कविता कृष्णन कांग्रेसी बनेंगी या एनजीओ खोलेंगी इसको लेकर सट्टे का बाजार गर्म

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कविता कृष्णन का लोकतंत्र!

भारत में जाति का मतलब अतीत में वर्ग रहा है जबकि रूस में जातीयता का संदर्भ पिछड़ी राष्ट्रीयताओं के संदर्भ में आया है। जार के शासन में पिछड़ी राष्ट्रीयताओं का शोषण व उपेक्षा रूसी राष्ट्रीयताओं के द्वारा होते रहा। जार के शासन में रूसी राष्ट्रीयता के लोगों का वर्चस्व रहा । इसे कुछ इस तौर पर भी देख सकते हैं कि सामंती समाज से लेकर मध्य काल के भारत को छोड़ दिया जाए तो अंग्रेजों के शासन में भी भारतीय नौकरशाही तथा सत्ता में भारतीय आबादी में ऊंची जाति खासकर ब्राह्मण जाति का वर्चस्व रहा। मध्यकाल बेबी मुगलों के शासन में मुस्लिम जागीरदारों नवाबों के बाद ऊंची जाति का ही वर्चस्व था था। अकबर के नवरत्न टोडरमल और तानसेन के अलावा नीचे के स्थानीय शासन में राजपूत और नौकरशाही में ब्राह्मण भरे हुए थे।
रूस में राष्ट्रीयताओं के शोषण को खत्म करने के लिए निजी संपत्ति को खत्म करने तथा सभी को रोजगार,बेहतर शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य और शासन करने के अवसर उपलब्ध कराए गए, जबकि भारत में सदियों से शोषित जातियों को सत्ता में हिस्सेदारी देने के नाम पर आरक्षण का प्रावधान किया गया। सोवियत संघ में शोषण का मुख्य आधार उत्पादन के साधनों पर राज्य का पूरा नियंत्रण था और राज्य समाज की जरूरतों को केंद्र में रखकर उत्पादन करता था न कि मुनफा के लिए उत्पादन करता था।
भारत में आरक्षण सरकारी नौकरियों तक सीमित रहा। जिस पर उत्पीड़ित व उपेक्षित जातियों के 5- 10% लोग ही जगह बना सके, बाकी पूरी आबादी खुले बाजार में अपनी श्रम शक्ति बेचने वाले मजदूर बन गए बनते गए जिनकी शिक्षा और स्वास्थ्य की इतनी बदहाल स्थिति आज और गहरी होती जा रही है । भूमि से लेकर कल कारखाने तथा उद्योग पर पूंजीपतियों तथा भूस्वामी के रूप में ऊंची जातियों का ही वर्चस्व रहा है।
वर्ग के अंदर के अंतर्विरोध में जातीय उत्पीड़न उपेक्षा के रूप में आता है। लेकिन जब मजदूर वर्ग तथा अन्य मेहनतकश वर्ग का जातीय उत्पीड़न होता है तो वह भयावह होता है। मेहनतकशों की उपेक्षा व उत्पीड़न “ठाकुर का कुंआ और सद्गति” जैसी कहानियों के उत्पीड़न के रूप में होता है। आधुनिक युग में कार्य स्थल पर उन्हें साथ उठने बैठने से लेकर संबोधन के रूप में होता है, कई कार्य आज भी उनके हिस्से में अमानवीय स्थिति में करने की मजबूरी के रूप में होता है।
पिछले दशकों में आमतौर पर जातीय उत्पीड़न का विमर्श पढ़े-लिखे मध्यवर्ग और सत्ता में भागीदारी के लिए संघर्ष करते उपेक्षित समाज के खाते पीते वर्ग तक सीमित हो गया, जबकि जातीय उत्पीड़न सबसे ज्यादा मेहनतकशों की होती रही है। प्यार के शासन में मैं भी यह पिछड़ी राष्ट्रीयताओं का उत्पीड़न आमतौर पर उस राष्ट्रीयता के मजदूर और गरीब किसानों का ही होता रहा था। लेनिन तथा स्तालिन ने मजदूरों तथा तमाम तरह के उत्पीड़न को समाप्त कर समाजवाद के द्वारा इसका समाधान दिया। हमारे लिबरल्स के पास शोषण और उत्पीड़न को समाप्त करने के लिए क्या ब्लूप्रिंट है, यह कभी नहीं रखते हैं। वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दमन के प्रश्न को उठाते हैं लेकिन कभी भी कोई रास्ता पेश नहीं करते हैं कि मेहनतशों के ऊपर दमन और उत्पीड़न करनेवाले को नियंत्रण में कैसे रखा जाए।
अभी हाल में कविता कृष्णन ने सोवियत संघ में स्तालिन के नेतृत्व में रूस के आर्थिक विकास के लिए यूक्रेन के किसानों के उत्पीड़न का मामला उठाया है। पहली बात तो यह कि उक्रेन सहित पूरे सोवियत संघ में धनी किसानों के अधिकार तथा दूसरे के श्रम पर निर्भर खेती करके मुनाफा कमाने की अवस्था से उन्हें बेदखल किया गया। और इसका विरोध करने पर उनकी आक्रामकता का जवाब प्रतिरोध के द्वारा दिया गया जिसकी अगली पंक्ति में गरीब किसान तथा खेत मजदूर थे।
लेनिन और स्टालिन पिछड़ी राष्ट्रीयताओं के हितों की रक्षा के लिए सोवियत संघ में लगातार सक्रिय रहे। सोवियत संघ में पिछड़े राष्ट्रीयताओं का क्रांति के बाद जो विकास हुआ इसका प्रत्यक्ष परिणाम है इन राष्ट्रीयता ओके चौतरफा विकास के रूप में इतिहास में दर्ज है है। क्या कविता कृष्णन एक भी उदाहरण पेश कर सकती हैं कि सोवियत संघ में लेनिन या स्तालिन के नेतृत्व में उक्रेन की मेहनत करने वाली आबादी का उत्पीड़न हुआ या भाषा और क्षेत्र के नाम पर किसी तरह का भेदभाव किया गया?
क्या ऐसा विकास इंग्लैंड, फ्रांस या अमेरिका ने अपने उपनिवेश या अर्ध उपनिवेश में करने की पहलकदमी ली? फिर सोवियत संघ के बजाय हमारे भूतपूर्व कामरेड लोग पूंजीवादी लोकतंत्र की वकालत में आहे क्यों भर रहे हैं?
ऐसी स्थिति में जातीय उत्पीड़न के स्वरूप की गहरी खुदाई करके मेहनतकशों का जो जातीय उत्पीड़न होता है, उसे विमर्श की अग्रिम पंक्ति में लाना होगा। वर्ग और जातीय उत्पीड़न का संबंध बड़ा गहरा है। इस गहरी स्थिति में मेहनतकश वर्गों के पक्ष में खड़ा होकर ही जातीय उत्पीड़न के सही प्रश्न को संबोधित किया जा सकता है।
किसी भी तरह के उत्पीड़न को समाप्त करने के लिए समाज का जनवादीकरण होना आवश्यक है। कम्युनिस्ट तथा मेहनतकशों के आंदोलन में भी खाते पीते वर्ग से आने वाले लोग अपने वर्गीय तथा जातीय व राष्ट्रीय पूर्वाग्रहों और संस्कृति को लेकर आते हैं। इसलिए आप जहां भी कहीं हों, शासक वर्ग के खिलाफ और खुद के खिलाफ भी आपको जनवादी उसूलों के लिए संघर्ष करना होगा। लिली ने अपनी रचनाओं में रूसी राष्ट्रीयता को अपनी ऐसी संभावित कमजोरियों के खिलाफ संघर्ष करने के लिए बार-बार सजग किया है।
आपको अपनी बात कहने का अधिकार है, बहस करने का अधिकार है, लेकिन आप दूसरे के अधिकारों की उपेक्षा करके, अपने पूर्व से अर्जित क्षमता के कारण हावी नहीं हो सकते हैं। यही वह स्थिति है जिस पर विचार करना होगा कि ऐसा क्यों होता है?
ऐसा इसलिए हो रहा है कि समाज वर्गों तथा सदियों से उत्पीड़क तथा उत्पीड़ित जातियों, राष्ट्रीयताओं , समाजों और क्षेत्र के रूप में बंटा रहा है जिसमें सक्षम वर्ग तथा समाज ने पिछड़े समाज, वर्ग तथा प्रदेश पर शासन किया है। इस स्थिति को खत्म करना होगा।
नये जनवाद की ऐसी व्यवस्था का नाम समाजवाद है लेकिन यह समाजवाद तब तक लागू नहीं हो सकता है जब तक कि उत्पीड़क वर्ग तथा समाज को नियंत्रण में ना लाया जाए। इसलिए बहुमत आबादी के जनवाद को लागू करने के लिए आवश्यक है कि मुट्ठी भर जो अल्पसंख्यक हैं, उनके ऊपर नियंत्रण किया जाए। ऐसी परिस्थिति को लागू करते हुए लेनिन तथा स्टालिन ने सोवियत संघ में जार के समय के शोषकव शासक वर्ग के अधिकारों को नियंत्रण किया तथा मेहनतकशों के अधिकार को बहाल किया।
दुर्भाग्य से भारत में पूंजीवादी लोकतंत्र के बहाल होने के बाद यह सब नहीं हुआ और ना ही लोकतंत्र को महामंडित करने वाले पश्चिम के देशों में। लेनिन तथा स्टालिन ने उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के अधिकारों को अलग से रेखांकित किया और उसे सुरक्षित करने के लिए, उन्हें विकसित होकर पहले से विकसित समाज के स्तर पर आने के लिए अतिरिक्त सुविधाएं उपलब्ध कराई। इसलिए वास्तविक जनवाद सिर्फ समाजवाद में ही लागू हो सकता है जिसके शासन का आधार है “पहले से सुविधा संपन्न सभी वर्गों के दूसरों का शोषण व उत्पीड़ित करने के सभी अधिकारों और प्रवृत्तियों” पर रोक लगाना।
इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए निजी संपत्ति के सामाजीकरण कर सबों को तमाम साधन तथा अवसर उपलब्ध कराना पहली शर्त बन जाती है । क्या कविता कृष्णन ने निजी संपत्ति के खत्म करने के प्रश्न को जनतंत्र के प्रश्न से जोड़ कर अपनी बात हाल के इंटरव्यू में कहा? वह उस जनतंत्र का वकालत कर रही हैं जिसमें शोषण और उत्पीड़न करने का जो भौतिक आधार है, वह प्रबलता के साथ बना रहेगा।
हमारे देश सहित पूरी दुनिया के लिबरल्स कराह उठते हैं, जब प्रभुत्वशाली वर्गों के अधिकार की कटौती की बात की जाती है, लेकिन वे ऐसी कोई भी रूपरेखा नहीं रख पाते हैं, जिसमें शोषकों के अधिकारों पर नियंत्रण किए बगैर उपेक्षित तथा शोषित वर्ग के जनवाद के अधिकारों को लागू किया जाएगा। प्रभुत्वशाली वर्गों के अधिकारों पर लगाम लगाने के क्रम में कई गलतियां हो सकती है, हम ज्यादा से ज्यादा सावधानी ही बरत सकते हैं। लेकिन इसके नाम पर पूंजीवादी जनतंत्र के जुमलों की आड़ में शोषक वर्गों को खुली छूट नहीं दी जा सकती है। यह खुली छूट शोषित वर्गों के जनवादी अधिकार पर हमले का चोर दरवाजा बन जाता है और पूरी दुनिया में लिबरल्स इस चोर दरवाजे की पहरेदारी के लिए बड़े सजग होकर बहस चलाते हैं।
हमें मजबूती के साथ मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण के साथ मेहनतकशों के पक्ष में खड़े रहना है। और इसके लिए लेनिन और स्तालिन के द्वारा प्रस्तुत विचारों को मजबूती के साथ पेश करना है।

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