विद्वान की रायः संविधान जातिदोष से मुक्त नहीं है

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जिस जाति व्यवस्था के लिए ब्राह्मणों ने अपने तरीके से अनेक प्रयास किए और अपने वर्चस्व के लिए वेदों, पुराणों, श्रुतियों, स्मृतियों की रचना करते हुए जाति व्यवस्था को अक्षुण रखा हो, उसने आजादी आंदोलन के दौरान जाति व्यवस्था को टूटते हुए महसूस किया। तत्पश्चात, संविधान निर्माण के समय ब्राह्मणों ने अपनी एकता दिखाते हुए गांधी जी का प्रयोग किया तथा पूना पैक्ट करके डॉ. आम्बेडकर को आरक्षण लेने के लिए बाध्य कर दिया। आरक्षण के बहाने इस देश के जातिवादियों ने संविधान में अनुसूचित जातियों/जनजातियों को जाति प्रमाण-पत्र बनवा कर आरक्षण लेने के लिए प्रस्तुत करने को न सिर्फ बाध्य किया बल्कि जाति प्रमाण-पत्र बनवाने को संवैधानिक और अनिवार्य भी बना दिया। आज दलित स्वयं चमार, पासी, कोरी, धोबी का प्रमाण-पत्र प्रस्तुत कर ब्राह्मणों के जातिप्रथा को मजबूती प्रदान कर रहा है। इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि भारतीय संविधान ने जाति व्यवस्था को मजबूत किया है। हमें जाति प्रमाण-पत्र बनवाने की बाध्यता को खत्म करवाने का भी संघर्ष करना चाहिए। (आर डी आनंद, फेसबुक, 22 सितंबर 2021)

जी पी कनौनिया:

मान्यवर! 2000 सालो से संविधान नहीं था तो जातिप्रथा कमजोर थी। संविधान ने अधिकार दिया तो जातिप्रथा मजबूत हो गई! अजीब तर्क है आपका।

आर डी आनंद:

जी पी कनौजिया जी! पूना पैक्ट खत्म करो। हमें पृथक निर्वाचन चाहिए। हम जाति प्रमाण-पत्र क्यों दें। 2000 सालों तक ब्राह्मणों ने अपने व्यक्तिगत पुस्तकों में बिना हमारी मर्जी के हमारे विरुद्ध लिखा था लेकिन संविधान तो सर्वमान्य नैतिक और संविधिक दस्तावेज है जिस पर हमारे भी हस्ताक्षर हैं इसलिए इसने हमें सर्वमान्य व स्वयंमान्य शूद-चमार बना दिया।

पूना पैक्ट ने डॉ. आम्बेडकर साहब से पृथक निर्वाचन छीनकर आरक्षण का झुनझुना तो पकड़ा ही दिया। आरक्षण की स्थिति में दलितों का जितना फायदा नहीं हुआ उससे कहींअधिक नुकसान हो गया। सबसे अधिक नुकसान तो उनकी नैतिकता का हुआ जो उन्हें बिना किसी जोर-जबरदस्ती के चमार, पासी, कोरी लिखना पड़ रहा है तथा आरक्षण की आवश्यकता के लिए जातिप्रथा को स्वीकार करना पड़ रहा है। यदि पूना पैक्ट न हुआ होता तो दलित कौम पृथक निर्वाचन से अपने सफल और संगठित नेतृत्व को तैयार कर ले गया होता जो हमेशा सवर्ण जातियों को टक्कर देता और जाति प्रमाण-पत्र बनवाकर स्वयं निरीह और ज़लील न होता।

सुनील जाटवर:

मान्यवर! बाबा साहब ने रोते हुए कहा था मुझे से बहुत बड़ी गलती हो गई है इसे सुधार लेना। मतलब पृथक निर्वाचन ले लेना लेकिन हर 10 साल बाद कॉंग्रेस और बीजेपी इस राजनीति आरक्षण को बिना विमर्श के आगे बढ़ा देती है।

आर डी आनंद:

तो मित्र सुनील जी! इसका अर्थ हुआ कि हमें आरक्षण नहीं पृथक निर्वाचन लेना चाहिए। आरक्षण की वजह से हमें जाति प्रमाण-पत्र बनवाना पड़ता है जो हमें बहुत खलता है। इतना सत्य है कि पृथक निर्वाचन यदि हम हारे न होते तो हमारी बेहतरीन उन्नति हुई होती और हमें न आरक्षण के सहारे जीना पड़ता और न ही चमार, धोबी, कोरी का प्रमाण-पत्र ही बनवाना पड़ता। इस संवैधानिक प्रक्रिया से हम स्वयं ब्राह्मणों के चौथे वर्ण को मानने को मजबूर हैं।

होता क्या है, लोग वस्तुगत वैचारिकी के गहराई में न जाकर स्वयं को बाबा साहब का असली अनुयायी और असली हकदार मान लेते हैं तथा सामने वाले को बाबा साहब का निंदक मान बैठते हैं क्योंकि हमारे साथियों में तर्क करने की क्षमता ही विकसित नहीं हो पाई है।

आर पी द्विवेदी:

क्या डॉ. अम्बेडकर को बाध्य किया जा सकता था? डॉ. अम्बेडकर कोई ऐसे बुद्धिजीवी नहीं थे जो सिर्फ सोचने या लिखने का काम लेते थे। जब आप एक मोर्चे पर होते हैं तब सब कुछ आप के अनुसार ही नहीं होता है। हो सकता है जितना वक्ती तौर पर ले सकते उतना लिया।

आर डी आनंद:

लेकिन, उस दबाव ने डॉ. आम्बेडकर साहब से पृथक निर्वाचन छीनकर आरक्षण का झुनझुना तो पकड़ा ही दिया। आरक्षण की स्थिति में दलितों का जितना फायदा नहीं हुआ उससे कहींअधिक नुकसान हो गया। सबसे अधिक नुकसान तो उनकी नैतिकता का हुआ जो उन्हें बिना किसी जोर-जबरदस्ती के चमार, पासी, कोरी लिखना पड़ रहा है तथा आरक्षण की आवश्यकता के लिए जातिप्रथा को स्वीकार करना पड़ रहा है। यदि पूना पैक्ट न हुआ होता तो दलित कौम पृथक निर्वाचन से अपने सफल और संगठित नेतृत्व को तैयार कर ले गया होता जो हमेशा सवर्ण जातियों को टक्कर देता और जाति प्रमाण-पत्र बनवाकर स्वयं निरीह और ज़लील न होता।

आर पी द्विवेदी:

मान लीजिये आप एक लड़ाई आप हार जाते हैं और यह भी हो सकता है कि बार बार हार जाते हों। इसका कुछ तो मतलब होता होगा? क्या आप लड़ना छोड़ देंगे? शायद सबक लेंगे। दोस्तों को बढ़ाएंगे और आगे ले जाएंगे। कोसने से तो कुछ मिलने से रहा जैसा कि हावर्ड फ़ास्ट के उपन्यासों में होता है। बड़ी न्यायपूर्ण लड़ाईयाँ लोग हार जाते हैं (जैसे कि मुक्ति मार्ग) पर इतिहास को थोड़ा आगे बढ़ा देते हैं। यदि व्यवस्था ऐसी ही होती तो पता नहीं पृथक आरक्षण से क्या होता। आज चीजों को कैसे आगे बढ़ा सकते हैं, शायद उस पर सोचना चाहिए।

अमित कबीर:

सर! डा. आम्बेडकर को शायद आप जरुरत से ज्यादा मूर्ख या जगजीवन राम अथवा कोविन्द जी की श्रेणी का समझते हों। उस समय परिस्थितियाँ उनके विपरीत थीं, वो संगठित थे और आम्बेडकर अपने कुछ साथियों संग मुट्ठीभर थे। इसके बाद भी वे अपनी प्रथक निर्वाचन की मांग पर दृढ़ थे। उन्हे कैसे और किसलिए ब्लैकमेल किया गया, ये आप अच्छे से जानते हैं। ”झुनझुना पकडा दिया गया” आप का यह कथन स्वागत योग्य नहीं है। आप मेरे गुरु हैं, बुरा लगे तो माफ कर दीजिएगा।

आर डी आनंद:

मित्र कबीर! तर्क में बुरा मानने का कोई स्थान नहीं है। हमें लिखते समय शब्दों पर बहुत ध्यान देना चाहिए कि आप कहना क्या चाहते हैं और लिख क्या रहे हैं। आप लिख रहे हैं कि “जरूरत से ज्यादा मूर्ख” अर्थात मुझे जरूरत भर का मूर्ख समझने की सलाह दे रहे हैं। किसी भी व्यक्ति के विचारों और उपलब्धियों पर विमर्श किया जाना उचित है लेकिन उसको मूर्ख की किसी भी कैटेगरी में नहीं खड़ा किया जाना चाहिए और बाबा साहब जैसे व्यक्ति के बारे में ऐसा सोचना स्वयं में बहुत बड़ा अपराध है। खैर। आप का अर्थ है जगजीवनराम और कोविंद साहब मूर्ख अथवा अनुचित हैं? आप का मत है कि विपरीत परिस्थिति में हुए अहितकर कार्य को अहितकर न कहा जाय? अर्थात विपरीत परिस्थिति में डॉ. आम्बेडकर साहब से गोलमेज कांफ्रेंस के संघर्ष से प्राप्त साइमन कमीशन द्वारा पृथक निर्वाचन पर पूना पैक्ट हो जाना अच्छा कार्य और उचित मान लिया जाय? उसके बदले आरक्षण को प्राप्त कर लेना श्रेष्कर कार्य हो गया? विपरीत परिस्थितियों में डॉ. आम्बेडकर को समझौता करना पड़ा। समझौता बुरा था। वह उनकी हार थी। वह हमारी हार थी लेकिन उससे यह नहीं सिद्ध होता कि वह डॉ. आम्बेडकर की मूर्खता थी। आप लोग तर्क करते-करते इतने अधिक भावुक और असहिष्णु हो उठते हैं कि आपा खो बैठते हैं और जो लेखक का मत नहीं होता है, वह दिखाने की कोशिश करते हैं तथा लेखक के प्रति विष वमन करने के लिए तनिक की इंतजार नहीं करते हैं।

आप पृथक निर्वाचन और आरक्षण की भिन्नता के वजन पर यदि ध्यान दे देंगे तो आप स्वयं लज्जित हो उठेंगे कि आरक्षण झुनझुना के बराबर का भी अस्तित्व नहीं रखता है।

बाबा साहब को प्रज्ञावान, संघर्षशील, विद्वान महापुरुष ही मानिए, देवता मत बनाइए। किसी भी व्यक्ति को उचित सम्मान देना बहुत पुनीत कार्य है लेकिन त्रुटिरहित, परमपुनीत और अद्वितीय मान लेना विकास और विज्ञान को गाली देना और न मानना हो जाएगा। बुद्ध की बात हमेशा याद रखिए, किसी भी बात को इसलिए नहीं मान केना चाहिए कि उस बात को किसी बहुत बड़े विद्वान ने कहा है। किसी बास्त को इसलिए नहीं मान लेना चाहिए कि वह बहुत बड़ी कितबमें लिखी गई है। किसी भी बात तो तब मानना चाहिए जब वह तर्क की कसौटी पर खरी उतरे। मान और सम्मान किसी बात के पुरातन हो जाने अथवा विज्ञान के तराजू पर खरा न उतरने के कारण खत्म नहीं हो जाता है बल्कि किसी महान आदमी की महत्ता उसके मंतव्यों के वैज्ञानिक तरीके से विकसित होने अथवा किए जाने पर निर्भर करता है। बाबा साहब व बुद्ध को ‘एज इट इज’ मानकर सम्मान देना उनके महत्व को कम करके महत्व देना है बल्कि जब हम उनके असली मकसद को प्राप्त करने के लिए उचित व क्रांतिकारी रास्ता ढूढ़ लेंगे, वह उचित सम्मान होगा।

अमित कबीर:

सर! डा. आम्बेडकर भी आरक्षण से संतुष्ट नहीं थे | पूना पैक्ट हो जाने से वे भी आहत थे और इसे अपनी हार समझते थे लेकिन क्या उन्होंने कभी ये कहा कि अब आरक्षण मिल गया है तब इससे आगे और बेहतर करने के लिए अछूत समाज को सोचना बंद कर देना चाहिए, नहीं। उन्होंने कहा था कि अछूतों को अपने भविष्य की बेहतरी के लिए मुझसे भी बेहतर व क्रान्तिकारी मार्ग तलाश कर उस पर आगे बढना होगा। इस बात पर न कम्युनिष्ट व न आम्बेडकरवादी कोई प्रतिक्रिया नहीं देते, न उनकी इस बात की प्रशंसा ही करते हैं। आप की बात नहीं है, आप बहुत अच्छे हैं लेकिन आप से अलग मुझे एक भी कम्युनिष्ट ऐसा नहीं मिला फेसबुक पर जो डा. आम्बेडकर की विचारधारा के साथ न्याय करता हो। सभी के सभी गरियाते ही मिलते हैं। समन्वय की कोई बात नही करता है। जवाब में आम्बेडकर अनुयाई और ज्यादा आम्बेडकर भक्ति मे लग जाते हैं।

आर डी आनंद:

मैं आप के चिंतन के भिन्न कहाँ लिखा हूँ। मैंने सिर्फ एक बात पर फोकस किया कि संविधान एक तरह से जातिप्रथा को मजबूत ही करता है, और आप ने न जाने क्या-क्या और कितना कह डाला? क्या यह संविधान हमें जाति प्रमाण-पत्र बनवाने के लिए बाध्य नहीं करता है?

अमित कबीर:

जाति को महत्वहीन बनाने का विकल्प भी संविधान देता है, दलित नहीं; बल्कि आप जैसा आम्बेडकरवादी व्यक्ति जिस दिन सत्ताशीन होगा वह ऐसा कर भी सकता है। सर! अभी संविधान को बदलना विकलप नहीं है, तब तक तो बिल्कुल नहीं जब तक शोषित पीडित वर्ग समाजवाद से परिचित न हो जाए।

आर पी द्विवेदी:

ईश्वर चाहेगा तो पीड़ित वर्ग जरूर समाजवाद से परिचित होगा. वह बड़ा दयालु है। पीड़ित जन का जरूर कल्याण करेगा. कभी न कभी तो जरूर ही करेगा।

सुनील जाटवर:

आज सवर्ण जिन दलितों से रोटी बेटी का सम्बन्ध स्थापित किये हैं वो सभी दलित आरक्षण के प्रोडक्ट्स है इससे साबित होता है कि संविधान, आरक्षण ने जातीय भेदभाव मिटाया है और दलितों की आर्थिक स्थिति ठीक की है।

आर डी आनंद:

इसका अर्थ है कि पूना पैक्ट ठीक हुआ? यदि पूना पैक्ट न हुआ होता तो आरक्षण न मिलता, फिर क्या होता? फिर हमें पृथक निर्वाचन प्राप्त हो जाता और हम इससे अधिक सम्पन्न होते तथा जाति प्रमाण-पत्र न बनवाना पड़ता। सोचिए।

सुनील जाटवर:

इस पूना पैक्ट के एवज में कुछ न सही पर आरक्षण तो मिला जिससे शिक्षा और नौकरियों में इनका प्रतिनिधित्व हुआ  लेकिन अभी भी मैं इसके पक्ष में नहीं हूँ। हमें पृथक निर्वाचन चाहिए न कि आरक्षण।

जगदीश जगद:

तब तो बाभन भी चमार, धोबी लिखकर सामाजिक अन्याय बढ़ाने लगेगा। बहुत से छद्मी सवर्ण प्रथागत जाति उपाधि लिखना छोड़ने लगे हैं। आपको तिवारी, पांडे, सिंह न लिखने को तो किसी ने मजबूर भी नहीं किया है। आज वर्तमान में सामाजिक न्याय का तकाजा है कि दलितों पिछड़ों का विकास आरक्षण से ही संभव है। पुनर्विचार करें।

आर डी आनंद:

मैं कब कह रहा हूँ कि कोई आरक्षण न ले, लीजिए न लेकिन जाति प्रमाण पत्र बनवाइए और मानिए कि यह संविधान की देन है। यदि आरक्षण संविधान की वजह से मिल रहा है तो जाति प्रमाण पत्र भी संविधान की वजह से बनवाना पड़ रहा है।

आर पी द्विवेदी:

आप क्या चाहते कि प्रमाण-पत्र न बनवाना पड़े, जाति न दर्ज करना पड़े! और उसका लाभ भी मिलता रहे?

जगदीश जगद:

संविधान की वजह से आरक्षण मिला है और नियम है कि सक्षम अधिकारी के प्रमाण से ही लाभ मिलेगा तो इसकी बाध्यता खत्म करने का संघर्ष चलाने का क्या आशय है। जब तक आरक्षण लेकर आप सामाजिक रूप से सामान्य नहीं होंगे, तब तक इसे झेलना ही होगा। संविधान में प्रावधान है कि आपमानिक सेंस में कोई भी दूसरे की जाति पूछता है तो अपराध है। इसे सार्वजनिक न करें। उपाधि के लिए अन्य रूपकों से लेकर सरनेम लगाएँ। इससे सार्वजनिक लाभ मिलेगा और जातिगत दंश और हीनता बोध कमतर होगा और एक दिन पारंपरिक जातिवाद खत्म हो भारत समाजवादी गणराज्य बन जाएगा। पारंपरिक जातिबोधी सरनेम हटाइए, प्रगति होगी। अन्य कोई रास्ता बनता है तो समझाइए।

ओमप्रकाश:

हमारे बिचार से हम अंग्रेज़ों के गुलाम थे चीन जापान का गुलाम था हम दोनो आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे हम दो साल पहले चीन दो साल बाद हम दोनों आजाद हुए हमारी सरकार मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनाया चीन वैज्ञानिक समाजवाद का रास्ता अपनाया वैज्ञानिक समाजवाद योग्यता और क्षमता के अनुसार काम आवश्यकता के अनुसार जनता की जरूरत की पूर्ति के नियम का अनुपालन किया हमारे देश की सरकार जनता की जरूरत की पूर्ति में असफल अपने को बेदाग बचा लिया जनता को रोटी का टुकड़ा फेक कर लडा़ई दिया।

आर पी द्विवेदी:

कोई मिश्रित अर्थव्यवस्था जैसी चीज नहीं होती है। आप चाहें तो पूँजीवाद को गुलाब जामुन कह सकते हैं।

ओमप्रकाश:

मार्क्स ने पूंजी को तीन भाग में बांटा व्यकतिगत पूंजी  राजकीय पूंजी  सामाजिक पूंजी मार्क्स ने सामाजिक पूंजी के पक्ष में अपना बिचार रखा हमारे देश की सरकार ने निजी पूंजी और राजकीय पूंजी को एक साथ लेकर सफर शुरू किया।

आर पी द्विवेदी:

और लेनिन ने कहा सम्राज्यवाद पूँजीवाद की चरम अवस्था है. इसलिए अपनी पूँजी अपने पास रखिये.

हरपाल सिंह अरुष:

आरक्षण आर्थिक विकास करने का मार्ग नहीं है। यह तो प्रत्येक स्तर पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का साधन मात्र है। दलित विद्वान जितनी शक्ति से बहसें करते हैं यदि उतनी शक्ति आपसी जाति उच्छेद करने में लगा दें तो एक बहुत बड़ा ब्लाॅक इस समुदाय का बन सकता है जो राजनीति को प्रभावित कर सकता है। यह ‘ब्राह्मणवाद’ चालाकीपूर्ण अवधारणा है जिसकी चपेट में दलित-पिछड़े लिपटे हुए हैं जबकि वर्ण-जाति व्यवस्था हिंदु-सनातन धर्म का अनिवार्य अंग है। जाति की पहचान रखना व प्रमाणपत्र बनवाना हिंदू होने को स्वीकार करना है।

मनीष भारती

सर! अगर संविधान जाति व्यवस्था को मजबूत किया होता तोभारत के आजादी के बाद की व्यवस्था और आज की सामाजिक व्यवस्था में  परिवर्तन नहीं होता।

आर डी आनंद:

मित्र! आप यह क्यों भूल जाते हैं कि जब हमें जाति प्रमाण-पत्र न बनवाना पड़ता और पृथक निर्वाचन मिल गया होता, बाबा साहब को पूना पैक्ट न करना पड़ा होता, तो कितना विकास हो गया होता। आरक्षण देकर हमारे वास्तविक और तेज विकास को रोक दिया गया।

सुखचंद्र भारती:

क्या संविधान में लिखा है कि जाति प्रमाण-पत्र ही बनवाने से आरक्षण मिलेगा? सामाजिक और शिक्षा पृष्ठभूमि आरक्षण के मानक तय करते हैं, सही है। इसके लिए सरकार को दूसरा उपय सोचना चाहिए तथा सवर्णों को सझाना चाहिए कि ये भी हमारे देश के ही हैं और आरक्षण से देश के सभी वर्गों का विकास हो सकता है। मैं भी राजनीतिक आरक्षण का विरोध हूँ। बाबासाहेब भी इसको 10 साल के लिए रखना चाह रहे थे लेकिन आप का कहना है कि संविधान जाति का पोषण करता है, सहमत नहीं हूँ। सभी देशो में आरक्षण का उपबंध है। जैसे अमेरिका में सकारात्मक कार्रवाई कहा जाता है। वहाँ के जाति-जनजाति काले लोग को भी आरक्षण है और हम लोग अध्यक्ष के पद तक पहुँच जाते हैं लेकिन इंडिया में इसलिए यहाँ के सवर्ण लोगों और सरकार को आरक्षित कैटेगरी का विरोधन करके उसने ऊपर उठना चाहिए, जातिवाद ऐसे ही खत्म हो जाएगा।

आर डी आनंद:

यदि आप मुझसे सहमत नहीं हैं तो इसका अर्थ है कि आप जाति प्रमाण-पत्र बनवाए जाने के पक्ष में हैं। ब्राह्मण तो चाहता है कि दलित स्वयं अपनी जाति बताए और प्रसाद ले जाए। जब तक दलित अपनी जाति नहीं बताएगा तब तक संविधान उसे किसी भी प्रकार का आरक्षण नहीं देगा। जाति प्रमाण-पत्र बनवाने की वैधानिक जरूरत न मुगलों के संविधान में था और न अंग्रेजों के संविधान में था। जब देश आजाद हो गया तब ब्राह्मणों ने बड़ी चालाकी से संविधान में जाति प्रमाण-पत्र बनवाने की संवैधानिक जरूरत को विहित करवा दिया।

सुखचंद्र भारती:

सरकार आरक्षण देने के लिए जाति प्रमाण-पत्र बनवाने के अलावा शोषित-वंचित-पिछड़ा वर्ग के लिए कोई दूसरा उपाय भी कर सकती है लेकिन यहाँ की राजनीति ब्राह्मणवाद से चलती है इसलिए सरकार इस वर्गों को ऊपर उठना ही नही चाहती है।

आर डी आनंद:

यह सब तो है ही, इन्होंने जाति प्रमाण पत्र बनवाना संवैधानिक करवा लिया। आज हम स्वयं कहते हैं कि हम चमार हैं।

सुखचंद्र भारती:

सत्ता में अभी स्वर्णो का कब्जा है। सरकार के हर व्यवस्था संस्थान न्यायपालिका में ही लोग अपना एकाधिकार बनने हुए हैं। ये अपना वर्चस्व नहीं छोडना चाहते इसिलिए जातिवाद को बनाना रखना चाहते हैं। जातिवाद को स्वर्ण तथा कथित उच्च जाति के लोग ही खतम कर सकते हैं, शूद्र वर्ग नहीं। एक और उपाय है देश के हर चीज, संसाधन और पूँजी का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाए। उत्पादन और वितरण पर सबका अधिकार हो और सासन को सामूहिक रूप से चलाना होगा। तभी जातिवाद खत्म होगा, अन्यथा नहीं। बाबासाहेब ने कहा कि जब जातिवाद खत्म न हो तो अपनी जाति पर इतना गर्व करो कि ये लोग खुद जाति खत्म करने पर विवश हो जाँय इसिलिए मैं कहता हूँ-महान चमार। संविधान ने आरक्षण देकर जातिव्यवस्था को मजबूत किया है। तो आप ही बताइए महोदय कि संविधान में ऐसा क्या किया जाना चाहिए था कि अति पिछडे लोगों को प्रतिनिधिधित्व मिले और देश के विकास के मुख्य धारा में आ सकें।

प्रह्लाद दास:

आरक्षण का जब आधार ही जाति है तब जाति प्रमाण पत्र आवश्यक हो जाता है। दूर तक सोच कर देखिए, जाति उच्छेद के लिए आरक्षण का त्याग एक आवश्यक शर्त के रूप में सामने आता है।

आर डी आनंद:

आरक्षण के दबाव में दलित जातिप्रथा उन्मूलन के अहम और मूल सवाल को नजरअंदाज कर देता है। उसे लगता है आरक्षण ही एकमात्र दलित उत्थान और विकास का एकमात्र रास्ता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि दलित योद्धा तो बनता है लेकिन क्रांति नहीं करना चाहता है। यह शोध का विषय है कि क्या दलितों के डीएनए में भीरूपन है जिससे वह नए चीज को पाने के लिए रिस्क नहीं लेना चाहता है अथवा भौतिक परिस्थितियों ने दलितों में जुझारूपन नहीं पैदा होने दिया है? आम्बेडकर साहब का फाइनल गोल समाजवाद को प्राप्त करना था लेकिन दलित बीच में ही आरक्षण-आरक्षण खेल रहा है। जातिप्रथा उन्मूलन और समाजवाद को लागू करना आम्बेडकर साहब के अनुयायियों का नैतिक और भौतिक लक्ष्य होना चाहिए लेकिन दलित पाने में उतना विश्वास नहीं रखता है जितना खोने से डरता है। आम्बेडकर साहब का आध्यात्मिक भूख बौद्ध धर्म था लेकिन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक भूख की संतुष्टि के लिए संसदीय लोकतंत्र प्लस राजकीय समाजवाद था।

आर डी आनंद:

मनीष जी! इसका अर्थ हुआ गाँधी ने बहुत अच्छा किया क्योंकि आरक्षण का प्रस्ताव गाँधी का था आम्बेडकर साहब का नहीं। आम्बेडकर साहब ने तो मजबूरी में आरक्षण को स्वीकार किया था। आम्बेडकर साहब आरक्षण नहीं चाहते थे बल्कि वे पृथक निर्वाचन ही चाहते थे। अगर गाँधी आमरण अनशन न किए होते और आम्बेडकर साहब को पूना पैक्ट न करना पड़ा होता तब तो दलितों को आरक्षण न मिलता। तब क्या होता दलितों का?

गाँधी के आमरण अनशन से आम्बेडकर साहब को पूना पैक्ट करना पड़ा। पूना पैक्ट की वजह से दलितों के हिस्से में आरक्षण आया। दलित साथियों की बुद्धि न जाने कहाँ चली जाती है, वे आरक्षण को अपना सर्वस्व मान बैठते हैं। आरक्षण की बुराई अथवा मूल्यांकन प्रारम्भ करते ही दलित बौखलौ उठता है। उसे लगता है जैसे आरक्षण का मूल्यांकन करके हमने आम्बेडकर साहब की निंदा कर दी है। दलित-मित्रों! पृथक निर्वाचन खरा सोना था और आरक्षण गिलन्ट है। आप से सोना लेकर गिलन्ट पकड़ा दिया गया। आप हैं कि गिलन्ट से खुश हैं।

यदि दलितों को पृथक निर्वाचन का अधिकार प्राप्त हो गया होता तो आज दलितों का सर्वांगीड़ विकास हो गया होता। पृथक निर्वाचन से जहाँ 100 प्रतिशत विकास संभव था वहाँ दलित आरक्षण से हुए 10 प्रतिशत के इकहरे विकास से खुश है। दलितों को यदि पृथक निर्वाचन का अधिकार मिल गया होता तो आज उन्हें मल्टीनेशनल्स से न डरना पड़ता कि वे नौकरियों में आरक्षण नहीं देंगे।

सोचो मित्र सोचो। चिंतन करो। विमर्श का अर्थ तौहीन नहीं है।

आरक्षण पूना पैक्ट से निकला हुआ धोखे का बहुत बड़ा जिन है। आरक्षण समुद्र मंथन से निकला हुआ विष है जिसे गाँधी ने आमरण अनशन करके डॉ. आम्बेडकर को पकड़ा दिया और दलितों को अमृत के बदले विष पीना पड़ रहा है।

आर डी आनंद:

अमित कबीर! आप के बेहद प्यार और तात्कालिक गुस्से के लिए आभार। मैं अपने बाद जब भी कुछ बेहतर व्यक्तियों के बारे में सोचता हूँ तो आप उन टॉप टेन में होते हैं। मीमांसा के अतिरिक्त आप में आत्मानुभूति (Realization) का विशेष गुण है। आप एक अच्छे व्यक्ति हैं और अच्छे क्रांतिकारी बनने की प्रक्रिया में हैं।

हम जातिवाद के युग में हैं। हम किसी न किसी जाति में पैदा हुए हैं। हर जातियों के सिद्धांत हैं। हर जातियों के मसीहा हैं। जातिवाद का विरोध करते हुए हम जातीय विमोह में फँसे हुए हैं। इस जातीय विमोह के चक्कर में हम अपने मनीषी-मसीहा को जाति में बाँध कर रखे हुए हैं। आम्बेडकर परम विद्वान हैं। आम्बेडकर मेरे हैं। आम्बेडकर को सम्मान देना सिर्फ मेरा काम है। हम उनकी तौहीन नहीं होने देंगे। आम्बेडकर दलित हैं। आम्बेडकर महार हैं। अजीब सी विडम्बना है। हम जातिवाद का विरोध करते हुए जाति जे खूँटे को पकड़े बैठे हैं और उस महान व्यक्ति को भी जाति के घरौंदे से बाहर नहीं निकलने देना चाहते हैं जिसने स्वयं के 13 अक्टूबर 1935 के सपथ को 14 अक्टूबर 1956 को बौद्ध धर्म स्वीकार कर पूरा किया कि मैं हिन्दू धर्म में पैदा तो जरूर हुआ हूँ, वह मेरी मरजी नहीं विवशता थी लेकिन मैं हिन्दू धर्म में रहकर मरूँगा नहीं। दलित साथी यह नहीं सोचते और न मानना चाहते हैं कि जब डॉ. आम्बेडकर हिन्दू नहीं रहे तो वे भला दलित और महार कहाँ रहे लेकिन नहीं दलित अपने हित में उन्हें महार व दलित ही बनाए रखना चाहता है। जन्मना दलित को व्यवहारतः जाति से डिकास्ट हो जाना चाहिए। यहाँ तक डिकास्ट करिए कि कोई चमार कहकर गाली दे तब भी आप को प्रभावित नहीं होना चाहिए। जब कोई चमार कहे और आप प्रभावित हो उठें, तो इसका अर्थ है वह जातीय व्यवस्था को मानता है। जहाँ हमें जाति को त्याग देना चाहिए वहाँ हम गुह की तरह चूतर में लगाए हुए गंधा रहे हैं और कहते फिरते हैं कि हमीं सब से बड़े ब्राह्मणवाद विरोधी हैं। अरे! किस तरह के ब्राह्मणवाद विरोधी जब हम स्वयं उनके द्वारा प्रदत्त जातीय अहसास को हमेशा अपने दिल-दिमाग़ में लिए टहल रहे हैं बल्कि जब कोई चमार को गाली देता है तो उसे खट से अपना मान लेते हैं, अपना लेते हैं। मेरा यह मनोविज्ञान तत्काल आत्मसात कर पाना मुश्किल है लेकिन फ्रायड के मनोविज्ञान की तरह सोलह आने सच है। जो व्यक्ति मेरी जाति पराई जाति से विमुक्त नहीं हुआ हो वह जातिवादी है, घोर जातिवादी है। हम मूर्खता की हद तक दूसरों की जाति तोडना चाहते हैं और अपनी जाति बनाए रखना चाहते हैं। न जाति अपनी है और न मसीहा अपना है। इन दोनों तत्वों के मनोविज्ञान को समझिए और जातीय विमोह से दूर होकर जातिप्रथा को तोड़ने के लिए समाजवादी क्रांति में सहयोग करिए। दलित महकमें नें समाजवाद को लेकर विमर्श पैदा करिए।

अभी तक दलित समाजवाद के नाम पर भड़कता है। समाजवाद के नाम पर दलित इस कारण भड़कता है क्योंकि उसे लगता है उसे मार्क्सवादी बनाया जा रहा है। दलित मार्क्सवाद से इसलिए चिढ़ता है क्योंकि उसे लगता है कि उसके मसीहा डॉ. आम्बेडकर को मार्क्स से रिप्लेस किए जाने का कुचक्र किया जा रहा है। दलितों को मसीहावाद में फँसा कर हमेशा क्रांति के मार्ग से विचलित किया जाता रहा है। विचारों की बपौती नहीं है। महान व्यक्तित्व व नेतृत्व की भी बपौती नहीं है। क्रांतिकारी सिद्धांत को ग्रहण करने से डॉ. आम्बेडकर की कोई तौहीन नहीं होने जा रही है बल्कि उनके सपनों को अतिशीघ्र पूरा करने के लिए हम कुछ नई टेकनीकी और नए विचारों से आम्बेडकरवाद को इनरिच कर रहे हैं। वैसे भी हमें व्यवस्था परिवर्तन करना है न कि मसीहावाद लेकर ढोना है। दलितों का मसीहावाद एक प्रकार से पहचान की राजनीति है जो प्रकारांतर ब्राह्मणवाद ही है।

बिना समाजवादी व्यवस्था को स्थापित किए ब्राह्मणवाद किसी भी हालत में खत्म नहीं किया जा सकता है। जो लोग इस गफलत में हैं कि इसी संविधान द्वारा जातिप्रथा व ब्राह्मणवाद खत्म कर लिया जाएगा वे मेडक्स खाकर चिंतन कर रहे हैं। वे इतना भी जहमत नहीं उठाना चाहते हैं कि ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ पढ़ तो लिया जाय कि डॉ. आम्बेडकर ने जो ड्राफ्ट बनाया था, आखिर उसमें उस संविधान के अतिरिक्त इससे बढ़िया क्या है। वैसे परिवर्तन के लिए बेताब इन दलित साथियों को चाहिए कि हर हालत में ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ में वर्णित ड्राफ्ट के अनुसार नए संविधान की रचना करें तथा देश भर के दलित और प्रगतिशील क्रांतिकारी मिलकर उस पर बहस चलाएँ तथा उसे संसोधित संविधान के रूप में प्रस्तुत करें, संघर्ष करें, लड़ें और लागू करें। जो परिवर्तित संविधान का विरोध करे उसको शत्रु के समान ट्रीट करें।

वैसे एक बिंदु को चर्चा में और डालना चाहता हूँ कि जब हम समाजवाद की चर्चा कर रहे हैं तो क्यों न मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और स्तालिन के समाजवाद की भी चर्चा करें। यदि हम ऐसी चर्चा करेंगे तो हमारे दिमाग से गलतफहमी तो दूर हो जाएगी कि यह समाजवाद आम्बेडकर के समाजवाद के विपरीत नहीं है और न ही दलितों के विरुद्ध तथा ब्राह्मणों के पक्ष में है।

समाजवाद वह व्यवस्था है जहाँ मनुष्य के द्वारा मनुष्य का किसी भी तरह का शोषण खत्म हो जाता है। उत्पादन का उद्देश्य लोकहित होता है। उत्पादन के संसाधन व्यक्तिगत हाथों से छीनकर सामूहिक हाथों में चला जाता है। धर्म को बिल्कुल व्यक्तिगत बना कर घरों तक कैद कर दिया जाता है। सब को शिक्षा सब को काम की गारंटी कर दी जाती है। और भी बहुत कुछ है। पहले विमर्श तो शुरू करिए जनाब।

यह सच है कि आरक्षण से दलितों के एक तपके का शैक्षिक और आर्थिक विकास हुआ है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि 90 प्रतिशत दलितों तक आरक्षण की कोई पहुँच नहीं है। 90 प्रतिशत दलित आज भी भूमिहीन खेत मजदूर हैं। इन भूमिहीनों के लिए यह आरक्षण का फायदा उठा चुका दलित कुछ नहीं कर रहा है बल्कि उल्टे बहुसंख्य भूमिहीन खेत मजदूरों को अपने आरक्षण बचाओ आंदोलन में ट्रक भर-भर कर आंदोलन के मैदानों में ले जाता है। उनके विहाफ़ पर उच्च कुलीन दलित फायदा लेता है लेकिन उन गरीब भूमिहीन निरक्षर दलितों के लिए कुछ नहीं करता है बल्कि सवर्णों की ही तरह उनसे व्यवहार करता है।

आरक्षण डॉ. आम्बेडकर का वांक्षित उत्पाद नहीं है। उनका वांक्षित उत्पाद पृथक निर्वाचन था जिसे आमरण अनशन पर बैठकर पूना पैक्ट में बैरिस्टर गाँधी ने आम्बेडकर साहब से छीन लिया और उसके बदले गाँधी एण्ड कंपनी ने आरक्षण का प्रस्ताव रख दिया। डॉ. आम्बेडकर को अपनी असफलता पर दुख तो हुआ लेकिन उन्होंने इस आशा और विश्वास के साथ आरक्षण को स्वीकार कर लिया कि उनकी कौम लगभग 10 वर्षों में संघर्ष करने लायक शक्ति हासिल कर लेगी और जैसा मैं चाहता हूँ, उम्मीद है उससे बढ़िया ले लेने का माद्दा पैदाकर ले लेकिन हुआ इसका उल्टा। दलित जातियाँ आरक्षण से चिपक गईं बल्कि कायरता के हद तक चिपक गईं। दलित सिर्फ आरक्षण के सहारे जीवित रहना चाहता है, संघर्ष कर डॉ. आम्बेडकर के राजकीय समाजवाद प्लस संसदीय लोकतंत्र को लागू करने का साहस नहीं कर रहा है। कुछ लोगों को मुफ्त में खाने को मिल गया है इसलिए वे डॉ. आम्बेडकर के सपनों को तिलांजलि दे दिए हैं।

अमित कबीर:

प्रिय सर! आपसे मैने बहुत कुछ सीखा है और आगे भी सीखना है। आप मेरे गुरु हैं। सर! कम्युनिष्ट के लिए आम्बेडकर वैसे ही अछूत हैं जैसे दलित समाज के कथित बुद्धीजीवि चिंतक व अवसरवादी नेता मार्क्स को दलित समाज के लिए अछूत बनाने में लगे हैं। आम्बेडकर के प्रति मैने किसी भी कम्युनिष्ट को सहज नहीं देखा। मेरे पापा 1975 में समाजवाद से प्रभावित होकर कम्युनिष्ट संगठन की सहारनपुर इकाई से जुड गये थे। मुझसे मेरे पापा उस समय के अपने अनुभव साझा करते रहते थे। सार यही है कि आम्बेडकर कम्युनिष्टो के लिए दुखती रग समान हैं। पीडा तब होती है जब दलित समाज से आने वाला कम्युनिष्ट डा. आम्बेडकर को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं।| जैसे आप दूसरों को उनकी कमियों संग अपनाते हैं , वैसा दूसरे कम्युनिष्ट नहीं करते हैं। मेरी सोच या नजरिया अभी विकसित नहीं हुआ है, इसलिए कभी कभी गलती कर बैठता हूँ। शिष्य समझ माफ कर दिया करें, सर।

आर डी आनंद:

वैसे तो इसका जवाब कम्युनिस्ट पार्टियों के इतिहास को पढ़कर स्वयं जानना चाहिए। फिर भी, मैं कुछ मदद करता हूँ।

संक्षिप्त में, सीपीआई, सीपीआई-एम दोनों ही कम्युनिस्ट पार्टी नामधारी कांग्रेस और बीजेपी की तरह संसदीय लोकतंत्र की पार्टियां हैं। ये क्रांति नहीं चाहती हैं। सीपीआई-एमएल कुछ ठीक है लेकिन सांस्कृतिक आंदोलन न कर सकने की वजह सेयह भी क्रांतिकारी नहीं है। फिर आप या कोई बिना उचित अध्ययन के इनका सदस्य क्यों बन जाता है? दूसरी महत्वपूर्ण बात, जब आप को मार्क्सवाद का अता-पता नहीं है तो आप कम्युनिज्म से मोह और नाता क्यों बनाए रखना चाहते हैं? तीसरी बात, अँगुली पर गिनकर बताइए कि भारत में कितने दलित हैं जिसने मार्क्सवाद को पढ़ा है, ठीक से पढ़ा है, समझा है, ठीक से समझा है और किसी भी सवर्ण कम्युनिस्ट से पंगा ले सकने भर को पढ़ा है? कितने दलित कम्युनिस्ट हैं जो सवर्णों को कम्युनिज्म पढ़ा सकते गेन? हम किसी की बनी हुई गंधाउर पार्टी के सदस्य क्यों बन जाते हैं क्योंकि हममें नेतृत्व का ज्ञान और नेतृत्व की क्षमता ही नहीं है। यदि हममें क्रांतिकारी सिद्धांत और व्यवहार का भरपूर ज्ञान हो जाएगा तो हम किसी धूर्त के नेतृत्वमें क्यों झख मारेंगे, क्योंनहीं हम क्रांतिकारी पार्टी बनाकर ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद विरोधी समाजवादी क्रांति कर देंगे? ज्ञान और बूता पैदा करो। सारे प्रश्न और सारे कार्य हल हो जाएंगे।

सोनू सिद्धार्थ:

मै आप की बात से पूर्ण सहमत हूं जब भी गांधी को अपनी बात मनवानी होती तब ये आमरण अनशन पर बैठे जाते। मजबूरन समझौता करना पड़ता था। इस झुनझुने के सहारे भी लोगों ने अच्छी जिंदगी जियी है। अब बगैर कुछ मिले लोग ये झुनझुना कैसे छोड़ दे अगर वहीं लोग आंबेडकर को गरियाने से पहले खुद में झाक के तो सही होगा।

डॉ आंबेडकर जी की या हमारी हार कहिए या मजबूरन किया गया समझौता कहिए ये तो तह था पृथक निर्वाचन नहीं मिल सकता था अगर ये झुनझुना भी न मिला होता तो आज दलितों की स्थिति कैसी होती। अगर वो ये झुनझुना न लेते तो क्या करते। उस समय परिस्थितियां  भी उनके विपरीत रही होंगी।

मैने सभी कॉमेंट्स पढ़े है अगर वह झुनझुना  नहीं लेते तो क्या करते और आप आंबेडकर की जगह होते तो क्या करते?

आर डी आनंद:

प्रिय सोनू! आज हम डॉ. आम्बेडकर को पथ प्रदर्शक नहीं, मसीहा समझने लगे हैं। किसी की असहमतियों पर हम तिलमिला उठते हैं क्योंकि हम बाबा साहब को त्रुटिहीन मान बैठते हैं अर्थात देवता बना देते हैं। ईश्वर को न मानते हुए भी हम आस्थावान हो उठते हैं।

कुछ चीजों पर हमेशा स्पष्ट रहिए:-

यह कि विमर्श करते समय मैं किसी भी व्यक्ति को आरक्षण लेने से रोकता नहीं हूँ और न ही मैं आरक्षण का विरोध करता हूँ। मैं सिर्फ भौतिक परिस्थितियों का जिक्र करता हूँ। मैं कौन होता हूँ यह कहने वाला कि आरक्षण न लीजिए अथवा आरक्षण खत्म कर दिया जाना चाहिए।

जब डॉ. आम्बेडकर ने वाल्मीकि जातियों से कहा कि आप सभी को टट्टी साफ करने का कार्य छोड़ना होगा, तब जाकर हम सामाजिक उन्नयन का कार्य कर पाएँगे। साथियों ने कहा, फिर हम करेंगे क्या, हमें रोजगार कैसे मिलेगा? सफाई ही तो हमारा पेशा है। इसके अलावा हमें कौन सा काम मिलेगा और कौन काम देगा? नहीं बाबा साहब, हम बिना किसी विकल्प के इस कार्य को नहीं छोड़ सकेंगे। तह सच है कि बिना विकल्प के कोई भी रोजगार नहीं त्यागा जा सकता है लेकिन उस कार्य को करते हुए विकल्प तैयार करके उस कार्य को तो छोड़ा जा ही सकता है? बिना गंदे कार्य को छोड़े हमें सामाजिक सम्मान कदापि नहीं मिलेगा। अगर लड़ने की कूबत नहीं है तो हमें कुछ भी नहीं मिलेगा। यदि हमारे अंदर विजन नहीं है, विजन के अनुसार संगठन नहीं है, अगर हम संगठित होकर लक्ष्य के लिए लड़ेंगे-मरेंगे नहीं तो हमें कभी कुछ नहीं मिलेगा। होंठ चाटने से प्यास नहीं जाएगी। आरक्षण मात्र होंठ चाटने जैसा है, वह भी .3% लोगों के लिए।

अक्सर दलितों को यह डर सताता है कि आरक्षण न होता, तो क्या होता? यदि आरक्षण खत्म हो जाय, तो क्या होगा?

यदि कोई हमारा दस बीघा जमीन छीन ले और बाद में  दो बीघा रेहड़ या बटाई पर दे दे, तो हमारा काम तो चलेगा ही। फिर क्या हम रेहड़ और बटाई से संतुष्ट हो जाँय तथा अपना दस बीघा छीनने की योजना त्याग दें?

आरक्षण हमारे हाथ में झुनझुना है। इस झुनझुने को कितने प्रतिशत लोग बजा पा रहे हैं? 135 करोड़ में से 22.5 प्रतिशत अर्थात 30 करोड़ दलित हैं। इस तीस करोड़ दलितों में मान लिया जाय कि 50 लाख लोग नौकरी कर रहे हैं तो टोटल का .30 प्रतिशत लोग आरक्षण का फायदा के रहे हैं। 29 करोड़ 50 लाख भूखे-नंगे हैं। इसमें से 27 करोड़ दलित भूमिहीन, खेत मजदूर और निरक्षर हैं। हम-आप भारत के संपन्न 3 करोड़ दलितों में से हैं। खैर, फिर भी मैं आरक्षण छोड़ने की सलाह नहीं दूँगा लेकिन यह तो अपील कर ही सकता हूँ कि आरक्षण हमारे जीवन का विकल्प नहीं है। आरक्षण पूँजीवाद का पुछल्ला है। आरक्षण रोटी नहीं, रोटी का टुकड़ा है। मैं यह अपील तो कर ही सकता हूँ कि टुकड़े के स्थान पर पूरी रोटी छीन लो। यदि आम्बेडकर के मजबूरी से इतना प्यार है तो आम्बेडकर के सपनों से प्यार करो। आम्बेडकर का सपना राजकीय समाजवाद है। आम्बेडकर का सपना जातिविहीन और वर्गविहीन समाज का निर्माण है। यहाँ तो 27 करोड़ दलित निरक्षर, भूमिहीन और भूखों मर रहा है। कुछ लोग सिर्फ पेट भर रहे हैं। आम्बेडकर सहबक सपना सुअरों की तरह पेट भरना नहीं था। आम्बेडकर का सपना आरक्षण भी नहीं था। आम्बेडकर जा सपना लोकहित में उत्पादन तथा जन (राष्ट्र) के हाथों में उत्पादन के संसाधन को लिया जाना था। आम्बेडकर का मुख्य सपना व्यक्तिगत सम्पत्ति का उन्मूलन था। जिसको भी आरक्षण से प्यार है उन्हें आम्बेडकर के सपनों से प्यार क्यों नहीं है?

बिना लड़े कुछ नहीं मिलेगा बल्कि जो है वह भी खो जाएगा। आरक्षण पर बहस का अर्थ अथवा आरक्षण की कमियाँ गिनाने का अर्थ आरक्षण का त्याग करने का सलाह नहीं है बल्कि व्यवस्था परिवर्तन के क्रमिक और बेहतर उपायों की चर्चा करना है। दो तरह के दलित हैं; एक, वह जो इसी व्यवस्था में जीवित रहना चाहता है अथवा मात्र इतना ही समझता है कि इससे बेहतर और कोई व्यवस्था, सत्ता और संविधान हो ही नहीं सकता है। ऐसे लोग आरक्षण और इस संविधान को अंतिम विकल्प समझते हैं। दूसरा, वह जो आरक्षण और इस संविधान को क्रमिक विकास में पहला पायदान समझते हैं। वे मानते हैं आरक्षण और वर्तमान संविधान से दलितों, गरीबों, मजदूरों, मजलूमों का भला होने वाला नहीं है। ऐसे लोग वर्तमान उपलब्धियों का प्रयोग करते हुए बेहतर उपाय, संसाधनों और उपलब्धियों को अर्जित करने के लुई कठिन से कठिन संघर्ष करने को तैयार रखते हैं।

आप सुनिश्चित करिए कि आप कहाँ हैं?

अनिल गौतम:

कॉमरेड! बिल्कुल सही फरमा रहे हैं पर किससे कह रहे हैं, इन 10% लोगो से जो आरक्षण से चिपके हैं? वे भला 90% भूखे, नंगे, बेसहारों, भूमिहीनों के लिए क्यों कुछ करेगे। वे तो नौकरी की मलाई काट ही रहे है और जो 90% है, वे आप की आवाज सुन ही नहीं पा रहे हैं और सुन भी लें तो पहले वे अपनी भूख शान्त करें, रोजमर्रा की जरूरतो को पूरा करें या फिर संघर्ष का रास्ता अख्तियार करें; और करें भी तो कितने आगे आएँगे और कौन नेतृत्व करेगा। अंधेरे में तीर चलाने से अच्छा है, तीर न ही चलाया जाए।

आर डी आनंद:

जब से मैंने फेसबुक पर लिखना शुरू किया है, अनेक साथी कन्विंस हुए हैं और जड़ता से आगे बढ़े हैं। मुझे ऐसे लोगों से उम्मीद बंध रही है। इनमें बरगद का बीज उग रहा है। कुछ कायर होते हैं, कुछ फालतू के विद्वान, दोनों से कुछ भी उम्मीद नहीं किया जा सकता है बल्कि कुछ हुशियार इतने क़ाबिल हैं जो हमारे आप जैसे व्यक्ति को ही सबसे बड़ा पापी और दुश्मन समझने लगते हैं। क्या करेंगे? आप को स्तालिन जैसे बुद्धिमान और साहसी होना पड़ेगा। बनाइए लोगों को बुद्धिमान और साहसी। ये ही दुनिया बदलेंगे। हम तो खेत को पलिहर बना रहे है। बीज कोई और प्रत्यारोपित करेगा।

अमित कबीर:

शानदार विश्लेषणात्मक पोस्ट। कहीं भी असहमति की गुंजाईश नहीं। एक जगह थोड़ी सी आपत्ति है, वह यह है कि हमें सीधे सीधे अभी संविधान को बदलने की व नया संविधान लिखने की बात करने से बचना चाहिए। मैं इस संविधान का हिमायती नहीं लेकिन यदि हमें ज्यादा से ज्यादा दलित ओबीसी मजदूर को जोडना है तब हम कह सकते हैं कि सरकार पर संसोधन करने का दबाव बनाने हेतु आन्दोलन करना चाहिए। किसी भी कीमत पर हमे सत्ताशीन होना ही होगा। वह होगा बडे आन्दोलनों से, जिसमें ज्यादा से ज्यादा नीजिकरण की हानियों व समाजवाद के फायदे गिनाने होंगे।

आर डी आनंद:

आप की बात एक स्ट्रेटेजी कहलाती है। उस स्ट्रेटेजी पर मैंने जीवन के 57 वर्ष बिता दिए। अब तो बोल देने का समय आया है। नहीं बोलूंगा तो कल को आप ही कहेंगे कि आनंद नेभी कभी नहीं कहा।

व्यवस्था परिवर्तन करने पर वैसे भी संविधान बदल देना पड़ेगा। यह तो अन्तर्निहित सत्य है। जब हम संविधान लिखेंगे तो डॉ. आम्बेडकर की अच्छी सिफारिशों को लेकर शेष छोड़ देना होगा। एक तरह से होगा यह कि हम जिस नाव पर चढ़ कर पार उतरे हैं, उसे ही त्याग देना पड़ेगा। उसे त्यागने का मतलब निरदार नहीं होता है। जैसे माँ-बाप के दाह-संस्कार का अर्थ उनसे मोह न रखना कदापि नहीं होता है लेकिन अब उनकी बॉडी सार्थक नहीं है। केवल आस्था बच गई है लेकिन आस्था के सहारे हम नई मंजिल का मसाला नहीं तैयार कर सकते हैं। हमें नई मंजिल के लिए नए मसाले का इंतजाम करना होगा।

अभी से बोलकर रखने पर लोग इस मोह को त्याग पाएँगे, नहीं तो उनकी गलतफहमियाँ जड़ता तक मजबूत हो जाएँगी और जिस दिन आप उनको सत्य बताएँगे, उसी दिन वे अपनी झोली से निकाल कर आप को फेंक देंगे।

अमित कबीर:

बिल्कुल सही सर। यह तो मैंने सोचा ही नहीं था। हमें क्लियर होना पडेगा।

अमित बिडलान:

सर! आप ने आरक्षण को 10 वर्ष तक बताया है। क्या ये बात सही है?  केवल राजनीतिक आरक्षण ही 10 वर्ष तक था। बाद में समीक्षा कर इसे बढ़ाते गए। क्या sc/st समाज इतना सक्षम हो गया है कि उसके नेता अनारक्षित सीटों से चुनाव लड़ सकें और सामान्य वर्ग भी इतना समाजवादी हो गया है कि वो जातिगत भावना से ऊपर उठ चुका है और sc/st लोगों के लिए अपनी सीट छोड़ देगा? आज भी देश में बड़े से बड़े sc/st नेताओं को यहाँ तक कि चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी मायावती जी को भी आरक्षित सीट से ही चुनाव लड़ना पड़ रहा है। 10 साल तो क्या 70 सालों में भी शायद ऐसी स्थिति नहीं बन पाई कि देश में अब आरक्षण खत्म होना चाहिए बल्कि अब तो बिना किसी आन्दोलन के स्वर्णो को भी मिल गया, वो भी 61%  (51+10) सिर्फ देश की 15% आबादी को।

अब थोड़ा इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि ऐसी स्थिति क्यों नहीं बन पाई कि अब तक SC /St लोग मुख्यधारा में क्यों नहीं शामिल हो सके और इस के लिए क्या आरक्षण प्राप्त करने वालें जिम्मेदार हैं या कोई और, ये भी सोचने वाली बात है।

बाबा साहब जी ने जो संघर्ष किया था उसकी काट गांधी जी ने भूख हड़ताल से की और sc/st को मूर्ख बनाते हुए ये आरक्षण रूपी झूझना समाज को थमा दिया, जिसका समाज को फायदा कम और नुकसान ज्यादा रहा है।

अगर पृथक निर्वाचन प्रणाली होती तो हमारे समाज को फिर इस आरक्षण की जरूरत ही क्या थी। ये तो गांधी जी का एक भ्रमजाल था जिसमें समाज उलझ के रह गया।

गाँधी जी ने ये आरक्षण इसीलिए तो दिया था कि 10 वर्ष में ये लोग राजनीतिक और सामाजिक रूप से मुख्यधारा में आ जाएंगे अर्थात देश उच्चस्तरीय समाज इनको 10 वर्षो में अपना लेगा।

आखिर मुख्यधारा में आने के लिए सामान्य वर्ग ने ही तो रास्ता दिया था। यहीं से तो इस आरक्षण का फायदा होना था। तभी तो हमारा समाज मुख्यधारा में आता। इसके लिए सिर्फ अकेले sc/st लोग ही जिम्मेदार थोड़े है कि वे खुद सामाजिक और जातीय विद्वेष खत्म कर देंगे। इसकी पहल तो उच्च जातियों को ही करनी थी  क्योंकि भेदभाव तो वे ही करते आ रहे थे न कि अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति।

देखने वाली बात ये है कि क्या उच्च वर्ग ने जातिगत भेदभाव कम किया। क्या SC /St को सामाजिक मान-सम्मान और समाज की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक स्वतंत्रता दी। क्या अछूतो के लिए इनके नेताओं ने धार्मिक संगठनो या सामाजिक संगठनों ने कोई ऐसा आंदोलन या क्रांतिकारी जागरुकता उच्च वर्ग में चलाई कि जिससे इन लोगों को अछूतो को भी अपना भाई समझने में आसानी होती। धीरे धीरे ये जातिगत और सामाजिक भेदभाव खत्म होता। क्या गांधी जी ने ये कहा कि देश की आर्थिक संपदा में भी ये sc/st बराबर के भागीदार है और सभी अछूतो को स्वर्ण जातियों की तरह बराबर खेती लायक भूमि बांटी जाए ताकि देश में आर्थिक समानता आए।

लेकिन, उस समय के नेताओं और समाज सुधारको ने ऐसी कोई कोशिश नहीं की क्योंकि वे सब पूर्वाग्रही मानसिकता से ग्रसित थे जो नहीं चाहते थे कि sc/st लोग मुख्यधारा में शामिल हो और वे आर्थिक और सामाजिक रूप से सवर्णों के आस पास भी फटके। जब भी किसी दबे-कुचले या किसी भी प्रकार से पिछड़ चुके को समाज की मुख्यधारा में लाना होता है तो पहला दायित्व उस समाज का बनता है जो पहले से ही मुख्यधारा में हो।

वो ही हाथ पकड़ कर उसे मुख्यधारा में लाएगा क्योंकि वो उस उंचाई पर पहले से है जहाँ नीचे खड़े को उपर खींचना या लाना है।

अगर ऊंचाई पर बैठा हुआ व्यक्ति ही नीचे वाले को बार-बार दबाता रहेगा तो जिसका पेट और दिमाग़ भूख के कारण पहले ही खाली है तो वो उन मालिकों का कैसे विरोध करेगा जिसके दिये टुकड़े की बाट उसका पेट देख रहा है।

दस साल में तो वे उच्च जातियाँ भी इतनी शिक्षित नहीं हो पाई थी जो युगो युगान्तर से पढ़ती आई थी। फिर उन अछूतों से ये उम्मीद रखना बेईमानी है कि वो सदियों से दूर रही शिक्षा को इतनी जल्दी आत्मसात करले कि 10 साल में शिक्षित हो समाज की मुख्यधारा में शामिल हो जाँय।

आर डी आनंद:

दलितों को इस बहस में उलझना ही बेकार और मूर्खता है कि कौन सा आरक्षण 10 वर्ष के लिए था और कौन सा आरक्षण स्थाई था। आरक्षण की भौतिक परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। इस आरक्षण से दलितों में कुछ धनिक जरूर हो पैदा होजाएँगे लेकिन सम्पूर्ण दलित कौम का कोई भला और कभी नहीं हो पाएगा। दलितों को यह सोचना चाहिए कि क्या कारण है कि इस व्यावस्था में दलितों का भला नहीं हो पा रहा है। दलितों के मध्य चिन्तन की प्रक्रिया भी स्लो नहीं होनी चाहिए कि एक बात तय करने में 100 वर्ष गुजर जाय। आनन-फानन सोचिए और सुनिश्चित करिए कि कौम के भले के लिए क्या किया जाना अनिवार्य होगा और उसे तत्काल प्रभाव से प्रारंभ कर दिया जाय।

इस गलत फहमी में न रहिए कि शोषक वर्ग ही हमरा हाथ पकड़ कर हमें मुख्य धारा में ले जाएगा। हमारी लड़ाई वर्गीय लड़ाई है। इसे ही वर्ग संघर्ष कहते हैं। हमारा समाज दो वर्गों में बटा है- शोषक और शोषित। दोनों के अलग वर्ग हित हैं। स्वामी वर्ग से दया की उम्मीद बेईमानी है। इनसे लड़िए और स्वयं का स्टेट बनाइए।

मैं इस व्यवस्था में चुनाव लड़ने की सलाह, सत्ता हथियाने की सलाह व इस संविधान को सुधारने का सलाह नहीं दे रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ कि इस पूँजीवादी-ब्राह्मणवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकिए और एक नई व्यवस्था-नया संविधान बनाइए। राजकीय समाजवाद बाबा साहब का सपना था। हमें राजकीय समाजवाद पूरा होता नहीं दिखाई पड़ रहा है इसलिए राजकीय समाजवाद से आगे बढ़कर समाजवादी क्रांति के लिए कमर कसनी चाहिए।

आर. डी. आनंद

25.09.2021

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