प्रेम कोमल अनुभूतियों का अप्रतिम एहसास

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प्रेम अंतर्मन को छूने की एक अद्भुत कला है। प्रेम कोमल अनुभूतियों का अप्रतिम एहसास है।प्रेम में डूबने वाला,उसमें और डूबना चाहता है। प्रेम को लेकर अनेक कवियों ने कविताएं लिखीं हैं।प्रेम के अनेक पहलुओं को इन कवियों की कविताओं में देख सकते हैं। आज वैलेंटाइन डे के दिन प्रेम पर लिखी कुछ कवियों की कविताएं साझा कर रहा हूं :
जो तुम आ जाते एक बार 
“जो तुम आ जाते एक बार
कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग
आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार
हँस उठते पल में आर्द्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग
आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार।”
– महादेवी वर्मा

आदर्श प्रेम 

“प्यार किसी को करना लेकिन
कह कर उसे बताना क्या
अपने को अर्पण करना पर
और को अपनाना क्या
गुण का ग्राहक बनना लेकिन
गा कर उसे सुनाना क्या
मन के कल्पित भावों से
औरों को भ्रम में लाना क्या
ले लेना सुगंध सुमनों की
तोड़ उन्हें मुरझाना क्या
प्रेम हार पहनाना लेकिन
प्रेम पाश फैलाना क्या
त्याग अंक में पले प्रेम शिशु
उनमें स्वार्थ बताना क्या
दे कर हृदय हृदय पाने की
आशा व्यर्थ लगाना क्या।”
– हरिवंशराय बच्चन

ताजमहल की छाया में

“मुझ में यह सामर्थ्य नहीं है मैं कविता कर पाऊँ,
या कूँची में रंगों ही का स्वर्ण-वितान बनाऊँ ।
साधन इतने नहीं कि पत्थर के प्रासाद खड़े कर-
तेरा, अपना और प्यार का नाम अमर कर जाऊँ।
पर वह क्या कम कवि है जो कविता में तन्मय होवे
या रंगों की रंगीनी में कटु जग-जीवन खोवे ?
हो अत्यन्त निमग्न, एकरस, प्रणय देख औरों का-
औरों के ही चरण-चिह्न पावन आँसू से धोवे?
हम-तुम आज खड़े हैं जो कन्धे से कन्धा मिलाये,
देख रहे हैं दीर्घ युगों से अथक पाँव फैलाये
व्याकुल आत्म-निवेदन-सा यह दिव्य कल्पना-पक्षी:
क्यों न हमारा ह्र्दय आज गौरव से उमड़ा आये!
मैं निर्धन हूँ,साधनहीन ; न तुम ही हो महारानी,
पर साधन क्या? व्यक्ति साधना ही से होता दानी!
जिस क्षण हम यह देख सामनें स्मारक अमर प्रणय का

प्लावित हुए, वही क्षण तो है अपनी अमर कहानी !

– अज्ञेय

चम्पई आकाश तुम हो 

“चम्पई आकाश तुम हो
हम जिसे पाते नहीं
बस देखते हैं ;
रेत में आधे गड़े

आलोक में आधे खड़े।”

– केदारनाथ अग्रवाल

थरथराता रहा 

’एक विचित्र प्रेम अनुभूति’
थरथराता रहा जैसे बेंत
मेरा काय…कितनी देर तक
आपादमस्तक
एक पीपल-पात मैं थरथर ।
काँपती काया शिराओं-भरी
झन-झन
देर तक बजती रही
और समस्त वातावरण
मानो झंझावात
ऐसा क्षण वह आपात
स्थिति का।”
– शमशेर बहादुर सिंह

नामांकन 

“सिंधुतट की बालुका पर जब लिखा मैने तुम्हारा नाम
याद है, तुम हंस पड़ीं थीं, ‘क्या तमाशा है
लिख रहे हो इस तरह तन्मय
कि जैसे लिख रहे होओ शिला पर।
मानती हूं, यह मधुर अंकन अमरता पा सकेगा।
वायु की क्या बात? इसको सिंधु भी न मिटा सकेगा।’
और तबसे नाम मैने है लिखा ऐसे
कि, सचमुच, सिंधु की लहरें न उसको पाएंगी,
फूल में सौरभ, तुम्हारा नाम मेरे गीत में है।
विश्व में यह गीत फैलेगा
अजन्मी पीढ़ियां सुख से
तुम्हारे नाम को दुहराएंगी।”
– रामधारी सिंह “दिनकर”

रचना 

 “कुछ प्रेम
कुछ प्रतीक्षा
कुछ कामना से
रची गई है वह,
— हाड़माँस से तो
बनी थी बहुत पहले।”
-अशोक वाजपेयी

पर आँखें नहीं भरीं 

 “कितनी बार तुम्हें देखा
पर आँखें नहीं भरीं।
सीमित उर में चिर-असीम
सौंदर्य समा न सका
बीन-मुग्ध बेसुध-कुरंग
मन रोके नहीं रुका
यों तो कई बार पी-पीकर
जी भर गया छका
एक बूँद थी, किंतु,
कि जिसकी तृष्णा नहीं मरी।
कितनी बार तुम्हें देखा
पर आँखें नहीं भरीं।
शब्द, रूप, रस, गंध तुम्हारी
कण-कण में बिखरी
मिलन साँझ की लाज सुनहरी
ऊषा बन निखरी,
हाय, गूँथने के ही क्रम में
कलिका खिली, झरी
भर-भर हारी, किंतु रह गई
रीती ही गगरी।
कितनी बार तुम्हें देखा
पर आँखें नहीं भरीं।”
– शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

बारिश 

“एक दिन मैं तुम्हें
भीगता हुआ देखना चाहता हूँ
प्रिये
बरिश हो और हवा भी हो
झकझोर
तुम जंगल का रास्ता भूल कर
भीग रही हो
एक निचाट युवा पेड़ की तरह
तुम अकेले भीगो
मैं भटके हुए मेघ की तरह
तुम्हें देखूँ
तुम्हें पता भी न चले कि
मैं तुम्हें देख रहा हूँ
फूल की तरह खिलते हुए
तुम्हारे अंग-अंग को देखूँ
और मुझे पृथ्वी की याद आए।”

– स्वप्निल श्रीवास्तव

प्रेम क्या है ? 

“प्रेम
दूसरे को जानना भी है
ख़ुद को पहचानना भी है
ग़लत को ग़लत
सही को सही
मानना भी है
प्रेम गुसलख़ाने में
गाना भी है
नहाना भी है
किसी को अपने घर
खाने पर बुलाना भी है
किसी का दुख-दर्द सुनना
और अपना बताना भी है
प्रेम
अपना हाथ देकर
किसी को उठाना भी है
काँटे हमें कहीं
तो उसे निकालना भी है
पत्थर है कोई रास्ते में
तो उसे हटाना भी है ।
प्रेम
अगर मान-मनौव्वल है
तो कुछ
उलाहना भी है ।
प्रेम
ज़िन्दगी भर का हिसाब है
जोड़कर
उसमें कुछ घटाना भी है ।
प्रेम जितना जताना भी है
उतना छिपाना भी है ।
प्रेम में आँसू बहाना भी है
मुस्कराना भी है।”
– विमल कुमार

अर्ध्य  

“चाँद निकल आया
यही तो कहा था
उस रात
जब माघ की चौथ को तुम अर्ध्य दे रही थी
तुम्हारे लिए चाँद का यह निकलना
पुतलियों में फँसी हवा का निकलना था
जहाँ रोशनी थी
हरियाली
और एक ऐसी आर्द्रता थी
जो तुम्हारे प्रेम से भारी थी
और भरी हुई
निकला हुआ चाँद
गाजीपुर की चाँदनी से
मुझे बेपर्दा कर रहा था
और मैं बनारस की बरसात में भीग रहा था
चाँद आज हमारे लिए
उस चकवा की तरह है
जहाँ सिर्फ रात है
मुझे इस चन्द्रमा के गुजर जाने का इंतजार होगा
तुमसे व सिर्फ तुमसे
मिलने के लिए।”
– श्रीप्रकाश शुक्ल

आग और प्रेम 

“आग की ही तरह
जन्म लेता है प्रेम
पहले कुछ सुलगता है
फिर भभक कर जल उठता है
सब कुछ जगमग-जगमग हो उठता है
बंद आंखों के भीतर
छिटकने लगते हैं सात रंग
देश- काल नहा उठता है
एक अनाविल उजास में
एक पल में सब कुछ बदल जाता  है
रेगिस्तान में उग आते हैं फूलों के द्वीप
बिना मेह बरसता है आकाश
खेत लहलहा उठते हैं विविध रूप-रंग में
बसंत उतर आता है बारहमासी
भूख-प्यास लगती नहीं
मन भरा रहता है हमेशा
सूरज डूबता ही नहीं
एक अरूप असंख्य
चिनगारियों में फूट पड़ता है
आग में ही बदल जाता है समूचा अस्तित्व
पिघलकर भी बहता नहीं
जलकर भी जलता नहीं।”
– सुभाष राय

प्यार के किस्से सुनने वाला कोई नहीं था

“मैं भाग निकला क्योंकि शाम होते ही
मुझे अपने प्रेम के किस्से सुनाने का दिल करने लगता है
मैं भाग आया घर
मुझे घर का रास्ता मालूम था
प्यार के किस्से सुनने वाला यहाँ भी कोई नहीं था।”
-मिथिलेश श्रीवास्तव

मिलना 

“मैं
अपने को ढूंढ़ रहा था
कि मिली तुम
अपने को ढूंढ़तीं।”
– विनय विश्वास

तुम्हें प्यार करता हूँ

तुम्हें प्यार करता हूँ
क्योंकि तुम पृथ्वी से प्यार करती हो
मैं तुममें बसता हूँ
क्योंकि तुम सभ्यताएं रचती हो।…
भाषा की जड़ों में तुम हो
हर विचार,हर दर्शन तुमसे
हर खोज,हर शोध की वजह तुम हो
सभ्यता की कोमलतम भावनाएं तुमसे
कुम्हार से तुमसे सीखा सिरजना
मूर्तिकार की तुम प्रेरणा
चित्रकार के चित्रों में तुम हो
हर दुआ,दुलार तुमसे
नर्तकी का नर्तन तुम।
संगतकार का वादन
रचना का उत्कर्ष तुम हो ।
मैं तुममें बसता हूँ
क्योंकि तुम सभ्ताएं सिरजती हो।”
– राकेशरेणु

प्रेम करते हुए

“प्रेम करते हुए हमने
नहीं पढ़ीं प्रेम की कविताएँ
हमने पढ़ीं एक -दूसरे की पुतलियाँ
हमने उँगलियों से बिखराईं-सँवारीं
एक -दूसरे की लटें
एक-दूसरे के चेहरे को हाथों में लेकर
सुबह के सिंदूरी सूर्य की तरह निहारा
एक-दूसरे के साथ चलते हुए
चाँद को अँगुरी में भर लिया
एक-दूसरे से ठिठोली की
मन भर लड़े
एक दूसरे के गले में गला डाल खड़े रहे देर तक
हम मिलते रहे
सागर की लहरों जैसे
मचलते रहे एक-दूसरे की बाँहों में
पहचानते रहे एक-दूसरे के होंठ
एक-दूसरे के शरीर
एक-दूसरे का सपना
हम घुलते रहे एक-दूसरे में
धीरे-धीरे लगा
हमने रचा है कुछ एक-दूसरे में
प्रेम करते हुए हमने जाना
प्रेम करते हुए लोग
रचते हैं कविताएँ एक-दूसरे में
एक-दूसरे का होना
उनकी कविता का पूरा होना है।”
-जितेंद्र श्रीवास्तव

वे हमारे लिए भीतर बैठी हमारे लिए स्वेटर बुन रही हैं 

“यह उनमें भी नहीं थी
जिनकी आंखों की बुलाहट में
हमें नदी नाले आग पानी कुछ भी नहीं दिखाई देते थे
यह वह भी नहीं थी
जिनके लिए हमारी लंबी रातें छोटी होकर
आंखों में ही रीत जाती थीं
यह उनमें भी नहीं थी
जिनसे कभी इतनी बातें की थीं
अब यह निश्चय है कि अब हम जो करेंगे
और यह को है इसे कभी दिखाई नहीं देगा कि वे
हमारे भीतर बैठी हमारे लिए स्वेटर बुन रही है।”
-नरेंद्र पुंडरीक

साथ-नाम 

“मेरा नाम ले-ले कर
लड़ती-झगड़ती होंगी तुम्हारी पत्नी
जोड़-जोड़ कर मेरे साथ तुम्हारा नाम
उँगली तक नहीं छुई हमने कभी एक-दूसरे की
लेकिन सुनती हूँ मेरे बारे में कहती हैं वह तमाम अपशब्द
सुनना पड़ता होगा मेरी वजह से
कितना कुछ तुम्हें
जमाने भर की बुराई लादी जाती होगी
तुम्हारे ही सिर
तुम्हारी नेकनीयती, सज्जनता के प्रति
हमेशा रहा मेरे मन में गहरा आदर भाव
उजली खिलखिलाहट तुम्हारी आज भी है मुझे बेहद प्रिय
अनुरक्ति ही थी हमारी
है भी
तभी तो कविता में आज उठ आयी है
इस तरह तुम्हारी बात
अफसोस होता है अक्सर मुझे
मेरी वजह से तुम निर्दोष पर
कितना दोष लग रहा है !!”
– प्रेमशंकर शुक्ल

प्रेम

“तुम्हारी देह के भीतर
तैर रही हैं
असंख्य रंगीन मछलियां
तैर रहे हैं
कुछ टूटे हुए स्वप्न
कुछ सितारे
कुछ टूटे हुए इन्द्रधनुष
तुम्हारी देह के भीतर
एक तिनके के सहारे
मैं भी तैर रहा हूँ
तुम्हारी देह के भीतर।”
-मणि मोहन

प्यार

उसने पूछा
कैसा होता है प्यार?
क्या आकाश से ऊँचा
पाताल से गहरा
शीशे सा पारदर्शी
जल कल सा साफ स्वच्छ
क्या ऐसा होता है प्यार?..
मत बांधो
चंद रिश्तों का नाम नहीं है
हर बन्धन में कसमसाता
छटपटाता
मुक्ति की तमन्ना लिए
बेख़ौफ़ आजादी की नव नव तरंग
जीवन का सार
प्यार..प्यार..प्यार।”
-कौशल किशोर

तुम्हारा प्रेम 

“तुम्हारा प्रेम
उस सिक्के की तरह है
जिन्हें भरकर नन्हीं मुट्ठियों में
मेरा बचपन और मैं
घर के बगल में ही
काज़ी हाउस में छिप गए थे
तब बहुत मुश्किल से मैं
लौटा था घर
क्योंकि काज़ी हाउस के अँधेरे कमरे में
मैं
हर परिचय के ख़िलाफ़ छिपा था
तब मैंने चाहा था
सौंप देना
अपनी दुखती हथेलियाँ
आसमान को
तुम्हें देखते ही
मेरी हथेलियों में भिंजे हुए
उन्हीं सिक्कों के
आड़े-तिरछे निशान उभर आते हैं
तब कई दिनों तक
किसी के सामने
नहीं खोलता हूँ
अपने हाथ
और न ही देखता हूँ
तुम्हें
कई दिनों तक।”
– राकेश मिश्र

प्रेम में

“प्रेमी -प्रेमिका का वह जोड़ा
जिनके होंठ एक -दूसरे में गुंथे हैं
वे बेखबर हैं
उन्हें नहीं मालूम इस वक्त हवा की सरसराहट
पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमना
पेड़ से शहद की बूंद का टपकना
भरी दोपहर में धूप के कण का गिरना
पेड़ की पत्तियों का जड़ से अपना भोजन खींचना
यहां तक कि बिल्ली का दुबक कर उसके सामने बैठे रहना
कुछ भी पता नहीं चल रहा
बिना हिले-डुले जैसे सब कुछ रुका हुआ है
या फिर वे रुके हुए हैं
थम गई है धरती,थम गए हैं वे
लेकिन तभी मोबाइल की घंटी बज गई।”
– उमाशंकर चौधरी

एक प्रेम कविता

“मैंने तुम्हें देखा
तुम्हें नहीं
तुम्हारे मकान को देखा
मुझे एक मकान की
सख्त जरूरत थी।
मैंने तुम्हें पहचाना
तुम्हें नहीं
तुम्हारे बाप को पहचाना
मुझे एक पहचान की
सख्त जरूरत थी।
मैंने तुम्हें जाना
तुम्हें नहीं
तुम्हारे जिस्म को जाना
मुझे एक जिस्म की …….।”
– बली सिंह

रहना यूँ ही जैसे तुम रहे सदा से

“मुझे याद है वो दिन
जब कहा था मैंने तुमसे
सुनो मुझे भी तुमसे प्यार है
मैं चाहूँगी तुमको वैसे ही
जैसे चाहा था हीर ने राँझे को
लैला ने मजनू को
शीरी ने फ़रहाद को
तुम्हें आकण्ठ डूब कर प्यार करूँगी मै
और तुमने मेरे उस भावात्मक उद्वेग को
ठीक बीचोबीच रोक दिया था
कहा था तुमने की नहीं चाहिए तुम्हें अपने लिए
कोई हीर, कोई लैला या कोई शीरी
कहा था तुमने हम प्यार में रहेंगे वैसे ही
जैसे रहे हैं हम सदा से
मैं सब कुछ हो कर भी रहूंगा मै ही
और तुम चाहना मुझे सिर्फ़ तुम हो कर
सच कहूँ उस दिन तुम्हारी वह बात
कुछ बुरी-सी लगी थी मुझे
कि तुम नहीं चाहोगे कभी मुझे उतनी शिद्दत से
जितनी शिद्दत से मजनू ने चाहा लैला को
फरहाद ने चाहा शीरी को और
चाहा राँझे ने अपनी हीर को
कभी नहीं पार करोगे तुम मेरे लिए कोई उफनती नदी
या कोई तूफ़ान
आज इतने बरसों बाद जब मैं देखती हूँ तुम्हारे प्यार को
यह कि मेरे बिन तुम्हारा जीवन अधूरा है तुम्हारे लिए
कि तुम्हारे बिन मेरा जीवन बे-अर्थ
तब लगता है कि अच्छा ही है
जो तुम्हारे प्यार में नहीं था कोई उद्वेग
कि तुम आज भी वहीं हो
जहाँ थे तुम कई बरसों पहले
जब मिले थे हम एक-दूजे से
मैं जानती हूँ जीवन का कोई उद्वेग, कोई हलचल
तुम्हे डिगा नहीं सकती मुझे चाहने से
तुम मुझमें और मैं तुममें उतने ही हैं
जितना बाक़ी है समुद्र में नमक
जितना बाकी है सृष्टि में जीवन।”
– ज्योति चावला

जब तुम दो टुकुर देखती हो

“मन के अँखुआ में
कोपल  उग आता  है…
कविता से पंक्ति
हमारी ओर खिसक आती हैं
ज़ुम्बिश सी उठती है
मन की  गिरह
थोड़ी और खुल जाती है
भँवर के  क़ैद से
 एक मछली
और आज़ाद हो जाती है
मौसम  जम्हाई लेता है
इन्द्रियाँ उनींदी होती  हैं
सातों सुर एक साथ
शरमा कर आपस में लिपट जाते हैं
आलम से भरी घड़ी
मुस्कुरा उठती है
हौंस थोड़ी हूक
और बढ़ाती  है
आंगन चैत के महुए से पट जाता है
आसमां कार्तिक के सितारों सा जगमगाता  है
दरअसल जब तुम टुकुर- टुकुर  देखती हो
तो लगता है
तुम मुझे देख नहीं
भींच रही  हो …

– यतीश कुमार

प्रेम करो

“प्रेम करो अपनी आँखों से
जिनसे देखना है तुम्हें
यह विराट जगत
प्रेम करो अपने हाथों से
इन्हीं हाथों से
खेनी है तुम्हें
अपनी जीवन -नैया
प्रेम करो अपने पैरों से
आख़िर वे ही पहुँचाएंगे तुम्हें
तुम्हारी मंजिल तक
प्रेम करो अपनी आत्मा से
आत्मा प्रज्वलित रखेगी
तुम्हारे अन्तस् का दीप
प्रेम करो अपने आप से
तुम जब सीख जाओगे
अपने आप से प्रेम करना
तभी कर पाओगे
किसी दूसरे से सच्चा प्रेम ।”
-जसवीर त्यागी

जब आप प्रेम करते हैं

“जब आप प्रेम करते हैं
तब आप दुनिया के निकम्मेपन और क्रूरता को
एक सरल मुस्कान से
जीत लेने के किस्से गढ़ते हैं
और विश्वास करने लगते हैं
कि इस बंजर होती धरती पर यकायक
पेड़ बढ़ जाते हैं
उन दिनों आपको एक कंक्रीट की बिल्डिंग भी
हरी नजर आती है और पैरों के नीचे
तपते डामर की काली सड़कें भी
महसूस होती हैं ठंडे छिछले तालाबों की तरह
तब आप एक टिमटिमाती रौशनी भर के
भरोसे पर एक भयानक लंबी सुरंग में
प्रवेश कर जाते हैं और उम्मीद करते हैं
कि आप उसे सौ फ़ीसदी पार कर ही लेंगे।”
– घनश्याम कुमार देवांश

प्रेम

“एक मीठे प्यास का दरिया
एक अतृप्त पथिक
दोनों वाचाल
मौन खड़े हैं।”
-निशांत
(संकलन कर्ता- नीरज कुमार मिश्र)

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