नक्सलवादी किसान विद्रोह के मूल्यांकन का प्रश्नः स्वदेश सिन्हा

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एक चलते हुए आंदोलन के बारे में लिखना बहुत कठिन होता है, विशेष रूप से ‘नक्सलवादी किसान विद्रोह के बारे में इसके सटीक मूल्यांकन में बड़ी समस्या यह है की या तो इसके समर्थक बहुत भावुक हो कर इसका मूल्यांकन करते है, या विरोधी बहुत ही नफरत से, ये चीजे किसी भी परिघटना के सम्रग विश्लेषण में बाधा उत्पन्न करती हैं। दूसरी जरुरी बात यह है की यह आंदोलन आज खंड खंड होकर सैकड़ों टुकड़े में बटा हुआ है, तथा सभी की इस आंदोलन के बारे में अपनी अलग अलग राय है। नक्सलबाड़ी आंदोलन पर जो पुस्तकें लिखी गई जिसमें’ विप्लव दास गुप्त’ की ‘ नक्सलवादी आनंदोलन’ प्रो मनोरंजन मोहंती की पुस्तक हो अथवा ‘ अभय कुमार दूबे ‘की पुस्तक हो सभी ने अपनी संगठनिक वैचारिक प्रतिबद्धता से इसका मूल्यांकन किया है। लेकिन इस बात पर किसी को मतभेद नहीं है की आज से 55 वर्ष पहले पश्चिमी बंगाल के दार्जिलिंग जिले के ‘ नक्सलबाड़ी प्रखंड में जो घटना घटित हुई थी, वह ना केवल अपने देश में बल्कि सारे दक्षिण पूर्व एशिया में भी एक महत्वपूर्ण घटना होने वाली थी। इस घटना ने ना केवल भारत में बल्कि इसके पडो़सी देशों नेपाल पश्चिम पाकिस्तान जो आज का बंगला देश है, इसके अलावा पाकिस्तान के बलूचिस्तान तथा श्रीलंका के भी वामपंथी आंदोलन पर जबरदस्त प्रभाव पड़ा, तथा सभी जगहों पर कम्युनिस्ट पार्टियों ‘ क्रांति कारी ‘ या’ संशोधनवादी’ के आधारों पर बट गयी थी। वास्तव में इस आंदोलन पर वैश्विक हालतों का भी बड़ा योगदान है। 70 के दशक आंदोलनों का दशक था, अमेरिका में अमेरिका की वियतनाम में जारी भारी बर्बरता के खिलाफ आंदोलन चल रहे थे, साथ ही में वहाँ ‘ नारी मुक्ति’ तथा काले अमेरिकी लोगों के ख़िलाफ़ नस्ल भेद को लेकर भी व्यापक आंदोलन चल रहे थे। इसके अलावा श्रीलंका तथा दक्षिण पूर्व एशिया के अनेक देशों में हथियार बंद वामपंथी आंदोलन चल रहें थे। अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका भी संघर्षों के केन्द्र बने हुए थे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी की चीन और सोवियत संघ में ‘ संशोधनवाद बनाम क्रांतिकारी दिशा’ पर महत्वपूर्ण बहस चल रही थी इससब का भी व्यापक प्रभाव इस आंदोलन के फूट पड़ने पर पड़ा।’ पेकिंग रेडियो ‘ ने ” भारत में बसंत का ब्रजनाद” कार्यक्रम पेश करके ‘ चारु मजूमदार’ तथा उस इलाके उनके अन्य नेताओं जैसे’ जंगल संथाल, कानू सान्याल तथा सौरोनबसु जैसौ को रातोरात ‘ नक्सलबाड़ी प्रखंड’ के मामूली कम्युनिस्ट नेताओं को वैश्विक नेताओं में बदल दिया था।
नक्सलबाड़ी आंदोलन का महत्व इसबात में है की इसने कम्युनिस्ट आंदोलन में’ क्रांति कारी बनाम संशोधनवाद ‘ के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खींच दी थी। बाद में आंदोलन को व्यापक पराजयों का समाना करना पड़ा केवल कलकत्ता में ही सड़कों पर हजारों नौजवानों को घसीट कर मार दिया गया, वे बंगाल के ‘क्रीम’ थे, इस कारण से बंगाल के बौद्धिक समाज में जो शून्यता पैदा हुई वह आज तक भरी ना जा सकी है। बाद के दौर में इस आंदोलन के सबसे वरिष्ठ नेता तथा नवगठित सीपीआई (माले) के महासचिव ‘चारुमजूमदार ‘ गिरफ्तार कर लिए गए तथा पुलिस थाने के ‘लाकप ‘मे विवादास्पद हालातों में उनकी मौत हो गई! नक्सलबाड़ी आंदोलन में चारुमजूमदार के भूमिका का सटीक विश्लेषण करने में अकसर आज भी नक्सलबाड़ी आंदोलन से निकले अधिकांश ग्रुप बचते हैं, लेकिन इसका कारण वैज्ञानिक न होकर भावनात्मक अधिक है। उनके ढेरों प्रसंशक मानते हैं की ‘ अगर चारुमजूमदार ना होतें तो नक्सलबाड़ी भी नहीं होता, यह बात काफी हद तक सही भी है, संशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिकाओं से कोई इनकार नहीं कर सकता है, परन्तु यह भी सत्य है की विचारधारा की लड़ाई भावनाओं से नहीं बल्कि’ वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ से तय होती हैं, नक्सलबाड़ी या मजुमदार का मूल्यांकन भावनाओं से उपर उठकर इन्हें कसौटियों से ही हो सकता है।
अपने प्रारंभिक समय में चारुमजूमदार एक क्रांतिकारी थे लेकिन आंतकवादी कार्य दिशा पर एक जनवादी क्रांतिकारी लाईन ना लागू कर पाने के कारण वे जल्दी ही एक ‘ मध्यवर्गीय आतंकवादी’ में बदल गए। बाद की उनकी कार्यविधियों से यह बात और स्पष्ट हो जाती है। आंध्र प्रदेश के ‘नागी रेड्डी’ जैसे अनेक नेता आंध्र प्रदेश में आंतकवादी लाईन की जगह जन आंदोलन की लाइन लागू करना चाहते थे लेकिन चारुमजूमदार ने कमेटी मे जोड़ तोड़ और तिकड़म करके वहाँ अपनी लाईन लागू की जो बाद में व्यापक पुलिस दमन तथा पार्टी के व्यापक विनाश का कारण बनी। इसके अलावा बंगाल में उनकी लाईन के अनुसार बंगाली पुनर्जागरण के नायकों को प्रतिक्रियावादी घोषित करके बंगाल विशेष रूप से कलकत्ता में उनकी मूर्तियों को तोड़ने का जो अभियान चलाया गया, उससे बंगाल का मध्यवर्ग में नक्सलवादियों के प्रति नफरत पैदा हुई, पार्टी में इसका भारी विरोध हुआ पर चारुमजूमदार ने किसी की बात नहीं मानी और विरोध करने वालों को अलगाव में डाल दिया, इसका व्यापक प्रभाव संगठन पर पड़ा और ढेरों लोग उनसे अलग भी हो गयें। एक सबसे खतरनाक बात यह हुई की ‘ सौरोन बसु’ के नेतृत्व में नक्सलवादियों का एक प्रतिनिधिमण्डल चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से मिलने चीन गया वहां कम्युनिस्ट पार्टी के अनेक नेताओं के साथ साथ ‘चाउ एन लाई’ तथा ‘ लिनपीआवो’ से भी मिला उनसब ने कहा की ” आपलोग तुरंत आंतकवादी लाइन ” त्याग कर जन आंदोलन करे तथा मजदूर और किसानों में काम करे” इसे चीनी पार्टी के दस्तावेज के नाम से जाना जाता है। सौरोन बसु इसके बारे में बतलाते हैं ” चारुमजूमदार ने जब यह दस्तावेज पढा तो वे बेहोश हो गये, उन्होंने तुरंत इसे नष्ट करने को कहा” सौरोन बसु ने नष्ट करने से पहले इसकी एक और कापी कर ली थी, जो बाद में सामने आई। यह एक अक्षम्य अपराध था, जिसने करीब करीब सारी पार्टी को नष्ट कर दिया था।
आज करीब करीब सारे ही ग्रुपों ने चारुमजूमदार की आंतकवादी कार्य दिशा से नाता तोड़ लिया है, केवल ‘ भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ( माओवादी) को छोड़कर उसकी कुछ चर्चा हम अलग से आगे करेगें।
जिन ग्रुपों ने आंतकवादी लाइन छोड़ी उन्होंने इसे मजबूरी में इसे छोडा़ क्योंकि अब ऐसे हालत बन गए थे की वे उसे चला नहीं सकते थे। इन्होंने कभी अपने दस्तावेजों में चारुमजूमदार की आंतकवादी लाइन की सम्रंग राजनैतिक आलोचना नही की, कुछ लोगों की भी तो बहुत ” दबे जबान ” से! वास्तव में हमे यह भी ध्यान रखना चाहिए की आंतकवाद की राजनैतिक लाइन के अलावा एक सांगठनिक लाइन भी होती है। इस लाइन को लागू करने वाले नेतृत्व में अपनी बातों को लागू करने की बहुत जल्दी पड़ी रहती है, इसलिए वह जोड़ तोड़ तिकड़म करता है, पार्टी कमेटियों मे “अपना एक गुट” बनाता है, विरोधी विचारों के लोगों को अलगाव में डालने के लिए वह उनका चरित्र हनन तथा विभिन्न तरीकों के कृत्सा प्रचार तक करता है। मैं खुद वर्षों तक इसीतरह के एक ग्रुप में शामिल रहा तथा इसतरह की बातों से रोजबरोज दो चार होता रहता था। बाद में इन्हीं कारणों से यह संगठन भी टूट फूटकर खंड खंड में बट गया। 90 के दशक के बाद जो विभिन्न ग्रुपों में टूट फूट हुई उसके पीछे कमोबेश यही कारण थे हांलाकि इसके पीछे वैचारिक कारणों की तलाश की जाती रही जो बिलकुल गलत थी ।
अब थोड़ी सी बातें ” भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ( माओवादी) “के बारे में यह आज भी भारत का सबसे बड़ा संगठन है, जो अभी भी चारुमजूमदार की आंतकवादी वादी कार्यदिशा से दृढ़ता से जुड़ा है, हालांकि उसनें भी कभी भी इस लाइन का कोई मूल्यांकन नहीं किया यधपि वह ना तो चारुमजूमदार को या अपने को आतंकवादी मानता है। देश के अनेक दुर्गम तथा जंगली इलाकों में जैसे छत्तीसगढ़ महाराष्ट्र मध्यप्रदेश उडीसा तथा मध्यप्रदेश के इलाकों में आदिवासियों के बीच में कार्यरत हैं। इन इलाकों में आदिवासी भयानक रूप से शोषण के शिकार हैं, देशी- विदेशी समराज्यवादियो का गिरोह उन्हें अपने जंगल जल और जमीन से महरूम कर रहा है, माओवादी उनके लिए लड़ तो रहे हैं परंतु समाजवाद की एक लंबी यात्रा के लिए उनके पास सम्रग दृष्टिकोण का भारी अभाव है, उनका साहित्य बुर्जुआ मानवतावादी बातों से भरा है। देश में करीब 80% आबादी मजदूरों और किसानों की है उनको देश की मुख्य भूमि पर संगठित किये बिना आप समाजवाद के लिए संघर्ष कर ही नहीं सकते हैं। माओवादियों ने उत्तर प्रदेश बिहार , दिल्ली तथा देश के दक्षिणी इलाकों तक में छात्र संगठन तथा दलित संगठन बना कर कुछ जन कार्यवाही की भी की शुरूआत की है लेकिन हर जगह ” जंगल ” ही दिमाग पर हावी होने के कारण वे कुछ नहीं कर पा रहे हैं। एक उदाहरण से यह बात आसानी से समझ में आ जायेगी। हमारे अनेक मित्र माओवादी संगठन में गयें वे बाकायदा संगठन के ” होलटाईमर ” बनकर भूमिगत रुप से काम करने लगे। यधपि इसमें से कोई भी कभी किसी हिंसक कार्यवाहियों मे शामिल नहीं हुआ अनेक केवल अपना नाम बदल कर पत्रकारिता या अध्यापन आदि का काम करते रहे, परन्तु पार्टी का ढा़ंचा भूमिगत होने के कारण वे भी भूमिगत रहकर जन कार्यवाहियां करते रहे, इनमें से अनेक जब गिरफ्तार हुए तो मीडिया में खुब शोरगुल हुआ उन्हें भयानक आतंकवादी के रूप में चित्रित किया गया, वे लोग कुछ वर्षों तक जेल में रहने के बाद हिसक गतिविधियों में शामिल होने के सबूत न मिलने के कारण रिहा कर दिए गए। लेकिन कयी लोगों को जेल में लंबी सजा काटनी पडी़ , लेकिन जमानत सभी को मिल गई। अब यही लोग अपने नाम से छात्र तथा मनवाधिकार संगठन बना कर कामकर रहे हैं। अब आप खुद समझ सकते हैं कि ये लोग अब दलित तथा छात्र संगठनों में क्या नेतृत्व देगें ?? गिरफ्तारी और रिहाई के बाद जब एक कार्यकर्ता भूमिगत से खुले जन संगठन में काम करने लगे तो क्या वह मजबूरी में काम कर रहा है? अगर यह संगठन की लाइन है , तो यह कितनी दिवालिया लाइन है? माओवादियों के निजी त्याग बलिदान से कोई इन्कार नहीं कर सकता है, परन्तु अगर आप की लाइन ही दिवालिया हैं तो आपका ” महान बलिदान ” कि कोई कीमत नहीं है।
अब चाहे माओवादी हो या सैकड़ों टुकड़ों में बटे क्रांतिकारी कम्युनिस्ट संगठन और ग्रुप अगर नक्सलबाड़ी की चारुमजूमदार की आतंकवादी लाइन की खुलकर सार्वजनिक आलोचना नही करेंगे तथा अपने अपने संगठनों में आतंकवाद के सांगठनिक आधारों पर हमला नहीं करेंगे, इनका टूट फूट कर बिखरना तथा संपूर्ण विलोपन की और बढना इनकी नियति है।
नक्सलबाड़ी आंदोलन की 52 वी बरसी पर यह छोटा सा लेख हमने बहस के लिए रखा है, अगर आप को यह इस योग्य लगे तो बहस में अवश्य भागीदारी करें।
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