हिमगिरि का उत्तुंग शिखर

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आधुनिक हिन्दी – काव्य के सर्वोच्च क्लासिक ‘ कामायनी ‘ के प्रणेता जयशंकर प्रसाद गोस्वामी तुलसीदास और सूरदास के बाद हिंदी के तीसरे सबसे बड़े कवि हैं । उसके बाद कवित्व की दृष्टि से जायसी और निराला का स्थान सुरक्षित है । बहुआयामी प्रतिभा संपन्न प्रसाद कथा – सृजन में यदि प्रेमचंद को अतिक्रमित करते हैं तो नाटक के क्षेत्र में एक नया प्रतिमान रचते हैं । उनका युग प्रवर्तक व्यक्तित्व कविता के कंकाल को नूतन मांसल सौन्दर्य प्रदान करता है । वैयक्तिक प्रणय और राष्ट्र – प्रेम के द्वंद्व पर आधारित उनकी रोमांटिक कहानियाँ अतीन्द्रिय प्रेम का आकाशदीप रचती हैं । तो किशोर काल में आँसू का झरना बह निकलता है और वीणा के आस्फालन की संगीत – लिपियाँ समय की शिला पर मन के मधुर चित्र बना देती हैं । चंद्रगुप्त , समुद्रगुप्त और ध्रुवस्वामिनी इतिहास के स्वर्ण काल की सृष्टि करते हैं ।अद्भुत चरित्रों का उदात्त सृजन समकालीन सांस्कृतिक क्षरण के दौर में कितना उत्प्रेरक है !
कामायनी आधुनिक युग की महत्तम प्रबंधात्मक काव्यकृति है । गंभीर सभ्यता – विमर्श और मानवता के विकास के साथ ही उसमें मानव मन के विकास की गाथा भी विन्यस्त है । यह काण्ड या घटना प्रधान न होकर भावों की मधुमयी व्यंजना और मन के अंतर्द्वन्द्वों को संबोधित है । इसमें मनु , श्रद्धा और इड़ा प्रतीकात्मक अर्थ रखते हैं , जैसे पद्मावत के पात्र । समासोक्ति मूलक काव्य संरचना का शिलान्यास ।इतिहास के दर्पण में वर्तमान को बिम्बित करने और दार्शनिक शिल्प में काव्य – सत्य को आयत्त करने के अनुष्ठान में जो प्रसाद या पाथेय प्राप्त होता है , वह विरल है । इतिहास की ध्वंसात्मक संरचना और कश्मीरी शैवागम के प्रत्यभिग्या दर्शन को काव्यार्थ की सान्द्रता के साथ प्रस्तुत करना और बड़े जीवन – चक्रों को हाथ में लेकर उसे एक व्यापक समाहार तक ले जाना प्रसाद के ही बूते का था । सैंतालिस वर्ष की अल्पायु में लंबी आयु की कालजयी रचना दे गए ।आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने मनोविकारों पर बेकन की अपेक्षा प्रौढ़ निबंध लिखे । पर उसे काव्यानुभूति के आसव में ढाल देना क्लासिकल काव्य के निर्माण के लिए उत्तरदायी है । आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने इस प्रसाद गुण का विशद विवेचन किया है । किन्तु आज की आलोचना तो उनके सौन्दर्य जलधि से अपना गरल – पात्र ही भर लाई है ।
ग्यान दूर , कुछ क्रिया भिन्न है,
इच्छा क्यों पूरी हो मन की?
एक दूसरे से न मिल सकें ,
यह विडंबना है जीवन की।
प्रसाद और प्रेमचंद महान रचनाकार हैं । निराला और दिनकर भी उसी अर्थ में महान सर्जक हैं । किन्तु कथित प्रगतिवादियों ने प्रसाद को नीचा दिखाने के लिए निराला को खड़ा किया और अग्येय को डाउन करने के लिए जोर – जोर से मुक्तिबोध का टीना पीटते रहे ।किन्तु ——–
यह नीड़ मनोहर कृतियों का ,
यह विश्व कर्म रंगस्थल है ।
है परंपरा लग रही यहाँ , ठहरा जिसमें जितना बल है ।
प्रेमचंद ने कथा – संसार को आदर्शोन्मुख यथार्थवाद का जो मंत्र ‘ दिया , उस पर प्रगतिशीलों ने ‘ कफन ‘ उढ़ा दिया । प्रसाद का तो प्रादुर्भाव ही त्वरा और संवेग के साथ हुआ ——–
किस गहन गुहा से अति अधीर !
झंझा प्रवाह सा निकला यह जीवन विक्षुब्ध महासमीर । आचार्य नंददुलारे वाजपेयी कहते हैं कि खंडप्रलय की अनंत जलराशि में सारे देवता डूब गए और मनु अकेले बच गए । जाहिर है कि वे सर्वाधिक वीर्यवान थे । यह कथन स्वयं प्रसाद पर चरितार्थ होता है । यहाँ रुककर यह कहना जरूरी है कि प्रलय के निरूपण में भाषा की जो लय है , वह विश्व – साहित्य में बेजोड़ है । इस सामूहिक ध्वंस या महाविनाश का कारण निर्बाध भोग – लिप्सा और खुद को प्रकृति का नियंता समझने का दंभ है ——–
उनको देख कौन रोया यों , अंतरिक्ष में बैठ अधीर ?
व्यस्त बरसने लगा अश्रुमय यह प्रालेय हलाहल नीर ।
हाहाकार हुआ क्रंदनमय , कठिन कुलिश होते थे चूर ।
हुए दिगंत बधिर भीषण रव बार – बार होता था क्रूर ।
दिग्दाहों से धूम उठे या जलधर उठे क्षितिज तट के ।
सघन गगन में भीम प्रकंपन , झंझा के चलते झटके ।
पंचभूत का भैरव मिश्रण , शंपाओं के शकल निपात ।
उल्का लेकर अमर शक्तियाँ खोज रहीं ज्यों खोया प्रात 
बार -बार उस भीषण रव से कँपती धरती देख विशेष ।
मानो नील व्योम उतरा हो , आलिंगन के हेतु अशेष ।
उधर गरजती सिन्धु लहरियाँ , कुटिल काल के जालों सी ।
चली आ रहीं फेन उगलती , फन फैलाए व्यालों सी ।
धँसती धरा , धधकती ज्वाला , ज्वालामुखियों के निःश्वास ।
और संकुचित क्रमशः उसके अवयव का होता था ह्रास 
सबल तरंगाघातों से उस क्रुद्ध सिंधु के विचलित सी ।
व्यस्त महाकच्छप सी धरणी ऊभ – चूभ थी विकलित सी ।
बढ़ने लगा विलास वेग सा वह अति भैरव जल संघात ।
तरल तिमिर से प्रलय पवन का होता आलिंगन प्रतिघात ।
मनुष्य की नियति और उसकी अस्तित्वीय पहचान से जुड़े गंभीर प्रश्नों को सभ्यता – विमर्श के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करते हुए प्रसाद जी ने जिस काव्य – दर्शन की अवतारणा की है , वह हिमगिरि के उत्तुंग शिखर से आर्द्र आँखों से देखा गया मानवीय सत्य है । इतिवृत्तात्मकता के बजाय हर सर्ग का नाटकीय आरम्भ नये कौतूहल की सृष्टि करता है । अभाव की चपल बालिका चिंता की जन्मकुण्डली बनाने के बाद फ्लैश बैक या पूर्वदीप्ति तकनीक के द्वारा देव – सृष्टि के विगत ऐश्वर्य का आख्यान प्रस्तुत हुआ है ——
चिर किशोर वय नित्य विलासी , सुरभित जिससे रहा दिगंत ।
आज तिरोहित हुआ कहाँ वह , मधु से पूर्ण अनंत वसंत
मैं भी यही प्रश्न आज की गद्यब्राण्ड कविता से पूछना चाहता हूँ । कई गुरुजन मुझसे कहते रहे हैं कि छायावादी भाव – बोध से बाहर आइए । जब संस्कृत काव्य में वैदर्भी रीति और तरल संवेदनात्मक रस – सृष्टि को पराकाष्ठा पर कालिदास ने पहुँचा दिया तो भवभूति , माघ और वाणभट्ट ने भाषा की कला – चेतना का प्रतिमान रचते हुए शब्द – क्रीड़ा और चमत्कार – सृष्टि को पुरस्कृत किया । समकालीन कविता काव्यार्थ की सान्द्रता और नयी कविता के गहरे काव्यानुशासन को अतिक्रमित कर यथार्थ – निरूपण को ही काव्य – मूल्य के रूप में आयत्त करती है । किन्तु छायावाद को प्रसाद का यह बिम्ब परिभाषित करता है ——
छायापथ में तारक द्युति सी झिलमिल करने की मधुलीला ।
——–शशिमुख पर घूँघट डाले , अंचल में दीप छिपाए
जीवन की गोधूली में कौतूहल से तुम आए ।
आँचल में छिपे दीपालोक की तरह ही उद्भासित होता है छायावादी कविता का अर्थ । लक्षणा और व्यंजना शब्द – शक्तियों के द्वारा हम कविता के अर्थ का छायाभास पाते हैं । परंतु जीवन तो महानृत्य के विषम सम मृत्यु का क्षुद्र अंश है ——–
जीवन तेरा क्षुद्र अंश है , व्यक्त नील घनमाला में ।
सौदामिनी संधि सा सुन्दर क्षण भर रहा उजाला में ।
जैसे बादलों में क्षण भर के लिए बिजली चमक कर छिप जाती है । किन्तु यह निर्वेद के किन्हीं क्षणों की अनुभूति है । वृहत्तर यथार्थ तो विधेयात्मक आशावादी दृष्टि में सन्निहित है ———
उषा सुनहले तीर बरसती , जयलक्ष्मी सी उदित हुई ।
उधर पराजित कालरात्रि भी जल में अंतर्निहित हुई ।
निवृत्ति मार्ग का निषेध कर प्रवृत्तिमूलक जीवन – दृष्टि को प्रस्तावित करते हुए प्रसाद जी ने कर्म और भोग के बीच एक संतुलन स्थापित किया है और गीता के निष्काम कर्म का व्यावहारिक सम्मूर्त्तन कर जीवन को उसकी सम्पूर्ण सान्द्रता में निर्ग्रन्थि भाव से जीने का निर्देश दिया है ——
काम मंगल से मंडित श्रेय , सर्ग इच्छा का है परिणाम ।
लिंग – पूजा को पुरस्कृत करता शैव दर्शन काम का निषेध नहीं करता किन्तु निर्बाध भोग लिप्सा या वासना की उपासना का समर्थन नहीं करता । यहाँ ” जीवन जीवन की पुकार है ” की अंतर्ध्वनि जीवन को उसकी समग्रता में स्वीकार करती है । जहाँ अमृत और हलाहल की सत्ताएँ एकरस हो जाती हैं । और जहाँ उल्लास की पृष्ठभूमि में करुणा सतत वर्तमान है —-
आँसू से भींगे अंचल पर मन का सब कुछ रखना होगा
तुमको अपनी स्मिति – रेखा से यह संधिपत्र लिखना होगा ।
इस संधि पत्र को उल्टा पकड़ कर पढ़ने वाले वामपंथी आलोचकों ने कामायनी का संदर्श बिगाड़ दिया और कामायनी के साथ ही नहीं , स्वयं अपने साथ और साहित्य के साथ भी अन्याय किया । विजयदेव नारायण साही को प्रसाद की भाषा ढोकदार लगती है और जिसमें घुलावट नहीं है तो नामवर सिंह को एक कमजोर आधार – भाषा में कथा की अंतर्योजना के कारण कामायनी की वर्णन – भाषा और बिम्ब की भाषा में असंगति लक्षित होती है जो वस्तुतः स्ट्रक्चर और टेक्सचर का तनाव है । नामवर सिंह का आलोचना – विवेक अद्भुत है और उनके निष्कर्षों से हम असहमत हो सकते हैं लेकिन उनकी गहरी अन्तर्दृष्टि को खारिज नहीं कर सकते । किन्तु काव्य रचना से लेखन की शुरुआत करने वाले नामवर जी अपनी सारी समझदारी अर्जित कर लेने के बाद भी एक भी उल्लेखनीय कविता नहीं दे पाए । और कविता के नए प्रतिमानों की खोज में सबसे अधिक अज्ञेय का समर्थन लेने वाले नामवर सिंह उन्हें भी अपदस्थ कर मुक्तिबोध को प्रतिष्ठित करते हैं तो दर असल वे खुद को प्रतिष्ठित कर रहे होते हैं । और कविता की मूलधारा या मौलिक अस्मिता से मुक्ति का यह बोध धन्य है । नामवर जी को मुक्तिबोध के अँधेरे में कुछ अधिक दिखाई देता है और मुक्तिबोध की ऊबड़ – खाबड़ काव्य – भाषा प्रसाद की समरस प्रांजल भाषा से अधिक अपील करती है ।
” कामायनीः एक पुनर्विचार ” शीर्षक अपने आलोचना – ग्रंथ में मुक्तिबोध ने अपने मार्क्सवादी पूर्वाग्रहों के बावजूद कहीं अधिक ईमानदारी से कामायनी का पुनर्मूल्यांकन किया है ——
कामायनी कवि के दीर्घ संचित भावों और विचारों के ऊहापोह के दौरान क्रमशः रूप धारण करती हुई एक आत्मपरक फैंटेसी है जिसमें समकालीन जीवन की कलात्मक पुनर्रचना की गई है । कामायनी सकर्मक जीवन अनुभव और अकर्मक जीवन – दर्शन के द्वन्द्व अथवा तनाव की कलात्मक सृष्टि है , जिसमें जीवन की वास्तविकता की गहरी पहचान तो है लेकिन मानव समाज के भविष्य का व्यापक और स्पष्ट चित्र न होने के कारण वे यथार्थ चित्र दकियानूसी जीवन दर्शन के शिकार हो गए । यद्यपि मुक्तिबोध ने प्रसाद के नाटकों में निहित सकर्मकता की ओर अर्थपूर्ण संकेत किया है ।
आज मार्क्सवादी यूटोपिया के पराभव के बाद और निरन्तर पर्यावरण – विनाश के कारण खण्ड प्रलय के मुहाने पर खड़ी मानव – सभ्यता के लाकडाउन के सन्दर्भ में यह अनदेखा नहीं रह जाता कि दकियानूसी दर्शन कौन सा है । अपने को प्रकृति का नियंता मानकर सांस्कृतिक – जैव विविधता को नष्ट करने वाले सर्वसत्तात्मक वर्चस्वी मनुष्य को अपने – अपने खूँटे से बाँधकर अदृष्ट ने उसे उसकी हैसियत बता दी है । चाँद पर चढ़ाई करने वाले मानव के पैरों के नीचे से धरती खिसक रही है । परमाणु बम विस्फोट से आकाश की छाती में छेद करने वाले मनुज अभी तक कोरोना वायरस के छोटे से अणु को नष्ट करने की प्रविधि विकसित नहीं कर सके । पृथ्वी ही एक मात्र ऐसा ग्रह है जहाँ हम रह सकते हैं लेकिन हमने इसे दूषित कर दिया है । इसका मूल कारण श्रद्धा या मूल्य – आस्था को अपने जीवन से अपदस्थ कर अनुपात हीन बुद्धिवाद की प्रतिष्ठा है जो कि कामायनी का केन्द्रीय प्रतिपाद्य है । हृदय की रागात्मिका वृत्ति की प्रतीक श्रद्धा का त्याग कर बुद्धि का प्रतीक इड़ा की ओर आकर्षित होना मनु को संकट में डाल देता है । यूँ बौद्धिक प्रज्ञा का अपना सौन्दर्य है जो इड़ा सर्ग के औदात्य में प्रतिफलित होता है —–
बिखरीं अलकें ज्यों तर्क जाल ।
वह विश्व मुकुट सा उज्ज्वलतम शशि खंड सदृश था स्पष्ट भाल ।
था एक हाथ में कर्म कलश ,
वसुधा जीवन रस सार लिए ।
दूसरा विचारों के नभ को
था मधुर अभय अवलम्ब दिए ।।
यह अप्सरस् सौन्दर्य जिस रम्य फलक पर उत्कीर्ण है वह जीवन – निशीथ के अन्धकार को भेदकर उदीयमान उषा के अरुण राग से संस्फूर्त्त है —–
प्राची में फैला मधुर राग ।
जिसके मंडल में एक कमल
खिल उठा सुनहला भर पराग ।
यूँ तार्किक तीक्ष्णता का बड़ा उपयोग है जिसके द्वारा कोई कबीर रूढ़ियों , अन्धविश्वासों और पाखण्डों का उच्छेद कर एक जीवन – विवेक का सृजन करता है लेकिन कबीर का मूल लक्ष्य तो उस प्रेमास्पद सत्य को पाना है जिसे द्वंद्वात्मक भौतिकवाद देख ही नहीं सकता ——–
नैना अन्तरि आव तू ! ज्यूँ हौं पलक झँपेउँ ।
ना हौं देखौं और कूँ , ना तुझ देखन देउँ ।।
आधुनिक विज्ञान ने जीवन को बहुत सरल बना दिया है लेकिन दृष्टि हीन बौद्धिक विकास ने स्वयं कृत मकड़ी के जाले की तरह सभ्यता की बुनावट में फँसकर अपनी अस्मिता को संकट ग्रस्त भी कर लिया है । मनु को श्रद्धा और इड़ा के बीच संतुलन साधना होगा । इस द्वैत की जगह भाव और विचार का संश्लेष ! एक दूसरे स्तर पर एक चिरन्तन द्वंद्व को संलक्ष्य करते हुए प्रसाद जी देवों की विजय और दानवों की हारों के अविराम संघर्ष को रेखांकित करते हैं ——
था एक पूजता देह दीन ।
दूसरा अपूर्ण अहंता में अपने को समझ रहा प्रवीण ।
सभ्यता विमर्श के परिप्रेक्ष्य में देखें तो आज भोगवाद देहवाद के समारोह में परिणत हो गया है और बड़े बड़े ज्योतिर्विद ‘ देह का गणित ‘ हल करने में लगे हैं —–
अब न कपोलों पर छाया सी
पड़ती मुख की सुरभित भाप ।
भुज मूलों में शिथिल वसन की
व्यस्त न होती है अब माप ।।
कंकण क्वणित , रणित नूपुर थे ,
हिलते थे छाती पर हार ।
मुखरित था कलरव , गीतों में
स्वर – लय का होता अभिसार ।।
सुरा – सुरभिमय वदन , अरुण वे
नयन भरे आलस अनुराग ।
कल कपोल था जहाँ बिछलता
कल्पवृक्ष का पीत पराग ।।
अर्थात् चेतना के उज्ज्वल वरदान सौन्दर्य को हमने वासना का क्रीड़ा – कन्दुक बना दिया ।
कामायनी का सौन्दर्य – बोध बहुतों के लिए अधखुला ही रह गया है अथवा इस विद्युल्लता की कौंध से आँखें चौंधिया गई हैं ——
नील परिधान बीच सुकुमार
खुल रहा मृदुल अधखुला अंग ।
खिला हो ज्यों बिजली का फूल
मेघ वन बीच गुलाबी रंग ।।
यद्यपि प्रसाद जी ने आकाशीय विद्युत को फूल का रूपक देकर उसे सह्य ठहराव दिया और उसकी स्वर्णिम दीप्ति को परिशान्त गुलाबी आभा से मंडित किया । नील परिधान के आवेष्टन के लिए श्यामल मेघ खंड का अप्रस्तुत और मेघ पर वन का आरोप । अर्थात् दुहरा संश्लिष्ट रूपक । किन्तु प्रायः हमारी दृष्टि नयन के इसी अभिराम इन्द्रजाल पर अटक जाती है और रक्त किसलय पर अलसाई अरुण की रश्मि की भाँति कामायनी के अधरों की मुस्कान से आबिद्ध हो जाते हैं । और इस रूप के पीछे छिपे अरूप को नहीं देख पाते ।और श्रद्धा के अंतःसौन्दर्य को नहीं देख पाते जो शरीर की सतह तक छलक आया है ——
हृदय की अनुकृति बाह्य उदार
एक लम्बी काया उन्मुक्त ।
कालिदास ने तपोनिरता भगवती पार्वती के अक्षुण्ण नैसर्गिक सौंदर्य का वर्णन करते हुए लिखा है ——
यथा प्रसिद्धं मधुरं शिरोरुहै
जटाभिरप्येवमभूत्तदाननम् ।
न षटपदश्रेणिभिरेव पंकजं
सशैवलासंगमपि प्रकाशते ।।
हजारों साल तक तपश्चर्या करने के बावजूद जटाओं से अलंकृत पार्वती का अपरूप लावण्य वैसा ही तेजोद्दीप्त है कि जैसा श्रृंगार प्रसाधनों और मुक्तामणियों से संग्रथित सौन्दर्य । कमल सेवार से घिरा होने पर भी उतना ही रमणीय लगता है जितना भ्रमरों से अलंकृत होने पर । अकृत्रिम निर्व्याज सौन्दर्य को कोई कालिदास ही देख और सराह सकता है । यही पर्वतीय सुषमा श्रद्धा में भी सन्निहित है । बल्कि प्रसाद की आस्थावादी दृष्टि तो हर नारी में श्रद्धा को ही देखती है ——-
नारी तुम केवल श्रद्धा हो ,
विश्वास रजत नग पग तल में ।
पीयूष स्रोत सी बहा करो ,
जीवन के सुन्दर समतल में ।।
परन्तु आज यह श्रद्धा खंडित हुई है और स्त्री विमर्श ने नारी को निर्दोष देवी और पुरुष को एक खलनायक के रूप में प्रतिष्ठित किया है । उसका वश चले तो नारी पुरुष के सहयोग के। बिना ही पैदा हो । यह अलग बात
है कि हिन्दी। में स्त्री विमर्श के सूत्रधार राजेन्द्र यादव खुद पुरुष विमर्श के शिकार हो गए और अपनी ही पत्नी मन्नू भंडारी को न्याय नहीं दे पाए । विमर्शों के बाजार में कौआ रोर के शोरीले वातावरण को सुरीले स्वर – शिल्प में ढालते हुए मैं कामायनी के बीजमंत्र का जाप करना चाहूँगा ——–
तुमुल कोलाहल कलह में
मैं हृदय की बात रे मन !
नए काव्य – बोध के आलोक में कामायनी के भाव लोक का परीक्षण नूतन प्रत्ययों की उद्भावना करता है —–
प्रकृति के यौवन का श्रृंगार
करेंगे कभी न बासी फूल ।
कभी जड़ीभूत सौन्दर्याभिरुचि के विरुद्ध विद्रोह से आविर्भूत प्रगतिशील सौन्दर्य – दृष्टि आज खुद जड़ीभूत हो गई है और शब्द – संसृति के रहस्य लोक से अनभिज्ञ होने के कारण आनन्द सर्ग खो गया है । ऐकान्तिक रूप से भूख – भूख चिल्लाते – चिल्लाते कविता मर गई है । जीवन में सत्य भी है और असत् भी । प्रसाद जी समग्र जीवन बोध के अध्वर्यु हैं । नामवर सिंह ने रचना और आलोचना के क्षेत्र में जिस सूत्रबद्ध यांत्रिक नुस्खेबाजी की आशंसा जताई थी वह आज प्रतिमानीकृत सृजनात्मक बाधा बन गई है । आज कविता के कारीगर अधिक हैं , कलाकार कम । कमाया हुआ सत्य तो सर्वथा अनुपस्थित है । भारतीय प्रज्ञा के आनुवंशिक अनुभव को प्रसाद जी की वैयक्तिक प्रतिभा के पारस स्पर्श ने संग्रथित कला – सृष्टि को सम्भव किया है । कलम की नोंक पर पूरी परंपरा का बोझ सँभाल कर लिखने पर ही परात्पर कविता सम्भव होती है । उनमें अनन्त सृजनशीलता और कल्पना का फैलाव है जो कि कविता के आत्म विस्तार को सूचित करता है । बहुस्तरीय भाषा में यथार्थ में अन्तःसंचरित सत्य की अनेक छवियाँ कामायनी में उत्सृष्ट होती हैं । भावोच्छ्वास गहरी मानवीय समझदारी से अनुशासित होकर आता है और प्रयोक्ता की संदर्भ – चेतना को सूक्ष्मतर विन्यास के लिए प्रस्तुत करता है । पदार्थ की आणविक संरचना में नियुक्त विद्युत् कणों के समन्वय से कास्मिक चेतना की उच्चतर भूमि की उपलब्धि और पौराणिक आख्यान के गृहीत परिवेश की पूरी अर्थवत्ता का संधान प्रसाद जी को सृजन – संस्कृति के उत्तुंग शिखर पर प्रतिष्ठित कर देता है । यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि वे विज्ञान का समर्थन तो करते हैं लेकिन उनकी दृष्टि वैज्ञानिक नहीं , परावैज्ञानिक है । उनकी भाषा की आन्तरिक गतिशीलता आज की वास्तविकता को देखने के लिए एक विजन उपलब्ध कराती है और स्वाधीनता आंदोलन को पार्श्व रक्षण भी प्रदान करती है । श्रद्धा को छोड़कर इड़ा तक भटकने वाले पवन की तरह संचरणशील मनु के इड़ा पर आधिपत्य के प्रयास में प्रजा से संघर्ष की भूमिका में सात समंदर पार से आए अंग्रेज महाप्रभुओं के अधिनायकवाद की छाया झाँक जाती है —-
अरुण यह मधुमय देश हमारा ।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा ।
किन्तु शरणार्थी और व्यापारी कब शासक बन बैठें , इसका क्या ठिकाना ! चंद्रगुप्त नाटक की उनकी ये पंक्तियाँ राजनैतिक – सामाजिक सजगता को सूचित करती हैं । समकालीन सांस्कृतिक संकट की स्वीकृति उनके सृजन संसार में प्रतिफलित होती है लेकिन संवेगों का संतुलन , रागात्मक ऐश्वर्य और भाषागत लाक्षणिक मूर्तिसत्ता विस्मित करती है । छोटी कविता में काव्यार्थ की सान्द्रता और नुकीलापन अधिक होता है लेकिन प्रबन्ध काव्य में संरचना की सघनता , समरसता और सघन लयात्मकता का आद्योपान्त निर्वाह केवल कामायनी में ही सम्भव है ।और उनके बिम्बों ने निराला और दिनकर जैसे परवर्ती कवियों को प्रभावित किया । अमरीकी आलोचक क्लींथ ब्रुक्स द्वारा संकेतित भावों का पैराफ्रेज भी नहीं होता यहाँ । क्योंकि एक ही बिम्ब को अनेक कोणों से देखने की अभिनवता सौन्दर्य बोध को बासी नहीं पड़ने देती । तत्सम भाषा का लालित्य परिष्कृत अभिरुचि या सुसंस्कृत भाव बोध का सूचक है जिसे उदात्त अतिचेतनावादी दिव्य अनुभूतियाँ सत्यापित करती हैं लेकिन अब जिनकी आँख का निर्माण रूस या लंदन में हुआ है और जिन्हें तर्कातीत अध्यात्म से चिढ़ है और जो हर सामंजस्य – चेतना में प्रतिक्रियावाद , पुनरुत्थानवाद और सर्वसंश्लेषणवाद सूँघते फिरते हैं उन्हें दार्शनिक निष्पत्तियों से विरक्ति अनुभूत होती है ——
स्वप्न , स्वाप , जागरण भस्म हो
इच्छा , क्रिया ज्ञान मिल लय थे ,
दिव्य अनाहत पर निनाद में
श्रद्धा युत मनु बस तन्मय थे ।
इस भाव समाधि की तुरीयावस्था में श्रृंग और डमरू का अन्तर्निनाद श्रुतिगोचर होता है और वाणी की वीणा अहर्निश बजती रहती है —-
रस गगन – गुफा में अजर झरै ।
इसी रस के आवर्त्तन से सीझी भाषा के समारोह में प्रेम संवलित जीवनासक्ति आँखों को काजल की तरह आँजती है —–
नयनों की नीलम की घाटी
जिस रस घन से छा जाती हो ,
वह कौंध कि जिससे अन्तर की
शीतलता ठंडक पाती हो ।
प्रेम और लज्जा की नीली सपनीली रोशनी में नहाई आँखें जीवन का एक नया तिलिस्म गढ़ती हैं । देहयष्टि का पारदर्शी सौष्ठव प्रकृति के पार पुरुष को परावर्तित करता है —-
महानील इस परम व्योम में ,
अन्तरिक्ष में ज्योतिर्मान ,
ग्रह , नक्षत्र और विद्युत् कण
किसका करते से संधान ?
हे अनन्त रमणीय कौन तुम !
वनस्पतियाँ किसके रस से अभिसिक्त हैं ? समस्त सौर मंडल किस अस्तित्व का मौन प्रवचन करते हैं ? भोर की संस्फूर्त्त मलयानिल किसके चरणों में नत होकर पावन उद्गीथ गाती है ? विहगों को कलगीत किसने सिखाया और किसलयों में लालिमा कहाँ से आती है ?
रोज नए चेहरे कौन गढ़ता है ? दुखों के सुखद संकलन जीवन की अनन्त सृजनशीलता का रहस्य यही प्रसाद गुण है ।
अजित कुमार राय

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