं , बड़ा कवि ही कर सकता है । और रंगों के पीछे के सत्य को देख लेने वाली भेदक आँख मद्धिम रोशनी में भी असंत को पहचान लेती है । सत्य को उसके मूल अक्ष पर बेधते हुए कवि जीवन के धूसर चित्रों एवं गहन मानवीय पीड़ाओं का स्थापत्य रचता है । अपनी जड़ों से जुड़ाव एवं छाया के सहारे सार तत्त्व तक पहुँचे हुए दृष्टि बोध का अभिनंदन करते हुए मैं डा. विजेन्द्र की उदात्त भाषा और प्रभावान्विति पूर्ण सजल शिल्प की अर्चना करता हूँ ।
ओ मेरी कविताओ
तुम उस बेचैनी को त्यागो
जिसे मै जीवन भर लपटो की तरह
पचाता आया हू
मुझे सीखने दो
कैसे छाया से सार तक पहुचते है
फूल से जड़ तक
मै ने जो देखे पशु,पक्षी ,वृक्ष ,
हवा , रोशनी ,आकाश
बादल , फूल, फल और बिलखती यातनाये
इन सब मे कोई धागा पिरोया सा लगा
इन्हे कैसे तो अपने अमूर्त चित्रो मे उकेरू
इसके लिए मुझे पृथ्वी की रगो मे बहना होगा
पर ऑखै रंगो के पीछे छिपे सत्य को जाने
चमकीले शब्द और पच्चीकारी मे नही
धूसर चित्रो और सने पुते शब्दो मे
दिखेगी आदमी की गहन पीडाए
हजारो ऑखो को
गूदडे लिए लेटा फुटपाथ पर
वह कौन है जिसे बिना देखे लोग गुजरते है
औह ! मध्यम रोशनी मे सब संत दिखते है
– विजेन्द्र
किन्तु डॉ0 विजेन्द्र की समस्या यह है कि डॉ0 विजेन्द्र खाटी मार्क्सवादी चेतना के प्रतिबद्ध सर्जक हैं इसलिए एक फ्रेम में देखने के कारण कई बार सत्य की हत्या हो जाती है खासकर तब जब कवि मुक्ति बोध से ही बँध जाता है।
मैं माखनचोर हूँ। तमाम कवियों और आलोचकों के घर से विचार नवनीत चुराकर मैं अपने पाठकों को परोसता रहता हूँ। नामवर सिंह,डा0 नगेन्द्र, प्रभाकर श्रोत्रिय, परमानन्द श्रीवास्तव,पंकज चतुर्वेदी, विजयकुमार, जयप्रकाश, अजय तिवारी, ओम् निश्चल, अशोक बाजपेयी, डॉ0 कपिलदेव आदि हिंदी के शीर्षस्थ आलोचकों ने मुझे आलोचना दृष्टि प्रदान की है। संभव है कि कई बार मैं अपने पुरखों के बड़े जूते पहनकर चलने लगा होऊँ और इस प्रयास में मेरी अपनी मौलिकता क्षरित हुई हो किन्तु एक व्यापक और समावेशी दृष्टि से कविता मात्र को देखने परखने की यह उद्यमिता साहित्य संसार में व्याप्त शिविर बंदी को तो विच्छिन्न करती ही है, आम जन के उपासक विशिष्ट कवियों के बरक्स आम कवि की तलाश में प्रवृत्त होती है। साहित्यिक मठों से अलग हटकर देखें तो आज कविता के परिदृश्य में गणेश गनी, विहाग वैभव,बाबुषा कोहली,वीरू सोनकर, अरुण श्री, सुशोभित शक्तावत, नीरज नीर, प्राञ्जल राय,पल्लवी त्रिवेदी, प्रज्ञा सिंह,प्रतिभा शर्मा, अंकिता सिंह, रोहित ठाकुर,धर्मेन्द्र मौर्य, यतीश अकिंचन जैसे अनेक कवि अपनी प्रातिभ उपस्थिति से काव्य लोक को समृद्धतर बना रहे हैं। अंकिता सिंह, धर्मेन्द्र मौर्य और यतीश अकिंचन जैसे कवि कमल मानव और दुर्गाप्रसाद झाला की भास्वर छांदस् काव्य की परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। हरिश्चंद्र पाण्डेय के काव्य में कमनीय बुरूँश खिलता है पर तनिक अमूर्त्तन के साथ। वहीँ भगवत रावत की कविता का टिफिन बच्चों के लिए भी खुला हुआ है।
डॉ0 विजेन्द्र के अंतरंग कवि मायामृग की कविताओं में तरल वैचारिकता का प्रसन्न प्रवाह देखने को मिलता है तो जयप्रकाश मानस की कुछ कविताएँ भी काव्यार्थ की सान्द्रता का पता देती हैं। जितेंद्र श्रीवास्तव और हरेप्रकाश उपाध्याय की कविताओं में अमूर्त्तन के बजाय उल्लेखनीय स्पष्टता, ऋजुता और सफाई मिलती है। पंकज मिश्र ‘अटल’ ने अतुकांत कविताओं के साथ-साथ नवगीत विधा में भी हाथ आजमाया है तो रामानंद तिवारी ने आज के तदर्थवादी युग में कबीर पर एक सफल प्रबंध काव्य लिखकर पाठकों को चौंका दिया है। उनका खण्डकाव्य ‘पिंजर प्रेम प्रकासिया’ प्रगतिशील वैचारिकी के आलोक में कबीर को नए शिल्प में आयत्त करने की एक विनम्र कोशिश है जिसमे ऋजुता, प्रासादिकता के साथ ही भावों का सहज प्रवाह देखते ही बनता है। उसकी प्रभावान्विति भी संलक्ष्य है। पंकज सिंह का कवि सत्ता संस्कृति और अमानवीय होती व्यवस्था में एक नागरिक आत्मा की तलाश करता है। मुक्तिबोध की कविता में सत्ता का मार्चपास्ट रात्रि में होता है पर पंकज सिंह के यहाँ सत्ता दिन के उजाले में सक्रिय है। मध्यरात्रि में आत्मा की आवाज़ आती है, ‘तुम जीवित हो?’ यह प्रश्न किसी भी उस व्यक्ति को परेशान कर सकता है जो व्यवस्था में शामिल हो मगर जिसके स्वप्न में मानव मुक्ति, समता मूलक समाज और न्याय की व्यवस्था हो। नृशंसता की ऋतु में एक बध्य प्रदेश में होने वाली किश्त दर किश्त आत्महत्या से बचने का प्रयास और यथार्थ की निष्कवच स्वीकृति पंकज सिंह की कविताओं का प्रतिपाद्य है—-
बहुत संयत और लगभग महान लिखते हैं
आदमखोर चेहरे
दूरदर्शन पर नेपथ्य में बजता है उम्दा संगीत
वे गुर्राते नहीं थम-थमकर बोलते हैं।
वर्तमान बर्बर और वर्चस्वी सत्ता द्वारा प्रदत्त निशान और आत्मा पर खँरोंचें साफ़ देखी जा सकती हैं। नेपथ्य में बजता हुआ उम्दा संगीत दरअसल मीडिया द्वारा बनाई हुई महानायक की अयथार्थ छवियाँ हैं। क्योंकि मीडिया अब एक मूल्य निर्माता प्रतिष्ठान नहीं, छवि निर्माता प्रतिष्ठान और विज्ञापन की दुकान बनकर रह गया है।
पंकज सिंह की तरह ही अल्पचर्चित कवि दिनेश कुमार शुक्ल के यहाँ हमें सच्ची कविता के दर्शन होते हैं। हमारे रक्ताक्त हस्ताक्षर की अपेक्षी संध्या आत्मसमर्पण का एक सुनहरा मौका है। अत्यंत सुपाठ्य किन्तु निरर्थक संधि पत्र की तरह फैलती हुई संध्या त्रिकाल और त्रिलोक में वायरस की तरह व्याप्त हो जाती है—-
विचित्र लिपि में लिखी
जीवित रेंगते हुए अक्षरों को
बार-बार कतारों में सजाती हुई
गलित मात्राओं और हलंतों को संभालती
चरम पराभव की वह संध्या।
जीवित रेंगते हुए अक्षरों का पुनर्विन्यास कविता के पुनर्गठन का प्रतीक है। साथ ही सकर्मक ज्ञानात्मक संवेदन को कविता की थाती बनाती इस सृजनशीलता का फलक विशाल है—
सौंदर्य की सीमान्त रेखा पर
साक्षात् अश्लील रंगों का विस्फोट
सुगंध की आदिम गुफा के द्वार पर
इस महापद्म की पंखुरियाँ खो जाएँगी झरकर
शरद के पुष्कर में।
इस अपार सौंदर्यबोध के सामने कवि वैसे ही खड़ा होता है जैसे पृथ्वी आती है सूर्य के सामने।
सब कुछ तेज़ी से घटित हो रहा है और आदमी घटता जा रहा है। दण्डकारण्य के सारे वृक्ष, लता-गुल्म सब लोहे के हो गए—
अचानक ही उस शरद की रात्रि में
चंद्रमा सुदर्शन चक्र की तरह
पृथ्वी की ओर बढ़ता देखा गया।
किन्तु शुक्ल जी की समस्या यह है कि बीच-बीच में सघन संरचना और भास्वर बिम्बधर्मिता के बावजूद कविता में आद्योपान्त भाषिक समरसता और अन्विति खंडित होती रहती है।
यह भाषिक समरसता और काव्यार्थ की सान्द्रता अपनी चरम प्रभावान्विति के साथ नव्यतम कवि सुशोभित सक्तावत की कविताओं में संलक्ष्य है। उनके काव्य संसार में प्रेम और प्रकृति के साथ ही जीवनानुभवों का सारांश उसी प्रकार आत्मसात् है जिस प्रकार घर की दीवारें दिन भर के धूप को जज़्ब कर लेती हैं। बारीक अनुभव, अतिशय कल्पनाशीलता और स्वानुभूति की विवृति भाषा की सीमान्त लाक्षणिकता के साथ संश्लिष्ट होकर चमकते बिम्बों के रूप में ढल जाती हैं। उनकी छोटी कविताएँ भी लंबी साँस की पारद रचनाएँ हैं। ऐसा लगता है की उनकी कविताएँ भविष्य के बनने वाले बहुत पतले कागजों पर लिखी जा रही हैं। वे वस्तुओं की आभाओं को सांकेतिक व्यंजना में पकड़ने की कोशिश करते हैं। गीत चतुर्वेदी ने उनकी कविताओं के वैशिष्ट्य को रेखांकित करते हुए कहा है—–
“सुशोभित की कविताएँ एक आदिम भित्तिचित्र, एक शास्त्रीय कलाकृति और एक असंभव सिम्फनी की मिश्रित आकांक्षा हैं। ये असंभव कागजों पर लिखी जाती होंगी- जैसे बारिश की बूँद पर शब्द लिख देने की कामना या बिना तारों वाले तानपूरे से आवाज़ पा लेने की उम्मीद। ‘जो कुछ है’ के भीतर रियाज़ करने की गाफिल उम्मीदों के मुखालिफ ये अपने लिए ‘जो नहीं है’ की प्राप्ति को प्रस्थान बनाती हैं। पुरानियत इनका श्रृंगार है और नव्यता अभीष्ट। दो विरोधी तत्त्व मिलकर बहुधा रचनात्मक आगत का शगुन बनाते हैं।”
रात को लिखते समय अँधेरे में जब हमारे चश्मों के शीशे आँखों से ज़्यादा चमकते हैं और एक आवाज़ मेरी डेस्क पर आकर गिरती है तो मैं पहचान जाता हूँ कि यह सुशोभित की आवाज़ है-
“दोपहर के बाद दफ्तर अपनी दीवारें बदलता है
एक अधूरा पुल ढहता है और निशानदेही के साथ
काटे जाते हैं दिन के दरख्त
मैं एक गुलाबी रंग को गुलाबी रंग की तरह
पहचानने से इनकार करता हूं
आलपिनों से छिदे क्षितिज पर
टांगता हूं अपनी उतरी हुई परछाइयां
कुछ पुराने चरित्र
एक उपन्यास के भीतर
कुचलकर मर जाते हैं ।”
अपने रचना-समय की निशानदेही और एक बिंधे हुए समय की शिनाख़्त करता हुआ कवि गुलाबी रंग को गुलाबी रंग की तरह पहचानने से इन्कार करता है । आज विराट विस्थापन के इस दौर में हर चीज अपनी शक़्ल बदलकर हमारे समय में उपस्थित है और वस्तुओं को उनके सही नाम से पुकारना एक अपराध माना जाता है । इसीलिए कवि आत्मभियोग की मुद्रा में आलपिनों से छिंदे हुए क्षितिज पर अपनी परछाइयाँ उतारकर टांग देता है । आज मनुष्य की परछाइयाँ उसके कद से बहुत अधिक लंबी होती जा रही हैं । कहीं यह उसके आत्मिक अवसान का सूचक तो नहीं ! पुराने मिथकीय चरित्रों की हत्या कर नयी रचनाशीलता अपनी ख़ुराक अर्जित करना चाहती है । यह एक रचनात्मक विडम्बना है । निश्चय ही पुराने चरित्रों या मिथकों को अपने समय में उपलब्ध करते हुए एक विवेकशील नवाचार की ज़रुरत होती है किन्तु उसकी आत्मा को सुरक्षित रखते हुए । कवि अस्थियों का मुकुट पहने साँसों की खोह में डूबता रहता है जैसे वह साँप का पेट हो । कवि ने न सिर्फ लघुता को महत्ता दी है, बल्कि उसने अपने समय के उधड़ते सीवन को सीना भी सीख है-
“मैं सीखता हूँ रेंगना उन चींटियों से
जो ज़मीन के जख्म सीती हैं
और हमेशा चुप्पी साधे रहती हैं ।”
प्रगतिशील पैटर्न के अवधारणात्मक यथार्थ से अलग हटकर अनुभव की जैविकता को प्रमुक्त मानस और स्वायत्त शिल्प में विन्यस्त करने वाले सुशोभित आज के दौर में बदले हुए प्रेम को ठीक से पहचानते हैं । आज आपाधापी, हड़बड़ी और भागदौड़ वाले इस समय में तन्मय प्रेम करना भी मुमकिन नहीं । इस अधूरेपन की व्यंजना इन पंक्तियों में संलक्ष्य है-
“बारिश और बसंत के बीच स्थगित
एक अधूरे चुंबन और अस्फुट कराह को
रेलवे प्लेटफॉर्म की चिकनी सतह पर
भारी लगेज के नीचे कुचलते सुनता हूँ ।”
जब नीले कोहरे के लहराते पर्दों के दरमियान सन्नाटों की सुई सरकती है, जब रातों के गलियारों में बैंजनी अँधेरा गहराता है तो चुम्बनों की चम्पई गंध में नशे में नीली पड़ रही परछाइयों की देह अधूरी छूट जाती है । कवि प्रेयसी के साँसों के कोहरे से होकर गुजरना चाहता है-
“मैं छीजता रहूँगा यूँ ही ताजिंदगी
और तुम बिखरती रहोगी बारिश और पानी की परछाईं में ।”
यहाँ बारिश के पर्दे में कल्पनात्मक समृद्धि और पानी की परछाईं में नवीन उद्भावना के साथ ही सूक्ष्म पर्यवेक्षण द्रष्टव्य है । नाउम्मीदी के नुक़्ते पर अपने अधूरेपन की ज़मीन से बेदख़ल हो जाने से डरा हुआ कवि साँझ के दूरस्थ सीमान्त पर उम्मीद की एक किरण देखता है जब पेड़ों के हिलते हुए सिर हवा के कन्धों पर जा टिकते हैं-
“पाटते सारे दर्रे रास्ते रूकावटें
मैं टहलूंगा तुम्हारे भीतर कोहरे की तरह
टटोलूंगा खामोश परदों में तुम्हारी परछाईं
जबकि शामें बुझती रहेंगी
उचटती रहेगी धूप
मैं तुम्हारी देह की नदी में उतरकर
छू लूंगा तुम्हारे किनारे ।”
किन्तु अरुण श्री इन कोमल अनुभूतियों का विलोम रचते हुए वर्चस्वी सत्ता को चुनौती देते हैं-
“नहीं सामंत !
सम्मोहित प्रजा का आँकड़ा बढाती संख्या नहीं मैं।
मेरा वैचारिक खुरदरापन –
एक प्रखर विलोम है तुम्हारी जादुई भाषा का।
पट्टे की कीमत पर पकवान के सपने बेचते हो तुम।
मेरी जीभ का चिकना होना जरुरी है तुम्हारे लिए।
नहीं सामंत !
रोटी का विकल्प नहीं हो सकतीं चंद्रयान योजनाएं।
प्रस्तावित अच्छे दिनों की कीमत मेरी जीभ नहीं है।
नहीं सामंत !
तुम्हारे मुकुट का एक रत्न होना स्वीकार नहीं मुझे ।
अपनी क्रांतिकारी कविताएँ मैं तुम्हें नहीं सौंपूंगा,
मेरे विद्रोही शब्द तुम्हारी भाषा का उपसर्ग नहीं बनेंगे ।”
अरुण श्री जानते हैं कि सत्ता शब्दों का अनुकूलन करना जानती है । विद्रोहों की धार को रस्मी बनाकर कुंद कर देने की कला सामंतशाही अच्छी तरह जानती है । चंद्रयान योजनाओं की परछाइयों में रोटी के प्रश्न को ढँकने और जादुई यथार्थ की सृष्टि करती बाजारवादी मीडिया और सुविधाभोगी प्रजा की कतार में शामिल होना कवि को स्वीकार नहीं है । इसीलिए वह ज़िन्दगी के खुरदुरे यथार्थ को परावर्तित करना अपना कविकर्म समझता है ।
किन्तु कविता केवल प्रतिरोध और विप्लव में ही नहीं जीती । क्रांति के बरसते शोलों के बीचोंबीच प्रेम के संगीत के लिए जगह निकल ही आती है । यह केवल फ़िल्मी सत्य नहीं है, जीवन-संघर्षों की थकान दूर करने और नयी ऊर्जा प्राप्त करने के लिए प्रेम ही वह अमृत या संजीवनी है जो हमें कर्मपथ पर प्रवृत्त करती है । इन स्थितियों का नाट्यकरण कविता को दीर्घ जीवन प्रदान करता है । वीरेंद्र मिश्र कहते हैं-
“थकते हुए हाथ में मेरे, तेरी दृष्टि कलम हो जाती
जिसे मिली अमृता दृष्टि तो उसे शिकायत रही न विष से ।
एक बूँद भी रिस जाए यदि लाखों परतों की जुम्बिश से
चुटकी भर भी प्यार मिले तो पीड़ा थोड़ी कम हो जाती ।।”
पल्लवी त्रिवेदी की कविताओं के कोमल पल्लव की नसों में स्वस्थ हरा रक्त प्रवाहित होता है और मसृण पल्लव की तरह ही पारदर्शी कविता के आरपार झिलमिलाती भावनाएँ संलक्ष्य हैं । कोमल अनुभूतियों का निर्व्याज सौन्दर्य उनकी कविताओं में इस तरह अभिव्यक्ति पाता है कि मुख्यार्थ किसी एक पंक्ति में न रहकर, सम्पूर्ण कविता में अनुस्यूत होता है । अन्विति के साथ ही संरचनात्मक सघनता और शब्दों की मितव्ययिता की ऐसी बानगी दुर्लभ है । यहाँ एक भी पंक्ति को हटाना सम्भव नहीं । पादपूरणार्थक पदों का यहाँ नितान्त अभाव है और जैसे बच्चे की मांसल देह में रक्त झलकता है वैसे ही अनुभूतियों की लालिमा यहाँ पारभासी रूप में द्रष्टव्य है-
“टहनी तब सबसे ज्यादा उदास नहीं होती
जब देखती है पहली बार पत्ते के कच्च हरे रंग पर हल्का पीलापन
विदा का पहला संकेत
यह तो उतना ही सहज
जैसे आँखों के गिर्द झुर्रियों ने पहली आमद दी हो
जैसे केशों में पहला चांदी का तार झिलमिलाया हो
वक्त सिलता रहता है एक पीला लिबास पत्ते के लिए
टहनी और पत्ता दोनों विदा की आहट सूंघते हैं चुपचाप, बेआवाज़
कैसी तो कसैली बू होती है इस आहट की
सावन भले ही देरी का आदी हो
वक्त का पक्का पतझर कभी आने में चूकता नहीं
पतझर के लिए कोई मन्नत नहीं मांगता
बिना मुरादों वाले बच्चे ढीठ और जिद्दी होते हैं .
टहनी पत्ते से बिछुड़ने के बाद भी सबसे ज्यादा उदास नहीं होती
हर पत्ते को एक दिन अतीत बन ही जाना होता है
टहनी सबसे ज्यादा उदास होती है पत्ते के एन टूटते समय
ठीक वो एक पल जब पत्ते से लिपटी उसकी ऊँगली की पकड़ छूट रही होती है
जब वह पत्ते को छूती है आखिरी बार
घनी उदासियों और गहरी पीड़ाओं से मिलकर बनता है
अलविदा का एक कठिन क्षण
आत्मा का देह से अलग होने का क्षण
दृश्य का स्मृति बन जाने का क्षण
मैं और टहनी आज भी लिपटकर रोते हैं जब याद करते हैं
एक हथेली से दूसरी हथेली का सरकते जाना
उँगलियों का उँगलियों के आखिरी छोर तक जाना
और अलग हो जाना
यूं ही नहीं एक नरम दिल कवि कहा करता था कि
‘विदा’ शब्दकोष का सबसे रुआंसा शब्द है ।”

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