वर्तमान राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 एक विचार 

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आइए हम स्वागत करने का प्रयास करें राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का हम इस स्वागत की शुरुआत करेंगे झारखंड के शिक्षा मंत्री श्री जगरनाथ महतो के उस वक्तव्य से उस कदम से जहां उन्होंने अपना हाथ मूल्यांकन करते हुए पुनः आगे की पढ़ाई जारी रखने और एक शिक्षा मंत्री की मर्यादा योग्य शिक्षा ग्रहण करने की ठानी है स्वागत योग्य है प्रशंसनीय है परंतु उनके भाई के कथनों में हमें उन चुनौतियों का हल कितना है तुलनात्मक नजरिए से अध्ययन करने की आवश्यकता है तब वे एक आम ग्रामीण किसान अभावग्रस्त पिता के पुत्र थे किन परिस्थितियों में उनकी शिक्षा बीच में ही उन्हें छोड़नी पड़ी क्या वर्तमान शिक्षा नीति इन कमियों को दूर करने में पर्याप्त है हमने पुरातन शिक्षा प्रणाली में गुरुकुल शिक्षा जहां केवल राजपुरोहित और राज्य सेवा से जुड़े लोगों के बच्चे ही शिक्षा ग्रहण करने के हकदार थे उसमें कोई शक नहीं कि उनके जीवन को दक्ष बनाने वाले सारे कौशल की शिक्षा गुरु सदैव और क्रियात्मक ढंग से देकर उन्हें क्षमता वान बनाने में कोई भी कसर नहीं छोड़ते थे।
प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव श्री पी के मिश्रा टाइम्स ऑफ इंडिया में 12 अगस्त 2020 को प्रकाशित एक लेख में खुद ही यह कहते हैं कि सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों मैं ऑनलाइन शिक्षा एक चुनौती तो है ही पर सुरक्षित परीक्षा उससे भी महत्वपूर्ण चुनौती है साथ ही साथ प्रयोगशाला अभ्यास  की सफलता पर भी उन्होंने चिंता प्रकट की है और वह यह भी मानते हैं कि एसे में सह कैंपस स्रोत के संभावना को एक विकल्प के रुप में होने पर जोड़ देते हैं, भाषा पर भी उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए उसे बाधा माना है और कहा है कि भाषाओं का मातृ भाषा में अनुवाद कर पाना ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली में काफी चुनौती भरा होगा।
इस पद्धति ने आम जनता ना सही पर राजसत्ता से जुड़े लोगों के बच्चों को इतना सक्षम बनाया कि उनके उदाहरण आज भी बच्चों को पढ़ाई जाते हैं पर वहां या अभिशाप इंगित है कि किस-किस प्रकार से करने जैसे प्रतिभावान प्रतिभा को प्रतियोगिता से बाहर रखा गया किस प्रकार एक लक्ष्य के प्रयास को एकलव्य के प्रयास को काबिल होने के बाद भी ना काम करने का प्रयास किया गया एकलव्य ने भी वर्तमान शिक्षा नीति में प्रावधान रूप ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से अपनी योग्यता का लोहा मनवाया था अब मैं आता हूं भारत की आजादी के बाद की शिक्षा व्यवस्था में जिसमें हमारे दादा जी पिताजी की शिक्षा हुई मतलब तीसरी जमात जमात या फिर आठवीं या बहुत प्रयास के बाद मैट्रिक हालांकि उस समय मैट्रिक पास करना किसी प्रतियोगिता से कम नहीं था उस शिक्षण व्यवस्था में सरकार बाद में आई पहले समुदाय ने अपने प्रयास से स्कूल खोले और अनाज और कुछ नगदी देकर शिक्षक रखे मतलब व्यवस्था लोग भागीदारी पर आधारित थी परलोक उपकारी नहीं थी।
शिक्षा के विद्यार्थियों के लिए वह ओपन और तंत्र विद्या पर आधारित थी एक ही शिक्षक एक साथ कई विषयों को पढ़ाते थे मतलब समझने वाले ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों की अपेक्षा रखने वाले याद रखने वाले विद्यार्थी योग्य माने जाते थे वर्तमान शिक्षा नीति भी शिक्षा क्षेत्र में निजी परोपकारी धन जुटाने की छूट दे रही है साथ ही साथ उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए प्रस्तावित नवीन नियम व्यवस्था जिसमें भूमिकाओं का विभाजन एवं पारदर्शी स्व प्रकटीकरण हो सशक्तिकरण के बहाने स्वायत्तता की बात करती है जो गरीब ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों के उच्च शिक्षा ग्रहण कर पाने की दिशा में संदेह उत्पन्न करता है वित्त पोषण के मामले में यह नीति 1968 1986 और 1992 के जीडीपी के 6% बजट प्रावधान के अनुशंसा की याद दिलाती है प्रश्न यह नहीं है कि वर्तमान सरकार कब तक जीडीपी का 6% खर्च करेगी नई शिक्षा नीति केके क्रमांक भाई अच्छा 26 पॉइंट 7 में जो बात कही गई है वह निरंतर अंदेशा पैदा करने वाली है और ऐसा लगता है जैसे सरकार शिक्षण संस्थानों के नियंत्रण से अपना हाथ खींचना चाहती है।
नई शिक्षा नीति स्थानीय भाषा मातृभाषा में शिक्षण की प्रतिबद्धता तो दर्शाती है पर वही त्रिभाषा फार्मूला की भी बात करती है और जोर संस्कृत भाषा और उस भाषा में उच्चतर शिक्षा की डिग्री देने की बात करती है जो संस्कृत विश्वविद्यालय के माध्यम से डिग्रियां दी जाने के लिए सक्षम होंगे इस विषय पर गौर करें तो आज भी अधिकतर संस्कृत शैक्षणिक संस्थान निजी हाथ और स्वैच्छिक महंतों के आश्रम द्वारा संचालित है जहां मुख्यता सवर्ण जाति के बच्चे ही पढ़ते हैं नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के 22 पॉइंट 16 में शास्त्री भाषा के संस्थान अपनी स्वायत्तता को बरकरार रखते हुए विश्वविद्यालयों के साथ संबंध होने या उनमें विलय का प्रयास करेंगे विलय नहीं करने की बाध्यता ब्लैक करने की बाध्यता नहीं ताकि एक सुदृढ़ एवं चौबीसी कार्यक्रम के हिस्से के तौर पर संकाय काम कर सके समान उद्देश्य प्राप्त करने के लिए भाषाओं को समर्पित विश्वविद्यालय भी बहुत ही बनेंगे जहां शिक्षा का एक शिक्षा एवं उस भाषा में b.ed की दोहरी डिग्री प्रदान की जाएगी सरकार की नीति इस मामले में जो दुविधापूर्ण है जो उन प्रावधान पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है जिसमें कहा गया है कि हम सबके लिए शिक्षा और समतामूलक शिक्षा व्यवस्था का निर्माण करेंगे दूसरी तरफ नई शिक्षा नीति के बहुआयामी उद्देश्यों की प्रशंसा करते हुए प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव श्री पी के मिश्रा टाइम्स ऑफ इंडिया में 12 अगस्त 2020 को प्रकाशित एक लेख में खुद ही यह कहते हैं कि सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों मैं ऑनलाइन शिक्षा एक चुनौती तो है ही पर सुरक्षित परीक्षा उससे भी महत्वपूर्ण चुनौती है साथ ही साथ प्रयोगशाला अभ्यास  की सफलता पर भी उन्होंने चिंता प्रकट की है और वह यह भी मानते हैं कि एसे में सह कैंपस स्रोत के संभावना को एक विकल्प के रुप में होने पर जोड़ देते हैं, भाषा पर भी उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए उसे बाधा माना है और कहा है कि भाषाओं का मातृ भाषा में अनुवाद कर पाना ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली में काफी चुनौती भरा होगा ।
ऐसी परिस्थिति में झारखंड के शिक्षा मंत्री अगर यह कहते हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का लागू कर पाने के लिए राज्य शिक्षा मिलती है तो उनकी चिंता पर पुनर्विचार होना ही चाहिए बल्कि कैसे भी नहीं है जिस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।
                                                                                                   विश्वनाथ सिंह
समाजिक कार्यकर्ता एवं राज्य महासचिव
ज्ञान विज्ञान समिति झारखंड

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