डायरी और नोटबुक जरूरी चीज है…

5
113
डायरी और नोटबुक जरूरी चीज है क्योंकि इससे हमारा लेखन कार्य सफलतापूर्वक संचालित/ संपादित  होता है। डायरी रखने के अनेक फायदे हैं, कुछ अतीत की कटु- मधु स्मृतियों को लिखकर अथवा संजोकर रख लिया जाए  और कालांतर में उसे देखा- पढ़ा जाए तो उससे हमें अनेक सीख मिलती हैं  और पुरानी बातों को याद कर करके मन को थोड़ा सुकून भी मिलता है और थोड़ा मनोरंजन भी हो जाता है।  यों भी यदि आप  डायरी रखते हैं, तो उसका ज्यादा लाभ  यह है कि हम अपने रोज के खर्चे को लिख सकते हैं। उससे हमें यह पता करने में बनता है कि मैंने कहा, क्या फिजूल खर्च किए ? इसी तरह यदि हम डायरी में अपने विचारों को लिखते हैं तो उससे भी हम अपने आपको रोज- रोज बेहतर बनाने में मदद करते हैं। सच तो यह है कि हमारे विचार ही हमारी असली पूंजी है।
एक बार का वाक़या  है कि एक शहर में आग लग गई थी । लोग अपने-अपने घरों से सामान लेकर भागते जा रहे थे। सब अपने- अपने सामानों को बचाने की फिक्र कर रहे था, ऐसे मैं एक ऐसा व्यक्ति दिखा जो केवल खाली हाथ ही बाहर निकल पड़ा था, उसके हाथ में कोई सामान नहीं था । लोगों ने आश्चर्य व्यक्त किया — भाई, तुम खाली हाथ जा रहे हो ? क्या तुम्हारे पास कुछ नहीं है ? उसने शांति के साथ जवाब दिया — “मेरे विचार ही मेरी पूंजी है। जिसे मैं अपने साथ लिए जा रहा हूं। ” स्पष्ट है कि उस व्यक्ति ने हमें एक नई दृष्टि दी, क्योंकि यह सारा संसार नश्वर है और शायद मेरे साथ कभी नहीं रहने वाला है। लेकिन व्यक्ति जब तक जीवित रहता है, उसके विचार उसके साथ होते हैं, उसके विचार ही उसकी असली संपत्ति होती है और समाज में यदि उसे मान- सम्मान मिल रहा है तो वह उसके विचारों की वजह से ही संभव हो पाता है। जाहिर है स्वार्थ, बड़बोलेपन, अहंकार और लाभ- लोभ– हमें जीवन की ऊंचाइयां कभी नहीं दे सकता। वस्तुतः डायरी  या नोटबुक के द्वारा ही हम अपने विचारों को बेहतर तरीके से लिख पाते हैं। मेरे प्रिय गुरुजी डॉ. नंदकिशोर नवल जी अक्सर कई डायरियाँ रखा करते थे और कई नोटबुक भी।
छोटी-बड़ी और मझोली और कई इसी तरह के। जब मोबाइल फोन का जमाना नहीं था तब उनके पास बहुत ही अच्छी छोटी- सी फोन डायरी हुआ करती थी , जिसका कवर मजबूत और सुंदर और टिकाऊ तो होता ही था, आकर्षक भी हुआ करता था । उस समय उनके घर बेसिक फोन भी नहीं था लेकिन विभिन्न साहित्यकारों, लेखकों, पत्रकारों, अध्यापकों, विश्वविद्यालय कर्मियों, छात्रों, शोध छात्रों, पड़ोसियों, सगे- संबंधियों एवं उनके अपने अभिन्न मित्रों के फोन नंबर बेहद व्यवस्थित रूप में रहा करते थे। एक डायरी और थी जो मोटी व  मझोली साइज की थी जिसमें सभी पत्र- पत्रिकाओं के संपादकों के  पते (फोन नंबर सहित) साहित्यकारों, लेखकों, पत्रकारों, घर – परिवार के सदस्यों , दूर के मित्रों, सगे- संबंधियों, पड़ोसियों के नाम अल्फाबेटिकल रूप में देखा करता था। एक नंबर को भुलाने के चलते कई- कई जगह लिखा करते थे और मजाल नहीं कि कोई नंबर या पता खोजने में क्षण भर की भी देरी लगे । उनके इस स्वभाव का असर मुझ पर ही पड़ा तो जरूर, लेकिन मैं उनके जैसा व्यवस्थित, मेहनतकश, तेज और लक्ष्य के प्रति समर्पित भाव वाला व्यक्ति नहीं बन सका। मुझे लगता है कि विभिन्न परिस्थितियों को डायरी में नोट करके कोई भी व्यक्ति अपने विचारों का धनी बन जा सकता है। वे विचार जो आप दिन- रात सोचते हैं, वे विचार जो आपकी धरोहर हैं,  वे  विचार जो आप किसी से मिलने पर तत्काल प्रकट करते हैं अथवा जो आपके दिल- दिमाग में निवास करता है।
मुझे लगता है कि डायरी अथवा नोटबुक हमारे जीवन को सच्चे मार्गदर्शन प्रदान करती हैं। एक दफे मुझे अपने गुरुदेव डॉ नंदकिशोर नवल जी के जन्मदिन पर उनके घर जाना था , अक्सर जब 2 सितंबर आता, मुझे एक-दो दिन पहले आगाह करा देते– समय 4:00 या 5:00 बजे (अपराह्न में) अवश्य आइएगा। और इस हिदायत के साथ कुछ नहीं लाइएगा… लेकिन मेरा मन मानता नहीं था, । तब मैं ऊहापोह  की स्थिति में हो जाता– कि क्या ले जाऊं, क्या ना ले जाऊं— अथवा उनकी  पसंद क्या होगी ? — एक बार किसी विद्वान व्यक्ति जो उनके अभिन्न मित्र थे, उनके जन्मदिन के उपलक्ष में उन्होंने बड़ी महंगी कलम नहीं भेंट की थी —  लेकिन वह ठीक से चली नहीं । इसका उन्हें मलाल रहा, कि रहा कि दिखने में  सुंदर यह कलम आखिर चलती क्यों नहीं है ? शायद हड़बड़ी में लिए जाने की वजह से उसे खोल कर चेक नहीं किया जा सका था कि वह कलम चलती भी है या नहीं ? अथवा उसका पैकिंग डेट क्या है ?
बहरहाल, उसमें दूसरा रिफिल महंगी रिफिल, जो सर्वत्र उपलब्ध नहीं थी, उसे खरीदने के लिए खजांची रोड (पटना) गया था तब  जाकर वह कलम चली थी!। सो इसी उहापोह में मैं जब-जब उनका जन्मदिन होता, मैं पशोपेश में रहता। उनके पास तो दुनिया की सारी पुस्तकें हैं, वे  सभी चीजों  से परिपूर्ण हैं  ! आखिर उन्हें क्या दिया जाए ? सभी अलमारियों में करीने से सजी पुस्तकें, आप एक-एक कर देख जाइए– वह सुव्यवस्थित, नई और पारदर्शी शीशे से झांकती दिख जाएंगी। पुस्तक रखने और सजाने तथा निकाल कर पढ़ने का तरीका मैंने उन्हीं से सीखा। आखिर  बहुत  सोच कर उन्हें देने के बारे में कभी अपने पिताजी से, कभी अपने चाचा जी से, कभी दुकान वाले से पूछ कर अपनी बुद्धि स्थिर कर पाता था कि फलाँ चीज उन्हें भेंट करनी चाहिए । इस तरह एक दफे में श्रीमद्भगवद्गीता की पुस्तक (अनुवाद व व्याख्या  श्री राम सुखदास जी महाराज ,गीता प्रेस, गोरखपुर ), महावीर मंदिर का प्रसाद नैवेद्यम् और एक सुंदर माला लेकर गया था। “गीता” मैं इसलिए लेकर गया था कि वे इस बुढ़ापे में पढ़कर प्रसन्न होंगे। प्रसन्न हुए भी और गीता पर जिन- जिन लोगों ने लिखा था जैसे- बाल गंगाधर तिलक, आचार्य विनोबा भावे, महात्मा गांधी आदि अनेक लोगों के विचारों के बारे में तुलनात्मक विश्लेषण करते और मुझे लगता है कि उन्हें गीता के कर्म योग, भक्ति योग और ज्ञान योग आदि के बारे में अच्छी जानकारी थी।ऐसा उनके साथ गीता पर बातचीत करने से पता चलता था ।
पतंजलि के योग सूत्र पर सन् 2005 ई0 के आसपास “प्रभात खबर “अखबार के लिए पूरे पृष्ठ के लिए ‘ योग और स्वास्थ्य ‘ पर  बेहतर फीचर उन्होंने लिखा था जिसमें पतंजलि योग सूत्र का न केवल विश्लेषण था बल्कि गीता में वर्णित “योगक्षेम बहाम्यहम् ”  को भी बेहतर तरीके से व्याख्यायित किया गया था । एक बार मेरे पूछने पर कि क्या  आप “गीता” लिखना चाहते हैं  ? उन्होंने कहा था,  हाँ, मुझे अब “अध्यात्म” में रूचि हो रही है और अपनी अधूरी किताबों को पूर्ण रूप देकर ‘गीता’ पर लिखूंगा लेकिन उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका। चूँकि मैं ही उनका अधिकांश डिक्टेशन लेता था, यद्यपि मेरे अलावे उनकी पत्नी,  योग प्रताप शेखर और अरुण नारायण भी आवश्यकता पड़ने पर डिक्टेशन लेते थे…!
 (शेष फिर कभी…)
पंडित विनय कुमार 
हिन्दी शिक्षक
 पटना जिला
मोबाइल  9334504100

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here