… जरा मेडिकल रिप्रजेंटेटिव (एमआर) की तकलीफें भी सुनें!!!

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आज हम आपको एम. आर. (मेडिकल रप्रेजेंटेटिव) के जीवन में कठिनाइयों के बारे में बात करते है।

१) एम.आर. के जीवन में सबसे ज्यादा प्रेसर होता है। उसको सब कुछ सोचना पड़ता है। जैसे कॉल एवरेज, टारगेट, आर. ओ. आइ. (रिटर्न ऑफ इन्वेस्टमेंट), और ब्रांड कॉम्पटीटर।

कॉल एवरेज- इसमें एक एम आर को एवरेज 9-10 का कॉल एवरेज मिलता है। अगर डाक्टर टाइम पर मिले तो इसमें कोई दिक्कत नहीं होती लेकिन आज कल के डाक्टर पहले मरीज़ देखते हैं बाद में कॉल लेते है कई बार ऐसा होता है कि घंटों प्रतीक्षा करने के बाद भी डाक्टर मना कर देते है या कॉल चल रही होती है तभी एक मरीज़ आ जाता है तो कॉल रोक कर पहले मरीज़ देखने लगते है। जिससे कॉल एवरेज पूरा नहीं हो पाता है और सीनियर कि चार बातें सुननी पड़ती हैं। इसमें कई जगह के अटेंडेंट ही इतना गंदे लहज़े में बात करते है कि मानो यही डाक्टर है। ये सबसे अधिक दुखदाई है।

टारगेट- ये वो प्रेसर होता है जो सब के बस की बात नहीं। इसमें चाहे जो करो पर इसे पूरा करो ये सीनियर की जुबां होती है। अब एम आर बेचारा क्या करें वो स्टाकिस्ट के पास जाकर उसको कन्वेंस करता है बात नहीं बनी तो डाक्टर के पास जाकर गिड़गिड़ाता है और तो और कई बार डाक्टर के अटैंडेंट को भी मानना पड़ता है कि भैया कॉल करवा दो जिससे में डाक्टर साहब से कुछ और प्रोडक्ट एड करने के लिए रिक्वेस्ट कर सकु पर सब कुछ डिपेंड होता है मरीज़ पर जब मरीज़ नहीं है तो डाक्टर बोलता है क्या मै खाऊ दवाई आपकी? अब यहां एम आर बेचारा निराश होकर लौट जाता है फिर अगले दिन किसी और डाक्टर या मेडिकल स्टोर वाले को जाकर उनको रिक्वेस्ट करता है कि भैया ये ज्यादा मंगा लू वो कहता नहीं भैया जितना बोला है उससे ज्यादा मत मांगना नहीं तो मै पेमेंट नहीं करूंगा। सब जगह अक्सर यही जवाब मिलता है। अब कैसे टारगेट पूरा हो वो एम आर कि जिम्मेवारी सीनियर्स को कोई फर्क नहीं होता है। अगर आपका टारगेट पूरा नहीं हुआ तो मीटिंग में जवाब दो खड़े होकर और वहां भी जमकर खिचाई होती ।

आर ओ आइ- इसमें हर डाक्टर का आर ओ आइ (रिटर्न ऑफ इन्वेस्टमेंट) का कैलकुलेशन रखना होता है। हमने अगर किसी डाक्टर के ऊपर अगर इन्वेस्टमेंट किया है और सेल ना आए तो वो कबाहत भी अपने ऊपर आती है। सीनियर रिलेशन अपना बनाते है है इन्वेस्ट कर के और सेल ना आए तो भड़ास अपने पर निकलते है। अगर कोई डाक्टर नहीं लिख रहा है तो हम क्या कर सकते है ज्यादा से ज्यादा रिक्वेस्ट कर सकते है अब लिखना या ना लिखना उनके ऊपर डिपेंड होता है अगर हम उनसे रिटर्न नहीं ले पाते है तो एम आर कि जिम्मेवारी होती है। अब ऐसे परिस्थिति में क्या कर एम आर बेचारा खामोश होकर सब सुनता है कुछ बोल दिया तो उससे रेजिग्नेशन ले लेते है कंपनी वाले तो यह भी एक बहुत बड़ी जिम्मेवारी होती है एम आर कि की कैसे रिटर्न लेना है।

ब्रांड कॉम्पटीटर- ये ऐसा काम होता है जिसमें सबसे ज्यादा गुस्सा आता है। डाक्टर चाहे जो लिखे ये उसकी चॉइस है पर क्या लिख रहा है ये याद रखना हमारी जिम्मेदारी है अब मैनेजर्स को कौन समझाए कि एक दो दस बीस कंपनी नहीं है जो याद किया जा सके कि डाक्टर किस कंपनी का लिख रहे है लेकिन तुम्हें याद होना चाहिए कि क्या लिख रहे है एक दो डाक्टर तो होते नहीं है लिस्ट में जो चलो कैसे भी कर के याद कर लिए 100-120 डाक्टर होते है सब का याद करना होता है कैसे करना है वो एम आर का प्रॉब्लम है । ऐसी परिस्थिति है आज कल एम आर कि की क्या बताएं समय नहीं दे पाते है अपने परिवार को बेटे को बच्चे को सुबह सब को रिमाइंडर देना है और देर रात तक कॉल भी करना है। ऐसे में हमारे पास यूनियन ही एक विकल्प होता है पर वो भी कुछ नहीं करते है सिवाय यूनियन फीस लेने के अब हालत ऐसी है हम एम आर कि की परिवार चलने के लिए सब कुछ सहना पड़ता है। अगर जो कोई भी डाक्टर या सीनियर इस लेख को पड़ रहे है तो प्लीज़ये भी सोच लिया करें कि हम भी आदमी है कॉल लेने के बाद भी पेशेंट्स देख सकते है तो हम सब को बहुत काम होता है टारगेट नहीं पूरा हुआ तो ये समझ लीजिए कि नहीं हुआ कुछ प्रॉबलम है उसपर एम आर बेचारे को बेज्जती कर के कंपनी से निकालना गलत बात होता है। सो प्लीज़ एक रुके बनाए जिसमें एक निश्चित समय हो एम आर के काम करने का और सैलरी भी ठीक ठाक मिलनी चाहिए जिससे कि वो भी अच्छे से जी सके।

धन्यवाद
आपका अपना एम आर
सलीम अंसारी
दिल्ली हेड क्वार्टर

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