वियतनाम ने कोरोना को कैसे हराया?

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– एल. एस. हरदेनिया

वैसे तो कोरोना की महामारी से लगभग सारी दुनिया पीड़ित है और सभी देश अपने-अपने तरीके से इसका मुकाबला कर रहे हैं। परंतु जिस बहादुरी से और रणनीति बनाकर वियतनाम ने इसका मुकाबला किया है वह अद्भुत है। सच पूछा जाए तो वियतनाम बहादुरों का देश है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि वियतनाम ने अमरीका जैसे शक्तिशाली राष्ट्र के घुटने टिकवा दिए थे। उस दरम्यान वियतनाम को लगभग सारी दुनिया का समर्थन प्राप्त था। दुनिया की समस्त लोकतंत्र समर्थक जनता ने वियतनाम का साथ दिया था। उस समय सारी दुनिया में एक नारा गूंजता था ‘वियतनाम मेरा नाम तेरा नाम’।

6 मार्च 2020 को वियतनाम में कोरोना वायरस का पहला केस सामने आया। यह पता लगते ही वियतनाम में एक तूफान सा आ गया। इसके 22 दिन बाद तक वहां वायरस का एक भी नया मामला सामने नहीं आया। वियतनाम ने सबसे पहले चीन से आने वाली उड़ानों को प्रतिबंधित कर दिया। यह कदम अत्यंत कारगर साबित हुआ। इसी दरम्यान लंदन, मिलान और पेरिस की यात्रा कर एक महिला वियतनाम आई जो संक्रमित पाई गई। इसके तुरंत बाद उसके अड़ोस-पड़ोस में रहने वाले सभी लोगों को क्वोरंटीन कर दिया गया जो उसके संपर्क में आए थे। ऐसे लोगों की ढूंढ़-ढूढ़ंकर पहचान की गई।

‘‘उस समय मैंने महसूस किया कि ये लोग वायरस को नियंत्रित करने के लिए कितने गंभीर थे। इस महिला ने अपनी स्क्रीनिंग नहीं करवाई और शहर के भीड़भाड़ वाले इलाकों में भी घूमी। मैं स्वयं इस महिला की लगभग एक हजार लोगों की बस्ती के पास रहता था। उस पूरे क्षेत्र को लाकडाउन कर दिया गया और उसे सेना के हाथ में सौंप दिया गया।’’ एक भारतीय फोटोग्राफर ने बताया।

इस बीच उस महिला की खूब खिंचाई हुई। वैसे भी वहां उन लोगों को सख्त सजा दी जाती है जो नियमों का पालन नहीं करते। इस कारण वियतनाम के नागरिक आत्मानुशासन के आदी हो गए हैं। वियतनाम की आबादी नौ करोड़ से ज्यादा है। इतनी आबादी के बावजूद वहां तीन महीने में कोरोना वायरस के सिर्फ 327 मामले सामने आए। इनमें से 270 रोगमुक्त हो गए। 40 संक्रमित लोगों का अभी भी इलाज हो रहा है। परंतु काबिलेतारीफ यह है कि अभी तक कोरोना से एक भी मौत नहीं हुई है। वियतनाम में कम्युनिस्ट शासन है। उसने अनेक खूनी युद्ध लड़े हैं। वैसे वियतनाम अभी भी विकासशील राष्ट्र है। इसके बावजूद वियतनाम ने महामारी से ग्रस्त लोगों को खोज निकालने का जबरदस्त अभियान चलाया और मुस्तैदी से लोगों को क्वोरेंटीन किया गया। इसके साथ ही जनता को रोग के विभिन्न पहलुओं और उसकी गंभीरता से परिचित कराया गया। ज्योंही चीन में कोरोना से पीड़ित प्रथम रोगी का पता लगा वियतनाम ने हर संभव आवश्यक सावधानियां बरतना प्रारंभ कर दिया। यद्यपि वियतनाम में मेडीकल व्यवस्था उतनी अच्छी नहीं है जितनी विकसित राष्ट्रों में है इसके बावजूद वहां के नागरिक आत्मरक्षा की सभी संभव सावधानियां बरतते हैं। जहां तक मास्क पहनने का सवाल है, वियतनामियों को उन्हें पहनने की आदत पहले से ही है। यह इसलिए क्योंकि वहां विभिन्न कारणों से प्रदूषण फैलता है।

हनोई और हो ची मिन्ह सिटी वियतनाम के दो बड़े शहर हैं। देश के अनेक बड़े उद्योग यहां स्थापित हैं। इन्हीं दो शहरों में कोरोना वायरस से लोग संक्रमित हुए थे। वियतनाम में 1 अप्रैल से 22 अप्रैल तक लाकडाउन लागू किया गया। इसी दरम्यान पूरे देश में संक्रमित लोगों की खोज जारी रही। वहां के स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश के नागरिकों से अपने स्वास्थ्य संबंधी जानकारी देने को कहा। मंत्रालय ने एक ऐसी सुविधा लागू की जिससे किसी भी व्यक्ति की कोरोना जांच पाजिटिव होने की सूचना तुरंत मंत्रालय तक पहुंच जाती थी। इसके तुरंत बाद उसे क्वोरेन्टाइन कर दिया जाता था।

इस व्यवस्था के कारण कोरोना का फैलाव रोकने में अद्भुत सफलता मिली। इस व्यवस्था से स्थानीय नागरिक तो प्रभावित थे ही जो विदेशी इस दरम्यान वहां थे उन्होंने भी इसकी प्रशंसा की। एक भारतीय जो किन्हीं कारणों से वियतनाम में था ने बताया कि ‘‘पहले तो मैं बहुत भयभीत हुआ। परंतु वहां प्रतिदिन सूचना एकत्रित किए जाने की व्यवस्था और प्रतिदिन दिए जाने वाले परामर्श से धीरे-धीरे मेरा भय चला गया और मैंने महसूस किया कि मैं पूर्णतः सुरक्षित हूं‘‘। इस दौरान रोगग्रस्त व्यक्तियों की पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाती थी जैस रोगी का नाम, उसका पता, उसके नजदीकी रिश्तेदारों के नाम और वह किस अस्पताल में भर्ती है इत्यादि।

लाकडाउन समाप्त होने के बाद प्रत्येक नागरिक को हर प्रकार की सावधानी रखनी होती थी। यदि किसी भी भूल का पता लगता तो सख्त दंडात्मक कार्यवाही होती थी।

अब वहां जनजीवन सामान्य हो गया है। शिक्षण संस्थाएं, होटल, पब और पर्यटन स्थल खोल दिए गए हैं। वहां की व्यवस्था से प्रभावित होकर एक अमेरिकी महिला, जो इस दौरान वियतनाम में थी, ने कहा कि  ‘‘फरवरी व मार्च में अमेरिका मे व्याप्त अव्यवस्था से भयभीत होकर मैंने सोचा कि यदि ऐसी परिस्थितियां यहां (वियतनाम में) हो जाएंगी तो मैं संकट से बच नहीं पाऊंगी। परंतु अब मैं महसूस करती हूं कि यह मेरा सौभाग्य है कि इस दौरान मैं वियतनाम में थी। अमरीका से मेरी बहिन ने टिप्पणी की कि तुम एक ऐसे अत्यधिक सुरक्षित देश में हो। मैं अपनी बहन से पूरी तरह सहमत हूं। वह सौ प्रतिशत सही है।‘‘

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