लूला डी सिल्वा की जीत से ब्राज़ील में किसी क्रान्तिकारी परिवर्तन की उम्मीद करना खुद को धोखे में रखना होगा

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ब्राजील में तथाकथित वामपन्थी लूला डी सिल्वा की जीत से ब्राज़ील में किसी क्रान्तिकारी परिवर्तन की उम्मीद करना खुद को धोखे में रखना होगा।

लूला द्वारा दक्षिणपंथी बोलसोनारो को हराया जाना फ़ौरी तौर पर दक्षिणपंथियों को एक झटका ज़रूर है, लेकिन मामूली अंतर (49.2% के बरक्स 50.8%) से हुई यह जीत दिखाती है कि ब्राज़ील में दक्षिणपंथियों का समाज पर गहरा प्रभाव बना हुआ है। साथ ही लूला के पिछले 2 शासनकाल भी दिखाते हैं कि वे पूंजीपति वर्ग के ही दूरगामी हित में काम करते हैं, ग़रीबी के दलदल में धकेल दिये गये लोगों को कुछ आर्थिक राहत पहुँचाकर सुधारवादी कामों के ज़रिये पूंजीवाद को प्राणवायु देने का काम ही करते हैं, समाजवाद उनके लिए केवल मुखौटा भर है।

ब्राज़ील में लूला की जीत उनके पिछले कामों की लोकप्रियता से अधिक बोलसोनारो की बढ़ती अलोकप्रियता की वजह से हुई है। कोविड के कुप्रबंधन और देश की लगातार गिरती अर्थव्यवस्था की वजह से लोग बोलसोनारो को सत्ता से दूर रखना चाहते थे।

ब्राज़ील इस वक्त गम्भीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। अभी ब्राज़ील पर उसकी जीडीपी का 78.6% क़र्ज़ है, क़रीब 15% लोग बेरोज़गार हैं, पिछले दो तिमाही में इन्फ़्लेशन 10% से ऊपर बना हुआ है, कुल 21.5 करोड़ आबादी वाले ब्राज़ील में 10 करोड़ लोग ग़रीबी के दलदल में फँसे हुए हैं, जिनमें से 3.3 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं।

पिछली बार लूला जनता को जितनी फ़ौरी राहत दे सके अब वह भी सम्भव नहीं है। न तो देश की ख़स्ताहाल आर्थिक स्थिति में पूंजीवाद के अंदर अब ऐसा करने की गुंजाइश बची है न ही उनका गठबंधन व ब्राज़ील का बाक़ी शासकवर्ग उनको पूँजीपतियों के मुनाफ़े में कटौती कर मेहनतकशों को राहत पहुँचाने की इजाज़त देगा।

हाँ, लूला की जीत यह ज़रूर दिखाती है कि ब्राज़ील की जनता दक्षिणपंथी राजनीति, गहराते आर्थिक संकट, व कोविड महामारी से पैदा हुई बदहाली से नाखुश है। पर क्रान्तिकारी विकल्पहीनता की स्थिति में, पिछले दो शासन काल में मेहनतकश जनता के जीवन में कोई आमूल चूल परिवर्तन न ला पाने, व भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे होने वाले लूला को ही चुनना जनता की मजबूरी थी।

दुनिया भर में पूँजीवाद संकट में घिरता जा रहा है, आर्थिक मंदी लगातार गहराती जा रही है, महँगाई, बेरोज़गारी अपने चरम पर है। इस आर्थिक संकट के प्रभाव को कम करने के लिये दुनिया भर में राजनैतिक बदलाव किये जा रहे हैं, पर कोई भी शासक अपने देश को इस संकट से उबारने में सक्षम नहीं है। यह पूँजीवादी व्यवस्था से पैदा हुआ संकट है इसका इलाज पूँजीवादी व्यवस्था के अंदर सम्भव ही नहीं है।लूला जैसे सुधारवादी नेताओं के नीम हक़ीमी नुस्ख़ों से इस असाध्य बीमारी का कोई इलाज नहीं होने वाला है।
अब क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने वाली शक्तियाँ ही इस पूँजीवादी व्यवस्था को ध्वस्त कर समाजवादी व्यवस्था स्थापित कर बार-बार आने वाले इन संकटों से मुक्ति दे सकती हैं।

—धर्मेन्द्र आज़ाद

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