अपने-अपने प्रेमचंद, बता रहे हैं स्वदेश सिन्हा

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अकसर बहुत से साहित्यकार और लेखक प्रेमचंद को अपने- अपने विचारधारा में बांधने की कोशिश करते रहते हैं, और उसी अनुसार उनका मूल्यांकन भी करते हैं, इसलिए उन्हें कुछ लोग गांधीवादी, कुछ आर्यसमाजी और कुछ मार्क्सवादी घोषित कर देते हैं। आजकल तो दलित साहित्यकारों का एक छोटा सा वर्ग; प्रेमचंद को उनकी कुछ कहानियों के कथ्य से दलित विरोधी तक कह रहे हैं। यहाँ तक कि एक दलित लेखक धर्मवीर ने तो उन्हें सूदखोर तक सिद्ध कर दिया। पिछले वर्ष ही’ ‘पाञ्चजन्य’ जो ‘आर एस एस’ से जुड़ी पत्रिका है, उसने भी उन पर विशेषांक निकाला था। संभव है कुछ वर्षों में ही उनकी ” राम चर्चा ” वाली कहानियों के माध्यम से उन्हें ” राम भक्त हिंदू’ घोषित कर दिया जाए।
प्रेमचंद का जन्म एक हिन्दू कायस्थ जमींदार परिवार में हुआ था, हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि उस दौर में कायस्थ छोटे जमींदार होते थे, उन्होंने मुगल काल में अरबी, फारसी या उर्दू की शिक्षा ली थी, इसलिए राज दरबारों में इनका मान था, क्योंकि उस समय अधिकांश राजा-महाराजा पढ़े-लिखे नहीं थे, इस कारण कायस्थों को छोटी-छोटी जमींदारियाँ मिल गई थीं, अंग्रेजी राज में अंग्रेजी सीख देने के कारण उन्हें क्लर्क की नौकरियाँ मिल गई थीं, इस कारण सुरक्षित नौकरी की चाहत में ये लोग शहरों में अपनी जमींदारियाँ बेचकर बसने लगे। यही कारण है, ज्यादातर कायस्थ राजभक्त थे । यही कारण यह कि यह जाति अंग्रेजी शासन की जबरदस्त समर्थक थी तथा अपवादों को छोड़ दिया जाए तो इस जाति ने स्वाधीनता संग्राम में भाग नहीं लिया था। अगर आप प्रेमचंद के साहित्य को इस दृष्टिकोण से देखे जिसमें किसानों की बदहाली ,शोषण,
उनका कर्ज में डूबना आदि उनके निजी अनुभव भी थे। डिप्टी कलेक्टर’ की सरकारी नौकरी से उस समय इस्तीफा देना उनकी जाति के लिए एक क्रांतिकारी कदम था, एक बड़ी सरकारी नौकरी से इस्तीफा देना। प्रेमचंद के कृतित्व में उन सबकी गंभीर अभिव्यक्ति दिखलाई देती है।
भारतीय समाज में जाति एक महत्वपूर्ण तथ्य है और किसी के व्यक्तित्व निर्माण में उसकी अहम भूमिका होती है। प्रेमचंद के लेखन के प्रारंभिक काल में उनकी रचना ‘ सोजे़ वतन’ में उनकी एक रोमानी क्रांतिकारी की छवि दिखलाई देती है, लेकिन बहुत जल्दी हम देखते हैं कि वे आर्यसमाज की धर्म सुधार की अवधारणा से प्रेरित हुए इसलिए उनके उपन्यासों कहानियों और लेखों में धर्म के नाम पर अमानवीयता, छूआछूत, ब्राह्मणवाद तथा कर्मकांडों के प्रति घोर नफरत दिखलाई देती है। यह ‘आर्यसमाजी आदर्शवाद’ था। यही कारण है कि वे हिन्दू वर्णाश्रम व्यवस्था को कहीं चुनौती देते नहीं दिखते हैं,लेकिन बहुत जल्दी वे इससे मुक्त भी हो जाते हैं। राष्ट्रवादी आन्दोलन के दौर में गांधी सारे आंदोलन के एकक्षत्र नेता बन कर उभरे थे, भारतीय समाज का पिछड़ापन और उनकी ‘साधु-महात्मा’ की छवि ने उनको नायकत्व प्रदान किया था, उस दौर को अगर हम देखे तो राष्ट्रीय आंदोलन की सभी धाराएँ गांधी रुपी समुद्र में समाहित हो गई थी। अंबेडकर जैसे बड़े नेता को भी उनके सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा था। प्रेमचंद भी गांधी के इस जबरदस्त आकर्षण से बच नहीं पाए। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में गांधीवाद के तत्व साफ दिखते हैं, जिसमें सुधारवाद और ह्रदय परिवर्तन भी है, इस दौर की उनकी प्रमुख रचनाओं में यथा ‘कर्म भूमि, ‘सेवासदन’ और ‘रंगभूमि’ में गांधीवाद की छाप साफ दिखाई देती है। रंगभूमि का पात्र सूरदास वास्तव में गांधी का ही प्रतिरूप है। सेवासदन की नायिका जो विधवा आश्रम बनाना चाहती है, वह भी गांधीवाद की अवधारणा को पुष्टि करता है। परन्तु क्या ‘गोदान ‘ में उनका गांधीवाद से मोहभंग हो गया था? यह विश्वासपूर्वक तो नहीं कहा जा सकता है, लेकिन जो गोदान में निहित शोषण और विद्रोह की छुटपुट झलक दिखलाई देती है, वह उनका गांधीवाद से मोहभंग ही दिखाता है, उनकाे यह गहराई से महसूस हो गया था कि हृदय परिवर्तन से शोषण से मुक्ति नहीं मिल सकती है। बाद में उनका एक महत्वपूर्ण लेख ‘महाजनी सभ्यता’ में उन्होंने पूँजीवाद की कड़ी आलोचना की है।
आगे अपने अंतिम और अधूरे उपन्यास में वे लिखते हैं ” वे वोल्वशिक उसूलों के कायल हो गए हैं। क्या वे अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वोल्वशिक क्रांति के पक्षधर हो गये थे? अथवा मार्क्सवादी बन गए थे यह संभव है, इस पर भी अभी बहुत शोध की जरूरत है, लेकिन इस बात में कोई दो राय नहींं कि उनकी यात्रा लगातार विकासमान थी और यह उनकी रचनाओं में साफ झलकती है।
‘नामवर सिंह’ का यह कहना बिलकुल सही है ” जो लड़ाई प्रेमचंद ने शुरू की थी- राजनीतिक जीवन में, सामाजिक जीवन में और सांस्कृतिक जीवन में- वह लड़ाई आज भी चालू है और प्रेमचंद आज भी साहित्य के द्वारा, अपनी कृति के द्वारा हमारे साथ खड़े हैं ” ।
( मेरे एक लंबे लेख ‘ प्रेमचंद की विचारधारा’) का सार- संक्षेप)

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