प्रगतिशीलता के नाम पर डिक्टेट करने और मनमानी करने को लेकर कुछ नोट्स

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तरुणाई से ठीक पहले वाले दौर में अपने गृह-जनपद अमेठी में हम लोग भी ताश के खेल में अक्सर मशगूल हो जाया करते थे। रिश्ते में मेरे बाबा लगने वाले पड़ोस के गाँव के राजबहादुर शुक्ल जब खेल में होते थे तो रोमांच अपने चरम पर होता था। उन दिनों वह कोलकाता में नौकरी किया करते थे। शुक्ल जी कई बार बाकी खिलाड़ियों को डिक्टेट करने लगते थे और तब शुरू होती थी खींचतान और यह खींचतान कई बार खेल के खात्मे की ओर ले जाती थी।
खेल ताश का हो या असल जिंदगी का मज़ा तो तभी आता है जब खेलने वाले आज्ञाधीन उपकरण न होकर स्वतंत्र मनुष्य हों। जब आप स्वतंत्र-खुदमुख्तार मनुष्यों के बीच होते हैं और एकतरफा तौर पर डिक्टेट करने लगते हैं यानि कि अपने मन की चलाने लगते हैं। मन की चलाने का एक अर्थ दूसरे की नज़र में सनक भरा व्यवहार भी हो सकता है। गरज़ यह कि आपकी मनमानी से तंग आ जाने पर दूसरे खिलाड़ियों के पास खेल छोड़कर उठ जाने का विकल्प तो होता ही है। अब जाहिर है कि ऐसी स्थिति में आप अकेले पड़ जाएंगे, एकतरफा तौर पर अपनी बात मनवाने का प्रयास करेंगे तो अकेले पड़ने का खतरा तो रहेगा।
अब आप कहेंगे कि जाने दो क्या फर्क पड़ता है, खिलाड़ियों की कोई कमी थोड़े है। पर यहाँ आप स्पष्ट रूप से गलत होते हैं। खेल का मज़ा तभी आता है जब खिलाड़ी संजीदा किस्म का हो और वह नियमों को गंभीरता से लेता हो। और संजीदा खिलाड़ी बहुतेरे नहीं होते जो होते हैं वे अपनी भी चलाने की कोशिश करेंगे ही। फिर रास्ता क्या बचता है? अगर आपको नए नियम चलाने हैं तो बाकी खिलाड़ियों को यकीन दिलाने-कायल करने की कोशिश करें कि आप सही हैं और मनमानी नहीं करें।
अब ताश के खेल से दूरी बनाते हैं और असल जिंदगी पर आते हैं। समाज में जब मार्क्सवाद का प्राधिकार कायम हो जाता है अर्थात क्रांति के पक्ष में जनमत तैयार हो जाता है तब पशुबल के दम पर प्रभुत्व हासिल करने के लिए फैसलाकुन जंग छिड़ती है पर वर्ग-संघर्ष तो रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा होता है। जिस पल आप बदलाव के लिए काम करने की सोचते हैं, उसी पल से संघर्ष शुरू हो जाता है। सबसे मारक-तीखा और दिलोदिमाग को थका देने वाला संघर्ष तो पारिवारिक ढाँचे में होता है।
आइए चर्चा के केंद्र में मज़दूर आंदोलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं को लेकर आते हैं। पूँजीवादी व्यवस्था मे रह रहे आलीशान से आलीशान व्यक्ति खुद के मानव-प्रेमी होने का चाहे जितना भी दावा करें, तुलनात्मक रूप से खुद को आगे बढ़ा हुआ मानकर अपने विलोम को चाहे जितना प्रतिगामी साबित करें लेकिन सच तो यह है कि सुदूर अतीत के आदिम साम्यवाद के मनुष्य और सुदूर भविष्य के नए समाजवादी मनुष्य की तुलना में उनके बीच का फर्क राई-रत्ती का ही है। फिर वोटर के रूप में भाजपाई-कांग्रेसी होने के मुकाबले अपने परिवर्तनकामी होने-बेहतर होने की इतराहट में अकेले हो जाने का जोखिम क्यों मोल लिया जाए?
सीधी-सादी भाषा में समझाते हैं। माँ-बाप जब बियाह करते हैं तो पक्षधरता का मिलान करके नहीं करते। और अगर आपने जोड़ा बनाने का काम खुद ही किया है तो भी दोनों में से किसी की भी पक्षधरता कभी भी बदलने की ओर उन्मुख हो सकती है। अगर आप अपने घर में अपनी वैचारिकी का कायल नहीं बना सकते तो बाहर कितने प्रभावी होंगे? घर में तो आपके पास यह सुविधा होती है कि मटर के साथ सूरन को लाजवाब ढंग से बनाएं और निहाल कर दें। हज़ार तरीके से सरोकारी रहकर अपने गाढ़े रंग की छाप छोड़ सकें। पर आपको समाज में असर डालने के तो सीमित तरीके ही मिलेंगे।
मेरी अपनी ब्राह्मणी समाज में प्रभुत्वशील सवर्ण विचारधारा से आक्रांत है और जिन बातों पर मुझसे प्रायः पंजा भिड़ाए रहती है, उन्हीं के लिए मेरी पीठ पीछे वह मेरी इज्जत भी करती है। मसलन, ऊंट के साथ भिक्षा माँगने आए हँसमुख व्यक्ति के लिए खुद ही चाय बनाने लगना, सूदखोर सवर्ण को लतिया-जुतियाकर भगाने के बाद हाड़तोड़ मेहनत करने वालों के साथ निश्छल-निष्कपट और अपनेपन का बर्ताव करना। अबोध शिशु की मोहक मुस्कान पर फिदा होना मनुष्य मात्र का गुण है। अपनी विफलता-अपने मनमानेपन को छिपाने के लिए विचारधारा की आड़ लेना कहीं से भी न तो श्रेयस्कर है और न ही वरेण्य। पत्नी-प्रेमिका और इसके उलट का भी ईर्ष्यालु होना-पजेस्सिव होना पूँजीवादी समाज में सहज़-स्वाभाविक और मानवीय गुण है और हमें एक हद तक इसकी कद्र करना आना चाहिए वर्ना बिछोह के फिल्मी गीत गाने का विकल्प तो खुला हुआ है ही।
चूँकि मैं कमाता हूँ इसलिए मेरी मम्मी मेरी हर बात मान लेती हैं फिर चाहे सावन के महीने में भैंसा खाने की ही बात क्यों न हो? मुझे जाति-धर्म से ऊपर दिखकर तरक्कीपसंद होने-दिखने की खब्त है। तो भइया आपकी मम्मी को मायके में हिस्सा भी मिल सकता है या पुराने घर में गड़ा हुआ खजाना भी। तब तेरा क्या होगा कालिया? इतने दुलार के साथ तेरे माथे पर हाथ कौन फेरेगा? इसी बात को बेटे-बेटियों तक विस्तारित करते हैं। आज वे आप पर निर्भर हैं कल को नहीं रहेंगे। भरोसे में लेकर चलेंगे-अपना बनाकर चलेंगे तो रिश्ते आत्मीय और मज़बूत बने रहेंगे। धनबल-पशुबल से धमकाते रहेंगे तो यहाँ भी अकेले पड़ जाने का जोखिम तो रहेगा।
हम जिस देश-काल और समाज में रहते हैं उसके नियमों को एक हद तक मानने, मानकर चलते रहने में ही हमारी भलाई होती है। समाज में मर्दवाद है तो उसके कुछ नियम हैं, स्वाभिमान को बचाए-बनाए रखना है तो उनमें से कुछ को मानकर चलना चाहिए। कमाऊ गृह-स्वामिनी और बेरोजगार पति के युग्म में पुरुष कितना तो परवश-लाचार दिखता है।
अपनी राजनीति के दम पर जनता से रोटी-कपड़ा माँगना ऐक्टिविस्ट की कमाई होती है और अगर ऐसी कमाई न कर सको तो जरूरी है कि बाजार में अपना श्रम बेचकर अपनी उदर-पूर्ति करो। ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हारा आत्म-सम्मान छीजता जाएगा, तुम थेथर और पिटायल होते जाओगे और जाहिर है तुम मनुष्य के रूप में कमतर भी होते जाओगे। ‘बहुजनवाद’ वाले ऐक्टिविस्ट भी इन दिनों उग आए हैं जो मँझोली जातियों के खाते-कमाते अपने लोगों से मिलने वाले चंदे पर पलते हैं। यह चंदाजीविता मनुष्य के रूप में उन्हें किस प्रकार से गढ़ती है, इसके दीदार भी होने लगे हैं। ऐसे श्रम-विरत जनों में शराफत सिरे से नदारद होती है क्योंकि संवेदनशीलता-हमदर्दी के मनोभाव भी हवा में नहीं पैदा होते। उनकी भी जमीन श्रम ही होती है।
हम पूँजीवाद से इतनी नफरत क्यों करते हैं? सिर्फ इसलिए नहीं कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के श्रम का उपयोग अपने निजी मुनाफे के लिए करता है बल्कि इसलिए भी कि एक मनुष्य दूसरे को माल समझता है और बिना किसी मानवीय सरोकार के उसे हस्तगत करने का प्रयास भी करता रहता है।
कामता प्रसाद

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