एंगेल्स को याद करते हुए उदारवादी बुद्धिजीवियों के नाम लिखा पत्र

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उदारवादी बुद्धिजीवियों के नाम एक पत्र!
हम आप तमाम उदारवादियों को यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि पूंजीवादी प्रचार के अफवाह से भ्रमित ना हों। मार्क्स तथा एंगेल्स द्वारा प्रतिपादित तथा लेनिन और स्टालिन द्वारा लागू किया गया “सर्वहारा की तानाशाही” आप तमाम उदार बुद्धिजीवियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को तनिक भी कमजोर नहीं करता है। यह तानाशाही सिर्फ उन लोगों के लिए है, जो सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में समाजवादी सत्ता के खिलाफ षड्यंत्र करते हुए सत्ता को उलटने की साजिश रचते हैं।
गुजरते वक्त के साथ पूंजी के मालिकों का क्रूर और मानवद्रोही हमला लगातार बढ़ता जा रहा है। हम तमाम उदारवादियों से आग्रह करते हैं कि आज के दौर में वे बताएं कि संपत्तिशाली वर्ग और खासकर बड़ी पूंजी के मालिक क्या करुणा बहाते हुए गांधी के रास्ते पर भीख मांगने से अपने शोषण करने के अवसर को छोड़ देंगे?
कोरोना काल में जिस तरह से भारत के पूंजीपति तथा पूरी दुनिया भर में पूंजी के मालिकों ने मजदूरों के साथ व्यवहार किया और जिस तरह से मानवता को मृत्यु के गाल में मुनाफे के लिए ठेल दिया है, वैसे में आपको क्या लगता है कि आपके आग्रह और अपील से ये लोग अपनी पूंजी की सत्ता को आम लोगों की जरूरत की चीजें, दवाइयां सुरक्षा और मकान आदि उपलब्ध कराने के लिए समर्पित कर देंगे?
दो- दो विश्व युद्ध के बाद भी अनेक युद्धों में निहत्थे और शांति की चाहत रखने वाली आम जनता की हत्या लगातार जारी है। बाजार हड़पने के लिए आज भी यूक्रेन युद्ध का केंद्र बना हुआ है यूरोप की जनता युद्ध के आतंक में जी रही है इधर चीन और अमेरिका में ताइवान के बाजार को अपने नियंत्रण में लेने के लिए युद्ध की गर्जना हो रही है। स्थिति यह है कि जो युद्ध का प्रतिरोध करने में सफल हुआ, वही अपने समाज और साधनों को बचा पाया है।
क्या उदारवादी बुद्धिजीवी हमें बताएंगे कि हिटलर जैसी फासीवादी शक्तियों को गांधीवादी तरीके से कैसे पराजित किया जा सकता था? स्तालिन की आलोचना करने वाले साफ-साफ बताएं कि हिटलर को रोकने के लिए कौन सा अहिंसावादी तरीका स्टालिन को अपनाना चाहिए था?
यदि आपको इतिहास का ज्ञान होगा तो प्रथम विश्व युद्ध के उस दौर को याद कीजिए जब लेनिन ने ब्रेस्टलितोव्स्कक की संधि की थी, ताकि रूसी जनता के लिए शांति उपलब्ध हो सके और युद्ध से तबाह देश को फिर से खड़ा किया जा सके। लेकिन तब भी ब्रिटिश और फ्रेंच साम्राज्यवादी अपने हमलों से बाज नहीं आए थे और अंततः मजबूर होकर लेनिन- स्तालिन को रूसी जनता को युद्ध के लिए कमर कसने को कहना पड़ा।
मार्क्स से लेकर लेनिन सभी युद्ध विरोधी रहे हैं। विश्व युद्ध के बाद स्टालिन और सोवियत संघ की जनता शांति की चाहत रखती थी लेकिन अमेरिकन साम्राज्यवाद और ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने युद्ध जारी रखा। ग्रीस और कोरिया के राष्ट्रीय मुक्ति के संघर्ष को दबाने के लिए फौजी हमले जारी रहे। अब आप ही बताइए हमारे उदारवादी साथियों! इसके बावजूद भी लाल सेना ग्रीस नहीं गई थी। ग्रीस की बहादुर जनता ने लड़ाई लड़ी और पराजित हो गई।शांति की चाहत ग्रीस के मेहनतकश भी रखते थे, आप ही बताइए दुनिया भर के लिए कौन सा शांति का तरीका उनकी मुक्ति के लिए आप बताते हैं?
गांधी नेहरू की नीतियों ने तो भारत की मेहनतकश जनता को न तो शोषण से और ना ही सामंती ताकतों से किसानों को मुक्ति दिलायी, न ही सूदखोरों के उत्पीड़न से।
उल्टे किसान आंदोलनों के ऊपर गांधी के विचारधारा पर चलने वाली राज्य सत्ता ने लगातार दमन चलाए। आपको नेहरू से लेकर तमाम सरकारों के इस फौजी तथा अर्धसैनिक दमन और लोगों की हत्या और उत्पीड़न के खिलाफ अधिक मुखर होकर बोलना चाहिए और इन सरकारों के मुखिया की आलोचना करनी चाहिए। आजादी के बाद मुक्ति मिली तो सिर्फ बड़े पूंजीपतियों को, धनी किसानों को, जमींदारों के लगान के फंदे से, मुक्ति मिली तो सिर्फ उन्हें जो संपत्ति के मालिक थे और जो ज्यादा स्वतंत्रता के साथ श्रम शक्ति के मालिकों यानी मजदूरों का शोषण कर सकते थे। आज भी संपत्तिशाली वर्ग तथा पूंजी के मालिकों का सरकार खुलकर समर्थन करती है। कल तक इनका नैया कांग्रेस था आज इनके पीछे भाजपा खड़ी है। यही समाज आज फासीवाद का सामाजिक आधार बना हुआ है और आप उदारवादियों के खिलाफ तमाम तरह के हमले कर रहा है।
पूंजीवाद का वह दौर अब चला गया, जब पूंजी के मालिक अपने उदारवादी चेहरे के साथ शासन चला सकें। अब उन्हें वैसे शासक चाहिए जो पूरी दुनिया में उनके इशारे पर नंगा होकर नाच कर सके। उनके द्वारा अब वैसे ही बदमिजाजों को खड़ा किया जा रहा है और आप तमाम उदारवादियों को मेहनतकशों और कम्युनिस्टों की तरह जेल और झूठे मुकदमों में फंसाया जा रहा है। ऐसे में आप ही बताइए कि पूंजी के मालिकों से श्रम शक्ति के मालिक यानी अपने शोषण व उत्पीड़न को कैसे रोक सकेंगे?
नरेंद्र कुमार

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