मज़दूर साथियों को यूनियन की बेहद ज़रूरत है

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वाराणसीः सूरत, पटना और बनारस के मज़दूरों ने ऑनलाइन मीटिंग करके इस मसले पर बातचीत की कि कैसे मज़दूर यूनियन से जुड़कर नौकरी-रोजगार छूटने और कोरोना जैसी आफत-विपत आने की सूरत में खुद को असहाय-निरुपाय होने से बचाए।
साथी नरेंद्रः नज़दूर-राज लाने के लिए संघर्षरत ताकतें अपनी राजनीतिक कमजोरी के चलते कोरोना-काल में देशभर में मज़दूरों को प्रभावी राहत-सहायता उपलब्ध कराने में विफल रहीं। मज़दूरों की वास्तविक जिंदगी में यह बात दर्ज ही नहीं हो पाई कि उनका भी कोई माई-बाप है, जो उनसे प्यार करता है, उनसे सरोकार रखता है। सभी मज़दूरों के पास उनकी अपनी जिंदगी से जुड़े बेहद कटु और दहला देने वाले अनुभव हैं कि कोरोना काल में जो अप्रत्याशित हालात पैदा हुए थे, उससे वे अपने स्वयं के प्रयासों से कितनी मुश्किल से उबरे थे और उन्हें क्या-कुछ नहीं झेलना पड़ा था। देश के समस्त फैक्टरी इलाकों-काम करने की जगहों पर लाल झंडे वालों की अगर यूनियनें होतीं और आपस में उनमें तालमेल होता तो सारे मज़दूर सरकार से बस रोटी मांगने के लिए एक जगह बैठ जाते तो बहुत बड़ा काम हो जाता, उन्हें अपनी ताकत का अंदाजा हो जाता। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।
साथी सागरः मुंबई से सूरत जाकर वहाँ के मज़दूरों के बीच यूनियन बनाने और उसमें शामिल होने की अलख जगाने के क्रम में कहा कि मज़दूर साथियों को पता करना होगा कि मज़दूर अगर किसी कारण से पाँच दिन काम नहीं कर पाया तो उसका कितना नुकसान होता है और सेठ का कितना नुकसान होता है। एक बार मज़दूर जब इस गणित को समझ लेगा तो उसे अपनी ताकत का अंदाजा हो जाएगा। इसके साथ ही मज़दूर साथियों को यह भी जानने की कोशिश करनी चाहिए कि कपड़ा बनने के बाद कहाँ जाता है क्योंकि अगर वह रंगाई के लिए जाता है तो वहाँ पर भी तो हमारे जैसे मज़दूर ही काम पर लगते होंगे और हमें उनके साथ भी एकता बनाने की कोशिश करनी चाहिए।
साथी इंद्रजीतः राजेंद्र नगर स्टेशन के पास ही पटना में बिहार निर्माण व असंगठित मज़दूर यूनियन का कार्यालय है, कहीं के भी मज़दूर साथी जरूरत पड़ने पर यूनियन के ऑफिस में रुक सकते हैं। भोजन कर सकते हैं और बातचीत कर सकते हैं।
साथी वंदना चौबेः मैं यहाँ बीएचयू में पढ़ाती हूँ और जानती हूँ कि पढ़े-लिखे बच्चे भी रोजगार को लेकर किस तरह से परेशान हैं। हम लोग भी सूरत के मज़दूर साथियों से मिलना चाहेंगे, उन्हें सुनना चाहेंगे और चाहेंगे कि वे आपस में मिल-बैठकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करें। मज़दूर साथियों को यूनियन की बेहद ज़रूरत है। ये जुटने को बिल्कुल तैयार हैं बशर्ते सही तरीके से धैर्य से उनको जोड़े और सही रास्ते से आंदोलन में उतारें
कामता प्रसादः सूरत घूमने के बाद बोध के स्तर पर यह बात समझ में आई कि प्रवासी मज़दूरों को किसी न किसी यूनियन से जुड़ा हुआ होना चाहिए। जिससे उनके अंदर आशा का संचार हो। रूसी उपन्यासकार माक्सिम गोर्की के कालजयी उपन्यास के हर पन्ने मज़दूरों से गहन सरोकार के साथ उनकी जिंदगी का वर्णन किया गया है। फैक्टरी इलाकों में काम करने वालों में उपन्यास के हर पात्र में अपने अगल-बगल के लोग दिखाई देंगे। पूँजीवादी समाज में मज़दूरों की जिंदगी बेहद मुश्किल है और जब मज़दूर जिंदगी को आसान नहीं बना पाते तो थक-हारकर शराब का सहारा लेने लगते हैं।

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