जनता जब तक जागृत और गोलबंद नहीं होगी तब तक वह अपने हक में फैसले नहीं करवा पाएगीः कॉ. वीके सिंह

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वाराणसीः भाकपा-माले (लिबरेशन) नेता व वरिष्ठ ट्रेड यूनियनकर्मी कॉ. वी. के. सिंह ने कहा कि जनता जब तक जागृत और गोलबंद नहीं होगी तब तक वह अपने हक में फैसले नहीं करवा पाएगी।

वह विगत शनिवार को पुआरीकलां स्थित गहरपुर में आयोजित कॉ. देवब्रत सेन स्मारक व्याख्यान में बोल रहे थे। व्याख्यान का विषय थाः क्या मज़दूर वर्ग संसद के रास्ते दुनिया को बदल सकता है?

उन्होंने बताया कि 16 मई 2014 से ‘विकास’ का व्यापार हितैषी गुजरात मॉडल: रोजगार विहीन जीडीपी; सस्ता श्रम प्रबन्धन, जबरिया भूमि अधिग्रहण, सरकारी छूट, राष्ट्रीय और राज्य औद्योगिक व श्रम कानूनों से मुक्ति, निकालो-रखो की छूट, पूँजी निवेश के लिए राहत पैकेजों की छूट, नए दुलरुआ पूँजीपतियों रिलायंस, अडानी, एस्सार आदि का प्रश्रय। श्रम सुविधा पोर्टल के नाम पर 16 केन्द्रीय कानूनों के परिपालन की स्वघोषणा; लेबर इंस्पेक्टर द्वारा जाँचपर रोक।

अप्रेन्टिस नियुक्ति की छूट; परिवार श्रम के नाम पर बाल श्रम की छूट।

ओवर टाइम सीमा में वृद्धि और अनिवार्य किया जाना; फैक्ट्री के लिए ‘सुरक्षित दायित्व मानको’ से मुक्ति (जहाँ तक सम्भव हो सुरक्षित रखने का प्रयास) – नतीजा मुण्डका अग्निकाण्ड में 50 मजदूरों की मौत;

300 श्रमिकों तक की कम्पनियों को छटनी के लिए अनुमति की जरूरत नहीं। 40 से कम मजदूरों वाली इकाईयों को 14 केन्द्रीय श्रम कानूनों से मुक्ति: मोनेटाइजेशन के नाम पर समूचे सार्वजनिक क्षेत्र को निजी कार्पोरेटों को सौंपा जा रहा है। एनपीए के जरिए कार्पोरेट लूट की खुली छूट।
यह 2014 की फिक्की और अखिल भारतीय नियोक्ता संगठन की  सजेस्टेड लेबर पॉलिसी रिफॉर्म्स  और 2000 में दूसरे श्रम आयोग को फिक्की द्वारा दी गई सिफारिशों की कार्बन प्रतिलिपि है। इसमें 44 केन्द्रीय और 100 राज्य श्रम कानूनों को जो उद्योगों के लिए सबसे भारी बाधा है 4 श्रम संहिताओं में समेट देने और ओद्योगिक विवाद अधिनियम के चैप्टर वी-बी को समाप्त कर देने का प्रावधान है।

प्रस्ताव का सुझाव

बीस हजार से अधिक पाने वाले और किसी भी वेतन पर काम करने वाले सुपरवाइजरों, प्रबन्धकों को ‘वर्क मैन’ की परिभाषा से बाहर : सेवा शर्त परिवर्तन के लिए 21 दिन नोटिस की बाध्यता हटाई जाय; हड़ताल के लिए 14 दिन नोटिस और न्यूनतम 75 मत अनिवार्य है; धीरे काम और नियमानुसार काम हड़ताल माना जाय; नेशनल इनवेशमेंट ऐन्ड मैन्यूजोन में आंशिक व पूर्ण बन्दी के लिए पूर्वानुमति की जरूरत नहीं; 1 हजार से कम मजदूरों वाले प्रतिष्ठानों को बन्दी/छटनी के लिए पूर्वानुमति की जरूरत नहीं; उच्चतर न्यायालयों में विवाद लम्बित होने पर वेतन की बाध्यता समाप्त हो; 50 मजदूरों तक की इकाइयां ठेका विनियमन /उन्मूलन कानून के दायरे से बाहर हों; ठेकेदार को स्वतंत्र नियोजक माना जाय;

51 % सदस्यता वाली यूनियन को ही बार्गेनिंग एजेंट की मान्यता 21% से कम वाली यूनियों को सामूहिक सौदेबाजी अथवा विवाद उठाने की अनुमति नहीं;

यूनियन में अधिकतम 2 बाहरी पदाधिकारी;  यूनियनों को राजनीति से दूर रखा जाय; 50 तक वाली इकाईयों को श्रम कानूनों के अन्तर्गत रिटर्न दाखिल करने से छूट। ये अधिकांश सिफारिशें द्वितीय श्रम आयोग से भी की गई थी। औद्योगिक कानून की धारा 5जी के संशोधन से अधिकतम कार्यदिवस 10 घंटे से 12 घंटे ओवरटाइम की सीमा को 50 से बढ़ाकर 125 घंटे तिमाही किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि हिंदुत्व फासीवाद का खतरा बना हुआ है। ट्रेड यूनियनवाद/अर्थवाद का खतरा भी बरकरार है। ट्रेड यूनियन और हड़ताल को युद्ध का स्कूल बनाने की जगह अपने आप से युद्ध बना देना; नौकरशाही और अवसरवाद; ट्रेड यूनियन में दक्षिणपंथ और साम्प्रदायिकता की पैठ, वेतन सेवाशर्त के लिए कॉमरेड और राजनीति के लिए भाजपा की प्रवृत्ति। ट्रेड यूनियन के एनजीओकरण का हमला। असंगठित-अनौपचारिक श्रमशक्ति को संगठित करने के कार्यभार से दुराव; प्रबन्धन की यूनियनें।

जनतंत्रिक संघर्षों: किसानों, शाहीनबाग, छात्रों, अल्पसंख्यकों के दमन के विरुद्ध और उनके संघर्षों के साथ खड़े हो पाने की विफलता। फासीवाद से लड़ने के लिए बुद्धिजीवियों के सर्वहारा संघर्षों से जुड़कर सर्वहारा बुद्धिजीवी योद्धा बनने और सर्वहारा के वर्ग चेतना से लैस होकर क्रान्तिकारी सर्वहारा बनने की जरूरत।

क्रालोस के कॉ. रामजी सिंह ने कहा कि दस हजार सलाना जिस बच्चे पर खर्च हो वह उस बच्चे का मुकाबला कर पाए जिसकी पढ़ाई पर सालाना एक लाख खर्च हो। यह अपवाद की बात है कि कोई बच्चा जिसकी पढ़ाई पर सालाना दस हजार खर्च हो वह उस बच्चे का मुकाबला कर ले जिसकी पढ़ाई पर सालाना एक लाख खर्च हो। इतना फर्क है। इस फर्क को आप लोगों को पाटना पड़ेगा। फर्क पाटने के लिए एकजुट होना पड़ेगा। ऐसे सोने से, ढीले-ढाले ढंग से काम नहीं चलेगा। कॉमरेड देवब्रत जिस जुझारूपन से लड़ते हुए जिन्दगी के आखिरी क्षण तक आपलोगों के लिए लड़ते रहे उनकी कुर्बानी याद की जाए और अब तक मजदूरों के लिए लड़ते हुए तमाम शहीदों की शहादत याद की जाए और उनकी शहादत को याद करके अपने अन्दर लड़ने का हौसला लाया जाय। अपने अन्दर लड़ने का साहस पैदा किया जाए। परेशानी और तकलीफ उठाने की हिम्मत की जाए। अपनी एकजुटता को आगे बढ़ाते हुए मजदूर-किसानों की एकता को मजबूत करते हुए अपनी मंजिल को पाने की कोशिश करिए। आप लोगों की आखिरी मंजिल यह है कि आप लोगों को बड़े पूँजीपतियों की सत्ता को खत्म मजदूरों-किसानों की सत्ता कायम करना पड़े, पूँजीवादी व्यवस्था को ध्वस्त करके समाजवाद कायम करना पड़ेगा।
सेंटर फॉर साइंटिफिक सोशलिज्म के कॉ. नरेंद्र कुमार ने इस मौके के लिए अपना लिखित वक्तव्य भेजा थाः
प्रिय मजदूर भाइयों!
आपके बीच मुझे इस प्रश्न पर बोलने के लिए आमंत्रित किया गया है कि क्या संसद के रास्ते से मजदूर वर्ग अपना शासन प्राप्त कर सकता है?

मजदूर भाइयों! आप सभी लोग वर्षों से संसद तथा विधानसभा चुनाव में वोट देकर सरकार बनते देख रहे हैं। संसदीय चुनाव की प्रक्रिया का यूरोप तथा अमेरिका में शुरू हुए 100 वर्ष से ऊपर हो गए। इसके बाद एशिया में भी साम्राज्यवादी देशों के हुकूमत के खत्म होने के बाद 5 साल पर संसद का चुनाव आम तौर पर जारी है। लेकिन क्या इस संसद ने पिछले दिनों में मजदूरों के हितों में कोई कानून बनाया, उल्टे पूंजीवादी सरकार अंग्रेजों के जमाने में भी जो मजदूरों को अधिकार दिए गए थे, उसमें भी कटौती करके नए श्रम कानून को लागू किया है। इस कानून में मालिकों को 12 घंटे काम कराने की कानूनी छूट है।
19वीं सदी में सम्राटों व सामंतों के खिलाफ संघर्ष में पूंजीपतियों तथा मध्य वर्ग के साथ मजदूरों ने भी खड़ा होकर संसद के निर्माण और एक वोट के अधिकार के लिए लडाई लड़ी थी। लेकिन संसद के बनने के बाद पंजीपतियों ने सामंती शक्तियों से समझौता कर लिया, मजदूर वर्ग और छोटे किसानों को अपने मुख्य दुश्मन के तौर पर जीवन के साधनों के हरण के साथ-साथ पैसे के बल पर राजनीतिक अधिकारों से भी अलग कर दिया। संसद में सरकार चलाने वाली सभी पूंजीवादी पार्टियों ने सत्ता में आने के बाद अपने-अपने देश के सामंती शक्तियों को पूंजी के मालिक बनने में मदद की और इस तरह से सामंती लूट से बटोरे गए अकूत धन पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजी बन गई। राजाओं के बड़े-बड़े राजमहल आलीशान होटल बनकर पूंजी की कमाई का आधार बन गया, सामंतों के कब्जे की जमीन बड़े-बड़े कारखानों और संस्थानों के माध्यम से पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजी बढ़ाने वाला तंत्र बन गया।
शुरुआती दौर में सामंती ताकतों की मदद से पूंजीपति तथा पूंजीवादी सरकारें मजदूरों तथा गरीब किसानों के वोट को जबरदस्ती कब्जा कर लेते थे। गुजरते समय के साथ एशिया के इन देशों में मेहनतकशों का आंदोलन बढ़ा और ऐसे तमाम सामंती हमलो के प्रतिरोध में लंबी लड़ाई चली। सामंती शक्तियां धीरेधीरे कमजोर होती गई, लेकिन पूंजीवादी शक्तियां उतनी ही मजबूत होती गई। अब पूंजीपति सामंती और स्थानीय गुंडों के माध्यम से वोट पर कब्जा करने के बजाय अपनी पार्टियों को बड़े पैमाने पर चंदा देकर अभावग्रस्त मेहनतकश आबादी के वोट को खरीदने लगे। दशकों पहले भारत में कम पैसे में जनसाधारण लोग भी चुनाव लड़ लेते थे, लेकिन अब तरह-तरह के नियमों और खर्च की परंपरा के बढ़ने से चुनाव इतना महंगा हो गया है कि मजदूर लोगों की बात तो छोड़ दीजिए, साधारण मध्यवर्ग के लोग भी पूंजीपतियों की मदद के बगैर चुनाव नहीं लड़ सकते हैं।

इस कारण जहां 1947 के बाद संसद या विधानसभा में मध्य परिवार के लोग ज्यादा होते थे, अब सभी पूंजीवादी पार्टियों में पूंजीपति खुद चुनाव जीतकर आने लगे हैं। संसद या विधानसभा में दलित तथा आदिवासी समाज के लिए आरक्षण है, लेकिन इन पार्टियों का हिस्सा बनकर ऐसे सांसद भी अपने ही समाज के मजदूर और किसानों के खिलाफ पूंजीपतियों के पक्ष में बनाए गए कानूनों का समर्थन करते हैं।
दशकों पहले लैटिन अमेरिका के कई देशों में संसद के रास्ते चुनाव जीतने के बाद सरकार बना कर मजदूर वर्ग की पार्टियों ने मजदूरों के पक्ष में कानून बनाने और साधनों पर राज्य के नियंत्रण का प्रयास किया। लेकिन साम्राज्यवादी शक्तियों ने घरेलू पूंजी के मालिकों से मिलकर फौजी विद्रोह के द्वारा संसद में बहुमत वाली सरकार और उसके नेता की हत्या कर दी। यह स्पष्ट है कि शासन और संसद में भी उसी वर्ग की चलती है, उसी के पक्ष में कानून पास होता है, जिसके पक्ष में वहां की पुलिस, फौज तथा नौकरशाही का तंत्र काम करती है।

इसके अलावा न्यायपालिका भी कमोबेश पूंजीपतियों के पक्ष में ही फैसले लेते हैं। संसद में यदि मजदूरों के पक्ष में कानून बना भी दिया जाए, तो संविधान का
हवाला देकर यहां की न्यायपालिका उन कानूनों को लागू होने से रोक देगी या विलंब कर देगी। ऐसी स्थिति में जन आंदोलन के द्वारा वर्ग संघर्ष को तेज करके जब तक मजदूर वर्ग सत्ता के सभी अंगों पर अपना नियंत्रण करने में सफल नहीं होता है, मजदूर वर्ग का राज स्थापित नहीं हो सकता है।
19वीं सदी में पहली बार पेरिस कम्यून में मजदूरों ने सत्ता संभाली थी। वे कानूनी तौर तरीकों में ही उलझे रहे, जबकि पूंजीपति वर्ग ने पूंजीपतियों के मदद और बैंक के खजाने का उपयोग कर एक मजबूत सेना का गठन किया, मजदूरों के ऊपर भारी दमन कर उनकी सरकार को उलट दिया। इसी के अनुभव के बाद मार्क्स ने मजदूरों को सिखाया कि पूंजीपतियों के द्वारा स्थापित संस्था फौज व नौकरशाही को ध्वस्त करके ही सबों का फिर से निर्माण कर मजदूर वर्ग अपना शासन चला सकता है। पेरिस कम्यून के अनुभव के आधार पर ही लेनिन के नेतृत्व में रूस में मजदूरों ने जार और पूंजीपतियों की फौज़ और नौकरशाही का विघटन कर नए ढंग से लाल फौज का निर्माण किया। परानी नौकरशाही को किनारे कर मजदूरों को राज्य के काम करने के लिए सिखाया गया, तब कहीं सोवियत सत्ता के द्वारा मजदूर, जिसमें नीचे से सभी वर्ग अपने प्रतिनिधि भेजते थे, शासन चला पाया। इतिहास के अनुभवों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मजदूर वर्ग संसदीय रास्ते से शासन प्राप्त नहीं कर सकता है। जो भी पार्टियां लाल झंडे या मजदूर वर्ग की पार्टी के नाम पर यह भ्रम फैलाते हैं, वास्तव में पूंजीपति वर्ग के पक्ष में राजनीति करते हैं। मजदूर वर्ग को ऐसी पार्टियों के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाना चाहिए और अपने हितों तथा राज्य के चरित्र को समझने की कोशिश करनी चाहिए।
ऑल इंडिया वर्कर्स काउंसिल के कॉ. नरेश कुमार द्वारा भेजा गया परचाः

क्या श्रमिक वर्ग संसद के रास्ते समाजवाद ला सकता है?

हमारे देश के वामपंथी आन्दोलन में यह प्रश्न हमेशा से मौजूद रहा है कि समाजवाद की ओर क्या संसदीय रास्ते से जाया जा सकता है¿ आमतौर पर देश की वाम राजनीति में संसदीय राह को सुधारवादी, संशोधनवादी के रूप में देखा जाता है और गैर संसदीय तरीकों को क्रान्तिकारी माना जाता रहा है। इस तरह संसदीय राह पर आगे बढ़ने वाली पार्टियों और गैर संसदीय पार्टियों के बीच संवाद की जगह एक शत्रुतापूर्ण रिश्ता बनता है। समय बीतने और नवउदारवाद की वैश्विक नीतियों के लागू होने के बाद इस तरह के राजनीतिक वैचारिक विरोध अपना महत्व खोते गए और इधर हाल के दिनों में तमाम प्रकार के आन्दोलनों में उनके बीच एक संवाद सहयोग का सिलसिला शुरू होता है। वैश्विक धरातल पर यदि हम देखें तो पिछली शताब्दी में दोनों रास्तों पर समाजवाद लाने के प्रयोग हुए हैं।

रूस चीन जर्मनी स्पेन इटली आदि में क्रान्तिकारी संघर्षों के जरिए समाजवाद लाने की कोशिश हुई तो दूसरी ओर चिली ब्राजील बेनेजुएला, इंग्लैंण्ड आदि में संसदीय रास्ते से यह कोशिश की गई। हालांकि हर देश में समाजवाद के लिए संघर्षों-आन्दोलनों में काफी भिन्नताएं भी मौजूद थीं और हम कह सकते हैं कि हर देश-समाज का प्रयोग अपने आप में अनूठा था। बीसवीं सदी के समाप्त होते-होते इन तमाम तरह के समाजवादी प्रयोगों की ताकत कम होने लगती है और अन्ततः हर देश में पूँजी की सत्ता स्थापित हो जाती है। पूँजी की सत्ता वापसी पर इन देशों के श्रमिक-किसान जनता का जो प्रतिरोध होना चाहिए था, वह कहीं पर सशक्त रूप से नहीं दिखा और कई जगह पर जनता ने इसे नयी आजादी के तौर पर लिया। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि तमाम भूतपूर्व समाजवादी देशों में आज पूँजीवादी लोकतंत्र भी नहीं है। बल्कि किसी न किसी रूप में कठोर तानाशाही है। कोई भी व्यक्ति सत्ता और सरकार की आलोचना नहीं कर सकता। इसे गम्भीर अपराध माना जाता है।

आज इक्कीसवीं शताब्दी में हम जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो मजदूर आन्दोलन के सामने मौजूद सवालों को पिछली शताब्दी के प्रयोगों के फ्रेम में नहीं फिट किया जा सकता है। हां, उस अनुभव से कुछ उपयोगी अवश्य निकाले जा सकते हैं। हमें सोचना नए सिरे से ही सोचना पड़ेगा। यहीं पर आज का जरूरी प्रश्न है कि मजदूर वर्ग चुनाव और लोकतंत्र के सवालों को कैसे लेता है¿ अपनी मुक्ति की ओर आगे बढ़ने के एक जरूरी कदम के रूप में या पूँजीवादी नफा-नुकसान के रूप में यदि हमारी समझ आर्थिक नफा-नुकसान के दायरे में बन्द है तो मुक्ति का सवाल या समाजवाद का सवाल आएगा ही नहीं। ऐसे में संसदीय-गैर संसदीय बहस का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। वास्तव में सवाल कहीं अधिक गहरे हैं और उनका एक दार्शनिक वैचारिक संदर्भ है। आज इस पर थोड़ा ध्यान देने की जरूरत है ताकि हमारी लड़ाई समाजवाद की ओर बढ़ सके।
इस मौके पर आयोजित चिकित्सा शिविर में आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक और पशु चिकित्सक ने अपनी सेवाएं दीं और सैकड़ों ग्रामीणों को मुफ्त दवाइयाँ वितरित कीं।

 

 

 

 

 

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