42वें दिन भी जारी मनरेगा कर्मियों की हड़ताल

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 * विशद कुमार 
बेरोजगारी के समय जब मजदूर खुद काम की तलाश में थे और मनरेगा अंतर्गत योजनाओं में इन मजदूरों द्वारा कार्य किया जा रहा था और किया भी गया, इसके बाद सोशल ऑडिट यूनिट के द्वारा पंचायतों में सोशल ऑडिट किया जाने लगा और झूठा आरोप जैसे योजनाओं में जेसीबी मशीन का उपयोग करने का आरोप मनरेगा कर्मियों पर लगाया जाने लगा, इसी क्रम में कई मनरेगा साथियों को बर्खास्त किया गया। इतना ही नहीं सोशल ऑडिट टीम के द्वारा मनरेगा कर्मियों को मानसिक दबाव भी देने लगे। एक तरफ अधिकारियों द्वारा प्रति पंचायत 300 से 400 मजदूर को रोजगार देने का दबाव दिया जा रहा था, वहीं दूसरी तरफ सोशल ऑडिट टीम के द्वारा झूठा आरोप लगाया जा रहा था। इनके द्वारा जेसीबी मशीन का किसी भी जगह का फोटो खींचकर प्रतिदिन मनरेगा कमिश्नर को भेजकर मनरेगा कर्मियों के विरोध में शिकायत दर्ज किया जाता रहा है, जिससे मनरेगा कर्मी मानसिक दबाव में काम करने के लिए मजबूर हो गए। परिणाम यह हुआ कि कई मनरेगा कर्मी आर्थिक मंदी व मानसिक दबाव के कारण ब्रेन हेमरेज हार्ट अटैक, सड़क दुर्घटना या अंततः आत्महत्या करने पर मजबूर हो गए।
राज्य के मनरेगा कर्मियों द्वारा पूर्व सूचना के आधार पर 22 जून से 27 जून 2020 तक काला बिल्ला लगा कर अपनी मांगो को रखने का प्रयास किया गया था। इसके बाद 29, 30 जून और 01 जुलाई को सांकेतिक हड़ताल किया गया। इस बीच मनरेगा कमिश्नर ने मनरेगा कर्मियों के साथ 05 घंटे तक वार्ता किया। फिर 02 जुलाई को ग्रामीण विकास मंत्री से वार्ता हुई, परन्तु समस्याओं का समाधान नहीं निकला, अंततः बाध्य हो कर मनरेगा कर्मी अनिश्चित कालीन हड़ताल पर चले गए।
इस महामारी में मनरेगा कर्मियों को बिना सुरक्षा और बिना गारंटी के दिन रात प्रवासी मजदूरों को लाने से लेकर रोजगार देने का बड़ा दायित्व दिया गया। जब सभी लोग अपने-अपने घरों में बंद थे तब मनरेगा कर्मी ही अपने-अपने पंचायतों में घूम-घूम कर मजदूरों को रोजगार देने का काम किया। मनरेगा MIS  रिपोर्ट में अप्रैल, मई, जून और जुलई माह में स्पष्ट दिखाई देता है। बहुत हद तक इसमें मनरेगा कर्मी सफल भी रहे। परन्तु अधिकारियों के योजना चयन में रोक तथा सोशल ऑडिट यूनिट टीम के द्वारा गलत आरोप लगाकर मनरेगा कर्मियों को काफी परेशान किया जाने लगा। बेरोजगारी के समय जब मजदूर खुद काम की तलाश में थे और मनरेगा अंतर्गत योजनाओं में इन मजदूरों द्वारा कार्य किया जा रहा था और किया भी गया, इसके बाद सोशल ऑडिट यूनिट के द्वारा पंचायतों में सोशल ऑडिट किया जाने लगा और झूठा आरोप जैसे योजनाओं में जेसीबी मशीन का उपयोग करने का आरोप मनरेगा कर्मियों पर लगाया जाने लगा, इसी क्रम में कई मनरेगा साथियों को बर्खास्त किया गया। इतना ही नहीं सोशल ऑडिट टीम के द्वारा मनरेगा कर्मियों को मानसिक दबाव भी देने लगे। एक तरफ अधिकारियों द्वारा प्रति पंचायत 300 से 400 मजदूर को रोजगार देने का दबाव दिया जा रहा था, वहीं दूसरी तरफ सोशल ऑडिट टीम के द्वारा झूठा आरोप लगाया जा रहा था। इनके द्वारा जेसीबी मशीन का किसी भी जगह का फोटो खींचकर प्रतिदिन मनरेगा कमिश्नर को भेजकर मनरेगा कर्मियों के विरोध में शिकायत दर्ज किया जाता रहा है, जिससे मनरेगा कर्मी मानसिक दबाव में काम करने के लिए मजबूर हो गए। परिणाम यह हुआ कि कई मनरेगा कर्मी आर्थिक मंदी व मानसिक दबाव के कारण ब्रेन हेमरेज हार्ट अटैक, सड़क दुर्घटना या अंततः आत्महत्या करने पर मजबूर हो गए। इसका ज्वलंत उदाहरण स्वर्गीय विश्वनाथ भगत, ज्योति साल्गी एक्का, दुलाल सिंह मुंडा, ओबीडन टूडू, परमेश्वर टूडू और कई ऐसे आदिवासी चेहरे है जिनकी मृत्यु या सड़क दुर्घटना या ब्रेन हेमरेज या हार्ट अटैक या अंततः आत्महत्या से हुई हैं। विभाग और सरकार की तरफ से इन कर्मियों को किसी भी तरह का सुविधा मुहैया नहीं कराया गया और ना ही इनके प्रति कोई दुख ही व्यक्त किया गया। आज उनका परिवार इस महामारी में सड़क पर आ गया है और भीख मांगने पर मजबूर हैं।
अनिश्चित कालीन हड़ताल पर मनरेगा कर्मी
12 से 13 वर्ष अपनी सेवा, विभाग और सरकार को देने के बाद, अपनी पूरी जवानी देने के बाद, आज जब मनरेगा कर्मियों को सीधे बर्खास्त कर दिया जाता है, तब ऐसे कर्मी जिनकी उम्र सीमा समाप्त हो गई है, वह कहां जाएंगे? मजबूरन इन मनरेगा कर्मियों को लाठी और बंदूक उठाना पड़ेगा। इन्हीं सब बातों को रखकर मनरेगा कर्मियों ने अपनी पीड़ा सरकार तक पहुंचाने का काम किया  परन्तु  विभाग के कान पर जूं तक नहीं रेंगा है। अतः मजबूरन मनरेगा कर्मियों को अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
पूर्व की सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री रहे माननीय विधायक सुदेश महतो, ददई दुबे,  केएन त्रिपाठी,  नीलकंठ सिंह मुंडा ने भी हमारी मांगों पर सिर्फ आश्वासन ही दिया था। पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और रघुवर दास के द्वारा भी आश्वासन दिया गया था कि मनरेगा कर्मियों के लिए बहुत अच्छा किया जा रहा है, परंतु आज तक मनरेगा कर्मियों की समस्या जस की तस है।
दिनांक 3 सितंबर को ग्रामीण विकास विभाग और माननीय ग्रामीण विकास मंत्री से मनरेगा कर्मियों की शिष्टमंडल के साथ वार्ता हुई। वार्ता में सामाजिक सुरक्षा, मानदेय बढ़ोतरी, और 60 वर्ष के बाद एकमुश्त राशि देने पर सहमति बनी, परन्तु सामाजिक सुरक्षा में क्या दिया जाएगा और मानदेय बढ़ोतरी में किस कर्मियों कितना मानदेय बढ़ेगा इसको स्पष्ट नहीं किया गया, साथ ही 60 वर्ष के बाद हमारे ही पैसा को EPF कटौती के माध्यम से हमें दिया जाएगा। संघ ने मांग रखी थी, कि जब दो पक्ष में वार्ता होती है या समझौता होता है तो वह लिखित रूप में होता है। अतः हमें भी जो भी सहमति बनी है उसे लिखित में दिया जाए। परन्तु विभाग के अधिकारी लिखकर नहीं देने पर अड़े रहे। अंततः संघ ने निर्णय लिया हमारा हड़ताल यथावत रहेगा।
संघ ने वार्ता में अपनी बातों को मजबूती के साथ रखा जिसमें स्थायीकरण, वेतनमान, सामाजिक सुरक्षा, बर्खास्तगी पर रोक, उम्र सीमा में छूट एवं नियुक्तियों में आरक्षण, हड़ताल अवधि का मानदेय भुगतान तथा हड़ताल अवधि में किए गए दंडात्मक कार्रवाई प्रदेश अध्यक्ष की बर्खास्तगी और अन्य कर्मियों पर की गई कार्रवाई को वापस लेने पर चर्चा हुई। खासकर जॉब सिक्योरिटी पर चर्चा हुई, क्योंकि मनरेगा कर्मी विगत 12-13 वर्षों से सरकार को अपनी सेवा देते आ रहे हैं। इस पर अब अगर बर्खास्त करने जैसी कार्रवाई की जाती है, तो मनरेगा कर्मी क्या करेंगे कहां जाएंगे? यह मनरेगा कर्मी झारखंडी लोग हैं, अतः बर्खास्त करने के बजाय इन्हें निलंबित किया जाए या राशि वसूली या अन्य करवाई की जा सकती है, इससे मनरेगा कर्मी एवं उनके परिवार का भविष्य सुरक्षित रहेगा। वार्ता में अनुबंध कर्मचारी महासंघ के संयुक्त सचिव  सुशील पांडे, बसंत सिंह, मोहम्मद इम्तियाज, जॉन पीटर बागे और देवेंद्र उपाध्याय उपस्थित थे।

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