राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (मनु और मैकाले का नया संस्करण)

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– रामचन्द्र (इंक़लाबी छात्र मोर्चा, इलाहाबाद वि.वि.)

आखिरकार, छह साल की लुकाछिपी के खेल के बाद मोदी सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का पांचवा मसौदा आ चुका है। इस खेल की शुरुआत मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान वर्ष 2015 में हुई। सुब्रमण्यम समिति की रपट अप्रैल 2016 में तैयार हुई, लेकिन सरकार ने बिना वजह बताए इसे जनता से छिपा लिया। जुलाई 2016 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय की वेबसाइट पर सरकार ने शिक्षा नीति पर अपने विचार रखे और जनता से सुझाव मांगे। दसियों-हजारों लोगों और सैकड़ो जन-संगठनों ने पूरे विश्वास के साथ अपने सुझाव वेबसाइट पर डाले लेकिन सरकार ने उनकों भी हजम करके चुप्पी साध ली। फिर 2017 में कस्तूरीरंगन समिति का गठन हुआ। जिसकी रपट अगस्त 2018 में तैयार हो गई लेकिन उसका भी 2019 के लोकसभा चुनावों तक क्या हुआ, किसी को भनक नही लगने दी गयी। सरकार ने रपट को संपादन के लिये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के नागपुर हेडक्वार्टर की स्वीकृति के बाद जून 2019 को सार्वजनिक कर दी गई। अक्टूबर 2019 में 55 पेज का चौथा मसौदा और अब 60 पेज का पांचवा मसौदा आता है। कोई नही कह सकता कि यह आखिरी मसौदा है।
स्रोत- आभाशिअम (अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच)का पर्चा।

इस शिक्षा नीति में हम देखते है कि यह नीति एक तरफ बदहाल शिक्षा व्यवस्था की बड़ी-बड़ी बात करती है। जिसमे एक तरफ इसका कहना है कि शिक्षा कोई बाज़ार की वस्तु नही है, जिसे ख़रीदा या बेचा जा सके। लेकिन सिलेबस को वही दूसरी तरफ मार्केट के आधार पर बनाने की दोमुंही बात भी करती है। यह रपट स्वीकार करती है कि 1966 में कोठारी आयोग की सिफारिसों के अनुसार जीडीपी का 6 फीसदी शिक्षा पर खर्च होना चाहिए। लेकिन अबतक कि सरकारों ने इसपर ध्यान नही दिया। यह शिक्षा नीति तक्षशिला, नालंदा जैसे मॉडल की भी बात करती है। लेकिन यह शिक्षा नीति जहाँ एक तरफ बदहाल शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलती नजर आती है, वही इससे निपटने का कोई स्पष्ट रास्ता नही सूझाती है। यह नीति त्रिभाषा यानी तीन भाषाओं को पाठ्यक्रम में शामिल करने की बात करती है। लेकिन पाठ्यक्रम को मातृभाषा में डेवलप करने की कोई बात तक नही करती। यह नीति जनता को हिंदुत्ववादी एजेंडे के तहत राष्ट्रभाषा के नाम पर बरगलाने का काम करती है। यह राष्ट्रभाषा का झुनझुना दिखाते हुए, अंततः अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली को ही प्रोत्साहित करती है।
इस मसौदे में सरकारी प्राथमिक स्कूलों की बदहाली का रोना रोया गया है। साथ ही देश के ज्यादातर प्राथमिक और उच्चतर प्राथमिक स्कूलों में छात्र पंजीकरण मात्र 10-30 छात्रो के होने के आंकड़े प्रदर्शित करती है। इन आंकड़ों को आधार मानते हुए इसका कहना है कि इन स्कूलों को चला पाना मुश्किल है। इसलिए हम इन स्कूलों के बेहतरीकरण के लिए स्कूल काम्पलेक्स खोलेंगे। यह काम्पलेक्स तहसील, जनपद मुख्यालय, शहरों या ज्यादा से ज्यादा ब्लाक स्तर पर खोले जायेंगे। इसमें 12वीं कक्षा तक का एक बड़ा हायर सेकेंडरी स्कूल होगा। जिसके प्राचार्य के मातहत ब्लॉक, तहसील, जिले के सरकारी प्राथमिक और उच्चतर माध्यमिक स्कूलों को स्कूल काम्पलेक्स से जोड़ दिया जायेगा। स्कूल कम्पलेक्स में पढ़ने जाने और छात्रों की सुविधा के लिए बढ़िया रोड़-सड़के बनवाई जायेंगी। जिससे दूर-दराज इलाको के छात्र इनमें पढ़ने आसानी से जा सके। इन स्कूल कम्पलेक्स के माध्यम से कक्षा केजी से लेकर 12वीं तक के गरीब,दलित,पिछड़े,आदिवासी,अल्पसंख्यक खासतौर पर मुस्लिम, वर्गों के छात्रो और लड़कियों की एक बड़ी संख्या में बहुत बारीकी से शिक्षा लेने से बेदखल कर दिया जायेगा। स्पष्ट तौर पर अगर देखे तो गाँवो, पहाड़ी इलाकों के छात्र एवं छात्राएं कैसे इन स्कूल काम्पलेक्स में शिक्षा ग्रहण करने जायेगे, यह नीति इसका कोई भी स्पष्ट उपाय नही बताती है। सीधे तौर पर देखे तो पितृसत्तात्मक समाजव्यवस्था होने के कारण लड़कियों को इनके माता-पिता इतने दूर पढ़ने नही भेजेगें।
दूसरी तरफ स्कूल काम्पलेक्स के नाम पर वर्तमान में मौजूद 15 लाख सरकारी शिक्षण संस्थानों (केजी से बारहवीं तक) को एक झटके में बंद कर दिया जायेगा। वही बहुत से सरकारी स्कूलों को बंद भी कर दिया गया है या निजी हाथों में सौंप दिया गया है। पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश की योगी सरकार सहित कई राज्यो की सरकारों ने सरकारी स्कूलों को NGO को सौंपने की कवायद तेजी से लागू की थी। जिसकी वजह से सरकार को जनता और प्रगतिशील संगठनों का भारी विरोध भी झेलना पड़ा था।
मोदी सरकार अपने पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में नीति आयोग ने ऐलान कर दिया था। कि आने वाले समय मे देशभर के 80 फीसदी सरकारी स्कूल बन्द कर दिए जायेगें। तब से लेकर अभी तक में काफी सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए है या परिमल जैसे NGO के निजी हाथों में सौंप दिए गए है।

उच्च शिक्षा की तरफ देखे तो देश के ज्यादातर विश्वविद्यालय, डिग्री कॉलेज या उच्च शिक्षण संस्थान राज्य सरकारों के मातहत है, बाकी केंद्र सरकारों के है। इस नीति के अनुसार उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रसंघ चुनाव को समाप्त करके इसकी जगह बोर्ड ऑफ गवर्नेंस कमेटी की बात की जा रही है। इस गवर्नेंस कमेटी में प्रतिष्ठित लोगों/ स्वयं सहायको/ सामाजिक कार्यकर्ताओ/ NGO के लोग इस कमेटी के सदस्य होंगे। स्पष्ट तौर पर यह प्रतिष्ठित व्यक्ति RSS के कैडर ही होंगे। जिनकी मनमानी विश्वविद्यालयों,महाविद्यालयों में खुले रूप में चलेगी। इसप्रकार से देखे तो उच्च शिक्षण संस्थानों में कॉरपोरेट की नीति लागू करने के लिये इसका सबसे बड़ा रोड़ा छात्रसंघ को समाप्त करके सीधे संस्थानों का लोकतांत्रिक स्पेस समाप्त कर दिया जाएगा।
यह नीति इन संस्थानों को खुले रूप में स्वायत्ता देने की बात करती है। लेकिन यह स्वायत्ता शिक्षकों की नियुक्ति, विद्यार्थीओ के एडमिशन, सिलेबस या पाठ्यक्रम तय करने तथा संस्थानों में सुविधाएं बढ़ाने के लिए कत्तई नही है। इसमें केंद्र सरकार और कॉरपोरेट की मनमानी लागू की जाएगी। राज्य सरकारें अपने राजकीय विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों में कोई भी हस्तक्षेप नही कर सकती है। इनसे सभी अधिकार यह शिक्षानीति के द्वारा छीन लिए जाएंगे। केंद्रीय और राजकीय उच्च शिक्षण संस्थानों को पूरी स्वायत्ता देते हुए। इन सभी संस्थानो का अनुदान सरकार बन्द कर देगी। यह संस्थानों को पूरी छूट दी जाएगी कि यह इसकी पूर्ति छात्रों की फीस बढ़ाकर, कॉरपोरेट घरानों से सहयोग लेकर प्राइवेट पार्टनरशिप, FDI के तहत विदेशी पूंजी के माध्यम से संस्थानो को चला सकते है या निवेश कर सकते है। इसकी पूरी स्वायत्ता इन संस्थानों को दी गयी है। जाहिर है कि जो भी इन संस्थानों को आर्थिक मदद करेगा, वह अपनी शर्ते इनपर थोपेगा। कुल मिलाकर स्वायत्ता के नाम पर देश की युवा पीढ़ी को कॉरपोरेट पूंजी का गुलाम बनाने का खतरनाक एजेण्डा लागू किया जाएगा।
सीधे तौर पर यह नीति सरकारी उच्च शिक्षण संस्थानों में राज्य सरकारों का हस्तक्षेप सीधे तौर पर समाप्त कर दिया जाएगा। केंद्रीय नियंत्रण लागू करने के लिए आईएएस की तर्ज पर इंडियन एजुकेशन सर्विस का गठन करेगी। यानी देश की केजी से लेकर पीजी तक कि पूरी शिक्षा व्यवस्था पर केंद्र सरकार का हुक्म चलेगा। देश की विधान-सभाएं व राज्य सरकारें और इनके शिक्षा विभाग सिर्फ नाम-भर के रह जायेगें। देशभर में देश की शिक्षा को बचाने के लिये विमर्श और आन्दोलन चल रहे है। जो इसप्रकार है- साम्राज्यवादी शिक्षा विरोधी विमर्श और जातिवादी/ब्राह्मणवादी शिक्षा विरोधी विमर्श। लेकिन यह शिक्षा नीति दोनों का कहीं पर भी विरोध करने की बजाय शिक्षा व्यवस्था को विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन(WTO), FDI, विदेशी वित्तीय एजेंसियों और साथ मे आरएसएस के नागपुर हेडक्वार्टर के हवाले करने के दरवाजे पहले की अन्य सरकारों की अपेक्षा अब खुलकर खोलती नजर आती है। क्योंकि आज नव साम्राज्यवाद के दौर में दोनों का गठजोड़ हो गया है।
यह नीति आगे बढ़कर कहती है कि अब हम सरकारी और निजी संस्थानों के बीच मे कोई भी भेदभाव नही करेंगे। क्योंकि दोनों ही शिक्षा देने के लिए हैं। अब दोनों ही संस्थानो के साथ बराबर का व्यवहार करेंगे। इसलिए अब सरकारी संस्थानों की तर्ज पर निजी संस्थानों को भी पूरी स्वायत्ता दी जाएगी और सरकार दोनों को बराबर मदद करेगी। इसका मतलब सरकार दोनों को मदद नही करेगी। अगर सरकार सरकारी यूनिवर्सिटी को अनुदान देगी तो इसे प्राइवेट यूनिवर्सिटी को भी देना पड़ेगा। इसलिए सीधा सा फंडा है कि दोनों को कोई अनुदान नही दिया जाएगा। यह बात विश्व व्यापार संगठन के एजेंडे की पोशक समझ में आती है। अब यह निजी शिक्षा संस्थान खुलकर फीस बढ़ा सकते हैं। इसपर हम अड़ंगा नही डालेंगे। सरकार के पास अब सरकारी संस्थानों को चलाने के लिये पैसा नही है।

यह नीति कहती है कि अब बच्चे अपनी संस्कृति और परम्परा को भूल रहे है। अब छात्र स्कूलों से कोई भी ज्ञान नहीं अर्जित कर रहे हैं। इसलिए हम इसके उपाय के रूप में शिक्षण संस्थानों में प्रतिष्ठित नागरिकों/ सामाजिक कार्यकर्ताओं/ NGO के ट्रेण्ड लोगों को भर्ती करेगें। जो बच्चों में संस्कार भरने का काम करेंगे। वहीं इतनी ज्यादा संख्या में संस्कारी कैडर सिर्फ आरएसएस के पास ही मौजूद है। जो हिंदुत्व का जहर बच्चों में घोल सके। इस नीति का गठजोड़ हम आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत के एक बयान से समझ सकते है जिसमे यह ऐलान करता है कि हम जल्द ही 1 करोड़ कैडरों की संस्कारी टीम या फौज तैयार करने जा रहे है। वही दूसरी तरफ उड़ती हुई खबर बताती है कि इसकी कवायद आरएसएस ने नागपुर में शुरू भी कर दी है। अगर इन सामाजिक कार्यकर्ताओ की ज्यादा जरूरत पड़ी तो ब्लॉक स्तर पर एक ट्रेनिंग सेंटर खोला जायेगा। जिसमे 6 माह का शार्ट ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू किया जायेगा। जिसके माध्यम से इनकी पूर्ति आवश्यकता पड़ने पर की जाएगी। यह नीति 3 से 6 वर्ष के बच्चों/छात्रों पर ही संस्कार डालने पर जोर देती है। क्योंकि आरएसएस यह समझता है कि बच्चों में इस कच्ची उम्र में ही हिन्दुत्व की भावना, मिथक, अंध-विश्वास/श्रद्धा, पाखंड और वर्णव्यवस्था के दृष्टिकोण को उनकी चेतना में भरने के लिये यह उम्र सबसे सटीक है।

यह नीति कुछ विशेष वर्गों (महिलाएं, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, पिछड़े और गरीब) के छात्रों को बड़ी बारीकी से मूलभूत या मुख्यधारा की शिक्षा से बेदखल करके, इन वर्गों के छात्रों को कक्षा पाँचवी या आठवीं में ही फेल करने की नीति अपना करके स्किल ट्रेनिंग/वोकेशनल कोर्सों में डाल देना चाहती है। जिससे कॉरपोरेट घरानों और साम्राज्यवादी देशों के लिये सस्ते स्किल्ड श्रमिक तैयार करने की नीति को तेजी से अलम में ला सके।

दरअसल शिक्षा का अतिकेंद्रीयकरण विश्व व्यापार संगठन (WTO) के इशारों पर किया जा रहा है। जिससे वैश्विक पूँजी भारत के उत्पादन की प्रक्रिया पर अपना एकछत्र नियंत्रण कायम कर सके और BJP/आरएसएस के साथ मिलकर इस देश मे राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के माध्यम से पूरी शिक्षा के कॉरपोरेटीकरण एवं मनुवादीकरण व फ़ासीवादीकरण को तेजी से लागू करके। देश की बहुसंख्यक आबादी को शिक्षा जैसी मूलभूत अधिकार से बेदखल कर सके।

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