मोमिन ने कम लिखा लेकिन जो लिखा दानेदार लिखा

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‘कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़ ए बयाँ और’ कहने वाला ख़ुदपसन्द शायर और शुरुआती दौर में का लगभग अहमन्य शायर ..
‘रेख्ते के तुम्ही नहीं हो उस्ताद’ कहकर मीर का क़ायल हो जाता है। ‘मोमिन’ के एक शे’र पर अपना दीवान लुटा बैठता है।
‘तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता ‘
मोमिन के इस शेर पर ग़ालिब मर-मिटे थे।
भाषा की स्वाभाविक फ़ारसी लय, नाज़ुकख़याली और तंज़ में दोनों होड़ लेते हैं। अपनी अभिव्यक्ति में ज़िन्दगी की उलटबांसियों को ज़ाहिर करने के लिए जिस नुक्ते (टेक्नीक) का इस्तेमाल चचा ग़ालिब कर गये हैं …मियां मोमिन वहां किसी तरह कम नहीं पड़ते। मोमिन ने कम लिखा लेकिन जो लिखा दानेदार लिखा।
ग़ालिब और मोमिन एक दूसरे को बेहतर तरीके से समझ रहे थे इसीलिए जहाँ एक दूसरे से प्रभावित थे वहीं एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी भी रहे।
ग़ालिब के एक सवाल पर जहाँ दुनिया सर खपाए जाती है कि..
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
इसका जवाब कितनी शिद्दत, साफ़गोई और ख़ूबसूरती के साथ दिया है मोमिन ने..!
‘मरीज़ ए इश्क़ पर रहमत ख़ुदा की

मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की’

 पेश हैं मोमिन के लिखे चुनिंदा शेर

आप की कौन सी बढ़ी इज़्ज़त
मैं अगर बज़्म में ज़लील हुआ
उम्र तो सारी कटी इश्क़-ए-बुताँ में 'मोमिन'
आख़िरी वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमाँ होंगे

उलझा है पाँव यार का ज़ुल्फ़-ए-दराज़ में
लो आप अपने दाम में सय्याद आ गया

कुछ क़फ़स में इन दिनों लगता है जी
आशियाँ अपना हुआ बर्बाद क्या

किसी का हुआ आज कल था किसी का

न है तू किसी का न होगा किसी का

ठानी थी दिल में अब न मिलेंगे किसी से हम
पर क्या करें कि हो गए नाचार जी से हम

तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता

तुम हमारे किसी तरह न हुए
वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता

थी वस्ल में भी फ़िक्र-ए-जुदाई तमाम शब
वो आए तो भी नींद न आई तमाम शब

रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह
अटका कहीं जो आप का दिल भी मेरी तरह
डॉ. वंदना चौबे

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