सितम की तेंगे क़लम दें उसे जो ऐ मजरूह ग़ज़ल को कत्ल करे, नूमेआ को शिकार करे

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“हाये ग़ज़ल ख़ामोश”
सन-2000

तरक्क़ी पंसद तहरीक (प्रगतिशील) से वाबस्ता मजरुह सुल्तान पुरी वाहिद शायर हैं जिन्होंने ग़ज़ल को अपना कैनवस चूना समाजी,माशरती, पहलू पर बातों को कहने के लिए उस दौर के सभी शोरा नज्म के ज़रिया अपनी बातों को आवाम तक पहुंचा रहे थे
मजरुह ने ग़ज़ल को एक नया डायेमेन्शन दिया,हालात पर वार किया ” अफ़कार वो ख़्याल को पोटरबुल बना दिया”यानी कम से कम लफ़्ज़ों में अपनी बातों को आसानी से कह जाना,ये सलीका मजरुह के यहाँ बा आसानी नज़र आता है

देखना दिदा वों,आमदे तूफ़ान तो नहीं
टपकी है दर्द की इक बूँद मेरे आंगन में।
ज़माने का तमाम दर्द समेटे हुए थे। हर पल लोगों की फ़िक्र,इनसानीयत का दर्द, मुल्क से बेपनाह मुहब्बत का जज़्बा रखने वाले इन्सान मजरुह सुल्तान पुरी जो किसी तार्रुफ़ का मोहताज नहीं।
24 मई सन 2000 को 11:30 रात इस दुनिया ए फ़ानी को अलविदा कहा। उसी दिन दिन में उन्होने मुझसे बात की थी बुध का दिन था उन्होने बताया के कल मंगल को “क्या कहना” फ़िल्म के प्रीमियर पार्टी में मैं गया तो ज़रूर था लोगों के बेहद इसरार पर लेकिन मेरी तबियत नाराज़ थी उसके बावजूद मुझे जाना पडा क्योंकि उसके गाने मैने ही लिखें हैं तो ये सज़ा भी मैं ही भूकतंतुगा। तब मुझे बडा अजीब लगा था मजरुह साहब की ये बातें सुनकर और ये भी बताया के अब मेरी सांसों के कुछ पैरेंट ही बाक़ी बचे है।तो भी मैं बिल्कुल नहीं समझ पाया थी के वो किधर इशारा कर रहें हैं मुझे क्या बताना चाह रहें हैं।आज जब भी उनकी वो बातें याद आतीं हैं एक बेकैफ़ी का आलम हो जाता है उन्होने मुझसे अपनी बहुत सारी बातें शेयर की थी बहुत कुछ बताया था वो उन्होने मुझे अपनी बेटी बनाया था मुझे वो दुख़तर नेकअक़्तर कहकर मुक़ातिब करते थे।इतने साल हो गए उनके इनतेख़ाल को आज भी मैं आज की तारीख को गुमसुम रहती हूँ
“हाये ग़ज़ल ख़ामोश”
सन् 2000
एक दिन ये अफ़सोसनाक,पूरमलाल तारिखे़ वफ़ात मुझे ही निकालनी पडेगी क्या पता था।
मजरुह सुल्तान पुरी तरक़्क़ी पसंद ग़ज़ल (प्रगतिशील) के अकेले शायर हैं जिन्होंने समाज की बातें,अवाम के मसले,इनसानीयत की भलाई ज़ात-पात,भेद-भाव, ज़ुल्म व बरबरियत,सरमायादारी निज़ाम की फ़रेबकारी, मक्कारी इनसानी दुख दर्द।
ये सारी तिशनगी मजरुह ने अपनी ग़ज़ल का लिबास बनाया है ग़ज़ल को समाजी शाओर बक़्शा है
ग़ज़ल पर से नीम वहशी,ग़ज़ल वजह, कोठों की गायकी,ग़ज़ल समाजी मसायल और ईनक़लाबे वतन के मामले में साथ नहीं दे सकती है।
ग़ज़ल पर जितने भी इल्ज़ाम लगाये गये उस वक्त मजरुह ने उसे बचा लिया,सारे इलज़ाम को गलत साबित किया और ग़ज़ल को एक नया रूढ़ अता किया,ग़ज़ल को डाईमेनशन दिया ।मजरुह ये कहने पर मजबूर होकर कहा के

सितम की तेंगे क़लम दें उसे जो ऐ मजरूह
ग़ज़ल को कत्ल करे, नूमेआ को शिकार करे।

रोक सकता हमें ज़िंनदाने बला क्या मजरूह
हम तो आवाज़ हैं दीवार से छन जाते हैं
या ये भी
बनामें कूचा ए दिलदार गुल बरस के संग आए
हँसा है चाके पैराहन,न क्या चेहरे पे रंग आए

देख कलियों का चटकना सरे गुलशने सैयाद
ज़मज़मा संज मेरा ख़ूने जिगर है कि नहीं

देख ज़िन्दाँ से परे रंगे चमन जोश ए बहार
रक़्स करना है तो पाँव की ज़ंजीर न देख
ये सारे अशार मजरुह को सबसे जुदा बना देते हैं
मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर
लोग साथ आते गये और कारवाँ बनता गया
मजरुह के हम असर शोरा में मोईन अहसन जज़्बी,फि़राक़ गोरखपुरी,फैज़ अहमद फैज़,सैयद अतहर हुसैन रिज़वी कैफ़ी आज़म, अली सरदार जाफ़री,नशूर वाहदी,इसरारुल हक़ मजाज़ लकनवी,खुमार बारा बंकवी,आंनद नारायन मुल्ला,नजी़र बनारसी,जगन नाथ आज़ाद,और कैफ़ेटेरिया भूपाली वगैरह।
ये सभी अपने अपने तौर पर क़लम के ज़रिए जंगे आज़ादी में बड़ चड कर हिस्सा ले रहे थे ।
मजरुह अमन व अमान के हिन्दुस्तान का ख़्वाब देखा कर था
वो बातों ही बातों में कहा करते थे वो दिन जरूर आयेगा जिस दिन सभी एक होगें हर तरफ़ इनसानी रिश्ते क़ायम होंगे, हर तरफ़ ख़ुशीयाँ होंगी वो दिन ज़रुर आयेगा।
और एकदम से ख़ामोश हो जाते फिर कहते थोडा रूककर मै तो नहीं रहूगा तूम देखना मैं क्या बोलती चुपचाप रहती
मेरी मुलाक़ात नहीं हो पाई थी वो घंटों फोन से बातें किया करते थे उस वक्तसिर्फ़ लैंडलाइन हुआ करता था।
ये बडी लम्बी दास्तान है के मैं मजरुह से कैसे फोन के ज़रिए मिली इसका ज़िक्र कभी और कंरूगीं।
मजरुह का एक और दीवान है तमाशाई नाम से उसमें उनके सिर्फ तंज़ानिया ग़ज़लें हैं
और भी बहुत से फ़ौंट के माहिर थे।
हम बजा तौर पर कह सकते हैं की ऐसी शक़्सियत सदियों में हुआ करती है उनकी जगह कोई नहीं ले सकता है
कहने को तो बहोत है ।मैं मजरुह साहब को नमनाक आँखों के साथ तहेदिल से ख़ैराजे अक़िदत (सच्ची श्रद्धांजलि) पेश कर रही हूँ।
उन्हीं के एक आशार के साथ मैं अपनी बातों को ख़तम कर रही हूँ

अब की ऐसा है क्या कीजिए
वक्त ही फ़ितनागर है क्या कीजिए
साथ अपने कोई न आयेगा
हंस अकेला ही उसके जायेगा
ख़तम शुद


डाॅ. नूर फ़ातमा
मुगलसराय-चन्दौली
21/05/2021

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