बिहार में संघर्ष का रास्ता छोड़ मंत्रियों के पीछे दुमा हिला रहे हैं भाकपा-माले (लिबरेशन) के नेतागण

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क्या भूतपूर्व कामरेड कविता कृष्णन कभी मार्क्सवादी लेनिनवादी थीं? या वह शुरू से ही उत्तर आधुनिकतावादी दृष्टिकोण से लैस उदारवादियों की तरह वर्ग संघर्ष से दूर पहचान की राजनीति की हिमायती थीं?
कविता कृष्णन इन दिनों पूंजीवादी लोकतंत्र के झंडाबरदार बन सर्वसत्तावादी राज्य के खिलाफ आग उगलने के नाम पर लगातार स्तालिन तथा राज्य के बारे में मार्क्सवादी-लेनिनवादी अवधारणा पर हमला कर रही हैं। भारत के प्रसिद्ध और बौद्धिक तौर पर उन्नत विश्वविद्यालय से पढ़ी लिखी होने के नाते उन्होंने किसी मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टी के सदस्य बनने के पहले उसकी विचारधारा और उसके दार्शनिकों तथा राजनीतिक शिक्षकों के महत्वपूर्ण पुस्तकों को अवश्य ही पढ़ा होगा।
यह मानना थोड़ा मुश्किल होगा कि उन्होंने मार्क्स द्वारा लिखित फ्रांस में वर्ग संघर्ष तथा पेरिस कम्यून से संबंधित उनकी रचनाएं और लेनिन की “राज्य और क्रांति” तथा “सर्वहारा क्रांति और गद्दार काउत्सकी” नहीं पढ़ा होगा। थोड़ी देर के लिए मान भी लें कि उन्होंने नहीं पढ़ा था तो प्रश्न उठता है कि क्या भाकपा-माले (लिबरेशन) — मार्क्सवादी-लेनिनवादी- पार्टी के रूप में अपनी पहचान पेश करने के कारण अपने कार्यकर्ताओं को मार्क्स और लेनिन की इन रचनाओं से अवश्य ही गुजरने के लिए प्रेरित करती होगी। या यूं कहें कि इन पुस्तकों को केंद्र में रखकर पार्टी क्लासों में अपने कार्यकर्ताओं को अवश्य ही प्रशिक्षित करती होगी।
इन पुस्तकों से गुजरते हुए कोई भी पाठक राज्य के चरित्र को समझ सकता है। अपने सामान्य अनुभवों से भी वह समझ सकता है कि कोई भी राज्य किसी वर्ग विशेष की सेवा करता है। पूरी दुनिया में पूंजीवादी राज्य पूंजीपतियों और उसके सहयोगी शोषक वर्गों के हितों की रक्षा करता है और उसके खिलाफ आवाज उठाने वाले लोगों के हितों, ताकत और विचारों को निर्ममता से कुचलता है। क्या जर्मनी में सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता बाइमर रिपब्लिक के रूप में शुद्ध लोकतंत्र की स्थापना करते हुए अपने ही पूर्व के कामरेड रोजा तथा लिब्नेख्त की हत्या नहीं करवाई थी?
पूंजीपति वर्ग के राज्य में खुद कविता कृष्णन और कन्हैया जैसे लोकतंत्र का गौरव गान करने वाले भी जब सत्ता में बैठेंगे, तो उनके पीछे फौज, पुलिस और नौकरशाही का तंत्र होगा। यह पूरा तंत्र तभी तक लोकतांत्रिक बना रहता है या चंद नागरिक अधिकार को बहाल रखता है, जब तक उसके वर्ग की सत्ता को उलट जाने का या उस में कटौती होने की स्थिति उत्पन्न नहीं हो जाती है। लेकिन जैसे ही उसके वर्ग के अस्तित्व और राज्य पर खतरा आता है, वह बहुत ही क्रूर होकर हमला करता है।

मार्क्सवादी-लेनिनवादी अपनी बात लोकतंत्र के पर्दे में छुपाता नहीं है। वह साफ-साफ ऐलान करता है कि मेहनतकाशों के जनवाद को बहाल करने के लिए, उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी के लिए वह तमाम वर्चस्ववादी और पहले से शासन-सत्ता तथा साधनों पर अधिकार जमाए वर्गों के अधिकारों को सीमित करेगा। पहले से शासन करने वाले वर्ग की सत्ता उलट जाने के बाद वे चुप नहीं बैठते हैं, बल्कि उनका हमला और अधिक बढ़ जाता है। ऐसे में उन्हें रोकने के लिए, उनकी ताकत को तोड़ने के लिए, उन्हें नियंत्रित करने के लिए उनको वही छूट नहीं दी जा सकती है, जो आम मेहनतकश जनता को प्राप्त होती है।

स्तालिन को सर्वसत्तावादी घोषित करने वाले कभी बताने का कष्ट नहीं करते हैं कि स्तालिन ने किस मजदूर या किसान आंदोलन का दमन किया। माओ ने ल्यू शाओ ची के द्वारा सत्ता पर कब्जा कर लेने के बाद सीधे-सीधे जनता को बुर्जुआ राज्यसत्ता पर हमला करने के लिए सांस्कृतिक क्रांति के दौरान आह्वान किया। माओ के पीछे राज्य नहीं था, तब माओ के पीछे जन आंदोलन की ताकत थी। स्तालिन जब हिटलर के खिलाफ लड़ रहे थे या अपने यहां समाजवाद का निर्माण कर रहे थे, तो कुलकों और पूंजीपतियों के खिलाफ मजदूर और गरीब किसानों की व्यापक आबादी यानी मेहनतकश वर्गों को बोलने और अपने विचारों को अभिव्यक्त कर राज्य के निर्माण में भागीदारी करने का मौका मिला। कई मौकों पर मजदूरों ने सीधे-सीधे स्तालिन की आलोचना की। राज्य ही नहीं कारखानों के संचालन में भी मजदूरों की यूनियन और प्रबंधन की सीधे भागीदारी होती थी। कई मौके पर अंतरविरोध भी आते थे, टकराव भी होता था, लेकिन उसका रास्ता आपसी विचार-विमर्श से निकलता था। उसके लिए कहीं दमन का रास्ता नहीं अपनाया गया।
यदि कविता कृष्णन सर्वसत्तावादी राज्य पर इतना हमलावर हैं, तो सीपीआई(एमएल) लिबरेशन को बताना चाहिए कि राज्य का चरित्र क्या होता है? लेकिन उन्होंने तो खामोशी ओढ़ रखी है! तो कभी-कभी यह आशंका होना लाजिमी है कि सीपीआईएमएल लिबरेशन का कविता कृष्णन के साथ कोई खास गहरा मतभेद नहीं है!
मार्क्स ने बार-बार कहा है कि व्यावहारिक मामले में चाहे जितनी व्यापक एकता के लिए समझौते हो जाएं, लेकिन वैचारिक संघर्ष पर कोई समझौता या मिलावट न की जाए। आज की तारीख में वैचारिक संघर्ष सबसे महत्वपूर्ण कार्यभार हो गया है। सीपीआई एमएल लिबरेशन की चुप्पी किसी मार्क्सवादी-लेनिनवादी को स्वीकार नहीं हो सकती है। लेकिन पिछले दिनों में मार्क्सवाद-लेनिनवाद का नाम लेने वाले कई वाममपंथी पार्टियां फासीवाद के खिलाफ लड़ने और पहचान की लड़ाई के रूप में जाति के प्रश्न को अधिक महत्व देने के नाम पर विचारधारा के मसले को ताश के पत्तों की तरह फेंट रही थीं।
कई वामपंथी पार्टियां फासीवाद को हराने के नाम पर शोषक वर्ग की पार्टियों के साथ गठबंधन कर रही हैं। लेकिन हर कोई जानता है कि ये पार्टियां वर्ग विशेष के सामाजिक आधार पर निर्भर करती हैं । प्रश्न उठता है कि आज कौन सा वर्ग फासीवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष में सबसे आगे रहेगा?
स्तालिन को सर्व-सत्तावादी घोषित करने वाले कभी बताने का कष्ट नहीं करते हैं कि स्तालिन ने शोषक वर्गों के पक्ष में किसी मजदूर या किसान आंदोलन पर दमन किया है। माओ ने तो ल्यू शाव ची के द्वारा सत्ता पर कब्जा कर लेने के बाद सीधे-सीधे जनता को बुर्जुआ राज्य सत्ता पर हमला करने के लिए सांस्कृतिक क्रांति के दौरान आह्वान किया। माओ के पीछे राज्य नहीं था, तब माओ के पीछे जन आंदोलन की ताकत थी। स्तालिन जब हिटलर के खिलाफ लड़ रहे थे या अपने यहां समाजवाद का निर्माण कर रहे थे, तो कुलकों और पूर्व के पूंजीपतियों के खिलाफ मजदूर और गरीब किसानों की व्यापक आबादी थी। तब इन वर्गों को बोलने और अपने विचारों को अभिव्यक्त कर राज्य के निर्माण में भागीदारी करने का मौका मिला। कई मौकों पर मजदूरों ने सीधे-सीधे स्तालिन की आलोचना की। राज्य ही नहीं कारखानों के संचालन में भी मजदूरों के यूनियन और प्रबंधन की सीधे भागीदारी होती थी। कई मौके पर अंतरविरोध भी आते थे, टकराव भी होता था लेकिन उसका रास्ता आपसी विचार-विमर्श से निकलता था। उसके लिए कहीं दमन का रास्ता नहीं अपनाया गया था।
समाजवाद के निर्माण की इस पूरी प्रक्रिया को वामपंथी पार्टियों को अपने कार्यकर्ताओं को बताना चाहिए और यदि उन्हें लगता है कि इसमें कहीं कमी है, तो साफ-साफ उसकी आलोचना लिखकर वैचारिक बहस करना चाहिए ना कि ऐसे मौकों पर अवसरवादियों की तरह चुप्पी साध करके मार्क्सवाद-लेनिनवाद के पैनल के तले उदारवादी पूंजीवादी लोकतंत्र की विचारधारा को फैलाना चाहिए।
वामपंथी पार्टियों को बताना चाहिए कि फासीवाद के खिलाफ लड़ने वाली कौन सी वर्ग शक्ति आगे रहेगी? किसानों खासकर छोटे किसानों ने अपने वर्ग हितों के लिए एक हद तक फासीवाद को चुनौती दी। जब इन किसानों को लगा कि उनकी जमीन और साधनों के रूप में जो संपत्ति है, उसका हरण करके पूंजीपतियों के हवाले यह सत्ता करने जा रही है, तो अपने वर्ग हितों की रक्षा के लिए यह उन मजदूरों के साथ भी सहयोग की आवश्यकता महसूस करने लगे जिन्हें उनका एक हिस्सा अपने वर्ग हितों के विरुद्ध पाता था। उन किसानों को लगने लगा कि किसानों की जमीन छीनकर उन्हें मजदूर बनाया जा रहा है और नए श्रम कानूनों के द्वारा मजदूरों का शोषण तीव्र किया जा रहा है। और इस तरह से मजदूर और किसान की एकता की आवश्यकता उनमें से अधिकांश ने महसूस की। तो प्रश्न उठता है कि फासीवाद के खिलाफ लड़ने के लिए वामपंथी पार्टियां देश-व्यापी मजदूर वर्ग को संगठित करने की मजबूत पहलकदमी क्यों नहीं ले रही हैं, जबकि अतीत में वामपंथी पार्टियों का मजदूरों के बीच मजबूत जनाधार हुआ करता था?
मजदूरों को संगठित करने में जो उदासीनता बरती जा रही है उसके पीछे यही उत्तर आधुनिकतावादी विचारधारा का बोलबाला है। इन पार्टियों ने जब वर्ग तथा वर्ग संघर्ष की जगह धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय, जाति तथा क्षेत्र की पूंजीवादी घेरे में निपटाए जाने वाले छोटे-छोटे संघर्षों को संघर्ष का पर्याय बना दिया, तो वर्ग संघर्ष की राजनीति को यह आगे कैसे ले जा पाएंगी? इस तरह की विचारधारा से लैस कोई भी पार्टी अंततः लिबरल डेमोक्रेसी यानी उदार लोकतंत्र की बात कर ही लोगों को ठग सकती हैं, जबकि अपनी विद्वता के कारण उनके नेता समझते हैं की पूरी दुनिया में आज की तारीख में या अतीत में भी उदार लोकतंत्र कायम नहीं हुआ है।
फ्रांस और जर्मनी की 1848 ई की पूंजीवादी क्रांति के दौरान ही मजदूरों के भय से पूंजीपतियों ने सामंती राज्यसत्ता से समझौता करना शुरू कर दिया था और बाद के दिनों में जितनी भी पूंजीवादी क्रांतियों के द्वारा लोकतंत्र स्थापित हुए, सभी ने मेहनतकश संघर्षशील जनता के जनवादी अधिकारों को कुचला है। चुनौती देकर के इन सभी नेताओं से जानना चाहता हूं कि वे एक ऐसे लोकतंत्र तथा लोकतांत्रिक सरकार के स्वरूप को पेश करें या इतिहास से उदाहरण दें, जो पूंजी की सत्ता से मुक्त रहा हो और जिसमें मेहनतकश आबादी का शोषण नहीं हुआ हो। लोक कल्याणकारी राज्य के रूप में अपने को पेश करने वाले सभी राज्य सत्ता तथा पूंजीपतियों के वर्ग हित के खिलाफ जब कोई आंदोलन या संघर्ष हुआ है, उन्होंने निर्ममता के साथ हमला किया है। ये वामपंथी पार्टियां क्यों भूल जाती हैं कि तेलंगाना के किसान आंदोलन और उसके बाद के मजदूर आंदोलन को नेहरू और उनके लोगों ने ही कुचला था! क्यों संसदीय रास्ते से दक्षिण अमेरिका के चिली में सत्ता में आई एलेंदे की सरकार को फौजी तानाशाही के द्वारा कुचल दिया गया था?
हम किसी भी रूप में पुतिन और जीपी सिंग के सर्व सत्तावादी राज्य के स्वरूप के पक्षधर नहीं हैं। हम इनके द्वारा चलाए जा रहे युद्ध और दमन की तीव्र भर्त्सना करते हैं, जैसा कि कविता कृष्णन ने अपनी पार्टी से मांग की है। लेकिन महत्वपूर्ण सर्व सत्तावादी होना नहीं है, राज्य सर्व सत्तावादी होता ही है। चाहे वह लोकतंत्र का जितना भी नकाब पहन ले। महत्वपूर्ण बात यह है कि उस सर्वसत्तावादी राज्य के संचालन और नियंत्रण में किन वर्गों की भूमिका है। जब राज्य सत्ता है, तब किसी ने किसी वर्ग का उस पर नियंत्रण होगा ही। जैसे आज भारत की राज्य सत्ता पर खुलेआम पूंजीपतियों का नियंत्रण दिखता है। चीनी राज्य सत्ता पर मजदूरों का नियंत्रण नहीं है। उस राज्य सत्ता पर भी पूंजीपतियों का ही नियंत्रण है और पुतिन तथा जी पिंग एकाधिकार पूंजीपतियों के हितों की इस या उस विधि से साध रहे हैं।
एकाधिकारी पूंजीपतियों को बाजार का विस्तार चाहिए। और इसके लिए अमेरिका तथा पश्चिम के साम्राज्यवादी देश जब जमीन नहीं छोड़ेंगे तो दूसरे देशों के पूंजीपतियों को अपने राज्य तथा सरकारों को युद्ध के लिए तैयार करना पड़ता है। कविता कृष्णन को यह नहीं भूलना चाहिए कि पुतिन उसी पार्टी के वारिस हैं जिसने पश्चिम की मदद से और गोर्वाचेव के उदारीकरण के फलस्वरूप सोवियत संघ को विध्वंस कर येल्तसिन के नेतृत्व में पूंजीवादी लोकतंत्र की स्थापना की थी और पहले के सोवियत संघ के जमाने की संसद को तोपों से घेर कर के उसके अस्तित्व को नकार दिया था।
आज की तारीख में संसदीय वामपंथी पार्टियां यूरोप की तरह अपने को सामाजिक जनवादी पार्टी घोषित कर पूंजीवाद की बी टीम के रूप में काम करने की खुली घोषणा कर दें! इस तरह से मार्क्सवाद-लेनिनवाद के तनाव देने वाले वर्ग संघर्ष से वे मुक्ति पा जाएंगी, जैसे की कविता कृष्णन और कन्हैया जैसे जेएनयू मार्का नेताओं ने छुट्टी पा ली है! या फिर मार्क्स व लेनिन के वर्ग संघर्ष की विचारधारा को बहस के केंद्र में रखकर के पार्टी के बचे कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करें।
कविता कृष्णन के उलट इन पार्टियों में जो भी सच्चे मार्क्सवादी लेनिनवादी कार्यकर्ता हैं, उनसे मेरी अपील है कि अपनी पार्टी के अंदर मार्क्सवादी लेनिनवादी होने का दावा करते हुए इस वैचारिक संघर्ष को चलाएं और अपनी पार्टी को पूरी तरह से पूंजीवादी पार्टियों का पिछलग्गू बनने से रोकें। ऐसा नहीं किया तो आने वाले समय में हिंदी पट्टी और खासकर बिहार में सत्ता में बैठी आरजेडी तथा जनता दल यू जैसे पार्टियों के पीछे चलना उनकी नियति हो जाएगी। जब तक भाजपा सरकार में थी और आप विपक्ष में थे, तब तक जन आंदोलन करने की गुंजाइश थी। सड़कों पर आप कार्यकर्ता दिख रहे थे। लेकिन जिस सरकार के आप समर्थन में हैं, उस सरकार के खिलाफ जन आंदोलन करने की आप ताकत खोते जा रहे हैं। आपको याद रखना चाहिए कि आपकी ताकत मंत्रियों के पीछे चलकर कुछ काम करा देने से नहीं, बल्कि जन आंदोलन के बीच से प्रस्फुटित होती थी।
नरेंद्र कुमार, कम्युनिस्ट सेंटर फॉर साइंटिफिक सोशलिज्म

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