रश्मि सुमन की कविताः सीखती हूँ प्यार करना तालाबंदी में संगरोध रहकर

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एकांत बेहद सुखद अहसास
हो भी क्यूँ नहीं
सीखती हूँ प्यार करना
तालाबंदी में संगरोध रहकर
खुद को खुद से ही ……

जब संकल्पों और
विकल्पों के बीच
डूबती उतराती
किनारे पर आकर भी ,
संशय और खौफ में
घिरे इंसान को लगे
क्या यही मेरा किनारा है ?.
तब सामाजिक दूरी में
एकांत ही होता
एकमात्र उबरने का साधन…..

लोगों को परखने का भी
ये है सबसे आसान साधन
और आत्मविश्लेषण का
नायाब तरीका भी,
तब बाहरी दुनियाँ से खुद को
अलगाव में रखकर
एक विस्तार दे पाती हूँ
अपने मन को,
और अनुभवों को भी……

भीड़ में खड़ा हर व्यक्ति
भ्रम में रहता कि सब उसके साथ हैं
पर सच यह है कि वह
खुद में अकेला होता है….

कोई किसी के पास होने का
दम नहीं भर सकता ,
ना ही कोई किसी के साथ होने का
दम भर सकता…

परछाँई तक साथ नहीं देती
वो भी अमावस की तरह
अंधेरे में कहीं खो जाती है……

जब उखड़ती हुई पपड़ियों से झाँकते अतीत के ललाट पर जबरन लिख दी जाती मानसिक आघातों की छोटी छोटी दास्तानें ,
तब भी,
तब भी यही एकांत
ऐसे घाव पर मरहम लगाता…..

एकांत कई भ्रमों को तोड़ता है
सच कहूँ तो
खुद को खुद से जोड़ता है
एकांत……यानि एक का अंत
और बेहद सुखद आत्ममंथन…..

रश्मि सुमन
पटना (बिहार)

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