केशव शरण की कविताएं

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लाकडाउन में रंग-क्षेत्र
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ज़मीन
तीन रंगों की हो गयी है
लाल, नारंगी और हरा,
जल
दो रंगों का
साफ़ और मटमैला,
आकाश का रंग
ज़रूर नीला रहा
बल्कि नीले से
कुछ और नीला

चिड़ियां वैसे ही
रंग-बिरंगी
लेकिन इंसान पीला

समय की
अजब लीला
दिख रही है
जिसके रंग की बात करूं तो
काला

समझ में नहीं आ रहा है
क्या होने वाला !
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लाकडाउन में घर की यात्रा
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कट गये आठ सौ किलोमीटर
अब बचा ही कितना है !

बस सात सौ किलोमीटर
घर आ ही गया है

बस पांच सौ किलोमीटर
घर आ ही गया है

बस तीन सौ किलोमीटर
घर आ ही गया है

बस दो सौ किलोमीटर
घर आ ही गया है

बस सौ किलोमीटर
घर पहुंचे ही समझो

बस पचास किलोमीटर
अब नहीं चला जायेगा
एक क़दम
गाड़ी बुलाओ
एम्बुलेंस ?
नहीं
शववाहिनी !
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लाकडाउन में इलाज
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ले आओ
कहने वाले हास्पीटल
कह रहे हैं
ले जाओ
ले जाओ
बड़े सरकारी हास्पीटल
बड़े सरकारी हास्पीटल
कह रहे हैं
जगह नहीं है
अभी यहां कुछ नहीं होना
अभी केवल कोरोना

ले आओ
दुखी इंसान
आख़िर में बोला
महाश्मशान
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लाकडाउन में भोजन
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वहां घर जोह रहा है
वहां चूल्हा जोह रहा है
वहां थाली जोह रही है
यहां लाइन में लगे हैं
और सुन रहे हैं ताने
कि शारीरिक दूरी भी नहीं बनाकर रख सकते
आये हैं मुफ़्त में खाने
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लाकडाउन में बच्चे
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बेमानी हो गयीं
हंसते बच्चों की
हंसती तस्वीरें
बेमानी हो गयी
उनकी कला
उनकी कविता
बेमानी हो गये
उनके संदेश

भूख-प्यास और वक़्त की मार से
बिलबिलाते, बिलखते बच्चों की
फोटो पर फोटो
देखने के बाद
लाकडाउन में

मानीख़ेज़ हो गया
वर्गीय अंतर
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