श्रमिकों की बदहाली की जमीन पर खड़ा है कविता कृष्णन का निरपेक्ष लोकतंत्र

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कॉमरेड चारु मज़ूमदार ने सुधारवाद-संशोधनवाद के विरुद्ध स्पष्ट रेखा खींचते हुए ऐतिहासिक काम को अंजाम दिया। लेकिन जिन बिंदुओं पर उन्होंने तत्कालीन माकपा से संघर्ष चलाया और नई पार्टी की स्थापना की, उनकी नई पार्टी वापस वहीं जा पहुँची है। संसद की गद्दीदार कुर्सियों पर बैठने की बेताबी को अब लिबरेशन के लोग छिपाते नहीं हैं। कविता कृष्णन प्रकरण पर लिखी गई कम्युनिस्ट सेंटर फॉर साइंटिफिक सोशलिज्म के साथी नरेंद्र कुमार की यह टिप्पणी अवश्य पढ़ी जानी चाहिएः

समाजवादी व्यवस्था,स्टालिन तथा माओ की राज्य व्यवस्था का मूल्यांकन तो लगातार जारी है। यह मूल्यांकन ज्यादा से ज्यादा तर्कपूर्ण और जनवादी भाषा- शैली में आगे बढ़ाया जाए तो यह स्वागत योग्य है। लेकिन यक्ष प्रश्न है कि किस वर्ग की राजनीति के साथ खड़ा हो कर यह मूल्यांकन कोई कर रहा है?
वित्त पूंजी के प्रभुत्व के युग में, जब समाज घोर विषमता वाले वर्गों में बटा हुआ है, तो क्या एक वोट के लोकतंत्र को लोकतंत्र माना जाना चाहिए? जैसा सीपीआईएमएल के पूर्व के नेता कविता कृष्णन तथा दूसरे उदारवादी बुद्धिजीवी इसे नहीं लागू कर पाने के लिए स्तालिन की आलोचना कर रहे हैं, क्या आज के दौर में फासीवादी शक्तियों के राजनीतिक अधिकारों को लगाम दिए बगैर जनसाधारण के नागरिक अधिकारों की रक्षा की जा सकती है? क्या अपने ही पार्टी के अंदर षड्यंत्र करने वाले को या राष्ट्र राज्य के खिलाफ षड्यंत्र करने वाले को पूंजीवादी तंत्र चलाने वाले या उदारवादी बुद्धिजीवी क्षमादान दे देंगे ?
इन सभी प्रश्नों पर चुप्पी साध कर निरपेक्ष लोकतंत्र की जब हवा बनाई जाती है, तो आप कितने बड़े झूठके साथ खड़े हो जाते है। क्या झूठ और दुनिया भर में इस पूंजीवादी लोकतंत्र के कुकृत्य और दमनकारी चरित्र पर चर्चा नहीं होनी चाहिए? पूंजी तथा पूंजीपतियों के हितों से अलग किसी भी लोकतंत्र के द्वारा मेहनतकशों के पक्ष में खड़ा होने का कोई उदाहरण दुनिया में है, तो उसे पेश किया जाना चाहिए।
70 के दशक में इसी लोकतंत्र की गलतफहमी में चिल्ली तथा दूसरे लैटिन अमेरिकी देशों में जिस संसदीय गणतंत्र के माध्यम से सरकारें आईं उनका अमेरिकी साम्राज्यवाद था उस देश के प्रतिक्रियावादी शक्तियों ने फौजी हस्ताक्षेप के द्वारा जो हाल किया, चिली में एलीन्दे की वोट के द्वारा चुनी हुई सरकार के साथ जो व्यवहार किया गया उसपर उदारवादी बुद्धिजीवी चर्चा क्यों नहीं कर रहे हैं? क्या इन सब के बीच में उदारवादी बुद्धिजीवी तथा पार्टी अहिंसक लोकतंत्र की रूपरेखा पेश कर पाए हैं ?
वर्गों में बंटे समाज में कोई भी तंत्र सभी वर्गों के हितों की रक्षा नहीं कर सकता है, क्योंकि एक वर्ग का हित दूसरे वर्ग के शोषण और अंततः दमन पर टिका हुआ है। पूंजीवादी लोकतंत्र पूरी दुनिया में यही कर रहा है।
समाजवादी देशों का लोकतंत्र सबों का लोकतंत्र नहीं था। जैसे पूंजीवादी लोकतंत्र सबों का लोकतंत्र नहीं होता है, जैसे पूंजीवादी लोकतंत्र पूंजी के मालिकों के हितों और अधिकारों की सीमाओं में कैद है, उसी तरह से समाजवादी लोकतंत्र में मेहनतकश के अधिकारों की रक्षा के लिए अन्य शोषक वर्गों या उससे जुड़े समूह के अधिकारों को सीमित करना समय और सामाजिक स्थिति की नियति बन जाती है। क्या कोई बता सकता है कि समाजवादी सरकारों के अंदर मजदूर और मेहनतकश किसानों की हत्या हुई जैसा पूंजीवादी लोकतंत्र रोज कर रही है?
स्टालिन के शासन काल के दौर में जिस दमन की चर्चा की जाती है, उन्हें इसलिए दबाना पड़ा क्योंकि वे दूसरों के श्रम के आधार पर अपनी खेती को बनाए रखना चाहते थे।उस समय की परिस्थिति को शोलोखोव के प्रसिद्ध उपन्यास “कुंवारी धरती के जागरण” में कोई भी पढ़ कर समझ सकता है।
जिस स्तालिन पर तानाशाह होने का आरोप लगा रहे हैं उन भूतपूर्व कामरेडों व बुद्धिजीवियों को इतिहास की इन घटनाओं पर भी चर्चा करनी चाहिए कि रूसी क्रांति के बाद सत्ता संभालते ही लेनिन, खासकर स्टालिन ने फिनलैंड तथा यूक्रेन सहित सभी राष्ट्रीयताओं को अलग होने का अधिकार दिया था। और बाद में इन देशों की सरकारों ने मिलकर के सोवियत संघ का निर्माण किया था। आज उसी महत्वपूर्ण काम केलिए पुतिन राष्ट्रीयताओं की आजादी के लिए लेनिन की आलोचना करता है। सोवियत संघ के निर्माण में यूक्रेन के राष्ट्रवादियों को पराजित कर वहां के मजदूर किसानों की सत्ता ने मुख्य भूमिका अदा की थी।
पश्चिम के झूठे प्रोपेगेंडा में आने के बजाए तर्कपूर्ण ढंग से सोचा जाना चाहिए कि क्रांति तथा समाजवाद शांति का पाठ पढ़ाने की चीज नहीं है। समाजवाद में वर्ग संघर्ष के दौरान पराजित वर्गों को फिर से सत्ता में लौटने की बार-बार होने वाली कोशिशों को दबाने के लिए प्रहार करना ही होगा । यूक्रेन में भी वहां मजदूर किसान की पार्टी ने जर्मनी की फौज को समर्थन देने वाली राष्ट्रवादी पार्टियों को बलपूर्वक सत्ता से बेदखल किया था।
क्या पूंजीवादी लोकतंत्र के पुरोधाओं के समर्थन से ऐलेत्सीन के नेतृत्व में रूसी फौज ने 1991 की प्रतिक्रांति के दौर में रूस के संसद के फैसले को तोपों के बल पर नहीं दबा दिया था? यदि पुतिन गलत ढंग से चुनाव जीतकर के अध्यक्ष बनता है, तो पश्चिम और अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव में पूंजी का खेल क्या नहीं होता है? आज सभी उदारवादी बुद्धिजीवी इस तथ्य पर चुप रह कर इस लोकतंत्र में पैबंद लगा कर के पूंजी के मालिकों, उनके प्रोपेगंडा और उनकी सेवा करने वाली राजनीति तथा व्यवस्था को स्थापित करने में लगे हुए हैं।
समाजवादी समाज की अपनी समस्याएं हैं। मेहनतकशों और उनकी पार्टी के अंदर लोकतंत्र तथा जनवादी केंद्रीयता को बेहतर ढंग से कैसे लागू किया जाए यह एक चुनौती है। जब इस तंत्र पर पूंजीवादी समर्थकों ने कब्जा कर लिया तो सांस्कृतिक क्रांति का आवाह्न कर माओ ने आम जनता को सड़कों पर संघर्ष के लिए खड़ा कर दिया। क्या वह नीचे से लोकतंत्र की बहाली की लड़ाई नहीं थी? क्या वह सर्वसत्ता के खिलाफ जन आंदोलन का समाजवादी स्वरूप नहीं था?
इस बात पर चर्चा की जानी चाहिए कि समाज तथा पार्टी के अंदर जनवादी माहौल कैसे कायम हो, जैसा कि माओ ने चीन में कोशिश की थी। लेकिन इसके मुकाबले एक सड़ा दुर्गंध देता हुआ पूंजीवादी लोकतंत्र को पेश करें, यह शर्मनाक है। जो शोषक वर्गों के राजनीतिक अधिकारों की वकालत करें ,ऐसे बुद्धिजीवियों तथा भूतपूर्व कामरेडों को जो पूंजीवाद के दमनकारी चरित्र का पर्दाफाश न कर के लोकतंत्र की वकालत में कशीदा गढ़ रहे हैं, हम लानत भेजते हैं।
इस मुद्दे पर विद्यानंद चौधरी कहते हैंः क्या वर्तमान पूंजीवादी सत्ता लोकतांत्रिक है? आप जिन्हे वोट देते हैं, उनका चयन कैसे होता है? पार्टी के अंदर नेताओं का चयन कैसे होता है? इस विशेषाधिकार और अत्यधिक सुविधा संपन्न वर्ग के अधिकार कौन तय करता है? इनकी सुविधाओं और इनकी उत्पादकता में कौन सा संबंध है? इस लोकतंत्र में मजदूरों छात्रों महिलाओं के क्या अधिकार हैं? मेहनतकशों को कौन सा लोकतंत्र दिया है? अगर लोकतंत्र का अर्थ एक विशेष सुविधासंपन्न वर्ग के अय्यासियो के लिए पूरा मेहनतकश वर्ग समर्पित हो, अगर पूरी मानवता को विपन बनकर चंद लोगों की संपन्नता का अर्थ लोकतंत्र है, तो ऐसा लोकतंत्र किसे चाहिए? समाजवाद सबके लिए सम्मानपूर्ण जीवन सुनिश्चित करता है, और किसी को कोई विशेषाधिकार नहीं देता, तो इसके परे कौन से लोकतंत्र की बात हो सकती है?
नरेंद्र कुमार

 

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