नई शिक्षा नीति पूंजी के लिए शिक्षा के दरवाज़े खोलेगी

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“दुनिया को बदले का शिक्षा एक बहुत बड़ा हथियार है।” नेल्सन मंडेला की इस पंक्ति से हम शिक्षा की गंभीरता को समझ सकते हैं। वर्तमान में जारी शिक्षा नीति इस बदलाव लाने के प्रति कितना गंभीर है,आइये जानते हैं।

छात्रों-युवाओं और बुद्धिजीवियों के तमाम विरोध को दरकिनार करते हुए 29 जुलाई के दिन ‘नयी शिक्षा नीति 2020’ को मोदी सरकार के कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। कायदे से इस शिक्षा नीति को संसद के दोनों सदनों में पेश करके पास किया जाना था तभी यह कानून बनती लेकिन मोदी सरकार के चाल-चरित्रसे लगता है कि उसकी नौबत ही नहीं आने दी जायेगी। यह शिक्षा नीति शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी विनिवेश को घटायेगी और बड़ी पूंजी के लिए शिक्षा के दरवाज़े खोलेगी। व्यापक मेहनतकश जनता के बेटे-बेटियों के लिए शिक्षा प्राप्त करने के रास्ते और भी संकरे हो जायेंगे।
भारत में पहली शिक्षा नीति 1968 में आयी थी। आज़ादी के बाद से लेकर 68 तक शिक्षा की दिशा टाटा-बिड़ला प्लान से निर्देशित थी। इसके बाद दूसरी शिक्षा नीति 1986 में आयी जिसे 1992 में उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के मद्देनजर संशोधित किया गया ।तभी से शिक्षा के क्षेत्र में निजी पूंजी की घुसपैठ की परियोजना को अंजाम दिया गया तथा शिक्षा भी मुनाफ़ा कमाने का एक साधन बन गयी। अब सरकार तीसरी शिक्षा नीति को लेकर आन खड़ी हुई है।
इस नीति के ड्राफ्ट पढ़ने पर आपको यह पता चलेगा कि भारत देश के लिए यह एक आदर्श शिक्षा नीति का ड्राफ़्ट है। नीति में बहुत सारी ऐसी बातें लिखी गई है वो आपको काफ़ी प्रभावित करेंगे। जैसे इसमें लिखा गया है कि प्राइमरी की शिक्षा मातृ भाषा में दी जाएगी, दूसरी बात उच्च माध्यमिक या उच्च शिक्षा में विषय चुनने के लिए आर्ट्स(कला) और साइंस(विज्ञान) स्ट्रीम के बीच दीवार रूपी बटवारा नहीं रहेगा, विषय चुनने की आज़ादी रहेगी। शिक्षा पर जीडीपी का 6% खर्च किया जाएगा। यह सब सुझाव काफ़ी प्रगतिशील जान पड़ते हैं। लेक़िन वास्तविकता ठीक इसके उलट है। क्योंकि इन सब को लागू करने के लिए जो जरूरी है वो फंडिंग,इंफ्रास्ट्रक्चर, आदि को विकसित करने की कोई ठोस चर्चा नहीं है। जो इस समय की आर्थिक हालत है और सरकार की मंशा है, उसको देखते हुए बिल्कुल नहीं कहा जा सकता है कि इस नीति में कही बात उसी रूप में लागू की जाएगी। मैं सारी बातों को आगे एक-एक करके आपके रखूंगा आप स्वंय देखेंगे की यह नीति कितना जनता के हक़ में है। क्योंकि यह पूरी शिक्षा नीति विरोधाभासों से भी भरी हुई है। याद कीजिये वर्तमान प्रधानमंत्री जब चुनाव लड़ रहे थे,तो कहते थें “सौगंध है मुझे इस मिट्टी की मैं यह देश बिकने नहीं दूंगा” लेक़िन जब से यह सरकार सत्ता में आई है इसने लाल किला,एयर इंडिया,रेल,कोयला,और कई सारे सरकारी उपक्रमो को निजी कंपनियों के बेच दिया है या बेचने की तैयारी में है। ठीक यही सोच इस शिक्षा नीति को लोक-लुभावन बनने की पीछे है।
इस शिक्षा नीति लाने के मूल मकसद है नव-उदारवादी,गैर-लोकतांत्रिक और अति केंद्रिकित नीतियों को शिक्षा में भी बढ़वा देना। यह नीति सीधे-सीधे देश की बहुआयामी-संस्कृति पर हमला है,जिसमें संवैधानिक,धर्मनिपेक्षता,समता-समानता,बहुलतावाद व सामाजिक न्याय जैसे जरूरी मूल्यों का आभाव है। यह नीति पूरी तरह से “कॉरपोरेट और खास विचारधारा के हितों” का प्रतिनिधित्व करती हुई जान पड़ती है।
भारत में उच्च शिक्षा की रीढ़ “सरकारी अनुदान” यानी पब्लिक फंडेड सिस्टम पर टिकी है। क्योंकि देश की बहुसंख्यक आबादी इतनी सक्षम नहीं है कि वो मोटी फ़ीस देकर उच्च शिक्षा ग्रहण कर सके। लेक़िन इस नीति का सार यही कि शिक्षा ‘निजी’ हाथों में जाएगी। आप जब इस ड्राफ़्ट को पढेंगे तो पाएंगे की इसमें यह स्वीकार गया है कि बिना ‘सरकारी अनुदान’ के इतनी बड़ी आबादी को शिक्षा (खास करके उच्च शिक्षा) मुहैया नहीं कराया जा सकता है,इसमें शिक्षा के व्यवसायीकरण पर लगाम लगाने की बात लिखी है। इस तरह के लोक लुभवाने राय जाहिर की गई है, लेक़िन इसमें यह कहीं नहीं कहा गया है कि कोई अगर शिक्षा को मुनाफ़ा का जरिया बनाएगा तो उसके खिलाफ़ कानून बनाकर रोक लगाई जाएगी।

“यह नीति शिक्षा क्षेत्रों में निज़ी परोपकारी गतिविधिओं को पुनर्जीवित करने,सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करने और समर्थन करने की अनुशंसा करती है। कोई भी सार्वजनिक संस्थान शैक्षिक अनुभवों को बढ़ाने के लिए निजी परोपकारी धन जुटाने की दिशा में पहल कर सकता है।” (राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020)

एक आंकड़े के अनुसार देश में 39931 कॉलेजों में सिर्फ 22% ही सराकरी अनुदान से चलते हैं। आख़िरी 8 सालों में 351 नए विश्वविद्यालय खुले है/मंजूरी मिली है जिसमें से 199 निजी विश्वविद्यालय हैं। इस आंकड़े से हमें सरकार द्वारा बनाई गई नीति और उसके लागू करने की नियत को समझ जाना चाहिए। क्योंकि जो सरकार निजीकरण को ही अपना प्रमुख काम समझती है,उससे सार्वजनिक शिक्षा को बढ़ावा देने की कितनी उम्मीद की जा सकती है।
इसमें यूजीसी (UGC,विश्विद्यालय अनुदान आयोग) के जगह पर HECI (उच्च शिक्षा आयोग) होगा । अब तक UGC सरकारी दखल से स्वतंत्र होकर सभी विश्विद्यालयों को अनुदान देने का काम करती है। लेक़िन अब इसके जगह पर (HECI एक्ट -2018 के अनुसार) अनुदान देने का काम HEFA(हेफा,हायर एजुकेशन फाइनेंसिंग एजेंसी) के पास होगा,जो पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में होगी। यूजीसी द्वारा विश्विद्यालय की जरूरत के अनुसार बिना सरकारी दखल के अनुदान दिया जाता लेकिन हेफा के ज़रिए वि.वि (विश्वविद्यालय)को “लोन” दिया जाएगा जिसे बाद में वि.वि. को वापस करना होगा। सार्वजनिक विश्विद्यालयों को खुद से वित्त(फंड्स) इकट्ठा करने की मजबूर किया जाएगा, जिसका परिणाम फ़ीस वृद्धि,ठीकेदारी व्यवस्था,अस्थाई नियुक्तियां ,सेल्फ-फाइनेंस कोर्स,यूनिवर्सिटी कैंपस के अंदर कॉरपोरेट-कंपनियों को अपनी मॉल और दुकान खोलने की जगह देना आदि। इस तरह सार्वजानिक वि.वि. को मुनाफ़े रूपी कॉरपोरेट लॉजिक चलाने का की छूट दी जाएगी और अकादमिक कैंपस को भी बाज़ार का अड्डा बना दिया जाएगा। जवाहरलाल नेहरू वि.वि. समेत कई यूनिवर्सिटियों में फीस वृद्धि ,BHU एवं अन्य जगह में बड़े-बड़े कॉफी शॉप,व अस्थाई नियुक्तियां शुरू हो चुकी है।
इस नीति में मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम लागू करने की बात की गई है। आज अगर 4 साल इंजीनियरिंग पढ़ने या 6 सेमेस्टर का कोई भी स्नातक का कोर्स पढ़ने के दौरान किसी कारणवश (ज्यादातर कारण आर्थिक ही होता है) यदि कोई छात्र बीच में पढ़ाई छोड़ देता है, या छूट जाती है तो उसकी डिग्री पूरी नहीं होने पाती है, लेकिन इस मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम के जरिये उसे 1 साल के बाद सर्टिफिकेट, 2 साल के बाद डिप्लोमा की डिग्री मिल जाएगी। बाकी 3-4 साल पूरा करने पर ही उसको इंजीनिरिंग/स्नातक की पूर्ण डिग्री मिलेगी। इसे स्टूडेंट्स के हित में एक बड़ा फैसला बता कर ढोल पीटा जा रहा है,कि डिग्री पूरा न करने पर भी छात्रों को 1 साल वाली सर्टिफिकेट कोर्स और 2 साल वाली डिप्लोमा की डिग्री के जरिये नौकरी मिल जायेगी। लेक़िन हम आये दिन देख रहे हैं कि हर साल इंजीनिरिंग/स्नातक की डिग्री लेकर लाखों छात्र बेरोजगारों की भीड़ में शामिल हो रहे हैं। फिर इस तरह के सिस्टम से छात्रों का क्या लाभ होगा? यह सिर्फ़ छात्र-छात्राओं के साथ मज़ाक किया जा रहा है। इस सिस्टम को लाकर सरकार यह बात साफ-साफ कह रही है कि वो छात्रों को पढ़ने के लिए कोई अनुदान या बजट देने के पक्ष में नहीं है क्योंकि वो यह भी नहीं चाहती है अगर कोई छात्र किसी तरह स्नातक में दाखिल ले भी तो आर्थिक दिक्कतें होने पर सरकार उसकी पढ़ाई पूरी करवायेगी। बल्कि वो तो 1 और 2 साल में ही डिग्री देकर कॉलेजों और यूनिवर्सिटीयो से भागना चाहती है।
आगे यह नीति शोध पर नया आयोग गठन करने की बात करती है। “राष्ट्रीय अनुसंधान फाऊंडेशन”(NRF) की स्थापना कर उच्च शिक्षा में शोध को अलग से रेगुलेट करने की बात है। जो की सरकारी कंट्रोल में शोध कार्य को लेने की कोशिश है। यह अनुसंधान बनाने की पीछे मकसद यही है कि अब शोध कार्य का केंद्रिकित करना। साथ ही साथ इस फाउंडेशन का काम होगा यह बताना की किस पर शोध किया जाय और किस पर नहीं। यह सीधे-सीधे शोध कार्य में लोकतांत्रिक जगह को खत्म करना है। जहां शोध विषय चुनने की जो आज़ादी सुपरवाइजर व शोध छात्र की होती थी,उसे भी अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के द्वारा नियंत्रित किया जाएगा। इस फाउंडेशन का गठन शोध को गुणवत्ता को न सुधारकर इसके उलट पूंजीपतियों की जरूरत के अनुसार ढालने की कोशिश की जा रही है। यह नीति बेशर्मी से सिफारिश करती है कि उद्योग की जरूरतों के अनुसार शोध किये जायें, यानी पूँजीपति वर्ग के मुनाफे को बढ़ाने के लिए शोध किये जायें, और जो पूंजीपतियों के मुनाफे के अनुकूल होगा सिर्फ़ उन्हीं को फंडिंग की जाए।
शोध क्षेत्र में एक बड़ा हमला एमफिल को खत्म करना है। इसका मतलब अब एम.ए. के बाद सीधे छात्र पीएचडी में एडमिशन के लिए अप्लाई करेगा। सुनने में अच्छा लगने वाला ये फैसला भी छात्र और शोध विरोधी है। पहला तो इसके लागू होने के बाद देश में एमफिल की लाखों सीटें खत्म कर दी जाएंगी। जिससे लाखो में छात्र प्रभावित होंगे।दूसरी तरफ हर संस्थान में पीएचडी की सीटों की संख्या बेहद कम है जिसके चलते एम.ए. के बाद पीएचडी में एडमिशन ना मिल पाने की स्तिथि में छात्र या तो पढ़ाई छोड़ देगा या फिर तैयारी करते हुए अपने साल बर्बाद करेगा। इससे पहले छात्र एमफिल में एडमिशन लेता था जिससे उसे शोध का भी अनुभव प्राप्त होता था। परंतु अब एमफिल न रहने पर ये छात्र क्या करेगें?
इसी तरह अकादमिक और प्रशासनिक स्वायत्तता का हवाला देते हुए उच्च शिक्षा संस्थानों को स्वायत्तता देकर,उसके संचालन के लिए बोर्ड ऑफ गवर्नर(BoG)के गठन करने का सुझाव है। इस BoG में सारे सदस्य मनोनीत होंगे,जिसमे अधिकतर ऐसे होंगे जिनका अकादमिक जगत से ज्यादा लेना देना नही होगा। अब तक उच्च शिक्षण संस्थानों में चुने हुए प्रतिनिधि और लगभग अकादमिक संस्थाओं के शिक्षक व छात्र ही होते थे। लेकिन
इस ‘बोर्ड ऑफ गवर्नर’ की प्रणाली से अब एकतरफा सरकारी नियंत्रण को और अधिक कड़ा करने की साज़िश है। क्योंकि इस बॉडी को मनमानी फीस तय करने, अपने जरूरत के अनुसार पाठ्यक्रम बनाने,अपने पसंद के शिक्षकों की नियुक्ति करने आदि करने की पूरी छूट मिलेगी।जाहिर जब बोर्ड में बैठने और उसमें प्राइवेट निवेश करने उद्योगपति होंगे तो, सब कुछ उनके व्यपार के जरूरत के अनुसार तय होगा। इस तरह सार्वजनिक उच्च शिक्षण संस्थानों में बची-खुची स्वायतत्ता और जनवाद को भी इन बोर्डों द्वारा सीमित और खत्म किया जाएगा।
इसमें शिक्षकों की स्थाई नौकरी के लिए लंबे और कठिन प्रावधानों की सिफारिश की गई है। जिसके अनुसार सभी शिक्षकों को पहले 5 वर्ष तक प्रोबेशन पीरियड से गुजरना होगा और उसके बाद अलग-अलग पहलुओं से मूल्यांकन में संतुष्ट पाए जाने के बाद ही स्थायी नौकरी पाने की बात की गई है,जिसकी भी कोई गारंटी नहीं है। जाहिर है यह शिक्षकों के अकादमिक और गैर-अकादमिक स्वतंत्रता पर लगाम लगाने की पहल है। जिसका सीधा प्रभाव अकादमिक शिक्षा और छात्रों पर पड़ेगा। जब शिक्षक ही पूर्ण रूप से अपने नौकरी को लेकर असमंजस में होगा तो वो कैसे छात्र-छात्राओं को पूरे मन से पढ़ा पायेगा।
यह भी कहा गया है कि उच्च शिक्षा में भारत 2035 तक 50 प्रतिशत नामांकन हासिल करेगा। लेकिन इस के लिए संसाधन बढ़ाने के बजाए ऑनलाइन कोर्स चलाकर इस लक्ष्य को हासिल करने की बात की गई है। स्पष्ट है कि ऑनलाइन क्लास के जरिए शिक्षा को पूंजीपतियों की चारागाह बनाने की प्रक्रिया को ही आगे बढ़ाया जाएगा। जिसका ताज़ा उदाहरण अभी हम इस लॉकडाउन में देख सकते हैं। इस आपदा में ऑनलाइन शिक्षा का कारोबार आसमान छू रहा है। यही कारण है कि पूरी दुनिया और देश भर के कॉर्पोरेट घरानों की नज़र भारत पर है क्योंकि भविष्य में यहां ऑनलाइन शिक्षा का कारोबार काफ़ी बड़ा होने की उम्मीद है। ज़ाहिर की बात है औपचारिक शिक्षा का कोई विकल्प नहीं हो सकता,ज्ञान उत्पादन की जो प्रक्रिया है वो केवल और केवल औपचारिक शिक्षा के जरिये ही हाशिल कि जा सकती है। होना यह चाहिए था की औपचारिक शिक्षा को और सुदृढ बनाने में ऑनलाइन पद्धति का सहयोग लिया जाये। लेक़िन पूरी तरह शिक्षा को ही ऑनलाइन कर देना,ज्ञान प्राप्त करने के प्रक्रिया को समाप्त कर देना है। ऑनलाइन शिक्षा किसी का मुनाफ़ा का जरिया तो हो सकता है लेकिन ज्ञान प्राप्त करने का साधन कभी नहीं हो सकता है।
नेप में जगह-जगह “भारत का ज्ञान” की चर्चा की गई है जिसके तहत भारत के प्राचीन को गौरवान्वित करते हुए शिक्षा में शामिल करने की बात की गई है। इस अनुशंसा से शिक्षा को बदलाव का जरिया न बनने देकर उसके भगवाकरण को और ऊँचाई पर ले जाने का भरसक प्रयास है। अब नेप के जरिए दीना नाथ बत्रा की पुस्तकों जैसे पाठ्यक्रम को पूरे देश में लागू करने का प्रयास किया जाएगा,जो पूरी तरह अवैज्ञानिक और तथ्यों से परे है। खैर इस तरह के पाठ्यक्रम को लागू करने के लिए सरकार को किसी नेप की अनुशंसा की जरूरत नहीं है। वही
CBSE के कक्षा 9-12 तक के पाठ्यक्रम से नागरितकता,राष्ट्रीयता,डार्विन की थ्योरी ऑफ एवोल्यूशन, धर्मनिपेक्षता,पर्यावरण से जुड़े पाठ व सरकार का संघीय ढांचा आदि पाठ को बिना किसी नेप(NEP) जैसी अनुशंसा के हटा दिया गया। नेप के बिना भी यह सरकार लंबे समय से शिक्षा में ऐसे ही बदलाव कर रही है। जब हम भारत के इतिहास की बात करते हैं तो उसमें हमारा सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही शामिल है। केवल सकारात्मक या अति महानता का पाठ छात्रों को सच्चाई से दूर ले जाता है। ऐसे इतिहासबोध से तैयार हुआ छात्र इतिहास की गोद से वर्तमान में आ रही समस्याओं का सामना नहीं कर सकता। परन्तु यह सरकार अति महानता का पाठ पढ़ाकर छात्रों को सच्चाई से दूर रखना चाहती है।
वही इसमें सामाजिक न्याय व आरक्षण जैसी सबसे जरूरी पहलू पर जान बूझकर नहीं बात की गई है। क्योंकि यह सरकार चाहती ही नहीं है को सामाजिक रूप से पिछडे दलित एवं अन्य जातियों के बच्चे उच्च शिक्षा में आएं। इसलिए उन्होंने आरक्षण जैसे मूलभूत पहलू पर बात न की है। जिसका सीधा मतलब है कि की वो आरक्षण ख़त्म करना चाहती है। दूसरी तरह यह भी एक सच्चाई ही हैं कि बढ़ते निजीकरण और आसमान छूती यूनिवर्सिटीओ की फ़ीस अप्रत्यक्ष रूप आरक्षण को पंगु बना देंगे। ख़ैर फिर भी इस आरक्षण जैसी व्यवस्था के माध्यम गिने चुने मेहनतकशों के बच्चें उच्च शिक्षा पहुँच तो जाते थें। जिसकी अब पूरी तरह गुंजाइस ख़त्म कर देने की नीति है।
शिक्षकों, संसाधनों के अभाव से दम तोड़ रहे स्कूलों के लिए संसाधन और शिक्षकों की व्यवस्था करने के कोई गंभीर प्लान की बात नहीं है। क्योंकि ASER 2016 की एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे भारत में 9 लाख प्राथमिक विद्यालय शिक्षकों के पढ़ खाली थें और वही इस से ऊपर की कक्षाओं में 1 लाख से ऊपर शिक्षक की कमी थी। पूरे देश में 1 लाख ऐसे प्राथमिक ऐसे स्कूल हैं जहां सिर्फ़ 1 शिक्षक हैं। दूसरी तरफ कक्षा 10 और 12 कि बात तो छोड़ दीजिए नेप कक्षा 3, 5 व 8 को भी डिस्टेंस लर्निंग (दूरस्थ शिक्षा) में शामिल करने की अनुशंसा करती है। यह बात समझना बिल्कुल भी कठिन नहीं है कि सरकार शिक्षा में खर्च बढ़ाने, औपचारिक शिक्षा के लिये ढाँचा खड़ा करने के स्थान पर प्राथमिक शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र को भी डिस्टेन्स लर्निंग के हवाले करने की मंशा रखती है।
इस नीति में मातृ भाषा में शिक्षा दिए जाने की अनुसंशा को लेकर काफ़ी प्रशंसा हो रही है और तर्क दिया जा रहा है कि अपनी भाषा में शिक्षा से आत्मनिर्भरता आएगी, अपनी संस्कृति का बोध होगा, और हम क्या हैं यह एहसास होगा। पाँचवीं तक की स्थानीय और हिंदी भाषा में शिक्षा प्राप्त करके पांच साल का बच्चा आत्मनिर्भर हो जाएगा, क्या ग़ज़ब का तर्क है! क्या इस नई शिक्षा नीति में इंजीनियरिंग, मेडिकल और कानून की शिक्षा भी हिंदी या अन्य स्थानिए भाषा में दिए जाने का प्रावधान है? और निजी क्षेत्र के स्कूलों में किस माध्यम से पढ़ाया जाएगा? ऐसे तमाम सवाल हैं, जिन पर चर्चा करना करना भी जरूरी है।

ऐसा नहीं है कि इससे पहले की जो शिक्षा नीति या व्यवस्था थी वो पूरी तरह से आम जनता के अनुकूल थी। पिछली शिक्षा व्यवस्था में भी सभी वर्गों तक शिक्षा की पहुँच नहीं थी। लेक़िन बहुत कुछ तो नहीं लेकिन ऐसा टूटा फूटा ढांचा जरूर था जहां आप खड़े होकर लड़ाई लड़ कर कुछ हाशिल कर सकते थें। जो की जनता के काफ़ी लम्बे संघर्षो के बाद मिला था। लेक़िन इस नीति में, पहले की बनी बनाई टूटी-फूटी लोकतांत्रिक ढांचा को भी खत्म करने की अनुशंसा है। इसलिए हमें तो इस नीति का मुखर होकर विरोध तो करना ही चाहिए साथ ही साथ यह भी मांग होनी चाहिए की ‘”केजी से पीजी “‘ तक सबको निःशुल्क शिक्षा दिया जाय। इस नारे के साथ की – राष्ट्रपति या चपरासी की हो संतान, सबको शिक्षा एक समान!

अनुपम
भगत सिंह छात्र मोर्चा,बनारस।
शोध छात्र- काशी हिन्दू विश्विद्यालय।

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