कोल विद्रोह के 189वें वर्ष का मना कोल विद्रोह दिवस

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 * विशद कुमार 
 आज 11 दिसंबर 2020 को महान कोल विद्रोह के 189वां वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आदिवासी सरना महासभा केंद्रीय कमेटी द्वारा कोल विद्रोह दिवस का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता महासभा के अध्यक्ष नारायण उरांव की। कार्यक्रम नागरा टोली स्थित सरना भवन में किया गया । अवसर पर पूर्व मंत्री देव कुमार धान ने कहा कि आज से 189 वर्ष पूर्व हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजों, जमीदारों, जागीरदारों एवं शोषक तत्वों से अपनी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था पड़हा, अपनी जमीन, भाषा, संस्कृति एवं धर्म की रक्षा करने तथा अंग्रेजों एवं शोषक तत्वों के अत्याचार से मुक्ति पाने के लिए यह ऐतिहासिक कोल विद्रोह किया गया था।
श्री धान ने बतलाया कि प्राचीन मुंडा भूमि व्यवस्था के अनुसार भूमि पर किसी व्यक्ति का एकल अधिकार नहीं होता था, ना ही  जमीन के लिए पट्टा दिया जाता था। मुंडा और पाहन की देखरेख में जमीन को गांव के लोगों के बीच बांट दिया जाता था और हर व्यक्ति की जमीन की सीमा को गांव के मुंडा और कुछ गवाहों के समक्ष मान लिया जाता था।  कुछ गांव को मिलाकर पड़हा बनाया जाता था, जिसका मुखिया मानकी कहलाता था । उरांव जाति में भी यही परंपरा थी। आदिवासियों में कोई राजा नहीं होता था।  लेकिन राजा प्रथा शुरू होने तथा राजा के द्वारा जमीदारी, जागीरदारी प्रथा लागू करने एवं छोटानागपुर में अंग्रेजों के आने से आदिवासियों की पारंपरिक भूमि व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया गया। आदिवासियों का घोर शोषण हुआ उनकी जमीन लूट ली गई, उन पर अनेक प्रकार के टैक्स लाद  दिए गए।  भोले भाले एवं आशिक्षित आदिवासियों को कोर्ट कचहरी में फंसा कर उनकी जमीन बड़े पैमाने पर लूट ली गई। न्यायाधीशों के द्वारा पारम्परिक मुण्डा भूमि व्यवस्था और जमींदारी, जागीरदारी व्यवस्था के बीच के अंतर  को समझ नहीं पाना और  न्यायाधीशों द्वारा आदिवासी भाषा को नहीं समझ पाना आदिवासियों के लिए बड़ी समस्या बनी।  चूकि पारम्परिक भूमि व्यवस्था मौखिक रूप से होती थी और जमींदारी-जागीरदारी व्यवस्था लिखित होती थी, यह भी जमीन लूट की एक बड़ी वजह बनी। इस प्रकार आदिवासी जो  कल तक जमीन के मालिक थे वे लगान देने वाले रैयत बन गए।  इस शोषण के विरुद्ध ही हमारे वीर पूर्वजों ने महान कोल विद्रोह किया था। श्री धान ने कहा की यह कोल विद्रोह का ही परिणाम था कि वर्ष 1833 में रेगुलेशन Xlll बनाया गया और छोटा नागपुर  क्षेत्र के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था की गई, लेकिन आदिवासियों के पारंपरिक भूमि व्यवस्था को फिर से लागू नहीं किया गया यही कारण है कि आज भी आदिवासियों की जमीन लूटी जा रही है। श्री धान ने कहा कि आज के दिन हम सभी वीर बुधु भगत, विंदराय मानकी,  सिंगराई
मानकी,  सुई मुंडा,  हलधर भगत, गिरधर भगत, सुरू भगत,  दुहाई खांडू पातर, दूंदा मुंडा, समद मानकी,  रारा मुंडा, कोल भूतनाथ, मथुरा मुंडा, गंगा मानकी, तोपा मुंडा,  सिंगराई, दसई मानकी, कटीक सरदार, मोहन मानकी, सागर मानकी, सुरगा  मानकी, नगु पहान,  समेत उन हजारों वीर सेनानियों को नमन करते हैं, जिन्होंने हमारी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था पड़हा,  हमारी जमीन, भाषा, संस्कृति एवं धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।
 इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से बुधवा उरांव, तेतर उरांव, दिनेश उरांव, धर्मपाल भगत बिश्राम कुजूर, रजनीश उरांव, भवानी उरांव, गौतम मुण्डा, महेंद्र उरांव, राजेंद्र उरांव, जीतेन्द्र उरांव, अरविंद उरांव, प्रकाश उरांव, राम उरांव, बलराम उरांव, सोहन उरांव, रामु उरांव, संदीप उरांव समेत अन्य उपस्थित थे।

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