कविता कृष्णन के इस्तीफे पर मज़दूर आंदोलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं की राय

0
188

क्रांतिकारी और चुनावी दोनों तरह के वाम हलकों में भाकपा-माले (लिबरेशन) नेता कविता कृष्णन के इस्तीफे पर चर्चा का बाजार गरम है। कविता कृष्णन बिना किसी लागलपेट के कह चुकी हैं कि गुज़रे जमाने की सर्वहारा वर्ग की तानाशाही की जमीन पर खड़े होकर मौजूदा दौर के सर्वसत्तावाद-फासीवाद से नहीं लड़ा जा सकता। वे उदार जनतंत्र की प्रबल समर्थक के रूप में मौजूदा फासीवाद से लड़ना चाहती हैं।
संप्रभुता-संपन्न राज्य की जरूरत ही इसलिए उत्पन्न हुई कि उत्पीड़ितों को शोषकों के अधीन रखने के साथ ही साथ शोषक वर्ग के बीच के आपसी द्वंद्व का भी निपटारा किया जा सके। मौजूदा पूँजीवादी दौर में हर पूँजीपति के अपने तात्कालिक हित होते हैं और वे अपने वर्ग के भीतर तीव्र टकराव की मुद्रा में होते हैं। एक-एक पूँजीपति के तात्कालिक हित और समूची पूँजीवादी व्यवस्था के दीर्घकालिक हितों के बीच तालमेल बैठाने का काम करता है संप्रभुता-संपन्न राज्य यानि कि केंद्रीय हुकूमत।
जो नज़र आता है वही अगर सत्य हो तो विज्ञान की जरूरत ही नहीं पड़े। स्वरूप को भेदकर अंतर्वस्तु तक पहुँचने के लिए साइंस की जरूरत पड़ती है। एक नजर में समझ में आता है कि देश में संविधान का राज है लेकिन जब हमारा सामना स्टेट मशीनरी यानि कि थाना-पुलिस, कोर्ट-कचहरी से पड़ता है तो साफ हो जाता है कि जिसकी जितनी हैसियत उसको उतना लोकतंत्र।
पर यहाँ एक पेंच है। मनुष्यता के विरोध होने वाले अपराधों में बाज़ दफा स्टेट मशीनरी मनुष्य-मात्र के पक्ष में, उसे न्याय दिलाने के लिए प्रतिबद्ध नजर आती है।
इस परिघटना को समझने के लिए आपको प्राचीन भारत पर केंद्रित कुछ उपन्यासों को पढ़ना होगा। मैंने ऐसा ही एक उपन्यास पढ़ रखा है, जिसमें यह बताया गया है कि दास भी अकारण वध्य नहीं है। यानि दासों का कोई नागरिक-मानवाधिकार नहीं लेकिन बेवजह वह भी वध्य नहीं। उस समय जनता की चेतना का स्तर बस इतना ही था कि जीवन का अधिकार दासों का भी होता है। आज जनता की चेतना का स्तर बहुत उन्नत हो गया है तो वह बुर्जुआ संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों को अमली जीवन में लागू होते देखना चाहती है।
जब हम कहते हैं कि पूँजीपति वर्ग की तानाशाही है तो इसका यह मतलब कदापि नहीं होता कि जिसके पास पैसा है वह मनुष्यों के साथ जैसा चाहे सुलूक कर सकता है और कहीं कोई आवाज नहीं उठेगी। इसका अर्थ सिर्फ इतना होता है कि पूँजीपति वर्ग द्वारा कम से कम मज़दूरी पर श्रमिकों को खटाने की व्यवस्था इसी संविधान के तहत की गई है।
मज़दूर आंदोलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि संविधान बुर्जुआजी द्वारा जनता से लिया गया पंगा है। पूँजीवाद अपने आधार क्षेत्र को विस्तारित करने के लिए जनता से कुछ वादा करता है और संविधान के रूप में वह लिपिबद्ध होता है। जबे मुनाफे की दर सामान्य से अधिक होती है तो पूँजीपति वर्ग की प्रतिनिधि यानि कि सरकार इस वादे को थोड़ा-बहुत निभाती है, अर्थात मज़दूरों को कुछ जनवादी अधिकार हासिल होते हैं। लेकिन जब मुनाफे की दर गिरने लगती है तब पूँजीपतियों के हितों की रक्षा करने के लिए अपने बघनखे सामने कर देती है।
राजनीति अर्थनीति की घनीभूत अभिव्यक्ति होती है, ऐसा लेनिन कह गए हैं। आज विश्व-पूँजीवाद और जाहिरातौर पर भारतीय पूँजीवाद भी अंतहीन संकट की गिरफ्त में है। मुनाफे की दर निरंतर गिरती जा रही है। अत्यल्प मज़दूरी पाने वाली जनता के बीच क्रयशक्ति ही नहीं बची। बाजार सामानों से पटा पड़ है पर कोई खरीदार ही नहीं है। मज़दूरी बहुत कम होगी तो बंदा चावल-रोटी खरीदेगा। टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं को खरीदने के बारे में वह सोच ही नहीं सकता।
तो इस तरह से हमने देखा कि बेरोजगारी-उत्पीड़न ढाँचाबद्ध है। पूँजीपति वर्ग की तानाशाही क्या होती है, इसे हम सभी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में देखते आए हैं। सर्वहारा की तानाशाही का अर्थ बस इतना सा है कि खाएगा वही जो कमाएगा। एक मनुष्य दूसरे का शोषक-उत्पीड़क नहीं होगा, यही है मज़दूर वर्ग की तानाशाही का अर्थ। जब शोषण-उत्पीड़न खत्म होने लगेगा, जब पूँजीपति वर्ग ही नहीं रहेगा तो जाहिर है हमारे मज़दूर होने का भी विलोपन हो जाएगा। सब मिलकर मानव समाज को उन्नत मंजिलों में ले जाने के लिए काम करेंगे और आज की तरह रोजगार-विहीन विकास नहीं होगा।
जब कविता कृष्णन मज़दूर वर्ग की तानाशाही की बात करते हुए उदार जनतंत्र के लिए लड़ने का आह्वान करती हैं तो इसका फलितार्थ क्या हो सकता है? आइए इस विषय पर मज़दूर आंदोलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं की राय जानने की कोशिश करते हैं।
इंकलाबी छात्र मोर्चा में काम कर चुके रितेश विद्यार्थी कहते हैंः कविता कृष्णन ने हाल ही में भाकपा माले (लिबरेशन) के सभी महत्वपूर्ण पदों से यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि “कम्युनिस्ट शासन प्रणाली से मेरी कुछ गंभीर राजनीतिक असहमतियाँ हैं, पार्टी में रहते हुए उस पर खुलकर अपनी बात रखने में मुझे परेशानी आ रही है।” हालांकि पार्टी के महत्वपूर्ण पदों से इस्तीफा देने से पहले(अभी उन्होंने पार्टी की आम सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया है) ही उन्होंने विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन के मार्गदर्शक नेता और सिद्धांतकार स्तालिन और तत्कालीन सोवियत समाजवादी शासन प्रणाली को साम्राज्यवादी व सबसे खराब अधिनायकवादी व्यवस्था बताते हुए हमला शुरू कर दिया था। उन्होंने स्तालिन को एक साम्राज्यवादी, तानाशाह और यूक्रेन के किसानों का हत्यारा बताया था। जिसके बाद से कम्युनिस्ट क्रांतिकारी हलकों में उनकी तीखी आलोचना हुई थी। बावजूद इसके सीपीआई (एमएल) लिबरेशन की ओर से आधिकारिक तौर पर न तो इसकी निंदा की गई और न ही उन पर कोई कार्रवाई की गई। जिससे मालूम पड़ता है कि पार्टी के भीतर भी भयानक अवसरवाद हावी है। कविता कृष्णन के वैचारिक- राजनीतिक पतन को सीपीआई माले लिबरेशन के संशोधनवाद से अलग करके नहीं देखा जा सकता। इस पार्टी में कोई सैद्धांतिक दृढ़ता अभी भी शेष बची है, ऐसा कह पाना नादानी होगी। क्योंकि क्रांति का एजेंडा इन्होंने कब का छोड़ दिया है।

दरसल रूस-यूक्रेन युद्ध के समय से ही कविता कृष्णन अमेरिकी पाले में खेलने लगी थीं और इस यूद्ध को उकसाने वाली घृणित कार्रवाई करने वाले अमेरिका व नाटो के खिलाफ इन्होंने बोलना उचित नहीं समझा। वर्तमान साम्राज्यवादी रूस के खिलाफ बोलने के बहाने स्तालिन व सोवियत संघ विरोधी अमेरिकी दुष्प्रचार में शामिल हो गईं। खुद को “उदार बुर्जुआ जनतंत्र” का हिमायती बताते हुए भी वो अभी भी खुद को मार्क्सवादी बता रही हैं। जबकि मार्क्स-एंगेल्स ने ही यह स्पष्ट कर दिया था कि वर्ग विभाजित समाज में कोई राज व्यवस्था अंततः एक वर्ग की तानाशाही होती है, मुखौटा भले ही वो ‘लोकतंत्र’ का लगा ले। बुर्जुआ डेमोक्रेसी भी बुर्जुआ वर्ग की खुली या छुपी तानाशाही ही होती है। विश्व में बुर्जुआ डेमोक्रेसी और मानवाधिकारों के सबसे बड़े झंडाबरदार अमेरिका के खूनी साम्राज्यवादी हमलों और जनसंहारों से पिछली सदी और इस सदी के दोनों दशक लहूलुहान पड़े हुए हैं। खुद अमेरिका के अंदर भयानक आर्थिक व सामाजिक असमानता व्याप्त है। काले और गोर का भेद व्याप्त है। वहाँ की पूरी मीडिया चंद पूंजीपतियों के नियंत्रण में है।

बड़े शर्म की बात है कि यह सब जानते हुए भी कविता कृष्णन बुर्जुआ डेमोक्रेसी की वकालत कर रही हैं। ऐसा नहीं है कि मार्क्सवाद-लेनिनवाद की सच्चाई से वो वाकिफ नहीं हैं। यह उनका सचेतन पतन है। यही वजह है कि आज जब कम्युनिस्ट आंदोलन बैकफुट पर है व पूंजी नंगी होकर दुनिया भर में फासीवादी रास्ते अपना रही है वो भी ‘डेमोक्रेसी’ की आड़ लेकर, तब वो उस पर हमला करने की बजाय स्तालिन, माओ और अतीत की कम्युनिस्ट शासन व्यवस्थाओं को अपना निशाना बना रही हैं। उस स्तालिन को निशाना बना रही हैं जिसके नेतृत्व में आक्रामक व हमलावर फासीवाद के खूनी पंजे से दुनिया को बचाया गया और उसका कब्र खोदा गया। सीपीआई (एमएल) लिबरेशन उनकी आलोचना करने व उन पर कार्रवाई करने की जगह उनके बचाव की मुद्रा में खड़ा है। खैर आने वाले समय में उनका अमेरिका प्रेम व असली चेहरा और खुलेगा।
इंकलाबी मज़दूर केंद्र की केंद्रीय कार्यकारिणी के सदस्य राम जी सिंह :मार्क्सवाद वर्गीय समाज में सत्ता के चरित्र के बारे में कोई भ्रम नहीं पालता । मार्क्सवाद मानव समाज के विकास की विभिन्न मंज़िलों के दौरान उस समय के आर्थिक संबंध, उत्पादन संबंध और उत्पादक शक्तियों के बीच संघर्ष के आधार पर तत्कालीन सत्ता का विश्लेषण करता है।वर्गीय समाज में सत्ता भी वर्गीय होती है व जनवाद भी वर्ग निरपेक्ष नहीं होता है । इस स्थिति में कविता कृष्णन सहित जो लोग भी सर्वहारा वर्ग की तानाशाही को सर्वहारा वर्ग की पार्टी के जरिये सुदृढ़ करने की कोशिश पर सवाल उठाते हैं ;वे किन्तु-परंतु के साथ मार्क्सवाद पर हमला करते हैं और संशोधनवाद के जरिये सर्वहारा वर्ग के साथ गद्दारी करते हुए पूंजीवाद की सेवा कर रहे होते हैं।

एक उत्पीड़ित वर्ग जो शस्त्रों को हासिल करने व उन का प्रयोग करने का प्रयास नहीं करता, वह गुलामों की तरह बरते जाने के लायक है। अगर हम बुर्जुआ शांतिवादी या मौकापरस्त न बन जायें तो हम नहीं भूल सकते कि हम एक वर्ग समाज में रहते हैं वर्ग संघर्ष के अलावा जिससे मुक्त होने का न कोई उपाय है न हो सकता है। हरेक वर्ग समाज चाहे वह दासता आधारित हो, भूदासता पर या मौजूदा उजरती गुलामी पर, उत्पीड़क वर्ग हमेशा सशस्त्र होता है। सिर्फ स्थायी सशस्त्र फौज ही नहीं, आधुनिक पुलिस भी सर्वहारा के खिलाफ सशस्त्र बुर्जुआ के प्रतिनिधि हैं, और यह सबसे अधिक जनवादी बुर्जुआ जनतंत्र जैसे स्विट्जरलैंड तक में सच है। यह ऐसा बुनियादी सच है जिस पर विचार के लिए बहुत वक्त लगाना जरूरी नहीं। सिर्फ इतना जोड़ना पर्याप्त है कि हर पूंजीवादी मुल्क में हड़तालियों के खिलाफ सैनिकों का प्रयोग किया जाता है। —- लेनिन

प्रस्तुति अद्वय शुक्ल

 

 

 

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here