संसदीय लोकतंत्र के नेता क्रांति नहीं किया करते

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किसी भी सवाल से पूर्व आप तय करना पड़ेगा कि आप वर्तमान संसदीय लोकतंत्र और औपनिवेशिक संविधान के अंतर्गत रहकर सवाल करना चाहते हैं अथवा इसके अतिरिक्त किसी अन्य व्यवस्था के लिए सवाल कर रहे हैं। यह मैं इस नाते कहने की जरूरत और हिम्मत कर रहा हूँ कि अब चुनाव नजदीक आ गए हैं और हमें अनेक सामाजिक व राजनीतिक चेहरों के बदलते हुए रूप और तेवर देखने-सुनने को मिलेंगे। ऐसे में हम बड़ी उत्सुकता भरे सवाल पूँछेगे तथा अपने दर्शन के अनुसार आक्षेप भी मढेंगे।

यदि आप इसी संसदीय व्यवस्था के अंतर्गत रहना वाज़िब समझते हैं तो सुधार की राजनीति के अतिरिक्त आप को कुछ नहीं मिलेगा क्योंकि संसदीय लोकतंत्र पूँजीपतियों का बनाया लाक्षागृह है। संविधान उनका कानूनी दस्तावेज है। सत्ता उनके दबंगों का अखाड़ा है। सरकार उनके द्वारा निर्मित पूँजीवादी व्यवस्था की प्रबंधन समिति है। एमपी-एमएलए उनके टट्टू हैं। मंत्री उनके खाश रखवाले हैं। प्रधानमंत्री पूँजीपतियों के प्रबंधन समिति का व्यक्तिगत वफादार प्रधान सेवक है। सत्ता, सरकार, संविधान, कानून, मंत्री और एमपी-एमएलए पूँजीपतियों के उद्योग और उसके मुनाफ़े को न क्षति पहुँचाते हैं और न किसी को क्षति पहुँचाने देते हैं। ये वफादार नौकर पूँजीपतियों के उद्योग और मुनाफ़े की रक्षा के लिए, जब कभी मजदूर, किसान, छात्र, नौजवान, बेरोजगार और जनता अपने हित की रक्षा के लिए उद्योगपतियों से सवाल करती हुई अपने जायज़ हकों को माँगती है, तब प्रबंधन समिति के सभी सदस्य एक शुर में अलापते हुए पुलिस और मिलिट्री लगा कर जनता के आंदोलन को कुचल देते हैं जिससे उनके जायज़ माँगों को न देना पड़े। अमूमन, यही सभी दक्षिणपंथी पार्टियों और उनके विधायकों और सांसदों का हाल है। जिन्हें आप दल बदलते हुए देखते हैं, वह किसी सिद्धांत की बात नहीं हुआ करती है बल्कि वह उनके सेटिंग का मामला हुआ करता है। जब उसको उचित प्लेसमेंट नहीं मिलता है तो वह अन्य पार्टी में चला जाता है या जब अधिक सर चढ़कर बोलने लगता है अथवा वर्चस्व की स्थिति प्राप्त करने लगता है, तब पार्टी कमांडर उसे निष्काषित कर देता है। आप को लगता है अच्छा हुआ फलाँ पार्टी ने फलाँ नेता को पार्टी से निकाल दिया अथवा अमुक नेता ने ठीक किया जो वहाँ से निकल कर तथाकथित उचित पार्टी को ज्वाइन कर लिया याफिर अमुक नेता बहुत बड़ा गद्दार है जो उस पार्टी और उसके सिद्धांतों को छोड़कर दूसरे किसी पार्टी में चला गया। सभी नेताओं का लक्ष्य किसी पार्टी में पहुँचकर धन और सम्मान हासिल करना है, व्यवस्था परिवर्तन उनका उद्देश्य नहीं है। यदि आप थोड़ा गंभीर अध्ययन-मनन में जाँय तो आप पाएँगे कि भारत की कोई भी पार्टी व्यवस्था परिवर्तन के लिए नहीं बनाई गई है। जिसे आप अपनी निजी पार्टी समझते हैं, उसका भी बारीक अध्ययन करके देखिए, वह भी इसी संसदीय लोकतंत्र में रहकर संसदीय लोकतंत्र की राजनीति ही करना चाहती है। सभी पार्टियों की एक जनता होती है। वे सभी पार्टियाँ अपनी-अपनी जनता से एक ही बात करती हैं कि उसकी वजह से हम दुखी है और अमुक पार्टी के दृष्टिकोण से हम सब परेशान हैं। सभी पार्टियाँ दूसरी पार्टी को सत्ताच्युत करके अपनी जनता में सुख-शांति ला देने का भरोसा दिलाते रहते हैं। जनता है कि अपना-अपना कहकर हमेशा मूर्ख बनी रहती है। सोचिए जरा; कन्हैया, जिग्नेश और हार्दिक के कांग्रेस ज्वाइन कर लेने से जनता का कौन सा हित होने वाला था, जो रुक जाएगा? यदि ये वहीं पड़े रहते तो कौन सी क्रांति हो जाती? हमारी विषखोपड़ी से वास्तविक सवाल गायब हैं कि मनुष्य का मनुष्य के द्वारा किसी भी तरह का शोषण-उत्पीड़न नहीं होना चाहिए। पूँजीपतियों ने अपने कुशल संचालन में अपने प्रबंधन समिति को हर व्यक्ति को अपने जाति की खाई को चौड़ा करने के उद्योग में फँसा दिया है क्योंकि पूंजीपति जानता है कि जनता की खोपड़ी कभी खाली नहीं रह सकती है बल्कि जनता में बहुत मेधावान लोग हुआ करते हैं और यदि उन्हें स्वतंत्र रहने दिया गया तो वे पूँजीपतियों के शोषणकारी मशीनरी को उखाड़ फेंकने के लिए जनांदोलन तैयार कर देंगे इसलिए पूँजीपति मेधाओं को आत्मसात कर लेते हैं और अक्षुण अपनी व्यवस्था को संचालित करने में सफल रहते हैं।

मैंने सुश्री बहन कुमारी मायावती जी का ‘प्रबुद्ध सम्मेलन’ में दिया भाषण सुना। कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को नोट किया जिसे आप सभी से शेयर करना उचित समझता हूँ। इससे आप अपनी राय आसानी से बना सकेंगे और यह देख सकने में सक्षम होंगे कि हम और हमारा आंदोलन कहाँ है। सुश्री बहन कुमारी मायावती ने अपने संबोधन में श्री सतीश चंद्र मिश्र और ब्राह्मण वर्ग को प्रबुद्ध वर्ग कहकर विशेष तरजीह दिया और निम्न बातों को मुख्यतः अपने उद्बोधन में रखा कि सपा व बीजेपी पूंजीवादी सरकारें हैं। प्रबुद्ध समाज यानी ब्राह्मण समाज ने बसपा के लिए अपना काम ठीक से किया है। दलित वर्ग ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा। दलित कभी भी बहकावे में नहीं आया। प्रबुद्ध समाज का भी शोषण-उत्पीड़न हुआ है। प्रबुद्ध समाज हर गली-कूचे,नुक्कड़, चैराहों पर कह रहा है कि बसपा का कार्यकाल बहुत अच्छा रहा है। इस बार भी प्रबुद्ध समाज की मदद से सरकार बनेगी। ब्राह्मण समाज के कल्याण का पूरा ध्यान रखा जाएगा। श्री सतीश चंद्र मिश्र ने प्रबुद्ध समाज को बीएसपी से जोड़ने का सफल काम किया है। ब्राह्मण समाज को युद्ध स्तर पर बीएसपी में जोड़ना है। ब्राह्मण समाज के साथ हुई ज्याजतियों की जांच की जाएगी। हर विधान सभा क्षेत्र में ब्राह्मण समाज के 1000 कार्यकर्ता तैयार करना है। ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ की नीति पर चलने वाली एक अकेली पार्टी बीएसपी है। करोना पीड़ितों की मदद की जाएगी। यूपी में 10 परसेंट ब्राह्मण वोटर हैं। ब्राह्मणों ने उप्र में 23 साल शासन किया। बसपा ने पिछले चुनाव में 56 ब्राह्मण कैंडिडेट उतारे थे और उनमें से 41 जीतकर आए।

यदि आप गौर किए हों तो यह उनके मन की बात नहीं थी बल्कि वह एक लिखित चुनावी भाषण पढ़ रही थीं। उनके चेहरे पर जनता से जुड़कर बोलने जैसी कोई बात नहीं थी। ऐसा लग रहा रहा था जैसे सुश्री मायावती जी और बीएसपी कुछ लोगों द्वारा हाईजैक कर लिया गया हो। जिनको वे संबोधित कर रही थीं और जो उजले कपड़े सम्मुख दर्शनदीर्घा में दिख रहे थे, सभी तथाकथित प्रबुद्ध लोग थे। यहाँ यह ध्यान देने वाली बात है कि जिस जोश-खरोश से बीएसपी बनाई गई थी और सुश्री मायावती जी जिन वजहों से आयरन लेडी बनी थीं, वह सब बीते समय में लिया गया गलत निर्णय महसूस होने लगा है क्योंकि कल तक आज के प्रबुद्ध कल के ब्राह्मण बीएसपी के सभाओं से जबरन घोषणा करके भगा दिए जाते थे क्योंकि कल यह लगता था जैसे दलित वर्ग मान्यवर कांशीराम साहब और हमारी प्रिय मशीहा सुश्री बहन कुमारी मायावती जी के नेतृत्व में ब्राह्मणशाही को उखाड़ फेंक देगी और एक नई व्यवस्था का सूरज स्थापित हो जाएगा। उस समय सुश्री बहन मायावती को कहाँ पता था कि वह जिस राजनीति में प्रवेश करने जा रही हैं, वहाँ अस्थाई सत्ता तो मिल सकता है लेकिन स्थाई व्यवस्था परिवर्तन का कोई जगह नहीं है। उन्हें तब यह नहीं ज्ञात था कि संसदीय लोकतंत्र सुधार की गुंजाइश जरूर रखता है किंतु वह कोई मूलभूत परिवर्तन को आदेशित नहीं करता है और न होने ही देता है। जिस संविधान ने दलितों को आरक्षण दिया, उसी संविधान ने विधिक बनाया कि कोई भी अपनी जाति न बदल सकता है और जाति की व्यवस्था को तोड़ सकता है। उसे आरक्षण का फायदा लेने के लिए बिना किसी बरजोरी के स्वयं जाति प्रमाण-पत्र बनवाकर प्रस्तुत करना होगा। हम भले न मानें लेकिन हम गाँधी की कल्पना के अनुसार उस रामराज्य में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ वर्ण-व्यवस्था स्थाई रूप से रहेगी, हाँ, थोड़ा उदारवादी बनी रहकर छुआछूत और भेदभाव को कम रखेगी। आम्बेडकर साहब चाहते थे कि जैसे भी हो जातिप्रथा को खत्म किया जाना चाहिए। निजी संपत्ति का लोप होना चाहिए। संसाधनों का राष्ट्रीयकरण होना चाहिए तथा आध्यात्मिक संतुष्टि के लिए बुद्ध के मार्ग का अनुसरण करने के लिए बौद्ध धर्म स्वीकार कर लेना चाहिए लेकिन ऐसा मुमकिन न हो सका और हम, अनजाने में ही सही, गाँधी के सपनों के सिद्धांत के तले जीने को बाध्य हो गए हैं। गाँधी चाहते थे कि सारी जातियाँ अस्तित्व में रहें लेकिन मिलजुल कर रहें। आज सुश्री मायावती जी अपने भाषणों और क्रियाओं में हमें वहीं लाकर बैठा रही हैं। उनके इस लिखित भाषण को सुनकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे उनका 30 वर्ष पुराना विचार और तेवर गलत था और वे अपने को भूल सुधार की अवस्था में रखकर ब्राह्मण वर्ग को प्रबुद्ध वर्ग संबोधित करके अपने ग्लानि को धो रही हैं।

मैं अपने इस विश्लेषण से यह कदापि नहीं कहना चाह रहा हूँ कि ब्राह्मण वर्ग से ईर्ष्या किया जाय और उसे प्रबुद्ध वर्ग मानने या संबोधन करने से मना कर दिया जाय, बिल्कुल नहीं क्योंकि संसदीय राजनीति यही सिखाता है अथवा कोई भी व्यक्ति किसी भी स्तर व विचार की कोई पार्टी क्यों न बना ले, उसे सर्वजन को लेकर चलना मजबूरी है। कोई भी एक विचारधारा या एक जाति-धर्म के विचार संसदीय लोकतंत्र में चल ही नहीं सकता है। सत्ता प्राप्त करने के लिए सभी जातियों की भागीदारी आवश्यक है। कोई भी एक विचारधारा या एक जाति या एक धर्म पर चलने का रूढ़ वि चार उसको आतंकवादी करार दे देगा। भारत जब बहु भाषाभाषी, बहु धर्म, बहु जातीय देश है तो यहाँ एक भाषा, एक धर्म व एक जाति की अड़ियल विचारधारा कैसे चल सकती है? आज सुश्री मायावती विशुद्ध लोकतंत्रवादी संसदीय राजनीति कर रही हैं। इस राजनीति में कहीं भी आम्बेडकर साहब की विचारधारा को खोजने की जरूरत नहीं है। आम्बेडकर साहब इस व्यवस्था को मूलभूत बदल देने के पक्षधर हैं और सुश्री मायावती इसी व्यवस्था में रहकर दलितों को कुछ सुविधा दिलाने की पक्षधर हैं। यदि आप दोनों को मर्ज नहीं करते हैं तो आप चीजों को आसानी से समझ जाएँगे और यदि गडमड करेंगे तो मूलतः किसी को नहीं समझ पाएँगे और एक अंधभक्त बने रहकर अनजने में आम्बेडकर के सपनों को रौंदते हुए सुश्री मायावती के विचारों में अपनी सहमति व्यक्त कर खुश होते रहेंगे।

एक आखिरी बात कहकर लेख को अंजाम दे दूँगा कि जब संसदीय राजनीति के लिए सर्वजन का साथ जरूरी है और वहाँ दलित सुश्री मायावती के पक्ष में खड़े हो जाते हैं तो क्रांति के लिए सर्वजन के प्रगतिशील और क्रांतिकारी लोगों को साथ लेकर चलने में दलित साथियों को आपत्ति क्यों होने लगती है?

आर डी आनंद
10.10.2021

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