रोहित ठाकुर की बनारस सीरीज़ की कविताएँ और तस्वीरें रौनक ठाकुर की हैं

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बनारस   –  1
हमनें सब रंग ख़रीदे
 इस शहर के
जितने जरूरी थे
जीवन के हरेपन के लिये
हमनें समय और मौसम के पार
जो नदी बहती है
उसमें घोल दी है अपनी कुछ कविताएँ
हमनें कभी शिनाख़्त नहीं किया तुम्हारे प्रेम का
चाँद पर कुछ शिलालेख मिले हैं
हमारे प्रेम के
इस शहर में आते – जाते
मैंने तितलियों के साथ किया रंगों का व्यापार
इसके अतिरिक्त मैंने
उदास चेहरों की एक अलबम तैयार की
मैंने उन उदास चेहरों के पते पर
नदी और रंग भेजे  |
 बनारस  –  2
मैंने तुम्हें उस समय भी प्रेम किया
जब स्थगित थी सारी दुनिया भर की बातें
मैंने तुम्हें
हर रोज प्रेम किया
जिस दिन गिलहरी को
बेदखल कर दिया गया पेड़ से
मैं गिलहरी के संताप के बीच
तुमसे प्रेम करता रहा
जब एक औरत ने अपने अकेलेपन से ऊब कर
बादलों के लिये स्वेटर बुना
उस दिन भी मैं तुम्हारे प्रेम में था
जब इस सदी के सारे प्रेम पत्र
किसी ने रख दिया था ज्वालामुखी के मुहाने पर
उस दिन भी मैंने तुम्हें प्रेम किया
रेलगाड़ियों में यात्रा करते हुए
कई शहरों को धोखा दे कर निकलते हुए
मैंने तुम्हें प्रेम किया बहुत ज्यादा
मैंने खुद से कई बार कहा
यह शहर जितना प्रेम में है नदी के
मैंने तुम्हें प्रेम किया उतना ही  |
बनारस – 3
शमूएल बेकेट
तुम्हारे नाटक
वेटिंग फॉर गोडोट
 में
 व्लादिमीर और एस्ट्रागन
 गोडोट के आने की अंतहीन
  प्रतीक्षा में हैं
यहाँ कोई परित्यक्त देवता
आदमी के इन्तजार में है  |
 बनारस  – 4
नदी के समानांतर
जो गति देता है
इस शहर को
उसके शरीर के पसीने से
कुछ अधिक
नम रहता है
यह शहर  बनारस
एक शहर हमारे
पैरों पर चलता है  |
बनारस  – 5
इस शहर का
मनुष्य
जीता है जीवन को
जैसे जिजीविषा की
कोई
शिलालेख हो
किसी पुरानी चीज को
इस शहर ने कभी
ख़ारिज नहीं किया  |
  बनारस  – 6
इन गलियों में
किस्सों के पेड़ उगते हैं
जिनके पत्ते हैं हवा के
जिन पर अंकित है
सुख और दुःख
ये गलियाँ गतिमान हैं
जीवन के व्यवसाय में  |
  बनारस – 7
किसी नाव में ही
सूरज को ढ़ोता है
कोई नाविक रोज
इस शहर में सूरज का
आना-जाना
आकाश से न होकर
नदी मार्ग से होता है  |
बनारस – 8
इस शहर के उस पार
मुझे नहीं जाना है
इस शहर की भीड़
एक उष्ण नदी है  ।
  बनारस   – 9
मैंने कहा विदा
और मैं आधा यहीं रह गया
जैसे अक्सर गले मिलते हुए
मेरी बाँहें रह जाती है तुम्हारे पास
बनारस की गलियों
से गुजरते हुए
धूप के फूल
 दिखाई देते हैं
 इन दिनों  |
बनारस  – 10
एक आदमी जब
 गुज़रता है इस शहर से
 शहर की छाया
उसके मन पर पड़ती है
एक जाता हुआ आदमी
अपने साथ थोड़ा शहर ले जाता है
एक जाता हुआ आदमी
थोड़ा सा शहर में रह जाता है
न आदमी इस शहर को
कुछ लौटाता है
न शहर आदमी को
दोनों धंसे रहते हैं
देनदारी में  |

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