मनुष्य की प्रकृति

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लेखकः एरिक फ्रॉम
अनुवादः प्रणव एन

1 मानवीय प्रकृति की अवधारणा
अपने कई समकालीन समाजशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों के विपरीत मार्क्स ऐसा नहीं मानते थे कि मनुष्य की प्रकृति जैसी कोई चीज नहीं होती; कि जन्म के समय मनुष्य कोरे कागज जैसा होता है जिस पर संस्कृति अपना पाठ लिखती है। इस समाजशास्त्रीय सापेक्षता के उलट मार्क्स ने इस विचार के साथ शुरुआत की कि मनुष्य एक पहचाने जाने लायक और जांचे जाने लायक अस्तित्व है; कि मनुष्य न केवल जैविक, शारीरिक और दैहिक रूप में बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है।
बेशक, मार्क्स यह मानने के लालच में कभी नहीं पड़े कि ‘मानवीय प्रकृति’ अपने समकालीन समाज में प्रचलित मानव प्रकृति के व्यक्त होने वाले खास रूप के समतुल्य होती है। बेंथम के खिलाफ दलील देते हुए मार्क्स कहते हैः किसी कुत्ते के लिए क्या उपयोगी है यह जानने के लिए हमें कुत्ते की प्रकृति का अध्ययन करना होता है। इस प्रकृति के बारे में कोई निष्कर्ष उपयोगिता के सिद्धांत से नहीं निकाला जा सकता। इसी बात को मनुष्यों पर लागू किया जाए तो जो भी तमाम मानवीय गतिविधियों, उनके कार्यों और रिश्तों आदि की उपयोगिता के सिद्धांत के आधार पर आलोचना करता है, उसे चाहिए कि पहले यह पता करे कि समान्य तौर पर मानवीय प्रकृति कैसी होती है, उसके बाद ही यह देखे कि हर ऐतिहासिक युग में उसमें किस तरह के बदलाव आए। यह बात नोट की जानी चाहिए कि मानवीय प्रकृति की यह अवधारणा मार्क्स के लिए और हीगल के लिए भी कोई अमूर्त चीज नहीं थी। उसके ऐतिहासिक दौर के विभिन्न स्वरूपों के विपरीत यह मनुष्य का सत्व है और जैसा कि मार्क्स ने कहा है, ‘मनुष्य का सत्व प्रत्येक अलग-अलग व्यक्ति से निकाली हुई कल्पना नहीं है।’ यह कहना भी जरूरी है कि ‘बूढ़े मार्क्स’ द्वारा कैपिटल में लिखा यह वाक्य मनुष्य के सत्व की इस अवधारणा की निरंतरता को दर्शाता है जिसके बारे में युवा मार्क्स ने ‘आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियां’ में लिखा था। आगे चलकर उन्होंने कभी अमूर्त और अनैतिहासिक होने के संदर्भ में सत्व (एसेंस) शब्द का इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने हमेशा ‘आम तौर पर मानवीय प्रकृति’ और हर ऐतिहासिक दौर के हिसाब से ‘अनुकूलित मानवीय प्रकृति’ का भेद करते हए सत्व की अवधारणा का ऐतिहासिक संदर्भ बनाए रखा।
आम तौर पर मानवीय प्रकृति और हर संस्कृति में मानवीय प्रकृति की खास अभिव्यक्ति में अंतर के मद्देनजर मार्क्स, जैसा कि हम पहले भी कह चुके हैं, दो तरह की मानवीय प्रवृत्तियों का जिक्र करते हैः एक, निश्चित प्रवृत्ति (जैसे भूख और सेक्स की इच्छा) जो मनुष्य की प्रकृति का अभिन्न हिस्सा होती है और भिन्न – भिन्न संस्कृतियों में भी जिनमें बदलाव सिर्फ बाहरी स्वरूप और दिशा में ही आते हैं। दो, सापेक्षिक प्रवृत्ति जो मानव प्रकृति का अभिन्न हिस्सा नहीं होती लेकिन जो ’खास सामाजिक संरचनाओं और उत्पादन तथा संचार की विशेष स्थितियों की उपज होती है।‘ उदाहरण के रूप में मार्क्स समाज के पूंजीवादी ढांचे से उपजी जरूरतों का जिक्र करते है। ‘आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियां’ में वह लिखते हैं, ‘पैसों की जरूरत, इसलिए, ऐसी वास्तविक जरूरत है जो आधुनिक अर्थव्यवस्था ने पैदा की है और यह इकलौती जरूरत है जो यह पैदा करती है। यह बात व्यक्तिपरक ढंग से आंशिक तौर पर इस तथ्य में दिखती है कि आवश्यकता और उत्पादन का विस्तार कैसे अमानवीय, अनैतिक, अप्राकृतिक और काल्पनिक प्रवृत्तियों का चतुर, चालाक ताबेदार बन जाता है।‘
मार्क्स के अनुसार मनुष्य की संभावनाएं जो हैं सो हैं। मनुष्य वैसा ही है जैसा कि वह था। मानवीय कच्चा माल बदला नहीं जा सकता। दूसरे शब्दों में दिमागी संरचना इतिहास की शुरुआत से एक जैसी ही है। बावजूद इसके, इतिहास के क्रम में मनुष्य बदलता जाता है। वह खुद को विकसित करता चलता है। वह अपना स्वभाव बदलता है। वह इतिहास की उपज है। चूंकि वह अपना इतिहास बनाता है इसलिए वह खुद अपनी उपज है। इतिहास मनुष्य के आत्म साक्षात्कार का इतिहास है। यह और कुछ नहीं बल्कि अपने कार्य और उत्पादन की प्रक्रिया के जरिए मनुष्य का आत्म सृजन है। ‘यह जो संपूर्ण विश्व इतिहास है यह और कुछ नहीं बल्कि मानवीय श्रम द्वारा मनुष्य का सृजन और मनुष्य के लिए प्रकृति का आविर्भाव है। इसलिए उसके पास अपने आत्मसृजन का, अपनी खुद की उत्पत्ति का अकाट्य और स्पष्ट सबूत होता है।‘
2 मनुष्य के स्व कार्य
मार्क्स की मनुष्य की अवधारणा की जड़ें हीगल के विचारों में हैं। हीगल शुरुआत इस समझ के साथ करते हैं कि बाहरी स्वरूप और सत्व में समानता नहीं होती। द्वंद्वात्मक चिंतक का कार्य है ‘वास्तविकता की आभासी प्रक्रिया से सत्व को अलग करना और दोनों के बीच के रिश्ते को समझना।‘ दूसरे शब्दों में, यह सत्व और अस्तित्व के बीच के रिश्ते की बात है। अस्तित्व की प्रक्रिया में सत्व आकार लेता है। इसके साथ ही अस्तित्व का मतलब होता है सत्व की ओर वापसी। “यह दुनिया तब तक अलग और नकली दुनिया होती है जब तक कि मनुष्य अपनी मृत वस्तुनिष्ठता को नष्ट करते हुए वस्तुओं और कानूनों के तय स्वरूपों के ‘पीछे’ की अपनी जिंदगी और अपने असली स्वरूप को पहचान नहीं लेता। एक बार जब मनुष्य चेतना के इस स्तर को पा ले तो न केवल अपने बल्कि अपनी दुनिया के भी सच को समझने की उसकी यात्रा शुरू हो जाएगी। इस एहसास के साथ-साथ कार्य भी आगे बढ़ता जाएगा। इस सच को वह अमल में लाएगा और दुनिया को उसका वास्तविक रूप देगा यानी मनुष्य की आत्म चेतना को संतुष्ट करने वाला रूप।” हीगल के मुताबिक ज्ञान चिंतक और विषय के रूप में विभाजित दो भिन्न पहचान वाले रूप में नहीं हासिल किया जाता जिसमें वस्तु को चिंतक से अलग कोई और चीज माना जाता हो। दुनिया को समझने के लिए मनुष्य को उसे अपना बनाना पड़ता है। मनुष्य और चीजें निरंतर संक्रमण में होते हैं, एक विशेषता से दूसरी विशेषता की ओर; इसलिए कोई भी वस्तु अपने वास्तविक स्वरूप में सिर्फ तभी होती है जब वह अपनी पूरी निर्णयात्मकता समेट कर उसे अपने आत्म साक्षात्कार का पल बना लेती है और इस प्रकार निरंतर परिवर्तनशील परिस्थितियों में पूरे समय ‘स्व की ओर वापसी’ करती रहती है। इस प्रक्रिया में ‘ अपने स्व में प्रवेश ही सत्व बन जाता है।’ यह सत्व, अस्तित्व की यह एकरूपता, परिवर्तनों के दरम्यान यह पहचान, हीगल के मुताबिक एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें ‘हरेक चीज अपने अंदर निहित अंतर्विरोधों को हल करती है और अपने आपको एक नतीजे के रूप में खोलती है।’ “इस तरह सत्व जितना ऐतिहासिक है उतना ही तात्विक (ऑन्टोलॉजिकल) भी है। वस्तुओं की सत्व संबंधी संभावनाएं खुद को उसी विस्तृत प्रक्रिया में साकार करती हैं जो उनका अस्तित्व कायम करती है। सत्व अपना अस्तित्व तभी ‘हासिल’ कर सकता है जब वस्तुओं की संभावनाएं वास्तविक परिस्थितियों से गुजरते हुए परिपक्व हो जाती हैं। हीगल इस प्रक्रिया को वास्तविकता में संक्रमण बताते हैं। निश्चयात्मकतावाद (पॉजिटिविज्म) के विपरीत, हीगल के अनुसार “तथ्य तभी तथ्य होते हैं जब वे उन चीजों से संबंधित हों जो अब तक तथ्य नहीं हैं, फिर भी दिए गए तथ्यों में खुद को वास्तविक संभावना की तरह प्रकट करते हैं। या तथ्य तथ्य होते हैं एक प्रक्रिया के महज उन पलों के रूप में जो उनसे आगे उस तक जाते हैं जो अभी तथ्यों के रूप में पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है।“
हीगल के विचारों का चरम है किसी वस्तु में निहित संभावनाओं की अवधारणा, उस द्वंद्वात्मक प्रक्रिया की अवधारणा जिसमें वे खुद को व्यक्त करती हैं और इस विचार की अवधारणा कि यह प्रक्रिया इन संभावनाओं की एक सक्रिय गतिविधि है। मनुष्य के अंदर की सक्रिय प्रक्रिया पर यह जोर इससे पहले स्पिनोजा की सदाचार व्यवस्था (एथिकल सिस्टम) में ही दिख गया था। स्पिनोजा के मुताबिक सभी प्रभावों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है – निष्क्रिय प्रभाव – जिसमें मनुष्य झेलता है और उसे यथार्थ की पर्याप्त समझ नहीं होती और सक्रिय प्रभाव जिसमें मनुष्य स्वतंत्र और उत्पादक (प्रोडक्टिव) होता है। गोथे ने, जो हीगल की ही तरह स्पिनोजा से कई मामलों में खासे प्रभावित थे, अपने दार्शनिक चिंतन के केंद्रीय तत्व के रूप में मनुष्य की उत्पादकता के विचार को विकसित किया। उनके अनुसार सभी पतनशील संस्कृतियां शुद्ध व्यक्तिपरकता (सब्जेक्टिविटी) की प्रवृत्ति से पहचानी जाती हैं, जबकि सभी प्रगतिशील दौर दुनिया को उसी रूप में समझने की कोशिश करते हैं जैसी कि वह है। वह कवि का उदाहरण देते हैः “जब तक वह यूं ही कुछ व्यक्तिपरक बातें करता है तब तक उसे कवि नहीं कहा जा सकता, लेकिन जैसे ही वह यह समझ जाता है कि इस दुनिया को अपने लिए कैसे अलग करना है और फिर कैसे उसे व्यक्त करना है, वह कवि बन जाता है। उसके बाद वह कभी खाली नहीं हो सकता, हमेशा नया बना रह सकता है। जबकि उसकी शुद्ध व्यक्तिपरक प्रवृत्ति जल्दी ही चुक जाती है और उसके पास कहने को कुछ नहीं रह जाता।“ , “मनुष्य खुद को उतना ही जानता है जितना कि दुनिया को; वह दुनिया को सिर्फ अपने भीतर ही जानता है और वह दुनिया के भीतर ही खुद से परिचित होता है। हर नई वस्तु जो सही अर्थों में पहचान ली जाती है, हमारे अंदर एक नई खिड़की खोलती है।“ फॉस्ट में गोथे ने मानवीय उत्पादकता के विचार को अत्यंत कवित्वपूर्ण और सशक्त अभिव्यक्ति दी है। फॉस्ट हमें बताता है कि न स्वामित्व, न ताकत, और न ही काम तृप्ति – जिंदगी को सार्थक बनाने की इच्छा कोई भी चीज पूरी नहीं कर सकती। ये सारी चीजें हासिल करके भी वह संपूर्ण से खंडित ही रहता है, इसीलिए नाखुश भी। उत्पादकतापूर्ण ढंग से सक्रिय रह कर ही कोई अपनी जिंदगी को सार्थकता दे सकता है। ऐसा करते हुए वह जिंदगी का आनंद लेता है, लेकिन उसे लालच से पकड़े नहीं रहता। उसने जिंदगी की एवज में जिंदगी का लालच छोडा है और अस्तित्व से संतुष्ट है, वह पूर्ण है क्योंकि वह खाली है, वह ज्यादा है क्योंकि उसके पास कम है। उत्पादक मनुष्य के विचार को सबसे ज्यादा व्यवस्थित और प्रबल अभिव्यक्ति हीगल ने दी, उस व्यक्ति के विचार को जो कि वह है, निष्क्रिय ग्रहणकर्ता के रूप में नहीं बल्कि दुनिया से सक्रिय तौर पर जुड़े व्यक्ति के रूप में, जो इसी अर्थ में व्यक्ति है कि वह दुनिया को उत्पादकतापूर्ण ढंग से समझने और अपना बना लेने की इस प्रक्रिया में शामिल है। उन्होंने इस विचार को कवित्वपूर्ण अभिव्यक्ति देते हुए कहा, संतुष्टि को वास्तविक रूप देने की चाहत खुद को ‘संभावनाओं की रात्रि से वास्तविकताओं के दिवस में रूपांतरित’ करके ही पूरी की जा सकती है। हीगल के मुताबिक तमाम वैयक्तिक शक्तियों, क्षमताओं और संभावनाओं का विकास निरंतर क्रियाशीलता से ही संभव है, केवल ग्रहणशीलता से नहीं। स्पिनोजा, गोथे, हीगल और मार्क्स के भी मुताबिक मनुष्य तभी तक जीवित है जब तक कि वह उत्पादक है, जब तक कि वह अपनी विशिष्ट मानवीय शक्तियों को व्यक्त करने की कार्रवाई के तहत अपने बाहर की दुनिया को समझने की जद्दोजहद में लगा है।
जिस बिंदु तक मनुष्य उत्पादक नहीं है, जहां तक वह केवल ग्रहणशील और निष्क्रिय है, उस हद तक वह कुछ नहीं है, वह मृत है। इस उत्पादक प्रक्रिया में मनुष्य खुद अपने सत्व का एहसास करता है, वह अपने सत्व में वापस लौटता है जो पारंपरिक धार्मिक शब्दावली में कुछ और नहीं बल्कि ईश्वर की ओर वापसी है।

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