मनरेगा कर्मियों की राज्यव्यापी हड़ताल से  मनरेगा मजदूर भूखों मरने को होंगे मजबूर

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विशद कुमार
मनरेगाकर्मियों की 27 जुलाई से जारी राज्यव्यापी हड़ताल से मनरेगा मजदूरों की कठिनाईयाँ बढ़ गई हैं। विगत् 4 महीनों से अन्य विभागों तथा निजी क्षेत्रों में विनिर्माण कार्य बन्द होने से श्रमिकों को मिलने वाला काम और मजदूरी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। ग्राम क्षेत्रों में निवासरत श्रमिक एक उम्मीद के साथ मनरेगा योजनाओं की ओर रूख करने लगे थे। ज्योंही सरकार ने 20 अप्रैल से मनरेगा योजनाओं में कुछेक सुरक्षा मानकों के साथ काम कराने संबंधी अधिसूचना जारी की, मजदूर वृहत् पैमाने पर मनरेगा योजनाओं में मजदूरी करने निकल पड़े थे। राज्यभर में मई महीने में 685595 परिवारों ने विभिन्न योजनाओं में मजदूरी की। जून महीने में यह सख्या बढ़कर 1071551 हो गई। वर्तमान जुलाई महीने में भी 940840 परिवार कार्यरत हैं। अप्रैल से जुलाई तक कार्य करने वालों में 124890 दलित और 332214 परिवार आदिवासियों की है। गौर करने वाली बात है कि कुल 3.25 करोड़ कार्य दिवस में से 1.32 करोड़ कार्य दिवस का पैसा महिलाओं को मिला। जो कुल मानव दिवस का 41 प्रतिशत है।
       हड़ताल से सर्वाधिक प्रभावित मुख्यमंत्री द्वारा 4 मई को घोषणा की गई महत्वकांक्षी 3 योजनाओं सहित कुल 484017 योजनाएँ हो रही है। 4 मई को प्रारंभ की गई योजनाओं में बिरसा हरित ग्राम योजना, नीलसंबर पीतांबर जल समृद्धि योजना और शहीद पोटो हो खेल विकास योजना शामिल है। बिरसा हरित ग्राम योजना के तहत् बागवानी हेतु इस वित्तीय वर्ष में 50 हजार परिवारों की जमीन पर न्यूनतम 1 एकड़ बागवानी लगाने का लक्ष्य सरकार ने निर्धारित किया है, जिसमें से अधिकाँश योजनाएँ आम बागवानी की हैं। अगले 15 से 25 दिनों के अन्दर गड्ढों की भराई हेतु आवश्यक सामग्री एवं पौधों की आपूर्ति किया जाना है। इसके साथ ही 10 अगस्त तक पौधों की रोपाई करने पर ही पौधों को इस बरसात में जड़ पकड़ने का मौका मिलेगा अन्यथा काफी मात्रा में पौधे मुरझा सकते हैं।
      मनरेगाकर्मी अपने 5 सूत्री माँगों को लेकर हड़ताल पर चले गये हैं। उनकी माँगें हैं कि झारखण्ड राज्य में कार्यरत सभी मनरेगा कर्मियों की सेवा को स्थाई किया जाए। स्थाई किये जाने की तिथि तक पद एवं कोटि के अनुरूप ग्रेड पे के साथ वेतनमान दिया जाए। मनरेगा कर्मियों को पच्चीस लाख का जीवन बीमा एवं पाँच लाख का स्वास्थ्य बीमा का लाभ दिया जाए तथा मृत मनरेगा कर्मियों के परिवार को पच्चीस लाख का मुआवजा एवं परिवार के सदस्य को अनुकम्पा के आधार पर सरकारी नौकरी दी जाए। मनरेगा कर्मियों को भी मातृत्व / पितृत्व अवकाश, अर्जित अवकाश, चिकित्सा अवकाश आदि का प्रावधान किया जाए। उनकी तीसरी माँग है कि अनियमितता के आरोप में मनरेगा कर्मियों को सीधे बर्खास्त करने के बजाए सरकारी कर्मचारियों की तरह कार्रवाई की जाए तथा अभी तक बर्खास्त कर्मियों को बिना शर्त सेवा में वापस लिया जाए। चौथा मनरेगा कर्मियों को सीमित उप समाहर्ता की परीक्षा में बैठने का अवसर दिया जाए तथा राज्य के समस्त नियुक्तियों में मनरेगा कर्मचारियों को उम्र सीमा में सेवाकाल की अवधि के बराबर छूट एवं रिक्त पदों में 50 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। आखरी माँग हैं कि बिहार की तर्ज पर मनरेगा को स्वतंत्र इकाई घोषित करते हुए मनरेगा कर्मियों को इनके क्रियान्वयन की सम्पूर्ण जिम्मेवारी दी जाए।
          झारखण्ड नरेगा वाच के संयोजक जेम्स हेरेंज और भोजन का अधिकार अभियान के संयोजक अशर्फी नन्द प्रसाद कहते हैं कि राज्य में विडंबना यह भी है कि राज्यभर में मनरेगा कर्मियों के 1499 पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं। कई प्रखण्डों में प्रखण्ड कार्यक्रम जैसे महत्वपूर्ण पद रिक्त हैं। एक-एक ग्राम रोजगार सेवक 2-2 पंचायतों की जिम्मेवारी निभा रहे हैं। सरकार की इस कदर उदासीनता की वजह से मनरेगाकर्मी कई दफा अत्यंत दबाव में कार्य करते हैं। दूसरी तरफ इन अनुबंध कर्मियों का मानदेय भी न्यूनतम साढ़े सात हजार से लेकर  20 हजार के बीच है। अतः सरकार की जवाबदेही है कि इनकी जायज माँगों पर तत्काल गंभीरता पूर्वक सकारात्मक पहल करे। दूसरी तरफ हड़ताली मनरेगा कर्मियों से भी ये अपील है कि इस आर्थिक आपातकाल के कठिन दौर में खुद के जीविकोपार्जन सुरक्षा के साथ ही 52 लाख पंजीकृत मजदूरों के हितों को ध्यान में रखते हुए हड़ताल खत्म कर काम में वापस आ जाना चाहिए। लगभग 5 हजार कर्मियों के हितों के लिए लाखों मजदूर परिवारों और राज्यवासियों की अनदेखी नहीं कर सकते।

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