चन्दौली की लगभग आधी आबादी भूमिहीन व गरीब किसानों की है

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मेहनतकश मुक्ति मोर्चा द्वारा 1 अक्टूबर 2022 को चन्दौली जिले के सैदूपुर में आयोजित जनसभा की विस्तृत रिपोर्ट।

नोट- रिपोर्ट की भूमिका में चन्दौली और वहाँ के मेहनतकश जनता की वर्तमान स्थिति का राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विश्लेषण किया गया है।

गत 1 अक्टूबर 2022 को चन्दौली जिले के सैदूपुर में मेहनतकश मुक्ति मोर्चा(MMM) द्वारा जनसभा का आयोजन किया गया। यह जन सभा “मेहनतकश जनता की मुक्ति का संघर्ष तेज करो” नारे के तहत आयोजित किया गया था। जनसभा में करीब 25 गाँवों की मेहनतकश जनता और प्रतिनिधि शामिल हुए। जिनमें से अधिकांश अधिया-पटवन-कूत और बन्नी पर पर खेती करने वाले भूमिहीन व गरीब किसान, वन भूमि पर खेती करने वाले मेहनतकश किसान व दिहाड़ी मजदूर थे। चन्दौली की लगभग आधी आबादी भूमिहीन व गरीब किसानों की है। इस क्षेत्र में जीविका का मुख्य साधन कृषि है, जिसका बड़ा हिस्सा आज भी 5-10% सामंती भूस्वामियों के पास है। लगभग आधी आबादी के पास जीविका का कोई साधन न होने, अपनी खेती न होने या बहुत मामूली जमीन होने, इलाके में उद्दोग-धंधे न होने, कृषि में मशीनों का इस्तेमाल बढ़ने आदि की वजह से इनके परिवार के सदस्यों को मजदूरी करने के लिए बहुत कम मजदूरी पर देश के कोने-कोने में जाना पड़ता है। योगी की भाजपा सरकार के “भू माफिया एक्ट” के तहत यही भूमिहीन, मेहनतकश, गरीब वर्ग भू माफिया है जो घर बनाने भर भी जमीन न होने की वजह से यहाँ-वहाँ गड़ही-पोखरी की जमीन पर बसा हुआ है। कई गांवों में उन्हें वहां से बेदखल करने के लिए नोटिस दी गई है और जुर्माना भी लगाया गया है। कुछ गाँवों में तो उनके घरों पर बुल्डोजर भी चला है। कुछ भूमिहीनों को अगर कहीं ग्राम समाज की जमीन का कोई टुकड़ा पट्टा भी हुआ है तो सामंती ताकतों की दबंगई की वजह से वो उस पर काबिज नहीं हो पाए हैं। चन्दौली के मुसखाड़ व नौगढ़ के वन क्षेत्र में भी वन विभाग किसानों को उनके वन संपदा और वन भूमि से बेदखल करने के लिए आये दिन नोटिस दे रहा है और कहीं-कहीं जबरिया बेदखली भी हुई है।

चन्दौली में उत्पादन और रोजगार का मुख्य साधन कृषि है और कृषि में यहाँ आज भी सामंती उत्पादन संबंध मजबूती से कायम है। जमींदारी उन्मूलन कानून, भूमि हदबंदी कानून(सीलिंग एक्ट) आज तक जमीन पर लागू नहीं हो पाया। जमीन पर पारिवारिक स्वामित्व का रकबा अगर थोड़ा कम हुआ है तो उसकी मुख्य वजह जमींदारों के परिवार में सदस्यों की संख्या का बढ़ना है। न कि असली किसानों को जमीन का मिलना। जमीन आज भी उन्हीं परिवारों के पास है जिनके पास पहले थी। भूमिहीन किसानों को आज तक जमीन नहीं मिली। ग्रामीण इलाकों का यह वो जिंदा सवाल है जिसे कोई भी जनपक्षधर पार्टी या संगठन नजरअंदाज नहीं कर सकता। इस इलाके में उद्दोग-धंधे लगभग न के बराबर हैं और बहुतों के पास अपनी खेती न होने की वजह से यह क्षेत्र बड़े महानगरों, शहरों में सस्ते लेबर की सप्लाई का क्षेत्र बना हुआ है। यहां से मजदूर बनकर जहाँ भी वो काम-धंधे की तलाश में जाता है वहां भी साम्राज्यवाद परस्त विकृत औद्योगिकरण व दलाल पूंजीवादी नीतियों की वजह से वो एक घुमंतू मजदूर में बदल जाता है। सामंती कृषि अर्थव्यवस्था की वजह से यह असली किसान भूमिहीन है और अधिया, कूत, पटवन के रूप में उसे जमीन का भारी लगान देना पड़ता है। खेत मजदूरी भी बहुत मामूली है वो भी नगदी की जगह अनाज(बन्नी) के रूप में। खेती में प्रयोग होने वाले खाद, बीज, कीटनाशक, कृषि औजार और बाजार पर भी साम्राज्यवादी पूंजी व देशी बड़ी कंपनियों का नियंत्रण है। जिसकी वजह से लागत मूल्य काफी बढ़ता जा रहा है और मेहनतकश किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य नहीं मिल पा रहा है। इन कारणों से भूमिहीन-गरीब व छोटे-मझोले किसान तबाह होते जा रहे हैं। दूसरी तरफ खेत मजदूरों की मजदूरी नहीं बढ़ रही है और मशीनीकरण की वजह से खेती में काम भी पहले से कम हुआ है। त्रासदी यह है कि अपनी जमीन न होने अथवा अपर्याप्त खेती या कृषि कार्य की वजह से बेरोजगार होते भूमिहीन, गरीब व मेहनतकश किसानों को स्थायी काम दे पाने में देश के सार्वजनिक या निजी क्षेत्र के उद्योग सक्षम नहीं हैं। साम्राज्यवाद परस्त दलाल पूंजीवादी नीतियों से विकसित उद्दोगों व गैर औद्योगिक क्षेत्रों में रोजगार के अकाल ने मेहनतकश जनता को तोड़ कर रख दिया है। जिसकी वजह से वह गाँव से शहर, शहर से गाँव व इस शहर से उस शहर के बीच झूल रहा है। लॉक डाउन में सबसे ज्यादा त्रासदी चन्दौली-पूर्वांचल, बुंदेलखंड, बिहार, झारखंड इन्हीं इलाके के श्रमिकों ने झेली थी।

सामंती कृषि अर्थव्यवस्था और कृषि में साम्राज्यवादी व बड़ी पूंजी की घुसपैठ ने भूमिहीन, गरीब व छोटे-मझोले मेहनतकश किसानों को कंगाली की तरफ धकेला है। इनकी वजह से खेती का विकास बुरी तरह प्रभावित है। यही कारण है कि भूमिहीन-गरीब व छोटे-मझोले मेहनतकश किसानों की क्रय शक्ति नहीं बढ़ पा रही है। जिससे औद्योगिक विकास की गति भी बाधित हो रही है। दूसरी तरफ साम्राज्यवाद परस्त व विकृत पूंजीवादी औद्योगिकरण की नीतियाँ खेती-किसानी की अतिरिक्त मेहनतकश आबादी को स्थायी काम उपलब्ध करा पाने में नाकाम हैं। इसलिए यह आबादी घुमंतू मजदूर बना हुआ है। आरएसएस-बीजेपी के दूसरे कार्यकाल में लगभग एक साथ ही अमेरिकी साम्राज्यवादियों के निर्देश पर किसानों को तबाह करने वाला कृषि कानून, मजदूरों को तबाह करने वाला 4 लेबर कोड और मजदूरों-किसानों-दलितों के बच्चों को शिक्षा के अधिकार से वंचित करने के लिए राष्ट्रीय नई शिक्षा नीति लायी गयी। ग्रामीण इलाके के परजीवी सामंती भूस्वामी देश के दलाल बड़े पूंजीपतियों की ही तरह साम्राज्यवाद के विश्वस्त दलाल बने हुए हैं और उसकी हर नीति का समर्थन करते हैं। साम्राज्यवादियों के साथ इन्हीं दोनों परजीवी शोषक वर्गों का राजनीतिक गठबंधन देश की राजसत्ता पर काबिज है। इस परजीवी भूस्वामी वर्ग की कमाई के सैकड़ों श्रोत हैं। यह शिक्षा माफिया, भूमाफिया, सूदखोर, प्रॉपर्टी डीलर, खनन माफिया, बिजनेस मैन, नौकरशाह, मेयर, मंत्री इत्यादि है। यह सैकड़ों धागों से विदेशी साम्राज्यवादियों व देशी दलाल पूंजीपतियों से जुड़ा हुआ है। दूसरी तरफ कुल मजदूरों की लगभग 93% आबादी असंगठित क्षेत्र में है और घुमंतू मजदूर बनी हुई है। बाकी के मजदूर भी धीरे-धीरे असंगठित क्षेत्र में ही ढ़केले जा रहे हैं। इनमें से अधिकांश ग्रामीण इलाकों के भूमिहीन- गरीब व छोटे- मझोले मेहनतकश किसानों के बच्चे और भाई-बहन ही हैं जो काम-धंधे की तलाश में बाहर जाते हैं। 4 लेबर कोड के माध्यम से इनके सारे श्रमिक अधिकार भी समाप्त किये जा रहे हैं। गाँवों में आज भी मजबूरीवश 10% मासिक के दर से ये मेहनतकश गरीब लोग ज्यादातर साहूकारों या सामंती भूस्वामियों से सूद पर पैसा लेते हैं। अब कुछ निजी कंपनियां भी सूदखोरी के इस घृणित धंधे में कूद गई हैं। इन सूदखोर निजी कंपनियों में परजीवी भूस्वामी वर्ग और साहूकार-महाजन भी अपना पैसा लगाते हैं।

इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखकर मेहनतकश जनता के मुक्ति संघर्ष को तेज करने के लिए 1 अक्टूबर को चन्दौली में जनसभा बुलाई गई थी।

जनसभा में चन्दौली की मेहनतकश जनता के स्थानीय नेताओं के अलावा अलग-अलग इलाकों से मेहनतकश जनता की अगुवाई करने वाले नेताओं को भी बतौर वक़्ता बुलाया गया था। जिसमें मुख्य तौर पर खेत मजदूर किसान संग्राम समिति, जौनपुर से कॉमरेड बचाऊ राम, जनमुक्ति मोर्चा, आज़मगढ़ से राजेश आज़ाद, कैमूर मुक्ति मोर्चा, कैमूर से राजालाल खरवार और इलाहाबाद से अधिवक्ता व राजनीतिक कार्यकर्ता विश्वविजय ने अपनी बात रखी। कार्यक्रम की अध्यक्षता मेहनतकश मुक्ति मोर्चा(MMM), चन्दौली के सचिव कन्हैया ने किया।

जनसभा में अपनी बात रखते हुए खेत मजदूर- किसान संग्राम समिति, जौनपुर के कॉमरेड बचाऊ राम ने साम्राज्यवाद परस्त शासक वर्ग की किसान विरोधी सामंती नीतियों का भंडाफोड़ करते हुए कहा कि ब्रिटिश सरकार को भी ये हिम्मत नहीं हुई कि वो जमींदार को सिर्फ भूमि का मालिक होने की वजह से किसान कह दे। ऐतिहासिक रूप से यह बात तय है कि खेती में श्रम लगाने वाला ही किसान है। हमारे पूर्वज जो खेती करते थे, जमींदार को लगान देते थे, आज हम ज्यादा से ज्यादा दर पर पटवन यानी पैसा, कूत, अधिया और कहीं-कहीं तो तिहाई पर खेती करते हैं। यह लगान ही तो है। यह लगान मुगलों और अंग्रेजों से भी ज्यादा है। ये गैर किसान मालिक- महाजन ही ग्रामीण इलाकों में निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की साम्राज्यवादी नीतियों के प्रबल समर्थक हैं। देश में हजारों मंदिरों-मठों, मस्जिदों के पास लाखों एकड़ जमीन है, अरबों रुपये के सोना-चांदी-जवाहरात हैं। ये धार्मिक-साम्प्रदायिक संस्थाएं जाति व्यवस्था व साम्प्रदायिकता को मजबूत करते हैं, हिंदुत्व का नवजागरण करते हैं, साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देते हैं। इन सब का विरोध करने वालों का हिंदुत्व सेनाओं, सामंती-जातिवादी सेनाओं द्वारा हत्या कराते हैं। उनको अपनी राजसत्ता द्वारा देशद्रोही का तमगा दिलवाकर जेल भिजवाते हैं। आज विदेशी खासतौर पर अमेरिकी साम्राज्यवादियों के साथ देशी बड़े पूंजीपतियों और गैर किसान भूस्वामियों यानी जमींदारों का गठबंधन ही भारत पर राज कर रहा है जो 3 कृषि कानून, 4 लेबर कोड, नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति, नए फॉरेस्ट एक्ट के माध्यम से देश के मजदूरों और मेहनतकश किसानों को तबाह कर रहा है। सिर्फ और सिर्फ मजदूरों, मेहनतकश किसानों, छात्रों-नौजवानों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों का राजनीतिक गठबंधन ही इन लूटेरों-शोषकों-परजीवियों को शिकस्त दे सकता है।

कैमूर मुक्ति मोर्चा, कैमूर के राजालाल खरवार ने कहा कि तेलंगाना, तेभागा के जनसंघर्षों के बदौलत बना जमींदारी उन्मूलन कानून आज भी सिर्फ कागजों पर है। शासक वर्ग के राजनीतिक गठबंधन में ये सामंती शक्तियां आज भी मजबूती से कायम हैं। यही वजह है कि भूमि हदबंदी कानून(सीलिंग एक्ट) जमीन पर आज तक लागू नहीं हो पाया। लगभग 70 साल पुराने सीलिंग एक्ट में आज की परिस्थितियों के मुताबिक बदलाव कर भूमि रखने की सीमा को कम करके धरातल पर लागू करने की जरूरत है। देश की व्यापक जनता का अंतर्विरोध आज भी इन सामंती शक्तियों के साथ है। दूसरी तरफ 1947 के सत्ता हस्तांतरण के बाद से वन विभाग जैसे कुछ दैत्याकार नए सामंत भी तैयार किये गए हैं। भारत में कुल 33 करोड़ हेक्टेयर जमीन है। जिसमें से 24% जमीन वन विभाग को देकर उसे विश्व का सबसे बड़ा जमींदार बना दिया गया है। जहाँ आदिवासी है वहीं जंगल है और जहां जंगल है वहीं आदिवासी है। मैं कैमूर से आपके साथ एकजुटता कायम करने के लिए आया हूँ। कैमूर पठार को बाघ अभ्यारण्य बनाने के बहाने खनन व लूट के लिए कंपनियों को दिए जाने की योजना बन चुकी है। सैकड़ों की संख्या में गाँवों को उजाड़ने की साजिश पर काम चल रहा है। हमारे परम्परागत जीविका के साधनों महुआ-पियार पर बैन किया जा रहा है। हम जंगल से चुनकर जहां महुआ-पियार बेचते हैं उन दुकानों को सीज किया जा रहा है। देश की सरकारें साम्राज्यवादियों के निर्देशों पर व उनके हित में काम कर रही हैं। कैमूर मुक्ति मोर्चा कथित बाघ अभ्यारण्य के बहाने कैमूर पठार को हड़पने की साजिश का पुरजोर विरोध करता है। अभी 6 महीने पहले करीब 70 किलोमीटर पद यात्रा कर हम लोग बाघ अभ्यारण्य की साजिश का विरोध करने के लिए अधौरा के जंगल-पहाड़ क्षेत्र से जिला मुख्यालय भभुआ तक आये थे। कैमूर व चन्दौली के मुसाखाड़-नौगढ़ जैसी स्थिति पूरे देश में है चाहे वो लखीमपुर ख़िरी हो, झारखंड हो, सिलगेर हो, हसदेव अरण्य हो। दरसल सामंती व साम्प्रदायिक हिंदुत्ववादी शक्तियों की मदद से देश कंपनी तंत्र की ओर बढ़ रहा है। मैं जंगल-पहाड़ का व्यक्ति होने के नाते आपको यह विश्वास दिलाता हूँ कि जंगल-पहाड़ हर दुख तकलीफ में देहात के साथ खड़ा रहेगा और मुझे यह भी विश्वास है कि देहात भी जंगल-पहाड़ के साथ खड़ा होगा। आज हमारे लिए आवाज उठाने वाले लोगों से देश की जेलें भरी पड़ी हैं। पत्रकारों तक को नहीं छोड़ा जा रहा है। झारखंड के पत्रकार रूपेश कुमार, केरल के सिद्दीक कप्पन, मोहम्मद जुबैर जैसे ढेरों पत्रकार आज राजसत्ता के जुल्म के शिकार हैं और इनमें से कई आज भी जेलों में बंद हैं। आज मजदूरों, मेहनतकश किसानों, दलितों, महिलाओं, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों को एक होना होगा। दरसल ये कथित आज़ादी सिर्फ शोषकों-परजीवियों की आज़ादी है।

इलाहाबाद से आये अधिवक्ता व राजनीतिक कार्यकर्ता विश्वविजय ने कहा कि सत्ता का मतलब संसद में पहुंचना नहीं होता। सत्ता का मतलब उत्पादन के साधनों पर उत्पादन करने वालों का अधिकार होता है। यहीं से हर चीज़ तय होती है। यही लड़ाई दरसल अपनी सत्ता बनाने की लड़ाई का केंद्र बिंदु है। समाज बदलने वाले लोग लड़ाई के साथ पढ़ाई करते हैं और पढ़ाई के साथ लड़ाई लड़ते हैं। मैं कानून का छात्र हूँ। भगत सिंह ने कहा था कि अदालतें ढकोसला हैं। इंक़लाब का मतलब होता है आमूल चूल परिवर्तन। ऐसी व्यवस्था जहां किसी भी प्रकार का शोषण व भेदभाव न हो। इन आदर्शों को हासिल करने के लिए चल रहे मुहीम में शामिल होकर संघर्ष करने वाला ही इंक़लाबी है। 1947 की आज़ादी एक झूठी आज़ादी थी। हम आपसे पूछते हैं कि क्या देश में जातिगत भेद-भाव खत्म हो गया? साम्प्रदायिकता खत्म हो गया? असली किसानों को जमीन मिली? अमीरी-गरीबी की खाई खत्म हुई?
उत्तर होगा नहीं। दरसल असली आज़ादी कि लिए देश में संघर्ष आज भी जारी है। ये संघर्ष ही बेहतर भविष्य की उम्मीद है। आज आदिवासी अपने जल-जंगल-जमीन को बचाने व एक शोषण विहीन समाज बनाने की लड़ाई लड़ते हुए पूरे देश को सैद्धांतिक- राजनीतिक नेतृत्व दे रहे हैं। अरुंधति राय कहती हैं कि भारत के आदिवासी सबसे अमीर धरती के सबसे गरीब लोग हैं। जिनको भारतीय राज्य सेना-फौज का इस्तेमाल करके बेदखल कर रही है। वहाँ राज्य मशीनरी द्वारा महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किये जा रहे हैं। हिमांशु कुमार कहते हैं कि सरकार जंगल वालों से जंगल के कागज मांग रही है। सरकार अगर ऐसा सोचती है वो इन लड़ाई को फौजी दमन के दम पर खत्म कर देगी तो वो गलत सोचती है। आदिवासी न केवल अपनी धन और धरती की बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं बल्कि पूरे मानवता के मुक्ति की लड़ाई लड़ रहे हैं। वो इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे हैं और सरकार नाइंसाफी की। आज यही लड़ाई भारत व पूरे दुनिया की उम्मीद है। यही लड़ाई भगत सिंह के सपने को जमीन पर उतारेगी। आपके वोट से उनकी व्यवस्था में पहुंचने वाले नेता व पार्टियाँ कुछ नहीं करेंगी। सारी चुनावी पार्टियाँ विदेशी साम्राज्यवादियों, देशी दलाल पूंजीपतियों और सामंती भूस्वामियों की प्रतिनिधि हैं। उन्हीं के पैसे व रहमोकरम पे पलती हैं। इसलिए उत्पादन के साधनों पर अपने मालिकाने के लिए व अपनी राजसत्ता बनाने के लिए आपको संगठित होकर लड़ाई लड़नी पड़ेगी।

जनमुक्ति मोर्चा आज़मगढ़ से साथी राजेश आज़ाद ने कहा कि हमारे देश का इतिहास यह बताता है कि हजारों सालों से मेहनतकशों को जमीन, शिक्षा व शस्त्र तीनों से वंचित रखकर गुलाम बनाया गया है। इन तीनों पर मुट्ठी भर परजीवी शोषक वर्ग ने अपना मालिकाना कब्जा बनाये रखा। आजादी के 75 साल बाद भी हमारे मेहनतकश वर्ग को हजारों उंच-नीच, छूत-अछूत जातियों में बांटकर धर्म का जहर, जाति का जहर और शराब के जहर को नशे के रूप में पिलाया जा रहा है। इस नशे में धुत करके आज भी गुलाम बनाये रखने की साज़िश होती है। चुनावी ड्रामे के माध्यम से आपको यह एहसास कराया जाता है कि आपने शासकों को चुना है लेकिन सत्ता पर साम्राज्यवादियों की दलाली करने वाले सामंतों व पूंजीपतियों के नुमाइंदे ही काबिज रहते हैं। हमें इस चुनावी जाल से बाहर निकलकर सोचना होगा। गांवों में अधिकांश जगहों पर जहां पर गरीब-भूमिहीन व दलित किसान- मजदूर की आबादी बसी है वह जमीनें आज तक जमींदारों के नाम चली आ रही हैं। चकबंदी के बाद भी जमींदारों के प्रभुत्व के चलते जमीनों पर आबादी नहीं दर्ज हुई और सामंती भूस्वामियों के डर से सवाल भी नहीं उठता। इसके चलते हर चीज में सामंती भूस्वामियों का दबदबा बना रहता है, हमारी मजदूरी भी सस्ती रखी जाती है, उनके शादी-ब्याह में हम पुरुष-औरतें-बच्चे सस्ते में श्रम करते हैं। आज भी लेखपाल को भूस्वामी वर्ग अपने प्रभाव में लेकर दलितों के घरों को को खसरे-खतौनी के कालम में आबादी दर्ज करने की जगह खाली दिखाते हैं।

हमने चन्दौली के एक गांव को समझने की कोशिश की तो पाया कि 37 एकड़ जल जमाव की जमीन में 5 एकड़ जमीन पर चार पीढ़ी से दलित आबादी बसकर मेहनत मजदूरी करती है। लेकिन किसी का अब तक घरौनी नहीं दर्ज है, क्यों? पांच घर को पट्टा मिला लेकिन कब्जा नहीं कर पाए उल्टे पट्टा खारिज कराकर परती रखा गया, क्यों? आखिर कैसे बड़े भूस्वामी लोग 132 लैंड की जमीनों जैसे पोखरी, गढ़ई की जमीनों को पाटकर पशुचर, वृक्षारोपण आदि करके ग्राम समाज की जमीनों व सार्वजनिक जमीनों को हथियाये हुए हैं? बंजर,परती की जी.एस.जमीनों पर पट्टे को खारिज कराके स्कूल, मंदिर व ट्रस्ट बनाकर काबिज हैं? जमीनों पर असली किसानों के मालिकाने का सवाल आज भी जिंदा है। बताया गया कि चंदौली में पहले यह आंदोलन बड़ा था, अब कमजोर हो गया है। जब-जब जमीन पर भूमिहीनों के मालिकाने के सवाल को अनदेखा किया गया है, कम्युनिस्ट आंदोलन कमजोर हुआ है और हमारे साथ जुल्म बढ़ा है। आज भी मेहनतकशों को इस सवाल को उठाकर जुझारु आंदोलन खड़ा करने की जरुरत है। जमीन की लड़ाई शुरु होते ही चुनावों में भिन्न-भिन्न चुनावी पार्टियों के नेता, पुलिस, कोर्ट-कचहरी सब एक हो जाते हैं ,क्योंकि वह अन्यायी हूकूमत को बनाये रखना चाहते हैं। हमारे पास जुझारु संगठन व आंदोलन ही वह ताकत है जो मेहनतकशों को चमचा, दलाल बनने के बजाय निर्भीक सिपाही बनायेगा। इसी ताकत से हम हर अन्याय, जुल्म-अत्याचार का मुहतोड़ जवाब दे सकते हैं। इसी दुनिया में सोवियत संघ जैसे देश थे जहाँ गरीब मेहनतकश किसानों व मजदूरों ने क्रांति करके अपनी राजसत्ता को चलाकर दिखा दिया था। हमारे पड़ोसी देश चीन में भी मजदूर-किसानों की समतामूलक समाजवादी व्यवस्था कायम हुई थी। हमारे देश में भी छात्र, नौजवान, महिला, किसान, मजदूर,आदिवासी, दलित के बीच से आन्दोलन लगातार उठ खड़े हो रहे हैं लेकिन अभी भी वो कमजोर हैं। क्योंकि आंदोलन और संगठन के लिए हमलोगों के पास फुर्सत नहीं रहता है। क्योंकि हमें सस्ता श्रम बेचने वाला सस्ता मजदूर बना दिया गया है। हमें जीवन गुजारने के लिए घंटों खटना पड़ता है। परंतु हमें यह सोचना पड़ेगा कि हमारी मेहनत से सूई से लेकर हवाई जहाज-राकेट तक, खेत-खलिहान से लेकर ऊंची इमारतों-भवनों तक का निर्माण हो रहा है लेकिन हमारे लिए क्या बच रहा है? हमें घिसट- घिसटकर जीने की जगह संगठन के लिए समय निकालने की कोशिश करनी होगी। क्योंकि इसके बगैर कुछ नहीं होगा। महीने में एक- दो दिन कुछ घंटे का ही सही लेकिन अपने संगठन व संघर्ष के लिए समय निकालना होगा। हमें अपने-अपने गांव में महिला, पुरुष, नौजवान को संगठन की सदस्यता दिलानी चाहिए और सदस्यों को लेकर संगठन की कमेटियों का निर्माण करना चाहिए। हर गांव में कमेटीयों को बनाकर जुझारू आंदोलन खड़ा करना ही हमारा रास्ता है। मेहनतकश मुक्ति मोर्चा का जुझारू रास्ता हम सबका रास्ता है।

आखिर में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे मेहनतकश मुक्ति मोर्चा(MMM), चन्दौली के सचिव कन्हैया ने अब तक हुई सारी बातों को समेटते हुए देश और दुनिया के मजदूरों, मेहनतकश किसानों एवं अन्य मेहनतकश वर्गों की वर्तमान दशा, उसके ऐतिहासिक कारणों व चन्दौली में संगठन और संघर्ष को मजबूत करने के व्यवहारिक तौर तरीकों के बारे में अपनी बात रखी।

जनसभा में भगत सिंह छात्र मोर्चा, बीएचयू की लीडर इप्शिता व चन्दौली की मेहनतकश जनता के स्थानीय नेताओं ने भी अपनी बात रखी। जनसभा का समापन भगत सिंह छात्र मोर्चा व इंक़लाबी छात्र मोर्चा के साथियों द्वारा क्रांतिकारी जन गीतों से किया गया। जनसभा का संचालन MMM के कार्यकारिणी सदस्य रितेश विद्यार्थी ने किया। जनसभा का पूरा खर्च ग्रामीण मेहनतकश जनता, गांव से बाहर मजदूरी करने गए मजदूर साथियों व आंदोलन के समर्थक कुछ बाहरी मित्रों के सहयोग से किया गया।

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