बड़े जोतदार जनता के मित्र नहीं हैं तो भूमि-प्रश्न अनसुलझा कैसे रह सकता है?

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संपादकीय टिप्पणीः घुटे हुए और घाघ कॉमरेड्स मुझे करेक्ट करेंगे इस उम्मीद के साथ सकारात्मक ढंग से अपनी बातों को रख रहा हूँः प्रधान अंतरविरोध पूँजी और श्रम के बीच है। जैसे ही सत्ता पर बलात कब्जे के द्वारा देसी-विदेशी बड़ी पूँजी की गोचर परिसंपत्तियों को जब्त किया जाता है, शेयर बाजार को ध्वस्त किया जाता है, समस्त विदेशी कर्जों को रद्द किया जाता है वैसे ही भूमि और जाति प्रश्न बड़े पैमाने पर हल हो जाएगा। वह कैसे? चूँकि बड़े जोतदार जनता के मित्र नहीं हैं और निर्णायक लड़ाई के दौर में वे बड़ी पूँजी के साथ खड़े मिलेंगे इसलिए उनकी जमीनों को छीनकर मजदूरों की सत्ता उसका राजकीयकरण कर देगी। इसी से जुड़ा जाति का प्रश्न है। इंकलाब के तुरंत बाद एक झटके में स्त्रियों की भारी आबादी उत्पादक श्रम से जुड़ जाएगी और चूँकि स्वतंत्र व खुदमुख्तार होने की ख्वाहिशें पहले से ही अपने चरम पर हैं तो पितृसत्ता के पंक्चर होने की जमीन पर मनपसंद जीवनसाथी का चुनाव एकदम से एजेंडे पर आ जाएगा। जाति को जमीन-राजसत्ता के रूप में मिला संरक्षण खत्म होते ही उसकी बुनियाद हिलने लगेगी। एक गौर करने लायक बात और दलितों-स्त्रियों-वंचितों को जब लोकतांत्रिक अधिकार सच्चे मायने में मिल जाएंगे तो उनके भीतर नागरिक चेतना को लेकर पंजा भिड़ाने की शुरुआत होनी ही होनी है। इसी तरह से उद्योग-कृषि, मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम, पूँजीवादी उत्पादन पद्धति और पारिस्थितिकीतंत्र-पर्यावरण आदि-आदि के बीच के अंतरविरोध बहुत हद तक एक झटके में हल होना शुरू हो जाएंगे। तो जाति प्रश्न-स्त्री प्रश्न और कृषि के सवाल को लेकर टेसुए बहाने वालों, लोकरंजकतावादी ढंग से चीजों को प्रस्तुत करने वालों के बारे में इस नुक्तानज़र से विचार किए जाने की जरूरत है कि वास्तविक संघर्ष में वह कहाँ पर हैं, उनकी सांगठनिक पोजीशन क्या है? कितने अंबेडकराइट जनता के बीच, उसके दुख-दुख के बीच पाए जाते हैं, जनहित के मुद्दों पर उनका वास्तविक स्टैंड क्या रहता है?
जनचौक पर कुछ दलित नौदौलतिए जमीन बाँटने की मंसूबाबंदी कर रहे थे। करते ही रहते हैं, मेरे लिए वह अहम नहीं था। डॉ. रामू सिद्धार्थ आजकल अंबेडकराइटों के बहुत प्रिय बन रहे हैं, वजह जाहिर है उन पर भी शब्द जाया क्यों करना।
इस परिचर्चा को मैंने कॉमरेड मनीष आजाद की वजह से पूरा सुना- साथी का तर्क था कि जमीनों का अगर बँटवारा कर दिया गया तो शहरों की फैक्टरियों को सस्ते मज़दूर नहीं मिलेंगे इसलिए पूँजीवादी सत्ता इसका पुरजोर विरोधी करेगी। लेकिन इनकी लाइन तो एनडीआर वाली है। और बात कर रहे हैं पूँजीवादी राजसत्ता की। 🙂
साथी मनीष आजाद को संबोधितः हमारे गाँव में एक एकड़ के किसान के घरों के युवा 10 हजार रुपये पर मॉल्स में नौकरी कर रहे हैं। सारतः बेरोजगार हैं। रही बात श्रवण कुमार निराला जैसे संविधानवादियों की तो उन्हें इसी व्यवस्था में लूट में हिस्सा चाहिए, दलितों-पिछड़ों का खाता-पीता वर्ग पक्का संविधानवादी है और लूट में हिस्सेदारी के लिए व्याकुल है। उसके हताशा भरे प्रयास खूब हँसाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे चूहे बिल्ली के गले में घंटी बाँधने पर बहस कर रहे हों।
महानगरों की झुग्गियों को जमीन के सवाल से कैसे जोड़ेंगे महाशय। क्या वे अंबेडकरवादियों की चिंता के दायरे में नहीं आतीं।प्रकाश की गति से बढ़ती शहरीकरण की रफ्तार क्या भूमि सुधार के लागू होते ही थम जाएगी और क्या भारत सरकार के सशस्त्र बल भूमि सुधार होने देंगे, क्या चुनावी राजनीति इसकी अनुमति देगी, इस पर कोई बात क्यों नहीं कर रहा है? अंबेडकराइटों और मान्यवर के अनुयाइयों के पास भारतीय सेना, पुलिस-न्यायपालिका से लड़ने का क्या विकल्प है? या वे इन सबको कपिला गऊ बना देने के लिए कृत-संकल्पित हैं।साथी मनीष आजाद परस्पर-विरोधी बात कर रहे हैं। भूमि-सुधार लागू होगा तो वह पूँजीपतियों के खिलाफ जाएगा। इसलिए जैसे ही भूमि का सवाल उठाया जाता है वैसे ही राजसत्ता के गोचर अंग सामने आ जाते हैं। तो हमारा समाज पूँजीवादी समाज कैसे नहीं हुआ और सत्ता पर पूँजीपतियों का कब्जा कैसे नहीं हुआ। भूमिपति की सत्ता में निर्णायक दखल किस तर्क से?प्राइम कांट्राडिक्शन भूमिहीनों-भूमिपतियों के बीच कैसे? साम्राज्यावादी शक्तियाँ देसी जमींदारों को कैसे प्रश्रय दे रही हैं। बड़ा गड़बड़झाला है।
——— जमीन मिल जाने से शहरों की फैक्ट्रियों को सस्ते मजदूर नहीं मिलेंगे, यह तो मार्क्सवाद व राजनीतिक अर्थशास्त्र की उथली समझ का नतीजा है। ऐसा सिर्फ तब हो सकता है जब मिलने वाला जमीन का टुकड़ा कम से कम इतना हो कि गरीबी के स्तर पर भी जीवन चला सके। आज तो जिनके पास हेक्टेयर में भी जमीन है वे भी फैक्ट्री मजदूर बन रहे हैं।
मार्क्सवाद में ही नहीं, सामान्य अर्थशास्त्र में भी यह अध्ययन मौजूद है कि जमीन का एक छोटा टुकड़ा असल में मजदूरी को कम रखने में पूंजीवाद की मदद करता है। इसकी वजह है कि जमीन के इस टुकड़े के साथ बंध कर मजदूर का परिवार उसमें कंगाली में मरता खपता रहता है और सिर्फ काम करने की श्रेष्ठ उम्र वाले मजदूर औद्योगिक मजदूरी के लिए अकेले प्रवास करते हैं। अकेले पुरूष मजदूर औद्योगिक क्षेत्रों में एक कमरे में समूह में गुजारा चला मजदूरी करते हैं जबकि उनका परिवार पीछे गांव में जमीन की गुलामी करता है। इस तरह दोनों जगह उनके जीवन का न्यूनतम उपभोग खर्च घट जाता है और मजदूरी भी (श्रम शक्ति का मूल्य जीवन के पुनरूत्पादन का न्यूनतम व्यय होता है)। छोटे जमीन के टुकड़े वाले मजदूर इस स्तर पर होते हैं तो अन्य के लिए भी इसी स्तर पर समझौता करना विवशता होता है।
इसीलिए बाद के दौर में पूंजीवाद जहां विकसित हुआ वहां अधिकांश देशों में उसने छोटे स्तर की खेती को समाप्त नहीं किया है, बल्कि छोटी मोटी मदद की योजनाओं के जरिए बनाए रखा है। यह इन देशों में मजदूरी दर को कम रखने में मददगार है। भारत और चीन दोनों में यह स्पष्ट देखा जा सकता है। चीन में तो हूकु की व्यवस्था खास तौर पर इसी मकसद को पूरा करती है ताकि मजदूर परिवार गांव को पूरी तरह छोड शहरों में बसने की गति को धीमा रखा जा सके और युवा प्रवासी मजदूरों की आपूर्ति निरंतर जारी रहे।
इसके बजाय अगर पूरा मजदूर परिवार शहर में आ बसेगा तो जीवन निर्वाह का औसत न्यूनतम व्यय व नतीजन मजदूरी बढ जाएगी।
अब अगर भारत में जमीन सबको बांट दी जाए तो कितनी मिलेगी? क्या उतनी जमीन मिलने पर वे मजदूरी बंद कर जीवन चला सकेंगे?
उपरोक्त टिप्पणी सिर्फ जमीन मिलने और मजदूरी के संबंध तक सीमित है। जमीन के सवाल पर पूरा विचार नहीं है।

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