लमही का दरवाज़ा

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लमही का दरवाज़ा
वह लमही का दरवाज़ा था
जिसे दीवार बना देने की क़वायद शुरू हो चुकी थी
और उस दीवार में धीरे-धीरे चुने जा रहे थे प्रेमचंद।
कडकड़िया जाड़े की बटुरन
का रहस्य पूस की रात ने सुलझाया था
कि मानुष मानुष है
तमाम रहस्य बनाकर भी आप उसे मशीन नहीं बना सकते
डरिए कि मानुष सोता भी है
पूस की रात की यह गाढ़ी नींद
नींद नहीं जाग है
आतताई-खटान के बाद मानुष की गहरी नींद
सदियों से फूल की तरह पोसे-पाले गए जवान खेतों को जला कर राख भी कर सकती है
हल्कू और जबरा
दो मजूरों की दोस्ती ने ‘आत्मा के सब द्वार खोल दिए थे’
उजड़े हुए निचाट खेत को देखकर
हल्कू की प्रसन्नता में नींद और आग का रिश्ता है।
नींद और आग
जीवन और राग से भय खाने वाले
लमही के दरवाज़े को दीवार बना रहे हैं
जिसमें धीरे-धीरे चुने जा रहे हैं प्रेमचंद।
◆ वन्दना चौबे

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