कविताः मन में बुदबुदाती है अनेक सवाल जिनके जवाब क़तई नहीं होने चाहिए

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धुँध भरे गाँव के गलियारे में
खड़जें-खपरैलों बीच
साँस भर खींचती है मैदानी कोहरे की गंध
फ्रॉक के घेरे भीतर सरकते हैं बर्फ़ के टुकड़े महीन
सहसा इधर-उधर देख-
वह खोल देती है लिपटी हुई बाँहें
और चढ़ा लेती है आस्तीन
मुट्ठियाँ भींच उभारती है नसों को
पूरी ताक़त से
हाथों के रोमिल बाल सख्त हो जाते हैं
बच्चे को सू-सू कराने की ध्वनि का करती है अभ्यास सीटी बजाने के भ्रम में
और ज़रा बिचका लेती है अपनी बाईं आँख
तान लेती है अपनी छातियाँ
बाँहें कुछ ज़्यादा फेंककर चलती हुई वह लड़की
बदल जाती है किसी मनबढ़ छोकरे में
मन में बुदबुदाती है अनेक सवाल
जिनके जवाब क़तई नहीं होने चाहिए उसके पास
कि जिससे मिलने जा रही है वह
दुनिया के सारे राज़ कैसे जान सकती है?
वह बेवकूफ़ लड़की!
कि जिससे मिलने जा रही है वह
दिनभर जो दो-मुँहे चूल्हे से निकालती रहती है राख
पाथती रहती है गोबर
कैसे पता होगा उस मूरख को!!
कि खेल में सचिन का शतक पूरा हुआ कि नहीं?
झाँकने भी नहीं देगी मियं-टोल
जाहिल लड़की को
दर्जिन को खुद ही दे जायेगी कुर्ती अब से
मिलते ही कंधे पर हाथ रखती है
सखी पियारी के
फेंकती है कुछ गीत-गालियों के बोल
बन जाती है बाँका मर्द
भोर-अँधेरे
गलियारे में.

1 COMMENT

  1. बड़ी अलग सी, गहरा प्रभाव छोड़ने वाली कविताएं होती हैं आपकी वंदना जी. अभिनंदन

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