लोक बंधु पार्टी के युवा नेता निकलेश सिंह ने मई दिवस पर किया अमेठी का तूफानी दौरा

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वाराणसीः लोक बंधु पार्टी के वरिष्ठ नेता गुरु प्रसाद सिंह के दिशा-निर्देश पर निकलेश सिंह और सुजीत कुमार राजभर ने लोक बंधु पार्टी के विस्तार एवम् प्रचार-प्रसार के क्रम में पिपरी-ननौती पहुँचकर गाँव के संभ्रांतजनों को मई दिवस की शुभकामना दी और अपनी पार्टी के लक्ष्य के बारे में विस्तार से बताया।

जनसमुदाय के समक्ष अपने संबोधन में एच. एन. तिवारी ने कहा कि हम अपने समय के सबसे अंधेरे दौर से गुजर रहे हैं , जब 19वीं और 20वीं शताब्दी के संघर्ष और जीतों से हासिल हमारी उपलब्धियों को हमारी ही श्रम शक्ति से पैदा मृत श्रम शक्ति ने लगातार हमारे खिलाफ प्रचार करके और हमारी सताओं पर हमला करके , हमें हमारी ताकत से दूर करके, अकेला बना दिया, कमजोर बना दिया । आज मृत श्रम शक्ति , जो हमारे लिए हमारी ही मृत आत्मा है , एक समानांतर दुनिया का निर्माण कर रही है । एक ऐसी दुनिया का विस्तार कर रही है , जिसमें सब के सब मृत आत्मा को ही प्यार करते हैं । हमारी दुनिया और समाज में तो जीवन का मतलब संवेदना होता है , जीवन का मतलब प्यार होता है, शांति होती है , एक दूसरे के दुख में खड़ा होना और उन की खुशियों में मुस्कुराना और हंसना होता है। लेकिन इस अंधेरे समय और पूंजी के युग में मृत आत्माओं के इस साम्राज्य में सब कुछ धीरे-धीरे करके नष्ट हो गया , जो हमारी जन संस्कृति में थी, जो हमारे हजारों वर्षों के श्रम की संस्कृति से विकास हुई थी । अब दुनिया है ‘मृत आत्माओं की , ऐसी दुनिया है जहां कोई हंसता भी है तो इस मकसद से कि मुद्रा कैसे बनाया जाए, मदद करता है लेकिन नजर इस बात पर रहती है कि और ज्यादा मोटी कमाई कैसे की जाए । यहाँ हर चीज की कीमत होती है ।

ये प्रेत आत्माएं हमारे और आपके दिमाग में बैठा रही है कि इसने ही मूल्य पैदा किया है , जबकि वह हमारी ही श्रमशक्ति से पैदा किए गए मूल्य को निचोड़कर छीनकर, चुराकर मृत आत्मा के रूप में विशालकाय बनता जा रहा है ।और महासागरों , वन प्रदेशों , नदियों , मनुष्य के आसपास के सभी साधनों पर कब्जा करता जा रहा है | उसकी आंखें प्रकृति के सौंदर्य को नहीं देखती है , उसका कान संगीत नहीं सुनता है, उसका जीभ मनुष्य के हाथों से बने भोजन का स्वाद नहीं जानता है , उसे बस एक ही नशा होता है , कैसे अपने आप को विस्तार दिया जाए , और प्रकृति और मनुष्य की सारी अच्छाइयों को , सारी ताकत को , सारी उपलब्धियों को अपने नियंत्रण में लेकर मृत आत्मा में बदल दिया जाए । हमारे अंदर वह प्रवेश कर रहा है । हमारे अंदर प्रवेश करने के बाद वह और आक्रमक हो जाता है । हमारे अंदर का जो कुछ भी पावन है ,सुंदर है , सृजन की क्षमता है उसे तबाह करके वह हमें लगातार नष्ट कर रहा है ।इसलिए आज की लड़ाई अपने अंदर इस फैलते मृत श्रम शक्ति की आत्माओं के खिलाफ है ,जो सबसे ज्यादा अपने को सुरक्षित हमारे अंदर प्रवेश करके महसूस करता है । अब हम उसे पहचान नहीं पाते हैं और वह हमारे अपने अंदर के वैचारिक ‘ संस्कृति, आदतों को अपने कब्जे में ले लेता है। अपने अंदर के इस प्रेतात्मा के खिलाफ कार्यभार को हम नहीं तय कर पाते हैं । हम कमजोर होते जा रहे हैं । तब इसके साम्राज्य को चुनौती देने का साहस और कौन कर सकता है ?
बीसवीं सदी में हमने सभी उत्पीड़ित और मेहनतकश समाज को रास्ता दिखाया था । आज उत्पीड़ित समाज के लोग अपनी कमजोरी को महसूस कर रहे हैं , इस हमले से अपने को तबाह होते हुए देख रहे हैं लेकिन इसके खिलाफ , इसे पराजित करने वाला समाज और व्यवस्था नहीं बना सकते हैं ,क्योंकि मृत आत्मा उनके अंदर प्रवेश करके उन्हें इस बात के लिए तैयार कर चुका है कि तुम्हारी भी मुक्ति हम ही में आ मिलने से होगा । इसलिए सब के सब अपनी छोटी पूंजी को बड़ी पूंजी बनाने में मशगूल है । इस आपदा ने इनकी छोटी पूंजी को बड़ी पूंजी में जा मिलने का अवसर दिया है। हमारी ही मृत शक्ति इस संकट को अवसर में बदल कर विशालकाय होती जा रही है । पूरी दुनिया में मृत आत्मा इसी तरह से छोटी पूंजी को निगल निगल कर कोरोना काल के अवसरों को पैदा कर बड़ी होती जा रही है । इसलिए अब जंग जीतने के लिए सबसे पहले मजदूर और मेहनतकशों को भी अपने अंदर प्रवेश कर गए इस मृत श्रम शक्ति की आत्मा को ध्वस्त करना होगा और उसके लिए जो आवश्यक दवाइयां है , आज के समय में उसे लेना पड़ेगा ।मई दिवस का संदेश इन दवाइयों की पोटली है जिसे हमें आत्मसात करना पड़ेगा l

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