नई सदी की हिन्दी कविताः बाँसुरी की आँख से टपका आँसू

85
791
अक्षांश – देशान्तर वाली कविता की इस अन्तर्यात्रा का प्रस्थान मैं ‘महाप्रस्थान’ की निम्न पंक्तियों से करना चाहूँगा ——
पता नहीं
किस इतिहास – प्रतीक्षा में
यहाँ शताब्दियाँ भी लेटी हैं
हिम थुल्मों में ।
शिव की गौर प्रलम्ब भुजाओं सी
पर्वत मालाएँ
नभ के नील पटल पर
पृथ्वी सूक्त लिख रहीं ।
आधुनिकता की शोभा – यात्राओं से संन्यस्त नरेश मेहता के इस हिम – दर्पण में ही इस आलेख का चेहरा परावर्तित होता है । हमें नभ – पत्र पर पृथ्वीसूक्त लिखना है । हिमालय की ऊँचाइयों से जीवन और जगत को देखने – परखने की उद्यमिता रचना और आलोचना दोनों का अभिप्रेत है । यथार्थ की परिघटनाओं के साथ संवेदनात्मक अन्तःक्रिया यथेष्ट शिल्प को आविष्कृत कर लेती है और उसकी दूर संवेदी ध्वनियाँ एक ही समय में कई- कई समयों को उपस्थित कर देती हैं । अशोक वाजपेयी कहते हैं —-
हम उठाते हैं एक शब्द
और किसी पिछली शताब्दी का
वाक्य विन्यास विचलित होता है ।
शब्द के पीछे छिपे ऐतिहासिक अर्थ – संदर्भों का अन्वेषण और दायित्व बोध के साथ उनका पुनर्गठन कवि कर्म का हिस्सा है । फिराक गोरखपुरी ने एक बार किसी मंच से बोलते हुए कहा था कि ध्यान से सुनना , सदी बोल रही है । डा0 प्रभाकर श्रोत्रिय ने रामचरितमानस पर लिखते हुए कहा था कि ध्यान से सुनना , सदियाँ बोल रही हैं । अरुण कमल ने कविता की तुलना हलवाई की कड़ाही से की है , जो जलेबी में कचौड़ी की भी सुगंध लिए रहती है । उसके काले चीकट में दीर्घ काल से संचित असंख्य व्यंजनों का रस समाहित रहता है । कविता की सनातन परंपरा भी ऐसी ही है कि आप को आज की कविता में परिमार्जित रूप में आदिम संस्कार भी परिलक्षित होंगे । केदारनाथ सिंह तो साफ कहते हैं कि मैं उस कविता को पूरी कर रहा हूँ जिसे किसी प्राचीन कवि ने लिखना शुरू किया था । और मैं कहीं बिन्दी लगा दे रहा हूँ और कहीं हलन्त उड़ा दे रहा हूँ । जब हम कलम की नोंक पर पूरी परंपरा का बोझ सँभाल कर लिखते हैं तभी परात्पर कविता सम्भव होती है । कुँवरनारायण कहते हैं ——
यहाँ से भी शुरू हो सकता है 
एक उपरान्त जीवन ——
पूर्णाहुति के बिल्कुल समीप बची रह गई
किंचित् श्लोक बराबर जगह में भी
पढ़ा जा सकता है एक जीवन – संदेश ।
मिथकीय शैली में प्राचीन औपनिषदिक कथा को अर्वाचीन बल्कि सार्वकालिक अर्थवत्ता से लैस करने की यह प्रविधि अद्भुत है । समकालीनों में ज्ञानेन्द्रपति सर्वाधिक समृद्ध हैं । पर्यावरण – विनाश से चिन्तित कवि देखता है कि विस्फोटक डायनामाइट से पहाड़ों की आँतें निकाली जा रही हैं ——-
अब आएँगे
पर्वतों के पंख काटने वाले
वज्रधर इंद्र के वंशज
और बारूद की गंध फैल जाएगी हवा में
उनके टूटने की गंध के ऊपर ।
क्या धरा है भू में
इन भूधरों की छाँह के गुजर जाने के बाद ।
ज्ञानेन्द्रपति ने कविता का निजी मुहावरा विकसित किया है। उनमें जीवनानुभवों का सारांश बोलता है। उनके ‘गंगातट’ में स्थानिकता के जल-दर्पण में आज के वैश्विक समय की थाह मिली थी तो ‘संशयात्मा’ का परिसर विश्व – विस्तृत है । फिर भी उनके श्वेत – श्याम चित्रों में बनारसी रंग मौजूद है । बनारसी परिधान में उनकी कविताओं का प्रभामंडल और दीप्तिमान और भास्वर हो उठा है । उनकी कविताएँ गंगा में पूरी तरह नहा कर लिखी गई हैं । ज्ञानेन्द्रपति की कविताएँ बड़ी साँस की रचनाएँ हैं । उनकी कविता वस्तुओं को गहराई से निर्धूम देखने के लिए काफी एकाग्रता या भाव समाधि में डूब जाती है । मोमबत्ती की तरह ही उनकी कविताओं की तासीर ठंडी होती है , चाहे उनमें कितना ही संताप क्यों न भरा हो । उनकी कविता की धुरी कहीं आकाश में है लेकिन वह धरती के गुरुत्वाकर्षण से बेतरह बँधी है । उसमें गँवई संवेदना का रसायन बहुत गाढ़ा है । सीधे जीवन का भेदन करती इन कविताओं में प्रायः वस्तुनिष्ठता के साथ अपने समय के अनुभवों को अभिव्यक्ति मिली है । जीवन और जगत के प्रति आलोचनात्मक विवेक दूरसंवेदी ध्वनियों के साथ उनकी कविता में मौजूद है । सृष्टि के प्रत्येक कण में काव्य सौन्दर्य की तलाश और हर वर्ण्य विषय की आणविक संरचना का माडल प्रस्तुत करते उनके रचना – संसार में मानव बम फट पड़ा है । मनुष्य के सर्वसंहारी आत्म – विस्तार को टोकती इन कविताओं का क्षैतिज विस्तार भारतीय समाज की लम्बवत संरचना को काटता हुआ शोषित – पीड़ित के पक्ष में खड़ा होता है । शोषकों का ब्लड ग्रुप जाँचती और शोषितों के पक्ष में रक्तदान करती  ज्ञानेंद्र की कविता निराला और मुक्तिबोध से आगे की कविता है , जहाँ जटिल जीवन – शिल्प की अभिव्यक्ति में उनकी भाषा कुछ जटिल एवं दुर्बोध भी हो गई है । वह आज के ग्रंथिल मनुष्य का रूपक है । व्यवस्था के विचलनों या समय की खरोचों से रक्तरंजित उनके चित्त में सात्विक क्रोध या आवेश भी पैदा होता है ।  संबन्धों की ऊष्मा को सोखती कूलर – संस्कृति में एक आदमकद फ्रिज में से निकलकर घर आने वाले सबाल्टर्न नहीं , अल्ट्रा माडर्न गौरांग कुकरमुत्ते से कवि की मुठभेड़ हो जाती है ——
जमीन से उठकर जिसका दिमाग
सातवें आसमान चढ़ा अमीरों का मुँहलगा
गुलाब का गोतिया ।
कहा पत्नी को — सुनो ,
जल्द पकाओ इसे 
नहीं तो कच्चा चबा जाऊँगा
कई बार लगता है कि ज्ञानेन्द्र की सारी ज्ञानेंद्रियाँ आँख बन गई हैं और यह आँख उनकी कविता में संक्रमित हो गई है । उनके स्क्रूगेज का अल्पतमांक बहुत कम अर्थात् मापन – क्षमता बहुत अधिक है । पालिथिन को वे पूँजीवाद की त्वचा के रूप में देखते हैं । औद्योगिक सभ्यता का प्रतीक चिमनी की साँवली लम्बूतरी लौह काया उसे धुएँ के पेड़ की तरह उगी हुई प्रतीत होती है ——-
हरे भरे पेड़ों को छाल की तरह पहने
खुद को छिपाए वहाँ खड़ी है ,
आलिंगन में लेने वाली बाँहों को
झुलसाने वाली एक उत्तप्त चिमनी
एक धमन भट्ठी के
दहकते हृत्पिंड वाली ।
उस धूमध्वज कारखाने को विकास के अग्रलेख के रूप में नहीं , पैशाचिक आवर्त्त के रूप में पाने के लिए वह अभिशप्त है —–
हवा के रह – रह बदलते रुख की
खींची धूम – रेखाएँ
दिशा – दिशा में उधियाते
कर्कश झोंटों सी दिखती हैं ।
उस चिमनी के साथ
प्रलम्ब खड़ी भी जो झूमती – नाचती है —-
पूँजी का डायन – नाच ।
यहाँ पितरपख का  प्रसिद्ध तीर्थ पिशाचमोचन का पोखर भी है जिसके चौकोर में एक पानीदार प्राचीनता बँधी है लेकिन जिसका पानी सड़ गया है । उस पोखर की जल – आँख में तटवर्ती वृक्ष ही प्रतिबिम्बित नहीं होते , श्रावण शुक्ल अष्टमी के पश्चिम क्षितिज पर लटका चाँद व विद्युत – दीपों का तरल बिंब भी उभरता है । चंद्रमा की अध्यक्षता में वे बिजली – बत्तियाँ भी एक शीतल जल – जीवन जीती हैं । स्थल के स्थूल जीवन का अतिक्रमण कर उसी जल – स्वप्न को सहेजने के लिए कवि आकुल दिखता है । वे गंगा के एक अच्छे गोताखोर हैं । मनुष्य को केन्द्र में रखते हुए अनेक चरित्रों , पदार्थों , स्थितियों एवं मानवीय उपस्थितियों में परकाया प्रवेश कर जनपदीय अनुशासन में अद्यतन काशी के यथार्थ जीवन बोध का महाभाष्य प्रस्तुत किया है । कविता कवि का मुक्तिबोध है । काशी कवियों का मोक्ष है । उसे साहित्यिक सिद्धपीठ बनाने में ज्ञानेंद्रपति का अवदान अविस्मरणीय है ।
आज अत्याचार का संस्थानीकरण हुआ है लेकिन सत्ता और शक्ति – संरचनाओं को किन्हीं संस्थानी औपचारिकताओं में न देखकर रोजमर्रा के जीवन , कर्म और आचरण पर पड़ती परछाइयों में ही समझा जा सकता है । बेचेहरा समझ लिए गए लोगों के चेहरे कविता में उद्भासित हो उठते हैं । आखिरी आदमी भी आखिर आदमी है । लेकिन आज समय का पहिया उल्टा घूम गया है और ये पैदल या साइकिल सवार तेज रफ्तार गाड़ियों से कुचले जा रहे हैं और चारों तरफ ध्वंस की धूल उड़ रही है । क्योंकि मुट्ठी भर लोगों की मुट्ठियों में देश की सारी संपदा बंद हो गई है । न्यू इंडिया में हर कोई धर्मात्मा हुआ जा रहा है लेकिन धर्म की आत्मा उसे छोड़कर चली गई है । उसे ही क्यों बौद्ध चीन को बुद्ध की करुणा छोड़कर कब की जा चुकी है । बुहान से कोरोना दूसरे देशों में जा पहुँचा है । मुझे विनोद कुमार शुक्ल की कविता याद आ रही है —–
कितनी गेंदें पड़ोस में खो चुकी थीं ।
गेंद ढूँढ़ने हम किसी के भी घर में घुस जाते ।
घरों में जाना और खो जाना हमने गेंद से सीखा ।
यह गेंद तानाशाही या रासायनिक हथियारों की भी हो सकती है जिसके जरिए अमेरिका इराक और अफगानिस्तान में दाखिल होता है और चीन दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था का अपहरण अमेरिका से सीखता है । यह इस काव्यांश का नया पाठ है । हिंस्र पूँजी , ऐन्द्रजालिक तकनीकी और बाजार ने इधर जिस नये यथार्थ का उत्पादन शुरू किया है , उसकी पहुँच न केवल समाज की भीतरी गहराइयों तक है , बल्कि उसने व्यक्ति के मनोलोक में भी सेंध लगा ली है । इसलिए यथार्थ की खरोंच से बचे किसी अक्षत – अनाहत स्वैर लोक में जा छिपना अब न तो सम्भव है , न काम्य । जयप्रकाश ठीक कहते हैं कि यह नृ – केन्द्रिक संसार के उत्कर्ष का समय है और विडम्बना है कि इस समय को रचने वाली शक्तियाँ नृ – घातक रूप धारण कर चुकी हैं । अवसाद इस समय का स्थायी भाव मालूम पड़ता है । इसलिए कविता में अब अमूर्त्त काव्य सौन्दर्य के बजाय मूर्त जीवन – संघर्ष का पाठ रचा जाना चाहिए । आज कविता भाषा का स्वप्न नहीं देखती , अपितु भाषा में स्वप्न को अपदस्थ होते देखती है । आज बाजार ने समाज को विस्थापित कर दिया है और वह समाज का पर्याय बन बैठा है । कुमार अम्बुज कहते हैं ——
यह दुःस्वप्न की फैंटेसी की सीमाएँ
पार कर गया समाज है ,
जहाँ नई इमारतों की चमक – दमक में
उजड़ने की दास्तान छिपी है —–
एक ऐसी विराट पण्यशाला ,
जहाँ मिल रही हैं वस्तुएँ
और छूट रहे हैं लोग ।
सभ्यता के धक्के से आत्म विस्थापन का यह मार्मिक बोध उनके काव्य संसार का चारित्रिक स्वर है । आज तो ज्ञान , कविता और यहाँ तक कि आत्मा भी बिकाऊ माल है ।लेकिन जब मीडिया भी यथार्थ की प्रसंस्करणात्मक या सत्ता सम्मत छवियों के उत्पादन में निरत है , तो कविता उसकी प्रामाणिकता की परख का एक मात्र स्रोत है । यद्यपि उत्तर आधुनिक चिन्तक सुधीश पचौरी ने सन् 1990 में ही कविता की मृत्यु की घोषणा कर चुके थे । और विजय कुमार को आज की अधिकांश कविताएँ मानकीकरण की शिकार होने के कारण काव्याभास ही लगती हैं । और मंगलेश डबराल विज्ञप्त वस्तु के आहरण के कारण एक किस्म का काव्यात्मक उपभोक्तावाद देखते हैं लेकिन अब भी कुछ कवि नयी जमीन तोड़ रहे हैं और प्रचलित संरचना में तोड़ – फोड़ कर रहे हैं । आशुतोष दुबे की कविता में स्फीति के बरक्स सारांश और गहरी मननशीलता संलक्ष्य है । वह गर्भजल की तरह ऊष्म और इतनी पारदर्शी है कि नींद में बारिश सुनी जा सके —–
सुख गर्भजल की तरह ऊष्म था ,
जिसमें तैरता रहा मैं अनगिनत वर्ष
एक आदिम अँधेरे में सुनते हुए
रोशनी की तरह चमकती आवाजें ,
जैसे कोई सुनता है नींद में बारिश ।
किन्तु प्रकृति में संवेदना – जल छीजता जा रहा है और मद्धिम होता जाता है रेत हो रही नदी के कानों में नावों का शोकगीत । यहाँ पृथ्वी के नीचे पानी के संगीत पर सिर हिलाते पत्थरों की छाया भी गिरती है । दर असल उनकी। कविता मनौती का एक पेड़ है जो कि झुलसती उम्मीद में इच्छाओं से बिंधा हुआ घायल कल्पवृक्ष है । शायद कुछ लोगों को मेरी बात आधुनिकता के भीतर ही रूढ़िवादी प्रत्यावर्त्तन जैसी लगें , परन्तु दिनेश कुमार शुक्ल जब मनुष्य के कैशोर्य को याद करते हैं ——
मैंने आग लगा दी है इंद्रधनुष में ,
फिर भी न जाने क्यों
पसीने सा छलछला उठता है मेरे ललाट पर
सौन्दर्य की विस्मृति में खोया हुआ
मेरा कैशोर्य ।
तो क्या इसे भावुक नास्टैल्जिक सन्दर्भ मानकर पोंछ दिया जाए ? कविता जीवन – साधना की स्मृति – मंजूषा है । वह वीरेन डंगवाल की तरह शौक की वस्तु नहीं ——
कुछ कविता – वबिता लिख ली तो
हफ्ते भर खुद को प्यार किया ।
जीवनासक्ति का प्रतिफलन ही कविता में होता है । किन्तु न जाने कितने त्यौहारों की होली जलाकर तो एक कविता उपलब्ध होती है लेकिन
बस्तियों में हुई रोशनी ,
रोशनी से जलीं बस्तियाँ ।
चाँद की वर्तनी के अनेक फान्ट बरतते हुए राजेश जोशी सहायक क्रियाओं और इत्यादि जनों की उपेक्षा और अपेक्षा के बीच एक स्पेस रचते हैं और अपरिहार्य होने पर झुकते हैं , जैसे कि कोई झुकता है जूते का फीता बाँधने के लिए । नई सहस्राब्दी की भोर में राजेश जोशी ने लिखा था ——–
कविता की दो पंक्तियों के बीच
मैं वह जगह हूँ ,
जहाँ कवि की अदृश्य परछाई
घूमती रहती है अक्सर ।
मैं कवि के ब्रह्माण्ड की
एक गुप्त आकाशगंगा हूँ ।
अर्थात् कवि पंक्तियों के बीच की खाली जगह को अनेक अर्थ – संदर्भों से भरता रहता है लेकिन डा. कपिलदेव कहते हैं कि आज कविता के मौन और खालीपन के प्रश्नों के संदर्भ तलाशने का दायित्व आलोचना निभा रही है । आज क्षिप्र परिवर्तनों और अकल्पनीय उत्पादकता की तुलना में मनुष्य की आत्मसात्करण की शक्ति बहुत पीछे छूट गई है । ज्ञानात्मक विस्तार के बावजूद कवि की संवेदना का  लोकेल बहुत छोटा है । पूँजी और बाजार के हमलों की जद में स्वयं मनुष्य का अन्तर्जगत भी आ चुका है । उत्तरवर्ती चरण में पूँजी ने बाहर से हटाकर हमलों को मनुष्य के भीतर शिफ्ट कर दिया है । नए समाज की सुविधाएँ भोगते हुए हम विरोध की नकली मुद्राओं की कविताएँ लिख रहे हैं । सैमसंग का फ्रिज यूज करते हैं और बाजारवाद को गाली देते हैं । आरम्भिक विद्रोहों की तीव्रता अपनी धार खोकर क्रमशः कुन्द होती गई । विद्रोहों को रस्मी बनाकर उन्हें पूँजीवाद ने अपने सुरक्षा – कवच में बदल लिया । इसलिए यथार्थ के जटिल रूप से बदल जाने का यहाँ शोर तो बहुत है लेकिन इस बदलाव पर पकड़ या उसे भेद पाने का प्रमाण आज की कविता नहीं दे पा रही है । आज प्रत्येक व्यक्ति शार्टकट सफलता प्राप्त करने की हड़बड़ी में है और कविता धीरज मांगती है —–
प्रेम करते हुए हो सकता है
आपको रुकना पड़े किसी के सिर को थामे
अपने कंधों पर थोड़ी देर ,
जब आप को जल्दी है जाने की
आगे की ओर ।
अनिल कुमार सिंह की कविता ‘नफरत’ की ये पंक्तियाँ प्रमाण हैं कि आज धरती त्वरा और त्वचा की धुरी पर घूम रही है । यह कविता नफरत की ताकत ही नहीं बताती , यह भी बताती है कि आज नफरत ही ताकत है । प्रेम का पुनर्वास घर में ही हो सकता है लेकिन वह घर  अकल्पनीय विध्वंस के जबड़े में फँसा हुआ है लेकिन अन्तिम आश्वस्ति भी वही है और इस बात को मजदूरों से अधिक कौन समझ सकता है ? माहेश्वर तिवारी कहते हैं ——
धूप में जब भी जले हैं पाँव ,
घर की याद आई ।
मनुष्य की अप्रत्याशित गिरावट को चंद्रकान्त देवताले बखूबी दर्ज करते हैं —–
मैं अपने को गिरते हुए देखना चाहता हूँ ,
जैसे खाईं में गिरती है आवाज ,
जैसे पंख धरती पर ,
कोई मुझे मत बचाओ ।
अन्यत्र वे उजाड़ में संग्रहालय की संरचना में ध्रुवीकृत हिंसा के प्रभावात्मक मनोबिम्ब प्रस्तुत करते हैं ——
यह हिंसा की प्राक्तन बावड़ी है ।
हड्डियाँ समा जाती हैं तहखानों में ,
खून उड़ा दिया जाता है भाप बनाकर ।
देवताले की इस फन्तासी शैली से भिन्न अभिधात्मक ढंग से ऋतुराज अपनी ईश्वरचरितम् कविता में देश – दुनिया की धर्म संसदों में प्रोत्साहन पाने वाली भयावह बर्बरता को उद्घाटित करते हैं । समता और सामाजिक न्याय का दम भरने वाली सत्ता ने उस लोकतंत्र को निरर्थक बना दिया है जिसकी बुनियाद पर वह कायम है ——
हत्यारा हत्या करता है ईश्वर के नाम पर ,
हत्यारे के पक्ष में ईश्वर गवाही देता है ।
क्योंकि हर अपराध में उसका हाथ होता है ।
मैं जानता हूँ ईश्वर !
तुम कहीं नहीं हो ।
सिर्फ अन्याय को एक नाम देने के लिए
मैं तुम्हें याद करता हूँ ।
अब कूटवक्रताएँ कविता में नहीं , राजनीति और साहित्य की राजनीति में मिलती हैं । नक्सलवाद , आतंकवाद और इस्लामी कट्टरता के संदर्भ में ये कविताएँ चुप हो जाती हैं । पाकिस्तान या कश्मीर में अल्पसंख्यकों की अंतहीन पीड़ा इन कवि पुंगवों को विचलित नहीं करती । इनकी धर्मनिरपेक्षता भी कविता की तरह ही सापेक्ष स्वतंत्रता की हिमायती है —-
ईश्वर ! तुम ही तो थे
उपभोक्ता संरक्षण समिति के सचिव ,
व्यापार मंडल के अध्यक्ष भी तुम ही थे ।
अन्यथा ईश्वर की जगह अल्लाह भी हो सकता था । यह राजनैतिक सजगता इस बात का संकेतक है कि उपभोक्तावाद , बाजारवाद और फासीवाद परस्पर नाभि – नाल बद्ध हैं । आकस्मिक नहीं है कि देवताले इकहरे वृत्तान्त के शिल्प में कहते हैं —-
भूल जाओ आधी रात की हत्याएँ और बलात्कार ,
यहाँ अश्वमेध यज्ञ हो रहा है ।
और हर अश्वमेध में नरमेध अन्तर्निहित रहता है लेकिन कविता तो भूलने के खिलाफ खड़ी होती है । विष्णु नागर जैसे गद्यकल्पी कवि की कविता का एक बिंब नहीं भूलता —-
बच्चे को देखा इस तरह झूमते – गाते
तो एक तितली ने बस में घुसना चाहा ,
ड्राइवर ने उसके लिए बस धीमी की ।
———–
बस चलती रही , चलती रही ।
बच्चा उसी में बड़ा हुआ ।
लेकिन यह क्या ?
अब वह 1996 की दिल्ली में था ।
अचानक जादू टूटता है , मानो कविता ही बस हो । तितली के साथ विनोद बाल श्रम की विडंबना में परिवर्तित हो जाता है ।
                  – अजित कुमार राय 
                    कन्नौज

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here