नूपुर शर्मा की जमीन और इस्लाम की आलाचोना

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मुकेश असीम
अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल
क्या अभिव्यक्ति की आजादी के सवाल को सत्ता व शक्ति के सामाजिक संबंधों से अलग कर निरपेक्ष रूप से देखा जा सकता है? उदाहरण के तौर पर कहें तो क्या सलमान रूश्दी, तस्लीमा नसरीन, रतनलाल, नुपूर शर्मा की अभिव्यक्ति की आजादी को निरपेक्ष रूप से बराबर बराबर माना जा सकता है जैसे कुछ का कहना है कि रतनलाल को अभिव्यक्ति की आजादी है तो नुपूर शर्मा को उतनी ही आजादी क्यों नहीं?
मेरा मानना है कि इस सवाल को निरपेक्ष रूप में नहीं, सामाजिक सत्ता व शक्ति संबंधों के परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए कि कौन ताकतवर के खिलाफ विरोध जताने के लिए अभिव्यक्ति का खतरा उठाते हुए व्यंगोक्ति व कटु शब्दों का प्रयोग करता है और कौन कमजोर को अपमानित करने व दबंगई के लिए ऐसा करता है। इसी आधार पर समर्थन या विरोध का फैसला बनता है।
कुछ उदाहरण –
गैलीलियो व ब्रूनो का उदाहरण बिल्कुल स्पष्ट है। वे धर्म तंत्र की सत्ता के ढोंग पाखंड के खिलाफ विज्ञान की बात कर अन्याय के खिलाफ खडे थे जबकि ईशनिंदा कानून सत्ता के ढोंग पाखंड की रक्षा में था। इतिहास गैलीलियो व ब्रूनो के पक्ष में फैसला सुना चुका है।
सलमान रूश्दी का उदाहरण लेते हैं। सलमान रूश्दी मुसलमानों पर कोई अत्याचार करने की स्थिति में नहीं थे जब वे धार्मिक पाखंड व ढोंग पर टिप्पणी कर रहे थे बल्कि वह ऐसी टिप्पणी कर शक्तिशाली सत्ताधारी पक्ष से खुद के लिए खतरा मोल ले रहे थे। जबकि इरानी शासक धर्म के सहारे अपने शोषण तंत्र की हिफाजत कर रहे थे। रूश्दी की अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल हमारे समर्थन का हकदार है।
दो अलग विरोधी स्थितियों वाला तसलीमा नसरीन का उदाहरण सबसे सटीक है। जब वे लज्जा लिखकर बांग्लादेश में बहुसंख्यक इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा अल्पसंख्यक हिंदुओं पर अत्याचार को उजागर करती हैं तो वहां की सत्ता द्वारा उस पर पाबंदी अभिव्यक्ति की आजादी का हनन है। लेकिन जब वे भारत में बहुसंख्या की सत्ता के संरक्षण में यहां अल्पसंख्यक पर ही निशाना साधती हैं तो वे अत्याचार के खिलाफ नहीं, सत्ता के साथ खडी होती हैं, बोलने की आजादी के नाम पर उनका मुसलमानों को चिढाते रहना सत्ता से लाभ लेने के मकसद से होता है।
रतनलाल जब हिंदू धर्म पर कटु व्यंगोक्ति करते हैं तो वे बहुसंख्यक हिंदू आबादी को सताने की स्थिति में नहीं हैं बल्कि वे दलितों पर हुए ऐतिहासिक जुल्म के ढोंग को उजागर कर रहे होते हैं। वे अपने से कमजोर पर हमला नहीं कर रहे बल्कि ताकतवर के मुकाबले खडे हैं।
ऐसे ही जब कोई दलित जातिगत अत्याचार के खिलाफ बोलते हुए अपने क्षोभ के इजहार में ब्राह्मणों सवर्णों के खिलाफ कटु शब्दों का प्रयोग करता है तो वह स्थिति उस से बिल्कुल अलग होती है जब कोई ब्राह्मण सवर्ण किसी दलित को जातिगत नफरत भरी गाली देता है। दोनों को समान जातिवादी कहना पूरी तरह कुतर्क है क्योंकि समाज के सत्ता शक्ति संबंधों में दोनों की स्थिति बिल्कुल अलग होती है।
नुपूर शर्मा जब मुसलमानों पर टिप्पणी करती हैं तो उनका मकसद धर्म के ढोंग पाखंड को उजागर करना नहीं, बल्कि सत्ताधारी पार्टी के, शासकों के, शक्तिशाली के प्रतिनिधि के रूप में इस भरोसे कि उनका कुछ नहीं बिगड सकता, चिढाना, अपमानित करना, दोयम दर्जे का नागरिक बता सबक सिखाना है जिसे बुलीइंग या दबंगई कहा जाता है। यह रतनलाल की स्थिति से बिल्कुल अलग स्थिति है।
किंतु जब पाकिस्तान या सऊदी अरब में ईशनिंदा के नाम पर निर्मम हत्यायें होती हैं तो उस वक्त कट्टरपंथी मुसलमान इस्लाम या पैगंबर का सम्मान नहीं बचा रहे होते बल्कि अपने से कमजोरों पर जुल्म व दबंगई कर रहे होते हैं, इसलिए वह मानवता के खिलाफ घोर अपराध होता है।

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