मनरेगा कर्मियों के अनिश्चित कालीन हड़ताल के बीच मनरेगा मजदूरों के काम के संकट से उबार पाएगा ‘काम माँगों, काम पाओ’ अभियान?

65
316
  • विशद कुमार

झारखंड राज्य मनरेगा कर्मचारी संघ के अह्वान पर मनरेगा 27 जुलाई से अपनी 5 सूत्री मांगों को लेकर मनरेगा कर्मी अनिश्चित कालीन राज्यव्यापी हड़ताल पर हैं। जिसका सीधा असर राज्य के मनरेगा मजदूरों पर पड़ रहा है। बताते चलें कि झारखंड में 52,96,000 ग्रामीण परिवार मनरेगा जॉब कार्डधारक हैं। जिनमें 91,48,000 मनरेगा मजदूर रोजगार में शामिल हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य के सभी 24 जिलों में कार्यरत मनरेगा कार्यालयों की सूची में 51,2668 ऐसे मजदूर हैं, जो रजिस्टर्ड तो हैं, लेकिन उन्हें जॉब कार्ड नहीं मिला है। जिलावार आंकड़े देखें तो — सरायकेला—288, लातेहार—24447, धनबाद— 1841, रांची 27094, लोहरदगा—3000, देवघर—27322, खूंटी—6779, चतरा—27574, रामगढ़—8392, हजारीबाग—29098, गुमला—8843, गिरिडीह—30427, सिमडेगा—16105, गोड्डा—30645, पूर्वी सिंहभूम—16507, साहिबगंज—32397, कोडरमा—17225, दुमका—32550, जामताड़ा—17829, गढ़वा—35780, बोकारो—22294, पलामू—41055, पश्चिम सिंहभूम—29643, पाकुड़—25533, जिसके कारण मनरेगा योजनाओं में उन्हें काम नहीं मिल रहा है।

उल्लेखनीय है कि जहां कोविड 19 से उत्पन्न संकट से पिछले 4 महीनों से आर्थिक गतिविधि लगभग ठहर से गयी है, वहीं खेतीहर मजदूर और छोटे—मोटे किसान अब धान रोपनी के कार्यों से मुक्त चुके हैं। पूर्व में जो मजदूर धान रोपनी से मुक्त होकर एक बड़ी संख्या में अन्य राज्यों में पलायन करते थे, वैसे मजदूर भी अब अपने अपने गांवों में मौजूद हैं। वैसे में इन मजदूरों और छोटे किसानों की आर्थिक चिन्ता बढ़ गयी है। दूसरी तरफ राज्य के ग्रामीण इलाकों में लगभग प्रवासी मजदूर भी अपने गांव वापस लौट चुके हैं।

अब जब मनरेगा कर्मी अनिश्चित कालीन राज्यव्यापी हड़ताल पर हैं तो ग्रामीण विकास विभाग इनकी मांगों पर विचार न करके 16 अगस्त से राज्य व्यापी ‘काम माँगों, काम पाओ’ अभियान शुरू किया है। जिसके तहत विभाग ने सोशल ऑडिट यूनिट को मनरेगा मजदूरों से काम मांगवाने की जिम्मेवारी सौंपी है। वहीं काम मांगने की प्रक्रिया को बेहद सरल कर दी गई है।  इस हालिया निर्देश के तहत अब मजदूरों के कार्य आवेदन ईमेल और वाट्सएप के जरिए भी स्वीकार की जाएगी और इसकी पूरी कानूनी मान्यता होगी। अतः गांवों के मजदूर समूहों में कार्य आवेदन तैयार कर, उसके फोटो लेकर स्वयं अथवा गांव में उपलब्ध किसी के स्मार्ट फोन के जरिये भी अपना आवेदन स्थानीय प्रशासन को समर्पित कर रहे हैं।

हम कह सकते हैं कि मजदूरों द्वारा काम की मांग किये जाने पर योजना के संचालन की अनियमितता में कमी आ सकती है। वहीं मनरेगा योजना को ठेकेदारों और बिचौलियों से मुक्त किया जा सकता है।n नरेगा वाच के संयोजक जेम्स हेरेंज बताते हैं कि ”इस प्रक्रिया की मांग राज्य के सामाजिक संगठन लम्बे समय से लगातार करते रहे थे।”

वहीं दूसरी तरफ जेम्स हेरेंज कहते हैं कि ”अभी जिस रफ्तार से मजदूर काम के आवेदन दे रहे हैं और दूसरी तरफ मनरेगाकर्मी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं, ऐसे में सभी काम मांग करने वाले मजदूरों का रिकार्ड संधारित करते हुए काम उपलब्ध कराना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। एक तो सरकार के पास मनरेगा के प्रारंभ से अब तक ऐसा कोई तंत्र विकसित नहीं हुआ है, जिसमें ग्रामवार व पंचायतवार वास्तविक मनरेगा श्रमिकों की संख्या का सही आंकड़ा रिकार्ड हो। मनरेगा मार्गदर्शिका अध्याय 6 के अनुसार प्रत्येक वर्ष 31 मार्च तक वास्तविक मांग के अनुसार प्रत्येक गांव की योजनाओं के लिए ‘सेल्फ आफ वर्क्स’ तैयार रहनी चाहिए था। जब भी मजदूर काम मांगे तो मौसम के अनुसार मजदूरों को तुरन्त काम उपलब्ध कराया जा सकता था। अभी प्रशासन, जब मजदूर काम मांग कर रहे हैं, तो योजना स्वीकृति के लिए रिकार्ड तैयार करने के काम में लग रहा है। इन परिस्थितियों में ऐसा ‘घर में आग लगने पर कुआं खोदने’ के समान है। योजना स्वीकृति हेतु फाईलों को संधारण और 7 रजिस्टर्स का संधारण आज की तारीख में सिर्फ रोजगार सेवक और बीपीओ को ही है। इस दफा सरकार को चाहिए कि जिन भी कर्मियों को मनरेगा कार्यों के संचालन में लगाया गया है उनको सरकार द्वारा समय-समय पर दिये गये दिशा-निर्देशों, कानूनी प्रावधानों और मनरेगा वेबसाईट में संधारित की जानेवाली जारकारियों के बारे में अपने मशीनरी के लोगों को नियमित तौर पर प्रशिक्षित करें।”

बताते चलें कि 16 अगस्त से शुरू हुए राज्य व्यापी ‘काम मांगों, काम पाओ’ अभियान के तहत 23 अगस्त 2020 तक  पूरे राज्य में कुल 2,62,121 मजदूरों ने काम की मांग की है, जिसमें सबसे ज्यादा गिरिडीह जिला में 29,558 मजदूरों ने काम की मांग की है। जबकि सबसे कम खूंटी जिले से मात्र 2448 लोगों ने काम की मांग की है। इस काम की मांग में दूसरे नंबर पर पलामू जिला है, जहां 20,779 लोगों ने काम की मांग की है। जबकि सबसे कम काम की मांग करने वाला खूंटी जिला के बाद सिमडेगा है जहां मात्र 3761 मजदूरों नें काम की मांग की है।

जो जिलावार इस प्रकार है —

1 गिरिडीह — 29558

2 पलामू  — 20779

3 बोकारो — 19614

4 लातेहार — 17602

5 रामगढ़ — 16501

6 हजारीबाग — 15324

9 साहेबगंज — 13312

7 गढ़वा — 12992

8 गोड्डा — 12809

10 रांची — 12647

11 दुमका — 10910

12 देवघर — 10781

13 जामताड़ा — 10371

14 सरायकेला — 9126

15 चतरा — 6650

16 पूर्वी सिंहभूम — 6256

17 धनबाद — 5972

18 पाकुड़ — 5908

19 प. सिंहभूम — 5445

20 गुमला — 4959

21 लोहरदगा — 4616

22 कोडरमा — 3780

23 सिमडेगा — 3761

24 खूंटी — 2448

बताते चलें कि मनरेगा के काम को काफी सरलता व पारदर्शिता से चलाने के लिए झारखंड नरेगा वाच के संयोजक जेम्स हेरेंज ने 19 अगस्त 2020 को ग्रामीण विकास विभाग के प्रधान सचिव को एक पत्र भेजकर झारखण्ड राज्य में मनरेगा अधिनियम 2005 की धारा 12 (1), 16 (1) एवं अनुसूची I और अनुसूची II संशोधन आदेश 2013 धारा 29 (क) से (ठ), धारा 30 एवं 31 के तहत संविधानिक ढ़ांचों के गठन एवं क्रियान्वयन सुनिश्चित करने की मांग की है। उन्होंने अपने पत्र में चार बिंदुओं पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि ”झारखण्ड राज्य गारंटी परिषद की अंतिम बैठक 4 साल पूर्व 27 जुलाई 2016 को की गई थी। इस संवैधानिक ढांचे के नहीं होने के कारण आज मनरेगा योजनाओं के नीतिगत निर्णय और अनुश्रवण जैसे महत्वपूर्ण कार्य प्रभावित हुए हैं।”

”राज्य में मनरेगा योजनाओं के चयन एवं क्रियान्वयन में ग्राम सभाओं की भूमिका को लगातार कमजोर किया जा रहा है। मनरेगा मार्गदर्शिका 2013, अध्याय 6 का आखरी बार अनुपालन 2015 में योजना बनाओ अभियान के रूप में किया गया था। 2020-21 में जो भी योजनायें ली गई हैं, उनमें ग्राम सभाओं की कोई भी भूमिका नहीं है। पेसा अधिनियम के तहत गठित ग्राम निगरानी समितियों को भी दरकिनार किया गया है।”

”मनरेगा अधिनियम 2005, अनुसूची II संशोधन आदेश 2013 धारा 29 (क) से (ठ) में वर्णित प्रावधानों का ग्राम पंचायतों एवं प्रखंडों के स्तर पर अनुपालन नगण्य है। जिला एवं राज्य स्तर पर सिर्फ उन्हीं मामलों पर आंशिक कार्रवाई की जा रही है, जिनमें वित्तीय गड़बड़ियाँ शामिल हैं। जबकि प्रखंड स्तर पर मनरेगा श्रमिकों तथा आम नागरिकों की दूसरी तरह की भी समस्याएं हैं।”

”मनरेगा अधिनियम 2005, अनुसूची II संशोधन आदेश 2013 धारा 30 में प्रत्येक जिले स्तर पर मनरेगा से सम्बंधित शिकायतों को प्राप्त करने, जांच करने और आदेश पारित करने हेतु मनरेगा लोकपालों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है। लेकिन झारखण्ड राज्य में जुलाई 2020 से मनरेगा लोकपालों की भूमिका को निष्प्रभावी कर दी गयी है। अत: आप से मांग करते हैं कि उपरोक्त क़ानूनी प्रावधानों को राज्य में सख्ती से लागू कराया जाय। जिससे कि मनरेगा योजनाओं और गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाया जा सके। राज्य हित में मनरेगा श्रमिकों तथा कमजोर वर्गों के हित में नीतिगत निर्णय लिए जा सकें तथा अनियमितताओं पर नियमित निगरानी रखी जा सके।”

ऐसे में जब मनरेगा कर्मी हड़ताल पर हैं, तो मजदूरों का रिकार्ड बनाने में विभाग को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। नियम के अनुसार अगर तय समय पर मजदूरों को काम नहीं दिया जाता है, तो ऐसी स्थिति में मजदूर बेरोजगारी भत्ता के हकदार होते हैं। अभी जिस रफ्तार से मजदूर काम के लिए आवेदन दे रहे हैं, और मनरेगा कर्मी अनिश्चित कालीन हड़ताल पर हैं, ऐसे में सभी काम मांग करने वाले मजदूरों का रिकार्ड बनाते हुए काम उपलब्ध कराना विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती होगी, जिसमें विभाग के फेल होने की पूरी की पूरी संभावना है। तब जाहिर है मजदूरों में अफरा तफरी का माहौल बन सकता है, जिसका पूरा ठिकरा हेमंत सरकार के सिर पर फोड़ा जा सकता है। विपक्ष, खासकर भाजपा इस मामले को लेकर हेमंत सरकार को घेरने की पूरी कोशिश करेगी। सूत्र बताते हैं कि मनरेगा कर्मियों का हड़ताल और उनकी मांगों पर विभाग द्वारा संज्ञान में न लेना हेमंत सरकार के खिलाफ एक गहरी साजिश है। सूत्र बताते हैं कि हेमंत सरकार में कई विभाग के अधिकारी भाजपा के काफी करीबी हैं जो परोक्ष रूप से हेमंत सरकार को भ्रमित कर रहे हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here