पंकज बिष्ट को मिला डा. राही मासूम रज़ा साहित्य सम्मान

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लखनऊ। डा राही मासूम रज़ा अकादमी के तत्वावधान में डा. राही मासूम रज़ा के जन्मदिवस के अवसर पर डा. राही मासूम रज़ा साहित्य सम्मान – 2022 से वरिष्ठ साहित्यकार- सम्पादक पंकज बिष्ट को सम्मानित किया गया। इस अवसर उन्हें प्रतीक चिन्ह, सम्मान पत्र व शाल देकर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने किया।
अकादमी के महामंत्री रामकिशोर ने अकादमी के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डा. राही मासूम रज़ा के मूल्यों और आदर्शों को जीवित रखने, उनके जलाये चिरागे तमन्ना को रोशन रखने तथा उनकी चिन्ताओं से अपने को जोड़ने एवं भ्रष्टाचार, स्वार्थ, अवसरवाद, जातिवाद, क्षेत्रीयता और साम्प्रदायिकता पर आधारित राजनीति से जूझने, उसको टक्कर देने, उससे संघर्ष करने, तथा अपनी साझा विरासत एवं संस्कृति को बनाये रखने, उस पर गर्व करने तथा उसे और मजबूती प्रदान करने के लिए डा. राही मासूम रज़ा साहित्य अकादमी की स्थापना की गई है। उन्होंने बताया कि प्रत्येक वर्ष डा. राही मासूम रज़ा के जन्मदिवस के अवसर पर अकादमी किसी एक साहित्यकार को सम्मानित करती है।
प्रो नदीम हसनैन ने कहा कि एक लेखक और शायर के रूप में राही की रचनाओं में तीन बातें लगातार देखी जा सकती है, वे बातें हैं भारतीयता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता।
करामत हुसैन कालेज की उर्दू विभाग की अध्यक्ष डा. शबनम रिजवी ने कहा कि राही की सबसे बड़ी खूबी मुहब्बत का पैगाम है। जो उनकी नज़्मों में पूरी तरह महसूस की जा सकती है।
सम्मानित साहित्यकार पंकज बिष्ट पर बोलते हुए केकेसी कालेज के प्रो नलिन रंजन सिंह ने कहा कि उनका पहला संग्रह 1980 में आया था। संग्रह की शीर्षक कहानी ‘पंद्रह जमा पच्चीस’ 1973 की है। कहानी अपने वर्णन और विवरणों के मामले में जबरदस्त है। पंकज बिष्ट इस कहानी में लिखते हैं- ‘यह हद है। यहाँ से भारत की राजधानी शुरू होती है और इन बिल्डिंगों की ऊँचाई एक पर्दा है, जिसके पीछे छिप जाता है हिंदुस्तान। हिंदुस्तान की शर्म और बेबसी।’ भारत यहाँ एक तरह से तत्सम है, इंडिया है और हिंदुस्तान जैसे आम लोगों का देश। दिल्ली के दो हिस्सों में से हिंदुस्तान कहानी के केंद्र में है। कहानी का केंद्रीय पात्र ‘पदुमन’ टी.बी. का मरीज है। गरीबी, महँगाई में संघर्ष करके अपने भाई के बच्चों को पालता है। सांप्रदायिक संदर्भ उसकी बेबसी के आगे हार जाते हैं।

पंकज बिष्ट की कहानी ‘शबरी शर्मा बीमार हैं’ 1977 में छपी थी जो राजनीतिक संदर्भ की कहानी है। शिक्षा मंत्री ऐसा है कि उसे शिक्षा से कोई लेना देना नहीं है। मंत्री महोदय दस पास थे या नहीं इसमें भी शंका थी। शर्मा को लगता है कि राजनीति बहुत आसान है। ऊँची–ऊँची बातें करो और सबसे अधिक सुविधाओं में रहो। किंतु महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए जैसे-जैसे आगे बढ़ती हैं उनका इस्तेमाल शुरू हो जाता है और भ्रष्टाचार में फँसती चली जाती हैं। गिरफ्तारी से बचने के लिए बीमारी का बहाना बनाती हैं जबकि इलाज के दौरान पता चलता है कि वह वास्तव में सिफलिस की बीमारी से ग्रस्त हैं। राजनीतिक जोड़-तोड़, कम पढ़े-लिखे लेकिन काइयाँ लोगों से भरी इस दुनिया में एक पढ़ी-लिखी स्त्री जो समाजशास्त्र पढ़ाती है बुरी तरह फँस जाती है और हर जगह से अपमानित होती है। राजनीतिक उठापटक की बेहतरीन कहानी है यह।

1980 में छपी कहानी ‘हल’ पहाड़ी जीवन की बेबसी और लाचारी की कहानी है। खेती का हाल पहाड़ों पर कितना खराब है, उसे बयान करती हुई। उसी लाचारी में वहाँ के लोगों को नीचे या शहरों में कमतर काम समझौते करके करने पड़ते हैं। यह संबंधों की भी कहानी है जिसमें भाई-बहन के प्यार का महीन चित्रण हुआ है।

1983 में छपी ‘खून’ एक बेहतरीन कहानी है। प्रेम के बीच धर्म दीवार बनकर खड़ा था। उस दीवार को तोड़ने में दो प्रेमी खुद ही टूट रहे हैं। मुस्लिम लड़के से हिंदू लड़की की शादी के खिलाफ न सिर्फ उनके पिता हैं बल्कि पूरा दफ्तर है। उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ता है। झूठे आरोप लगाए जाते हैं और गरीबी के दबाव में लड़की को एबॉर्शन कराना पड़ता है। कहानी में बार-बार माता के जगराते का शोर एक माँ न बन सकी स्त्री की बेबसी को चिढ़ाता है और धर्म के झूठ को भी उजागर करता है। यह एक बेहद मार्मिक कहानी है।

1983 में छपी प्रतीकों में लिखी गई कहानी ‘खिड़की’ साहित्य पर सत्ता और पूँजी के नियंत्रण को बेहतरीन ढंग से चित्रित करती है। फेलोशिप पाए लेखक को हर वातानुकूलित कमरे में फोन दिया गया है और कोई भी नंबर मिलाने पर फोन एक ही आदमी हर बार उठाता है। निराले प्रतीक से बिष्ट साहब कहानी शुरू भी करते हैं जहाँ कविता छापे जाने के समय ही आग लगा देती है। लेकिन सारा लावा बीवी-बच्चों की इच्छा और सुविधा की भेंट चढ़ जाता है। उन साहित्यकारों पर यह कहानी टिप्पणी भी करती है जो क्रांति करते-करते पूँजी के बँधुआ बन जाते हैं। इस कहानी को ‘लेकिन दरवाजा’ उपन्यास का प्रस्थान बिंदु भी कहा जा सकता है।

1983 में छपी कहानी ‘आवेदन करो’ बेरोजगारों के सवाल उठाती है। इसमें रोजगार दफ्तरों में पंजीकरण कराए घूम रही युवा पीढ़ी की बदतर स्थिति को व्यक्त किया गया है। ठंड, बारिश, दुर्घटना सब मिलकर ऐसी असंगति बनाते हैं कि कहानी अपनी बात कह जाती है। ‘पिछले जाड़े में चला काल लेटर ठंड के कारण रास्ते में जम गया’ जैसे वाक्य रोजगार के अवसरों की पोल खोल देते हैं। शीर्षक भी ‘आवेदन करो’ के छलावे को व्यक्त करता है।

1985 में पंकज बिष्ट का दूसरा संग्रह आया था ‘बच्चे गवाह नहीं हो सकते’। इसकी शीर्षक कहानी मध्यवर्ग में बढ़ते उपभोक्तावाद की कहानी है। नौकरीपेशा मध्य वर्ग बाजारवाद के जाल में फँस कर अपनी जान की नहीं झूठी शान की परवाह करके विज्ञापनों के चकाचौंध में अपना तन और धन दोनों गँवा देता है। विसंगति के बहाने ऋण जाल की वास्तविक हकीकत भी इस कहानी में बयान की गई है।

पंकज बिष्ट का उपन्यास ‘लेकिन दरवाजा’ 1982 में छपा था। नीलांबर, सुमन, देवेन और कला के इर्द-गिर्द सृजित यह उपन्यास बेहद महत्वपूर्ण उपन्यास है। यह मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी समुदाय के नैतिक और वैचारिक पतन का विस्तृत रूप प्रस्तुत करता है। हिंदी के साहित्यिक, सांस्कृतिक समाज का जो भीतरी रूप है वह यहाँ पर उद्घाटित हुआ है। पुरस्कार, नौकरी, प्रकाशन, जोड़-तोड़ सब यहाँ पर दिखाए गए हैं। साहित्य को जंपिंग पैड बनाते बुद्धिजीवियों की खबर यहाँ ली गई है।

अपने उद्देश्यों की पूर्ति करते हुए भी पंकज बिष्ट के उपन्यास और कहानियाँ पठनीय होते हैं। वे पाठक को बाँधे रहते हैं और अपनी भाषा और कथ्य के जुड़ाव से कथानक का विन्यास इतना मजबूती से बनाते हैं कि पाठक उनमें रमा रहता है।
अकादमी की अध्यक्षा वन्दना मिश्रा ने कहा कि डा. राही मासूम रज़ा भारत की परम्परागत साझी संस्कृति और विरासत के प्रबल समर्थक थे।
कार्यक्रम में भगवान स्वरूप कटियार, नवीन जोशी, राजेंद्र वर्मा, डा. रमेश दीक्षित, सुमन गुप्ता, आनन्द वर्धन सिंह, ओ पी सिन्हा, उषा राय, डा. नरेश कुमार, अखिलेश श्रीवास्तव चमन, प्रभात कुमार, आशीष, शिवाजी राय, मलिकजादा परवेज, विपिन त्रिपाठी, डी एस रावल, एडवोकेट वीरेंद्र त्रिपाठी, सी एम शुक्ला, सन्ने नकवी, संजीव कुमार, प्रतुल जोशी, राम कुमार, डा. रविकांत चन्दन, ज्योति राय, उदय सिंह, डा. सतीश श्रीवास्तव, डा. अतुल श्रीवास्तव, राकेश श्रीवास्तव सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।

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