17 सितम्बर : पेरियार जयन्ती : सामाजिक न्याय दिवस

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वृक्ष लगाने वाले व्यक्ति की कई पीढियां वृक्ष की छाया व फल का आनंद लेती हैं। राजनीतिक तथा वैचारिक रूप से जो बीजारोपण पेरियार ने आठ दशक पहले किया था वह आज पूरी तरह तमिलनाडु में लहलहाते हुए फल से गदराया हुआ है। आज तमिलनाडु सरकार ‘सामाजिक न्याय दिवस’ मना रही है, जिसका निर्णय मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार द्वारा 6 सितंबर, 2021 को फैसला लिया गया । 17 सितम्बर को प्रत्येक साल पेरियार जयन्ती को ‘सामाजिक न्याय दिवस’ के रूप में मनाए जाने का निर्णय अत्यंत सराहनीय है। विदित हो कि तमिलनाडु के वर्तमान मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन तमिलनाडु के भूतपूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत एम. करूणानिधि के पुत्र हैं। यह भी मालूम हो कि करूणानिधि पेरियार के राजनीतिक व वैचारिक शिष्य थे। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डी.एम.के.) के नेता आज भी पेरियार को अपना राजनीतिक विरासत मानते हैं, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण 7 मई, 2021 को दिखा। मुख्यमंत्री पद का शपथ लेने से पहले भी एम. के. स्टालिन ने पेरियार के तैलचित्र पर पुष्प अर्पित कर नमन किया था। पेरियार पूरे बहुजन समाज के लिए राजनीतिक और वैचारिक विरासत हैं, इसीलिए आज पूरे देश में नमन किये जा रहे हैं।

पेरियार का जन्म 17 सितम्बर, 1879 को समुद्र किनारे बसे इरोड नामक जिला के गड़ेरिया (नायकर-चरवाहा) जाति में हुआ था। उनके पिता का नाम वेंकट नायकर तथा माता का नाम चिन्नातायम्माल था। उनके माता-पिता का बहुत बढ़िया व्यापार चलता था। पेरियार अपने माता-पिता के छठवें सन्तान थे, इनसे पूर्व के शरुआती चार भाई-बहन जन्म के पश्चात अल्पकाल में ही चल बसे थे लेकिन दो साल बड़े एक भाई जीवित थे जिनका नाम ई. वी. कृष्णास्वामी था। पेरियार के बचपन का एक हिस्सा नानी के घर में व्यतीत हुआ था। उनके चेतना के निर्माण में नानी की बहुत बड़ी भूमिका थी। पेरियार के बचपन का नाम ‘नटखट’ था।

पेरियार आठ वर्ष की आयु में विद्यालय जाना प्रारंभ किये और सम्भवतः बारह साल की आयु में विद्यालय जाना बंद भी कर दिए अर्थात विद्यालयी जीवन मात्र 4 साल का रहा। उन्होंने शेष शिक्षा स्वाध्ययन से प्राप्त किया।

1898 में 19 वर्ष की अवस्था में पेरियार की शादी 13 वर्षीय सुंदर-सुशील युवती नागम्मई से हुई। विवाह के दो वर्षों बाद उन्हें एक पुत्री की प्राप्ति हुई लेकिन मात्र पाँच माह बाद ही बेटी चल बसी। 1933 में उनके पत्नी का निधन हो गया और वे विधुर हो गये और आजीवन शादी न करने का फैसला किया लेकिन 1949 में ही उन्होंने अपनी निजी सचिव मनियामई से दूसरी शादी (प्रेम-विवाह) कर ली, जो कि उनकी आधी उम्र की थी। इस विवाह का उनके समर्थकों व पार्टी वालों ने भी खुलकर विरोध किया।

पेरियार की पहली पत्नी विवाह के बाद हँसुली पहनती थीं जो सुहाग का प्रतीक था, लेकिन वे उसे गुलामी का प्रतीक मानते थे। उनका कहना था कि यह आभूषण वास्तव में औरतों को पति का गुलाम बने रहने की प्रेरणा देता है और वह स्वतंत्र व्यक्तित्व का निर्माण और विकास नहीं कर पातीं। उन्होंने अपनी पत्नी को अपनी हँसुली उतार फेंकने पर सहमत कर लिया।

बीसवीं सदी के दूसरे दशक के उत्तरार्द्ध में इरोड शहर में भयानक प्लेग फैल गया। इस महामारी में पेरियार ने निडरता से लोगों की सेवा की जिसके एवज में उन्हें जनता से भरपूर स्नेह व समर्थन मिला। 1919 में वे इरोड नगरपालिका के अध्यक्ष नियुक्त किये गए। अध्यक्ष बनने के बाद उनका झुकाव सक्रिय राजनीति व कांग्रेस की ओर होने लगा। उन्हें ‘रायबहादुर’ की उपाधि के लिए चुना गया और कहा गया कि आओ कांग्रेस में शामिल मत होइए, जिसपर उन्होंने कहा कि “मुझे सरकारी पद-प्रतिष्ठा अथवा मान-सम्मान की कतई परवाह नहीं है। मैं अपने देशवासियों की सेवा के पथ से विचलित नहीं ही सकता।” अंततः चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के अनुरोध पर 1920 में पेरियार कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्हें मद्रास कांग्रेस कमिटी का अध्यक्ष बनाया गया। वायकोम के आंदोलन की सफलता ने पेरियार को शूद्रों का महानायक बना दिया था। वायकोम आंदोलन में एक बार एक माह और दूसरी बार छः माह के लिए उन्हें जेल में भी रखा गया। 1925 में कांचीपुरम में प्रांतीय अधिवेशन के समय पेरियार ने एक माँग रखी। अब्राह्मण हितों की सुरक्षा के लिए नौकरियों और विधानसभाओं में उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व की माँग। प्रस्ताव को बहुमत नहीं मिला और वह गिर गया, जिससे उन्हें गहरा धक्का लगा और कांग्रेस से मोहभंग हो गया। उन्होंने आत्म सम्मान आंदोलन छेद दिया। ब्लैक शर्ट मूवमेंट (काली कमीज आंदोलन) की बदौलत 27 दिसम्बर, 1929 को जनसंख्या के अनुपात में गैरब्राह्मणों को सरकारी नौकरी में आरक्षण मान लिया गया। कांग्रेस छोड़ने के बाद पेरियार जस्टिस पार्टी में शामिल हुए। 1944 में पेरियार ने जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर ‘द्रविड़ कड़गम’ कर दिया, जो कि गैर राजनीतिक पार्टी थी। पेरियार ने जब दूसरी शादी की तभी उनका सीएन अन्नादुरई से मतभेद हुआ और पार्टी टूट गई। सी. एन. अन्नादुरई ने अलग होकर ‘द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’ (डीएमके) पार्टी बनाई और 1956 में राजनीति में उतरने का फैसला लिया। 1967 में कांग्रेस का सफाया कर डीएमके सत्ता में आई और अन्नादुरई मुख्यमंत्री बने लेकिन 1967 में ही वे चल बसे। फिर जी. करूणानिधि मुख्यमंत्री बने और कार्यकाल भी पूरा नहीं हुआ कि 1969 में एम. जी. रामचंद्रन उन्हें चुनौती देने लगे। अंततः 1972 में डीएमके का विभाज हुआ और रामचन्द्रन ‘ऑल इंडिया द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’ का गठन किया। इस प्रकार हम देखते हैं कि आज तमिलनाडु की जो दोनों प्रमुख पार्टियाँ हैं उनकी नींव कहीं न कहीं पेरियार ने ही डाली थी।

पेरियार महान सुधारवादी नेता थे। वे किसी भी चीज को तर्क व बुद्धि के कसौटी पर कसने की बात करते थे। धर्म और ईश्वर की कल्पना को मानवता का दुश्मन मानते थे। जाति-धर्म का खण्डन करते हुए कहते हैं कि “धर्म जन्म पर आधारित सामाजिक विभाजन को न्यायोचित ठहराता है; साथ ही वह जाति आधारित भेदभाव को सांस्थानिक वैधता प्रदान करता है। पेरियार सिर्फ हिंदू धर्म की ही आलोचना नहीं करते थे, वे इस्लाम में स्त्रियों की दुर्दशा पर बोलते हैं। बौद्ध धर्म की प्रशंसा करते हैं लेकिन बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के उद्देश्य पर संशय व्यक्त करते हैं।

धर्म के ठेकेदारों को बुद्धिवाद का विरोधी बताते हैं। उनका मानना है कि “परम्परा-पोषक धर्माचार्य अज्ञानता के दलदल में बुरी तरह धंसे हैं; पुराणों के दुर्गंधयुक्त कीचड़ में वे आकंठ लिप्त हैं। अंधविश्वास और अवैज्ञानिक विचारों ने उन्हें खतरनाक विषधर बना दिया है।” धर्म तथा ईश्वर का आधार अंधविश्वास को मानते हैं। “धर्म का आधार अंधविश्वास है। विज्ञान में धर्मों का कोई स्थान नहीं है। इसलिए बुद्धिवाद धर्म से भिन्न है। सभी धर्मवादी कहते हैं कि किसी को भी धर्म पर संदेह या कुछ सवाल नहीं करना चाहिए। इसने मूर्खों को धर्म के नाम पर कुछ भी कहने की छूट दे दी। धर्म और ईश्वर के नाम पर मूर्खता एक सनातन रीति है।” स्वर्ग तथा नरक की कल्पना को आधारहीन बताते थे। उनका कहना है कि “स्वर्ग की परिकल्पना अवैज्ञानिक और अप्रामाणिक है। यदि मानव-मात्र के लिए धरती पर ही स्वर्ग जैसा वातावरण उपलब्ध हो जाये, तब उसे स्वर्ग जैसी आधारहीन कल्पना की आवश्यकता ही नहीं पड़े।”

उनपर ब्राह्मण विरोधी होने का आरोप लगाया जाता है जिसका जवाब वे स्वयं देते हैं कि “मैं व्यक्तिगत रूप से किसी भी ब्राह्मण का दुश्मन नहीं हूं। एकमात्र तथ्य यह है कि मैं ब्राह्मणवाद का धुर विरोधी हूँ। मैंने कभी नहीं कहा कि ब्राह्मणों को खत्म किया जाना चाहिए। मैं केवल यह कहता हूँ कि ब्राह्मणवाद को खत्म किया जाना चाहिए।”

स्त्री-अस्मिता के सवालों पर भी पेरियार ने खूब लिखा है। विधवा विवाह को पुरजोर समर्थन और बाल-विवाह की निंदा करते थे। महिलाओं के आधिकार के पक्ष में मजबूती से खड़ा होते हैं। उनका मानना है कि महिलाएँ सर्वाधिक शोषित व पीड़ित हैं चाहे वे किसी भी जाति-धर्म की हों। लिखते हैं कि “जमींदार अपने नौकर और ऊँची जाति के लोग नीची जाति के लोगों के साथ जिस प्रकार का व्यवहार करते हैं, पुरूष उससे भी बदतर व्यवहार स्त्री के साथ करता है।…… पुरूष महिलाओं के प्रति उनके जन्म से लेकर मृत्यु तक क्रूर व्यवहार करते हैं। भारत में महिलाएँ हर क्षेत्र में अस्पृश्यों से भी अधिक उत्पीड़न, अपमान और दासता झेलती हैं।………. पुरूष के लिए एक महिला उसकी रसोइया, उसके घर की नौकरानी, उसके परिवार या वंश को आगे बढ़ाने के लिए प्रजनन का साधन है और उसके सौंदर्यबोध को संतुष्ट करने के लिए एक सुंदर ढंग से सजी गुड़िया है।” ज्ञान और धन की देवियों पर सवाल करते हुए कहते हैं, “हिंदू-धर्म में ज्ञान की और धन की देवियों को पूजा जाता है। फिर ये देवियाँ महिलाओं को शिक्षा तथा संपत्ति का अधिकार प्रदान क्यों नहीं करतीं?” मनुष्य अपने जीवन का सबसे बड़ा अनुष्ठान या आयोजन विवाह को समझता है। विवाह में दिखवापन और दहेज-प्रथा दिनोंदिन इतना बढ़ता जा रहा है कि अपनी बेटी को सदा स्नेह प्रदान करने वाले गरीब मां-बाप उसके विवाह के समय बोझ-सा महसूस करने लगते हैं। पेरियार का मानना है कि “खर्चीले विवाहों के कारण कुछ परिवार कंगाल हो जाते हैं। यदि पुरुष और महिला रजिस्ट्रार कार्यालय में हस्ताक्षर करके यह घोषणा कर देते हैं कि वे एक-दूसरे के ‘जीवन-साथी’ बन गए हैं; तो यह पर्याप्त है। मात्र एक हस्ताक्षर के आधार पर किये गए विवाह में अधिक गरिमा, लाभ एवं स्वतंत्रता होती है।”

पेरियार द्वारा रचित ‘द रामायण : अ ट्रू रीडिंग’ 1959 में प्रकाशित हुई, जिसका हिन्दी अनुवाद ‘सच्ची रामायण’ 1968 में प्रकाशित हुई। हिन्दी अनुवाद के प्रकाशक ललई सिंह यादव तथा अनुवादक राम आधार थे। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सच्ची रामायण को प्रतिबंधित कर दिया गया लेकिन ललई सिंह यादव ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय में जीत हासिल कर किताब को पाठकों के बीच परोसा। इस किताब की भूमिका में पेरियार ने साफ-साफ कहा है कि “रामायण और बरधाम (महाभारत) काल्पनिक ग्रन्थ हैं। उन ग्रंथों में प्रमुखतम जिन्हें आर्यों ने अपने हित में सर्वाधिक तोड़ा-मरोड़ा है; उन्हें द्रविड़ों को अपने जाल में फंसाने, उनके आत्मसम्मान को नष्ट करने, उनके निर्णय सामर्थ्य को कुंद करने तथा उनकी इंसानियत को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए तैयार किया गया है।”

देश में आज भी बहुत लोग हैं जो ईश्वरीय शक्ति से डर कर धर्म व ईश्वर में आस्था रखते हैं और कर्मकाण्ड करते रहते हैं। पेरियार कहा करते थे कि किसी ईश्वर में कोई शक्ति नहीं है, इतना ही नहीं वह जूता तथा झाड़ू से ईश्वरीय प्रतीकों को पीटते हुए कहते थे कि देखो, यदि इसमें शक्ति होती तो मुझे कुछ करता न, मैं तो इसे पीट रहा हूँ लेकिन मेरा कुछ नहीं हो रहा है। मतलब वह कहना चाहते थे कि अपने तर्क व बुद्धि का प्रयोग करते हुए इसे नकारो। दहाड़ कर कहते थे कि ईश्वर नहीं है।

14 दिसम्बर, 1973 को लगभग 94 वर्ष की आयु में पेरियार का निधन हुआ।

महामानव को सादर नमन!💐🙏

डॉ.(प्रो.) दिनेश पाल
प्रदेश प्रवक्ता सह मीडिया प्रभारी
राष्ट्रीय जनता दल अतिपिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ, बिहार

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