श्रमिक जनता में जिम्मेदारी लेने का भाव और समझ पैदा करने की जरूरत पर जोर

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ऑल इंडिया वर्कर्स काउंसिल की बैठक, लखनऊ, 6-7 अगस्त 2022

 

एक लंबे अरसे बाद ऑल इंडिया वर्कर्स काउंसिल की बैठक 6 – 7 अगस्त 2022 को लखनऊ में हुई। बैठक का मकसद था संगठन की अभी तक की वैचारिक-व्यावहारिक गतिविधियों की समीक्षा करना ताकि गतिरोध के कारणों को समझा जा सके और नए सिरे से नई ऊर्जा के साथ पुनः काम शुरू किया जा सके।

एजेंडा:

  • आज के बदले हुए समय और परिवेश के संदर्भ में काउंसिल के विचारों कार्यों की समीक्षा।
  • विभिन्न क्षेत्रों में किए गए कार्यों की रिपोर्टिंग।
  • विभिन्न आंदोलनों, राजनीतिक कार्यक्रमों में भागीदारी।
  • नई श्रम सहिंताएँ और ट्रेड यूनियन आंदोलन।
  • तानाशाही-फासीवाद का उभार और लोकतंत्र पर बढ़ते खतरे।
  • अर्थव्यवस्था का नवउदारवादी रूपांतरण।
  • जनविरोधी कानून और नागरिक आजादी पर हमले।
  • कार्यों को पुनर्गठित करने के संदर्भ में विचार।
  • तात्कालिक सांगठनिक, आंदोलनात्मक कार्यभार।
  • अन्य मुद्दे।

इन सभी विषयों पर दो दिन तक अलग-अलग पक्षों से चर्चा हुई और निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातें निकल कर आई।

चर्चा के महत्वपूर्ण बिंदु:

[1] इस समय देश के भीतर और देश के बाहर पूरी दुनिया में कई तरह के युद्ध चल रहे हैं। देश के भीतर राष्ट्रवाद के पर्दे में लोकतंत्र के खिलाफ ताकि देश की बहुसंख्यक श्रमिक और किसान जनता को राजनीतिक तौर पर निष्प्रभावी बना कर श्रम-शक्ति और प्राकृतिक सम्पदा की खुली लूट की जा सके। लोकतंत्र के खिलाफ यह युद्ध हर देश के भीतर जारी है। नव उदारवादी नीतियों ने धन-संपदा-पूंजी के संकेंद्रण की एक ऐसी प्रक्रिया को जन्म दिया है जिससे पूंजीवादी-कारपोरेट खेमें में एक खतरनाक होड़ पैदा हुई है और यह कई जगह आंतरिक युद्ध और कई जगह दो  देशों के सीधे युद्ध के रूप में है। युद्ध भले ही दो  देशों के बीच हो लेकिन उसमें शामिल सभी देश हैं। वित्तीय पूंजी (सट्टेबाजी, सूदखोरी की पूंजी) का बढ़ता वर्चस्व पूंजीवादी अर्थतंत्र  के सामंजस्य और संतुलन को लगातार बिगाड़ रहा है और पुराने समय के कायदे-कानून अपना महत्व खोते जा रहे हैं। “जिसकी लाठी उसकी भैंस” जैसा माहौल है। यह माहौल पूरे समाज को विचार हीन बनाकर उसका हर स्तर पर अमानवीयकरण कर रहा है। निर्वाचित सरकारों और उसकी राज्य मशीनरी से लोगों की दूरी और अलगाव अत्यधिक बढ़ गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि सब-कुछ भी विघटित होने के कगार पर है। ऐसे में सबका अस्तित्व दांव पर लगा है चाहे वह पूंजीपति हो, श्रमिक हो, किसान हो, विद्यार्थी हो आदि। नवउदारवाद ने पूरी दुनिया को उसके तार्किक नतीजों तक पहुंचा दिया है। व्यवस्था अंदर से जितनी दरिद्र होती जा रही है उसका उपरी दिखावा चमक-दमक, लफ्फाजी, झूठ बढ़ता जा रहा है। पूंजीवाद के इस नए संकट ने उसे लगातार विनाशकारी नीतियों की ओर ले जा रही है- मानव जाति के लिए विनाशकारी और प्रकृति के लिए और भी विनाशकारी।  संस्कृति, जीवन-मूल्य, सामाजिकता, कला, साहित्य, ज्ञान-विज्ञान आदि हर स्तर पर लगातार गिरावट है हां तकनीकी जरूर आगे बढ़ रही है जो हर दिन नए सामाजिक संकट पैदा कर रही है।

[2] पिछले कुछ वर्षों से समाज के हर अंग में इतना बदलाव आ चुका है कि पुराने तौर-तरीके से काम आगे नहीं बढ़ेगा। हमें कामों के नए तौर-तरीके निकालने होंगे ताकि हमारा समाज से अलगाव खत्म हो और लोग हमारी बातें सुने। नवउदारवादी नीतियां जो पूरी तरह शिक्षा क्षेत्र से लेकर आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, वैचारिक आदि क्षेत्रों तक फैला एक समग्र कार्यक्रम है। लड़ाई हर मोर्चे पर एक साथ लड़नी होगी तभी उसका प्रभाव दिखेगा।

[3] नई तकनीकी की मदद से ना सिर्फ सच को तोड़ा-मरोड़ा गया है बल्कि ज्ञान को पूरी तरह संदर्भ-विहीन बनाकर मनुष्य की सोच को नियंत्रित किया जा रहा है। मानव के उपभोग की अवधारणा को बदलकर स्वयं मनुष्य के प्रकृति और चरित्र को बदला जा रहा है। आज हमें इस बदले हुए श्रमिक से संवाद करना है।

[4] इन प्रश्नों को और बेहतर तरीके से समझने के लिए श्रमिक आंदोलन के उन आवाजों को भी सुनना होगा जो रूसी-चीनी क्रांति के माहौल में अनसुनी रह गई थी। रोजा लक्जमबर्ग, ग्राम्शी आदि को नए संदर्भों में देखना होगा। दुनिया के और मुल्कों में बहुत-सी क्रांतियां और बड़े आंदोलन हुए हैं, हमें सभी के अनुभवों को जानना और आत्मसात करना होगा ताकि भविष्य का एक स्पष्ट खाका बना सकें। जिस तरह हमारी प्रकृति विविधतापूर्ण और उद्देश्यपूर्ण है उसी तरह हमारे सामाजिक और आत्मिक जीवन में भी विविधता होगी। जीवन, विचार, संस्कृति और परंपराओं में अनंत विविधता हो सकती है। इन्हें मिटा कर हम किसी श्रमिक समाज या समाजवाद की कल्पना नहीं कर सकते। आगे बढ़ने के लिए हमें विविधता की ताकत को समझना और स्वीकार करना होगा।

[5] पहचान का सवाल एक वास्तविक सवाल है लेकिन पहचान की राजनीति (सत्ता की राजनीति) एक नकारात्मक कार्यवाही है जो शोषणकारी व्यवस्था के साथ आसानी से घुल-मिल जाता है। इसी तरह महिला प्रश्न को उसके द्वारा किए गए घरेलू कार्य के राजनीतिक-अर्थशास्त्रीय विश्लेषण के बिना ठीक से नहीं समझा जा सकता। श्रम-शक्ति के पुनर उत्पादन में स्त्री-श्रम की क्या भूमिका है? इसे ठीक से समझने की जरूरत है।

[6] जब हम किसी संघर्ष या आंदोलन में भागीदारी करते हैं तो समस्या के प्रति एक नजरिया होता है और जब उससे बाहर होते हैं तो अलग नजरिया होता है। हमें दोनों को महत्व देना होगा। संघर्ष आंदोलन चाहे सफल हो या असफल हमेशा हमारे सामने कुछ वैचारिक प्रश्न रखते हैं। इन प्रश्नों को संबोधित करके ही हम आगे बढ़ सकते हैं। किसान आंदोलन हो या नागरिकता कानून के खिलाफ संघर्ष हो यह सब एक वैचारिक-सांस्कृतिक सवाल के रूप में हमारे सामने आते हैं। किसान आंदोलन से यह बात भी निकल कर आती है कि अन्य बातों के अलावा किसान एक सामाजिक पहचान भी है जो अमीर-गरीब किसान को एक साथ खड़ा कर देती है। सवाल यह भी पैदा होता है कि क्या किसान वास्तव में एक संक्रमणकारी समूह है जिसे देर-सबेर खत्म होकर श्रमिक वर्ग में रूपांतरित हो जाना है और खेती को उद्योग में रूपांतरित हो जाना है या अपने देश में किसान-श्रमिक के बीच क्या वास्तविक फर्क है ?और क्या एकता के बिंदु हैं ?

[7] यहां पर एक और बात महत्वपूर्ण है कि किसान आंदोलन ने अपने संघर्ष का आधार अपने सकारात्मक गुणों को बनाया ना कि अपनी कमजोरियों को। वह सत्ता के समक्ष याचक के रूप में नहीं बल्कि एक प्रभावी सामाजिक ताकत के रूप में खड़ा होकर सत्ता से बराबरी के स्तर पर संवाद करता है। आंदोलन में वह अपनी पूरी सामाजिक- सांस्कृतिक शैली के साथ उपस्थित होता है। पूरे समाज के सवालों के साथ खुद को जोड़ता है और सत्ता पक्ष के लिए एक नैतिक संकट खड़ा कर देता है। जब समाज का कोई समूह अपने आर्थिक-राजनीतिक प्रश्नों को एक नैतिक सवाल का रूप देने में सफल हो जाता है तो सत्ता को झुकना ही पड़ता है।

[8] सेवा क्षेत्र का इस दौरान एक नया विस्तार हुआ है। गिग वर्कर्स का एक बड़ा दायरा निर्मित हुआ है। यहां पर करोड़ों युवा कार्यरत हैं। यह शर्म का एक नया रूप है और इनकी समस्याएं भी नया रूप लिए हुए हैं। यह एक जबरदस्त शोषण का क्षेत्र है जिसमें श्रमिक आंदोलन का विस्तार होना है। आई टी सेक्टर से भी सीधे तौर पर और परोक्ष तौर पर करोड़ों कर्मचारी, तकनीशियन जुड़े हैं। यह भी शोषण का एक बड़ा क्षेत्र है और आई टी कंपनियों के प्रमोटर्स मालामाल होते जा रहे हैं। इन क्षेत्रों में कार्यरत श्रम-बल काफी शिक्षित और हुनरमंद होने के बावजूद श्रमिक अधिकारों के मामले में काफी पिछड़ा हुआ है। इन नए कार्यक्षेत्रों से श्रमिक आंदोलन का मजबूत संबंध कैसे बने इसकी राह निकालनी होगी।

[9] वास्तव में वर्कर्स काउंसिल को इन नए बदलावों के मुताबिक नए रास्ते निकालने का काम करना था ताकि पूरे वर्ग की वास्तविक एकजुटता रूप ग्रहण कर सके। हम सामान्यतः ट्रेड यूनियन गतिविधियों की सीमा से बाहर नहीं निकल पाए और एक स्पष्ट और स्वतंत्र कार्यक्रम नहीं बना पाए और ना ही एक प्रभावी सांगठनिक ढांचा बना पाए। हमारा काम संघर्षों, आंदोलनों में भागीदारी के साथ-साथ कुछ सामाजिक, सांस्कृतिक, वैचारिक स्तर पर भी है और इसके लिए थोड़ी कल्पनाशीलता ,रचनात्मकता की जरूरत होती है। हम ऐसा न कर सके सिर्फ पुरानी बातों-अनुभवों को दोहराते रहे। नया कार्यभार नए चिंतन की भी मांग करता है। हमें श्रमिक वर्ग की राजनीतिक-वैचारिक सक्रियता का एक बड़ा दायरा बनाना था जो हम नहीं कर सके।

[10] अपने देश में मजदूर आंदोलन स्वतंत्र नहीं है वह पार्टी का विंग है। इस स्थिति में श्रमिक जनता राजनीतिक एवं सामाजिक प्रश्नों पर निर्णय लेने को स्वतंत्र नहीं है। निर्णय लेने की आजादी एक सांस्कृतिक-वैचारिक प्रश्न भी है। श्रमिक वर्ग में इस आजादी की चेतना अभी काफी कमजोर है। निर्णय लेने का सवाल जिम्मेदारी लेने के सवाल से जुड़ा है। सवाल है श्रमिक जनता में जिम्मेदारी लेने का भाव और समझ पैदा करने का है।

[11] भौतिक उत्पादन से जुड़े श्रमिक वर्ग के साथ-साथ बौद्धिक, साहित्य, कलात्मक, सांस्कृतिक सृजन में लगे लोगों का एक जैसा महत्व है। श्रमिक जनता को इन सभी क्षेत्रों में कार्यरत लोगों की समस्याओं को संबोधित करना चाहिए और उन्हें अपने दायरे में लाना चाहिए। इससे हमारी ताकत बढ़ेगी और समझ का विस्तार होगा।

[12] नए श्रम संहिताओं, निजी करण और श्रमिकों के ठेकाकरण के खिलाफ एक वैचारिक-राजनीतिक लड़ाई का माहौल बनाना होगा। यह संघर्ष पुराने दौर की वापसी के नाम पर नहीं बल्कि एक नया समाज बनाने की दृष्टि के आधार पर संगठित होगा। कार्य का चाहे सरकारी क्षेत्र हो चाहे निजी क्षेत्र दोनों का संचालन एक पूर्ण अधिकार संपन्न नौकरशाही के द्वारा होता है। आम श्रमिकों, कर्मचारियों की स्थिति इस नौकरशाही के समक्ष दोयम दर्जे की होती है और उन्हें किसी तरह के निर्णय लेने की आजादी नहीं होती। नौकरशाही मूलतः पूंजीवादी व्यवस्था के संचालन की संरचना है। श्रमिक वर्ग को दोनों जगहों पर इस नौकरशाही को श्रमिक कमेटियों से प्रतिस्थापित करने के लिए संघर्ष करना है।

[13] श्रमिक कानूनों की जगह चार श्रमिक सहिताएं लाकर सरकार ने श्रमिक संघर्षों की राह और मुश्किल कर दी है। ट्रेड यूनियन रजिस्टर कराना इस समय में लगभग असंभव बना दिया गया है। किसी भी हड़ताल को गैरकानूनी घोषित करके श्रमिकों को दंडित करना मालिकों के लिए बहुत आसान बना दिया गया है। यहां तक कि श्रमिक आंदोलन को सहयोग करने वाले लोगों को भी दंडित करने का प्रावधान किया गया है। डिफेंस कारखानों के निगमीकरण के विरोध में कर्मचारियों की हड़ताल ना होने देने के लिए सरकार द्वारा एक नया कानून लाया गया। इस कानून के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर डिफेंस कर्मचारियों के हड़ताल पर रोक लगा दी गई। इसके साथ ही उन दूसरे कारखानों के हड़ताल पर रोक लगा दी गई जहां से डिफेंस कारखाने कच्चा माल और दूसरे कलपुर्जे लेते थे। जाहिर है इससे लगभग सभी दूसरे उद्योगों में भी परोक्ष रूप से यह कानून लागू कर दिया गया। इन कानूनी दावपेचों से श्रमिकों का संघर्ष बाधित करना बहुत आसान हो गया है। वर्कर्स काउंसिल को पहल-कदमी लेकर संघर्ष के नए तौर-तरीके निकालने होंगे।

दो दिन की बैठक में बातें बहुत तरह की आई और उन्हें पूरी तरह प्रस्तुत करना बहुत कठिन है फिर भी मुख्य बातों को सामने लाने की कोशिश की गई है।

आज के दौर की सच्चाई यह है कि सिर्फ श्रमिक वर्ग ही नहीं संकट में है बल्कि पूंजीवाद और पूंजीपति वर्ग और गहरे संकट में है। सत्ताधारी समूहों के बीच अस्तित्व बचाने का युद्ध चल रहा है जिसकी छवि हमें राजनीतिक, सामाजिक जीवन में साफ तौर पर दिख रही है। पूंजीपति, कारपोरेट समूहों के पास नव उदारवाद से आगे जाने की कोई संभावना अब नहीं बची है। वे जब तक सत्ता में रहेंगे मानवता और प्रकृति का विनाश करेंगे, दुनिया में युद्ध पैदा करेंगे, धर्मांधता और दंगा-फसाद पैदा करेंगे, लोगों को उसकी जमीन और देश से उजाड़ कर शरणार्थी बनाएंगे और श्रमिकों, युवाओं को गुलामी की ओर ले जाएंगे। आज की पूंजीवादी-कॉरपोरेटी सत्ता एक झूठे आख्यान (नैरेटिव) पर टिका है कि उनका कोई राजनीतिक, सामाजिक, वैचारिक, आर्थिक विकल्प नहीं है। उनकी सत्ता हवाई सपनों (फैंटेसी) के बल पर चल रही है और बाकी काम उन्होंने पुलिस और जांच एजेंसियों को सौंप दिया।

ऐसे में हमें वर्कर्स काउंसिल को अपने व्यवहार और विचारों से एक नया आख्यान (नैरेटिव) समाज में ले जाना होगा कि नया विकल्प संभव है। यह विकल्प श्रमिक समाज, माननीय समाज, न्यायपूर्ण समाज और मानवीय एवं प्राकृतिक विविधता से परिपूर्ण समाज के ठोस जमीन से उभर कर सामने आएगा। वे विकल्पहीन और हताश हैं लेकिन हम देश और दुनिया का भविष्य हैं। इसी से समाज में नए उत्साह और सक्रियता का संचार होगा।

सभी साथियों से आग्रह है कि वह अपनी सोच-समझ और सुझावों से हमें अवगत कराएं। यह सारे काम हमें इसी वर्ष में पूरे करने हैं ताकि देश की श्रमिक जनता की ओर से एक नया विकल्प समाज के सामने पेश किया जा सके। आप-सबसे पूरे सहयोग की अपील है।

साभिवादन

बाल गोविंद सिंह, पी सिन्हा

 

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