किसान आंदोलन मेरे गांव की सीमा पर

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        उत्पादन के तीन मुख्य साधन हैं , ज़मीन श्रम और पूंजी । मोदी सरकार द्वारा लाया गया कृषि कानून 2020 ज़मीन और पूंजी के बीच के संघर्ष में ,पूंजी के हितों को सुरक्षित करने का कानून हैं। इसे हम इस तरह भी कह सकते हैं कि  यह कृषि उत्पादन के क्षेत्र में ज़मींदारों और पूंजीपतियों के बीच की प्रतिस्पर्धा को समाप्त कर पूंजीपतियों को सीधा लाभ पहुंचाने वाला कानून है । व्यवस्था ऐसी हो गई है कि यहां शोषित तो पीड़ित है ही लेकिन शोषकों के समर्थक भी पीड़ित हैं । जिसका मुख्य कारण है निजी संपत्ति का सिद्धांत । लेकिन इस पर बात करना  जितना प्रासंगिक है उतना ही बेवकूफाना भी ।
            कृषि कानून के विरोध में पंजाब , हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज़मींदार पिछले कई हफ्तों से आंदोलनरत हैं । लेकिन जब इसे किसान आंदोलन कहा जाता है तो मुझे 1857 के सामन्तवाद और पूंजीवाद के मध्य राजनीतिक हितों की लड़ाई की याद आ जाती है जिसे बड़े गर्व से प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम कहा जाता है ।
            जिसे हम किसान आंदोलन कह रहे हैं वह दरअसल ज़मीदार आंदोलन है । आप इस आंदोलन को करीब से देखेंगे तो यह समझने में ज़रा भी देर नहीं लगेगी कि वाकई यह किसान आंदोलन नहीं बल्कि ज़मींदार आंदोलन हैं । इसके लिए  मेरे पास मुख्यतः तीन दलील हैं ,,,,
पहली आंदोलन का आर्थिक पक्ष
दूसरी सुनियोजित प्रबन्धकीयता
तीसरी राजनीति से दूरी का दावा
          सवाल उठता है क्या इस तरह की योजना किसान बना सकते हैं ? क्या भारत का किसान इस स्थिति में है कि केंद्र सरकार के विरुद्ध इस तरह का सुनियोजित आंदोलन चला सके ? लेकिन यदि आप ज़मींदार को भी किसान ही समझेंगे तो ऐसा सम्भव हो सकता है क्यों कि उत्पादन के तीन मुख्य साधनों के स्वामियों में से ज़मींदारों और पूंजीपतियों का ही  आर्थिक पक्ष मज़बूत होता है ।
         भारत सरकार तेज़ी से ठोस पूंजीवाद की दिशा में आगे बढ़ चुकी है । अब वह समय दूर नहीं जब सब कुछ पैकेट में ही मिलेगा भले ही वह सरसो या पालक ही क्यों न हो ! इस आंदोलन का परिणाम चाहे जो हो लेकिन अब इस व्यवस्था में ज़मींदार ज्यादा दिन तक सरवाइव नहीं कर सकते हैं । जिस नरेला गांव की सीमा पर यह आंदोलन चल रहा है उसी नरेला में  शिर्के इंडस्ट्रीज़ फ्लैट्स बना रही है । यह फ्लैट्स नरेला के बड़े ज़मींदारों और छोटे किसानों की भूमि पर ही बन रहे हैं । नरेला में कृषि योग्य ज़मीन समाप्त कर दी गई है ।
        कृषि कानून 2020 में क्या है ? क्या नहीं है ? इस पर बहुत बात हो चुकी है । लेकिन मेरा मकसद सिर्फ इतना ही है कि
क्या यह आंदोलन व्यवस्था विरोधी है ?
इस आंदोलन से किसानों को क्या मिलेगा ?
इस आंदोलन से दलित मज़दूरों को क्या मिलेगा ?
जब आप इन तीन सवालों पर गौर करेंगे तो पाएंगे इस कृषि कानून से न तो व्यवस्था , किसान और दलित मज़दूरों का कोई अहित होगा और न ही किसान आंदोलन से किसान , मज़दूरों को कोई लाभ ही होगा ?
कारण  छोटे किसान या बहुत छोटे किसान अपनी उपज मंडी या बाज़ार में नहीं ले जाते हैं । वह उपज का बहुत कम हिस्सा ही बेच पाते हैं । उपज का वह कम हिस्सा भी वह अपने आस पड़ोस में ही बेच लेता है । लेकिन बड़े भूमिपति ऐसा नहीं कर सकते उनकी उपज का लगभग सारा हिस्सा मंडी या बाज़ार में ही जाता है । बड़े भूमिपति या ज़मींदार बाज़ार में पूंजीपतियों से टक्कर लेना नहीं चाहते हैं क्यों कि वह जानते हैं कि राज्यसत्ता लगभग कई वर्षों  बल्कि आज़ादी के बाद से ही पूंजीपतियों के हितों के अनुरूप नरम होती आई है । सीधी लड़ाई न लड़ के ज़मींदार अपने सुरक्षित क्षेत्र में बने रहना चाहते हैं । बेशक उनके बच्चे विदेशों में शिफ्ट हो रहे हों । बेशक राजनीति , फ़िल्म उद्योग , खेल उत्पादन और सेवा क्षेत्रों में भारी मुनाफा कमा रहे हों । पंजाब में एक महिला मंत्री ने यह कह कर इस्तीफा दे दिया कि वह किसान की बेटी है । जबकि सही मायनों में किसान या दलित मज़दूर होना मानव सभ्यता की सबसे बड़ी त्रासदी है ।
        ज़मीन्दार और किसान के बीच जो फ़र्क़ है उसे समझने की ज़रूरत है । लेकिन इस फ़र्क़ को भारत के मार्क्सवादी भी नज़रअंदाज़ कर गए । शायद उन्हें नही  पता होगा कि जो तथाकथित किसान आज आंदोलनरत हैं वही अपने बड़े खेतों में काम पर “लगभग बंधुआ मज़दूरी ” जैसे मेहनताने पर लोगों को काम पर रखते हैं । सारा उत्पादन यही करते हैं जिन्हें हरियाणा पंजाब में ” सीरी ” कहा जाता है । मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि हरियाणा पंजाब के “सीरियों” को इस आंदोलन से क्या मिलने वाला है ? या ऐसा क्या है जो इन ” सीरियों” या छोटे  किसानों का खो जाएगा ?
        औद्योगिक क्रांति यूरोप में हुई । मौजूदा पूंजीवाद भी यूरोप में ही उतपन्न और विकसित हुआ लेकिन क्या वह यूरोप तक सीमित रहा ? बल्कि प्रतियोगिता से एकाधिकार की ओर बढ़ते पूंजीवाद ने विश्व को दो  दो विश्वयुद्धों और न जाने कितने विभाजनों और गृहयुद्धों में धकेल दिया था । पूंजीवाद सामन्तवाद को राजनीतिक रूप से पहले ही पराजित कर चुका है । अब पूंजीवाद ने सामन्तवाद की अंतिम पहचान ज़मीदारी को आर्थिक रूप से पराजित करने के लिए निर्णायक लड़ाई छेड़ दी है । आंदोलन का अभी चाहे जो परिणाम हो लेकिन ज़मींदार अब ज्यादा दिन तक कृषि उत्पादन की लूट पर नियंत्रण नहीं रख सकता है । क्यों कि यह पूंजीवाद की विशेषता है कि वह उत्पादक , वितरक और नियंत्रक सब होना चाहता है । पूंजीवाद इतना सक्षम भी है ।
       सवाल उठता है ऐसे समय मे हम क्या करें ?
इस सवाल के लिए मैं “लेनिन” की किताब ” सोवियत समाजवादी जनवाद ” के अध्याय जनवादी क्रांति की याद दिलाना चाहता हूँ । इस अध्याय में स्पष्ट कहा गया है कि यदि नेतृत्व पूंजीपति करेंगे तो वह जनवाद ( लोकतंत्र ) के नाम पर ऐसी व्यवस्था का निर्माण करेंगे कि जो केवल धनकुबेरों के लिए जनवादी होगी । लेकिन मज़े की बात है कि भारतीय मार्क्सवादी  जब राजनीतिक फ़ासीवाद का विरोध करते हैं (जो कि पूंजीवाद का ही एक सहायक तत्व है ) तो पूंजीवाद के प्रति नरम रुख रखते हैं । अब किसान आंदोलन ( जो कि मूल रूप में ज़मींदार आंदोलन है ) तो उसी पूंजीवाद के प्रति आक्रामक हैं । जहां तक मैं समझता हूँ यह वैचारिक आधार पर अपरिपक्वता या लगभग अवसरवाद का परिचायक है । विरोध के लिए विरोध प्रतिक्रियतावाद ही है । विरोध सिद्धान्त के लिए होना चाहिए । पूंजीवाद का विकल्प केवल राजकीय समाजवाद है जो कि दलित मज़दूर किसानों के नेतृत्व में स्थापित हो सकता है । ज़मींदार आन्दोलन  को किसान आंदोलन कहना तर्क संगत नहीं है क्यों कि यह केवल बीस से तीस प्रतिशत ज़मींदारों के निजी हितों का आंदोलन हैं । ज़मींदार हो या पूंजीपति दोनों ही दलित मज़दूर किसानों  के वर्गशत्रु हैं । इन दोनों के निजी हितों के बीच की लड़ाई में पड़ने से हमारा नुकसान तो हो सकता है लेकिन फायदा कुछ भी नहीं क्यों कि यही ज़मींदार हैं जो आज भी हरियाणा में खाप पंचायत चला रहे हैं । जाति व्यवस्था को मज़बूती से सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं । अंतर्जातीय , अंतर्धार्मिक प्रेम और विवाहों में रुकावट पैदा करते हैं । यही ज़मींदार हैं जो यू पी में दलित मज़दूर किसानों का सामूहिक उत्पीड़न करते हैं । मैं व्यक्तिगत तौर पर इस आंदोलन का विरोधी नहीं हूँ । क्यों कि पूंजीवादी संविधान हमें इस बात की इजाज़त देता है कि अपनी सम्पत्ति की रक्षा के लिए हम बल प्रयोग भी कर सकते हैं  । जमींदार भाई तो फिर भी शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रख रहे हैं । ज़मीन ,पूंजी और श्रम के बीच संघर्ष का मुख्य कारण निजी संपत्ति का सिद्धान्त ही है और यही ज़मींदार वर्ग है जो निजी संपत्ति के उन्मूलन की राह की सबसे बड़ी रुकावट है । दलित मज़दूर किसानों की लड़ाई ज़मींदार और पूंजीपतियों दोनों के विरुद्ध है । प्रतिद्वंदी होते हुए भी ये दोनों वर्ग मित्र हैं । साथ ही हमारे वर्ग शत्रु भी । राजकीय समाजवाद के लिए दलित मज़दूर किसानों को दोनों ही मोर्चो पर लड़ाई लड़नी होगी । मैं इस आंदोलन का वैचारिक विरोधी हूँ क्यों कि यह प्रतिक्रियावादी आंदोलन है जो यथास्थिति को बनाये रखना चाहता है जो कि अब सम्भव नहीं है । पूंजीवाद बहुत आगे निकल चुका है इतना आगे की लगभग आवारा हो चुका है । अपने ही द्वारा बनाये गए संविधान की खुद धज़्ज़ियाँ उड़ा रहा है । ऐसे में विकल्प केवल निजी संपत्ति के उन्मूलन हेतू युद्धरत होने की ज़रूरत है न कि अपने निजी हितों को बचाने के लिए लड़ने की । ज़मींदारों को सामन्तवाद से मुक्त होकर समाजवाद के लिए सभी क्रांतिकारी शक्तियों से समझौता करते हुए पूंजीवाद से निर्णायक लड़ाई लड़नी होगी । तभी व्यवस्था हर व्यक्ति को समान रूप से जीवन जीने के स्वतंत्र अवसर मुहैया करा सकती है । दलित मज़दूर किसानों के लिए भी यही रास्ता शेष है ।।।
जय भीम लाल सलाम ।।।
रवि निर्मला सिंह

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