पीएफ घोटाले में फंसा सन्मार्ग प्रबंधन को15 दिन के अंदर 97.54 लाख जमा करने का आदेश

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रांची: रांची से प्रकाशित दैनिक अखबार सन्मार्ग के प्रबंधन को दो वर्षों तक कर्मचारियों का पीएफ का पैसा जमा नहीं करना महंगा पड़ा। पीएफ कमिश्नर ने एक मामले की सुनवाई के बाद सन्मार्ग प्रबंधन को 15 दिनों के अंदर पीएफ की बकाया राशि 97.54 लाख जमा करने का आदेश दिया है। इसका संस्थान के 21 कर्मियों को लाभ मिलेगा। ज्ञातव्य है कि सन्मार्ग झारखंड मीडिया प्राइवेट लिमिटेड प्रबंधन नियमों-कानूनों की परवाह नहीं करता और मनमाने तरीके से काम करता है। प्रबंधन ने 2017 में संमार्ग के वरीय संवाददाता नवल किशोर सिंह का दुर्भावनावश रांची से पटना स्थानांतरण कर दिया था। उनके कई बार आग्रह के बावजूद प्रबंधन तबादला रद्द करने को तैयार नहीं हुआ तो उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और अपनी भविष्य निधि की राशि के लिए भविष्य निधि कार्यालय में आवेदन दिया। इसपर तीन वर्षों तक सुनवाई चली। अंततः 23 दिसंबर 2020 को क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त ने अपना अंतिम फैसला दिया।
इस बीच आयुक्त ने सन्मार्ग प्रबंधन से उपस्थिति पंजिका सहित अन्य जरूरी दस्तावेज़ तलब किया। लेकिन प्रबंधन उन्हें प्रस्तुत नहीं कर सका। उसके पास दस्तावेज़ थे ही नहीं। वास्तव में अखबार प्रबंधन ने पीएफ निबंधन का नंबर तो ले लिया था लेकिन उसका कभी संचालन नहीं किया। न प्रबंधन की ओर से जमा की जाने वाली राशि कभी जमा की न कर्मियों के वेतन से उनका हिस्सा काटा। कर्मचारियों को उनके पीएफ खाते की जानकारी भी उपलब्ध नहीं कराई। नियमतः पीएफ मद में कर्मियों के हिस्से की राशि उनके वेतन से काटकर पीएफ कार्यालय में अपने हिस्से की राशि के साथ नियमित जमा करना संस्थान की जिम्मेदारी होती है। लेकिन सन्मार्ग प्रबंधन ने कभी इसका निर्वहन नहीं किया। आयकर रिटर्न में भी इसका कोई ब्योरा नहीं दिया। किसी भी संस्थान के लिए कर्मियों के खाते में वेतन ऑनलाइन ट्रांस्फर करने का नियम है। लेकिन सन्मार्ग प्रबंधन नकद राशि का भुगतान करता रहा। वह भी अनियमित तरीके से। यहां तक कि नोटबंदी के समय जब पूरे देश में नकदी की किल्लत थी, सन्मार्ग प्रबंधन के पास वेतन भुगतान के लिए नकद का कोई संकट नहीं होता था। दरअसल मीडिया हाउस होने के नाते प्रबंधन नियमों का पालन करना जरूरी नहीं समझता था। जबकि उस हाउस से हिंदी के अलावा उर्दू, अंग्रेजी अखबार भी निकलते हैं और 100 से अधिक पत्रकार गैरपत्रकार कार्यरत हैं। राज्य और केंद्र सरकार का विज्ञापन भी भरपूर मिलता है। लेकिन कर्मियों को नियमित वेतन भी देना जरूरी नहीं समझता। यह संस्थान पहली बार कानूनी पेंच में फंसा है।

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