ऑनलाईन शिक्षा और महिलाएंः आरती रानी प्रजापति

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ऑनलाईन शिक्षा और महिलाएं

आरती रानी प्रजापति

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

Aar.prajapati@gmail.com

 

महिलाओं की शिक्षा भारत जैसे देश में आज भी एक अनावश्यक खर्च मानी जाती है। लड़की है, पढ़-लिख कर क्या करेगी जैसी धारणा ने ही महिलाओं को सदैव शिक्षा से वंचित रखा। देश के संविधान ने जब सबको शिक्षा के समान अवसर उपलब्ध करवाये, महिला व वंचित समाज को समान अवसर देने की बात की गई तब महिला शिक्षा सम्वैधानिक रूप से अस्तित्व में आई। संविधान से पहले महिला शिक्षा का कार्य सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख ने किया था। देश में पहला बालिका विद्यालय खुलने वाली यह दो महिलाएं ही हैं। इनसे पहले महिलाओं की शिक्षा, व्यवस्थात्मक रूप में नहीं मिलती। न जाने कितनी महिलाओं ने मार खाई, कितनी मार दी गई, कितनों के गाल, पीठ व जिस्म के अन्य हिस्से लाल-नीले निशानों से भरे गए तब जाकर इस देश में लड़कीयां पढ़ पा रही हैं। साथ ही महिला शिक्षा के लिए देश के समाज सुधारकों ने भी एक बड़ी लड़ाई लड़ी है।

देश में स्कूल में लड़कियों को पढ़ने नहीं भेजा जाता था। कारण, वह बाहर जाएगी तो व्यवस्था बदल जाएगी। वह अपने निर्णय स्वयं लेने लगेगी। घर के हर छोटे-बड़े फैसले में अपनी राय देगी। बाहर निकली लड़की समाज के मर्दों के लिए भी एक अवसर होती है। घर के काम से बाहर जा सकती है लेकिन पढ़ने नहीं। लड़कियों के पैदा होने का अनुपात लड़कों के मुकाबले में कम है। और उससे भी कम है स्कूली शिक्षा का प्रतिशत। स्नातक और स्नातकोत्तर तक आते आते यह संख्या और कम हो जाती है। बहुत कम बच्चियों को यह सुविधा मिल पाती है, जी हां सुविधा।

पढ़ने के लिए बाहर जाती हुई लड़की कुछ समय के लिए ही घर से बाहर निकल पा पाती थी। इस बाहर जाने में वह अपनी पूरी जिंदगी जी ली थी। मसलन अकेले चलना, दोस्तों से बातें, घर के काम से मुक्ति, मन के विषय में वक्त बिताना, किताबें पढ़ना, तर्क करना, कक्षा में बोलना। जिसे घर में हर वक्त चुप किया जाता था वह स्कूल, कॉलेज में जाकर बोलती है, कक्षा में अपने प्रश्न रखती है। लड़कियों को शिक्षा का जितना महत्व ही माना गया उतना ही उसमें पढ़ने की ललक जगती है यही कारण भी है कि शिक्षा के क्षेत्र में लड़कियों ने बहुत कम समय में बड़े प्रतिमान तय किए हैं। आज लगभग हर उच्च पदों पर लड़कियां आसीन हैं। यह सब महिलाओं की मेहनत और लगन का परिणाम है।

कोरोना के समय ने महिला शिक्षा को कई गुना पीछे धकेल दिया है। जैसे कि मैंने पहले कहा देश में महिला शिक्षा एक ऐश्वर्य, एक सुविधा माना जाता है, ऐसे में बेटी की पढ़ाई को महत्त्व देने की आवश्यकता खत्म होती जा रही है। आज कोरोना के समय पर बच्चियों को भी ऑनलाइन शिक्षा दी जाती है। ऑनलाइन शिक्षा पद्धति जिसमें साधन संपन्न ही यह सुविधा ले सकता है। कई बच्चियां घर में इंटरनेट, मोबाइल न होने के कारण शिक्षा से वंचित हुई हैं। एक गरीब घर का बच्चा पैसे न होने पर पुरानी कॉपी पर लिख सकता था। किताबें खरीदने की जगह लाइबेरी या अपने दोस्तों की किताबों से काम चला सकता था, लेकिन इस समय सबको अपने निजी मोबाइल, उसके इंटरनेट की सुविधा की जरूरत महसूस हुई जो देश की लगभग 50% महिलाओं के पास नहीं है। यह प्रतिशत स्नातक और उससे कम की कक्षाओं की बालिकाओं का और भी ज्यादा है। ऑनलाइन शिक्षण के दौरान जब बच्चों से कक्षा में ना आने का कारण पूछा तो कई का जवाब था घर में एक मोबाइल है जिसमें भाई क्लास लेता है। किसी-किसी के घर में वह मोबाइल तक नहीं था। किसी के पास मोबाइल था लेकिन रिचार्ज के पैसे नहीं थे। जहां कोरोना के समय में दो वक्त की रोटी को लोग तरस गए ऐसे में घर में मोबाइल, इंटरनेट जैसी सुविधाएं, या हर महिने का 600-700 का वाई-फाई लगवाना वह भी लड़की की शिक्षा के लिए कहां तक सम्भव हो सकता है? ऐसे में कई बच्चे दाखिला लेने के बाद भी क्लास नहीं ले पाए।  उन बच्चों का क्या होगा? कितना वह खुद को पाठ्यक्रम समझा पाए होंगे यह कहना मुश्किल है। उनमें भी लड़कियां जिन्हे‌ पढ़ाई के साथ घर के काम भी करने होते हैं उनकी दशा सोची जा सकती है।

जिन घरों में बच्चियों के पढ़ाने को महत्व नहीं दिया जाता है उसमें यदि वह मजबूरी में पढ़ाते हैं या लड़की की पढ़ने की जिद है, ऐसी बालिकाओं ने भी कोरोना के समय पर काफी चीजों को झेला है। क्योंकि कक्षाएं ऑनलाइन है आपको सिर्फ सुनना है तो, वहां आपको काम सौपें जाते हैं। वह इस बात के लिए मजबूर होती है कि कक्षा सुनते-सुनते घर के काम करें। बच्चियां कक्षा सुनते हुए खाना बनाती, झाड़ू लगाती, बर्तन लगाती या अन्य काम करती हैं। पढ़ाई जिसके लिए एक माहौल, शांति चाहिए वह उसे नहीं मिल पाता। ‘सुन ही तो रही है साथ में काम कर लेगी तो क्या हो जाएगा’ जैसी बातें। भले ही वह कक्षा में उपस्थित रहती हो लेकिन हाथ काम में लगे होते हैं।

आम घरों में बच्चों के लिए यह सुविधा प्राय: नहीं होती एक अलग कमरा उन्हें शिक्षा के लिए दिया जाए। अजीब बात यह है कि भारत देश में पूजा का अलग कमरा या स्थान हो सकता है लेकिन पढ़ने का नहीं। ऐसे में यह बच्चियां घर परिवेश के साथ ही ऑनलाइन कक्षाएँ ले रही थीं। घर में चलने वाले संवाद, लड़ाई, झगड़े, पूजा-पाठ, खाना बनाने, घर के बाहर शोर के बीच अपने को कक्षा में केंद्रीत करती लड़कियों ने बहुत मुश्किल से कोरोना काल में यह समय काटा है।

कोरोना जैसी महामारी में शिक्षा या अन्य व्यव्स्थाएं सुविधा संपन्न घरों के लिए ठीक हैं लेकिन गरीब इससे पिसा ही है। चाहे वह सड़क पर खाली पेट चलता मजदूर हो या घर में काम करने वाला कामगार, बीमारी के कारण शहर छोड़ने वाले लोग हों या करोड़ो नौकरी खो चुके युवा। कोरोना के नाम पर एक वर्ग बहुत अमीर हो गया और उसके विपरीत एक वर्ग उभरा जिसने इस बीच हद से ज्यादा संघर्ष किया। इस संघर्ष में महिलाओं की संख्या ज्यादा है। उसमें भी शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं को भारी नुकसान हुआ है। ऑनलाइन शिक्षा पद्धति एक वर्ग की पद्धति है जिसे सम्पूर्ण देश पर लागू किया गया। यह पद्धति महिला शिक्षा के लिए एक शत्रु के समान है इससे ज्यादा कुछ नहीं।

 

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