शुद्ध एनजीओवादी दल्ला लाला शशिप्रकाश पुराण संपन्नम

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हमारा मोर्चा की फेसबुक वॉल सेः लाला शशिप्रकाश अगर अपने भाई रविप्रकाश की तरह सिर्फ एनजीओ सरगना होता तो कोई बात नहीं थी। वह समाज के भोलेभाले युवाओं को क्रांति के नाम पर अपने गिरोह में भर्ती करता है और फिर उन्हें जांबी बनाकर उनसे भीख मँगवाता है। योगी बाबा और उत्तर प्रदेश पुलिस को इस ओर ध्यान देना चाहिए। ——–मार्क्सवाद क्या है? सकर्मक विमर्श। एनजीओपंथ क्या है? अंतहीन निठल्ली बकवास, कुछ न करने, जनता को गोलियाने से बचने के तर्क पेश करना यानि कि अपने ठोस-अमली रूप में बौद्धिक वेश्यावृत्ति। इसी तरह की वेश्यावृत्ति में रवि प्रकाश पहले से संलग्न है जबकि शशिप्रकाश समाज का दुश्मन है और उसके चंगुल से युवाओं को छुड़ाकर उन्हें पुनर्वास केंद्रों पर भेजा जाना चाहिए ताकि वे श्रम-प्रक्रिया से खुद को जोड़कर रहमदिल मनुष्य बन सकें। ————लाला शशिप्रकाश को अपने लँगड़े लौंडे को नेता बनाना था, इसके लिए जरूरी था कि या तो कॉ. मुकुल श्रीवास्तव लाला का जांबी बनना स्वीकार कर लेते या फिर उन्हें निकाल दिया जाता। दूसरे विकल्प पर अमल हुआ। लाला ने हम जैसे बकलोलों के आगे तर्क पेश कियाः चूँकि तराई में जारी आंदोलन का विफल होना तय है और वह आंदोलन किंचित खाते-पीते संगठित क्षेत्र के मज़दूरों द्वारा चलाया जा रहा है जबकि भारी आबादी दिहाड़ीदार है तो आंदोलन से पीठ दिखाकर भगा खड़ा होना चाहिए। —————लाला के जांबियों ने रोजगार के सवाल पर बिना मजदूरों को गोलियाने का उपक्रम किए उन्हें परम विद्वान बनाने की निरंतर भरसक कोशिश की है। लाला के जांबियों बताओ तुम्हारे जनसंगठन और उनका औपचारिक ढाँचा कहाँ है? मज़दूर वर्ग के किन संस्तरों में तुम्हारा काम है? —————मज़दूर बिगुल में कुल कितने लोग लिखते हैं और उसमें मज़दूर इलाकों से कितनी खबरें होती हैं जो इस बात का पता बताएं कि मज़दूरों में वाकई ये लोग धँसे हुए हैं। —————–लाला तेज दिमाग़ है लेकिन मेरी तरह के क्लीनिकली मानसिक रुग्ण की तुलना में भी बेहिसाब कायर है। लाला कहता है कि पूँजीवाद सिस्टमिक (सर्वांगीण) संकट का शिकार नहीं। समलैंगिक भँड़वे जरा यह तो बताना कि जब अपनी आंतरिक गति से ही पूँजीवाद को ढह जाना है तो जनता के पैसे से तुम क्यों पल रहे हो, बाजार में जाकर अपना श्रम क्यों नहीं बेचते? क्यों तुम्हारी अलशेसियन कुतिया जनता के पैसे से शॉफर-चालित कार से चलती है? ————–लाला जनता के भारी हिस्से की हालत भिखारी सदृश और उसकी चेतना के विघटित होने की बात कहता है। जब मेरे जैसा मामूली रूप से साक्षर व्यक्ति यह जान गया है, इस नतीजे पर पहुँच गया है कि जनता को समूहबद्ध करने से उसकी चेतना का स्तर उन्नत होगा तो लाला क्यों नहीं समझा? क्योंकि वह कायर-बेईमान और संपत्तिसंचयी है। ————–इतिहास तुम्हें इसी रूप में याद करेगा लाला शशिप्रकाश कि तुमने अपने लँगड़े लौंडे को सुपर-ह्यूमन बनाने के लिए सारे अपराध किए और अंततः उसे ऐसा मनोरोगी बना दिया जो तुम्हारी ही तरह आत्म-भव्यता का मारा हुआ है। किसान आंदोलन हो या संगठित क्षेत्र के मज़ूदरों का आंदोलन लाला ने संघर्ष में उतरने के विरोध में सैद्धांतिकी झाड़ी है। शुद्ध एनजीओवादी दल्ला लाला शशिप्रकाश पुराण संपन्नम।

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